26/07/2026
नीट पेपर लीक, CJP आंदोलन और मोदी सरकार का निर्णय: जवाबदेही की जीत, अवसरवादी राजनीति के लिए सबक।
नीट जैसी राष्ट्रीय परीक्षा केवल प्रवेश परीक्षा नहीं, बल्कि लाखों युवाओं के परिश्रम, अभिभावकों के त्याग और देश की चिकित्सा-शिक्षा व्यवस्था में उनके विश्वास की परीक्षा भी होती है। ऐसे में प्रश्नपत्र का लीक होना साधारण प्रशासनिक चूक नहीं, बल्कि प्रतिभा, समान अवसर और परीक्षा की निष्पक्षता पर गंभीर आघात है। वर्षों तक कठिन परिश्रम करने वाले विद्यार्थियों को यदि किसी संगठित गिरोह या भ्रष्ट तंत्र के कारण दोबारा परीक्षा और अनिश्चितता से गुजरना पड़े, तो उनका आक्रोश पूर्णतः स्वाभाविक है।
CJP के नेतृत्व में हुआ छात्र आंदोलन इसी पीड़ा की लोकतांत्रिक अभिव्यक्ति बनकर सामने आया। इस आंदोलन ने पेपर लीक को केवल एक परीक्षा की गड़बड़ी न रहने देकर राष्ट्रीय जवाबदेही का विषय बना दिया। लोकतंत्र में शांतिपूर्ण विरोध सरकार-विरोधी अथवा राष्ट्र-विरोधी गतिविधि नहीं, बल्कि शासन को उसकी जिम्मेदारी का स्मरण कराने वाला संवैधानिक माध्यम है। युवा प्रदर्शनकारियों ने यह संदेश दिया कि नई पीढ़ी शिक्षा, रोजगार, पारदर्शिता और उत्तरदायित्व जैसे वास्तविक मुद्दों पर अपनी आवाज उठाना जानती है।
इसके साथ यह भी स्वीकार करना होगा कि किसी आंदोलन की वैधता उसके शांतिपूर्ण और संवैधानिक चरित्र में निहित होती है। सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान, हिंसा, सामान्य जनजीवन को अनावश्यक रूप से बाधित करना अथवा विद्यार्थियों के आंदोलन का राजनीतिक दलों द्वारा अपने हित में इस्तेमाल किया जाना उसके मूल उद्देश्य को कमजोर करता है। कानून-व्यवस्था बनाए रखना सरकार का दायित्व है, लेकिन शांतिपूर्ण छात्रों के विरुद्ध बल का प्रयोग सदैव न्यूनतम, आवश्यक और परिस्थितियों के अनुपात में होना चाहिए।
केंद्र सरकार के प्रारम्भिक रवैये पर प्रश्न उठना भी स्वाभाविक है। परीक्षा की सुरक्षा व्यवस्था विफल क्यों हुई, जिम्मेदार अधिकारियों और एजेंसियों पर तत्काल कार्रवाई क्यों नहीं हुई तथा विद्यार्थियों से सीधा संवाद पहले क्यों स्थापित नहीं किया गया—इन प्रश्नों के स्पष्ट उत्तर मिलने चाहिए। सरकार के पास कार्यपालिका की शक्ति है, इसलिए जवाबदेही भी अंततः उसी की होती है। परंतु इस उत्तरदायित्व की मांग और एक निर्वाचित सरकार को अस्थिर करने के राजनीतिक प्रयास के बीच स्पष्ट अंतर बनाए रखना भी उतना ही आवश्यक है।
इस घटनाक्रम में कांग्रेस और समाजवादी पार्टी की भूमिका पर भी गंभीर प्रश्न उठते हैं। विपक्ष का संवैधानिक दायित्व है कि वह विद्यार्थियों की आवाज उठाए, सरकार से उत्तर मांगे और सुधार के लिए दबाव बनाए। परंतु जब छात्र हित के मुद्दे को प्रधानमंत्री आवास के घेराव, संसद को लगातार बाधित करने और इसे सीधे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विरुद्ध राजनीतिक अभियान में बदलने का प्रयास किया गया, तब यह आभास उत्पन्न होना स्वाभाविक था कि उद्देश्य केवल विद्यार्थियों को न्याय दिलाना नहीं, बल्कि इस अवसर के सहारे अपने राजनीतिक हित साधना और पुराना राजनीतिक हिसाब बराबर करना भी था। रॉयटर्स के राजनीतिक विश्लेषण में भी कहा गया कि विपक्षी दलों ने आंदोलन से पैदा हुए राजनीतिक अवसर का लाभ उठाने का प्रयास किया।
कांग्रेस और समाजवादी पार्टी के नेताओं को यह समझना चाहिए कि विद्यार्थियों का स्वतःस्फूर्त आंदोलन किसी दल की चुनावी संपत्ति नहीं है। राहुल गांधी, प्रियंका गांधी और अखिलेश यादव को सरकार की आलोचना करने का पूरा अधिकार है, लेकिन आंदोलन को मोदी सरकार के विरुद्ध व्यापक सत्ता-संघर्ष के रूप में प्रस्तुत करना विद्यार्थियों की मूल मांगों को पीछे धकेल देता है। यदि विपक्ष सचमुच परीक्षा-सुधार चाहता था, तो उसे संसद में विस्तृत चर्चा, सर्वदलीय समिति, जांच की समय-सीमा और ठोस विधायी सुझावों पर जोर देना चाहिए था। केवल इस्तीफे को बहस की पूर्व शर्त बनाकर सदन की कार्यवाही बाधित करना समाधानपरक राजनीति नहीं कहा जा सकता।
इससे भी अधिक चिंताजनक वे राजनीतिक और समर्थक स्वर थे जिनमें भारत के आंदोलन की तुलना नेपाल, बांग्लादेश और श्रीलंका के तथाकथित Gen-Z आंदोलनों से की जाने लगी। उन देशों में आंदोलन अंततः सरकारों के पतन, व्यापक हिंसा, संवैधानिक अस्थिरता और सार्वजनिक संस्थाओं पर हमलों तक पहुंचे थे। भारत एक विशाल, स्थिर और परिपक्व संसदीय लोकतंत्र है, जहां सरकारें सोशल मीडिया के दबाव अथवा सड़क की भीड़ से नहीं, बल्कि संविधान और चुनाव के माध्यम से बदलती हैं। नेपाल या बांग्लादेश जैसी परिस्थिति उत्पन्न करने के संकेत देना लोकतांत्रिक विरोध नहीं, बल्कि गैर-जिम्मेदार राजनीतिक रोमांच है।
महत्त्वपूर्ण बात यह है कि स्वयं CJP के संस्थापक अभिजीत दिपके ने नेपाल और बांग्लादेश से की जा रही तुलना को स्पष्ट रूप से अस्वीकार करते हुए भारतीय युवाओं के आंदोलन को शांतिपूर्ण, संवैधानिक और लोकतांत्रिक बताया था। इसलिए विपक्षी दलों द्वारा ऐसी तुलना को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से हवा देना CJP के घोषित दृष्टिकोण के भी विपरीत था।
कांग्रेस और समाजवादी पार्टी को यह भी स्वीकार करना होगा कि नरेंद्र मोदी सरकार देश के मतदाताओं द्वारा संवैधानिक प्रक्रिया के माध्यम से चुनी गई एक लोकप्रिय सरकार है। किसी प्रशासनिक विफलता पर सरकार को उत्तरदायी ठहराना लोकतंत्र है, लेकिन उसी विफलता को सरकार को अस्थिर करने के राजनीतिक औजार में बदलना जनादेश का अनादर है। लोकतंत्र में विपक्ष का काम सरकार गिराने के अवसर तलाशना मात्र नहीं, बल्कि स्वयं को एक जिम्मेदार और विश्वसनीय विकल्प के रूप में प्रस्तुत करना भी होता है। विपक्ष यदि हर जन-आंदोलन को चुनावी लाभ के चश्मे से देखेगा, तो उसकी नीयत पर प्रश्न उठना स्वाभाविक है।
दूसरी ओर, सत्तापक्ष को भी प्रत्येक असहमति को षड्यंत्र या राष्ट्र-विरोध का नाम देकर खारिज नहीं करना चाहिए। विद्यार्थियों की मूल शिकायतें वास्तविक थीं और उन्हें सुनना सरकार की जिम्मेदारी थी। इसी दृष्टि से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्र सरकार द्वारा अंततः उठाए गए कदमों की निष्पक्ष रूप से सराहना की जानी चाहिए। प्रधानमंत्री ने पेपर लीक के मामलों की त्वरित सुनवाई के लिए फास्ट-ट्रैक अदालतें स्थापित करने तथा दोषियों को शीघ्र और कठोर दंड दिलाने की घोषणा की। सरकार ने सार्वजनिक परीक्षा कानून को अधिक प्रभावी बनाने, सजा एवं आर्थिक दंड बढ़ाने और मामलों के समयबद्ध निस्तारण की व्यवस्था करने की दिशा में भी पहल की है। प्रस्तावित संशोधनों में दोषियों के लिए दस वर्ष तक कारावास और दस करोड़ रुपये तक जुर्माने की बात सामने आई है, हालांकि इन्हें अंतिम कानूनी स्वरूप संसद की स्वीकृति के बाद ही मिलेगा।
शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा और केंद्र द्वारा आंदोलनकारियों की प्रमुख मांगों—परीक्षा प्रणाली में सुधार, प्रभावित परिवारों को सहायता तथा शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों के विरुद्ध मामलों पर पुनर्विचार—को स्वीकार करना राजनीतिक दृष्टि से साहसिक और लोकतांत्रिक रूप से उचित निर्णय है। इसके बाद CJP ने आंदोलन वापस लेने और समर्थकों से शांतिपूर्वक घर लौटने की अपील की।
इस निर्णय को मोदी सरकार की पराजय बताना राजनीतिक दुर्भावना होगी। लोकतंत्र में जनभावना सुनना, संवाद के बाद अपने दृष्टिकोण में सुधार करना और राजनीतिक जवाबदेही स्वीकार करना कमजोरी नहीं, बल्कि परिपक्व तथा संवेदनशील नेतृत्व की पहचान है। प्रधानमंत्री मोदी ने यह प्रदर्शित किया कि मजबूत सरकार वह नहीं होती जो प्रत्येक परिस्थिति में अपनी प्रारम्भिक स्थिति पर अड़ी रहे, बल्कि वह होती है जो राष्ट्रहित और युवाओं के भविष्य को राजनीतिक प्रतिष्ठा से ऊपर रखने का साहस दिखाए।
फिर भी केवल इस्तीफा, कठोर कानून अथवा फास्ट-ट्रैक अदालतों की घोषणा से समस्या समाप्त नहीं होगी। त्वरित न्याय के लिए विशेषज्ञ जांच अधिकारी, डिजिटल एवं फोरेंसिक साक्ष्य, सक्षम अभियोजन, गवाहों की सुरक्षा और राज्यों तथा उच्च न्यायालयों का समन्वय आवश्यक होगा। विधि विशेषज्ञों ने भी स्पष्ट किया है कि फास्ट-ट्रैक व्यवस्था तभी सफल होगी जब उसके साथ गुणवत्तापूर्ण जांच और पर्याप्त न्यायिक संसाधन उपलब्ध कराए जाएं।
इस पूरे घटनाक्रम का संतुलित निष्कर्ष यही है कि विद्यार्थियों का आक्रोश न्यायसंगत था, CJP के शांतिपूर्ण आंदोलन ने महत्वपूर्ण लोकतांत्रिक भूमिका निभाई और मोदी सरकार ने अंततः संवाद, जवाबदेही तथा सुधार का सही मार्ग चुना। कांग्रेस और समाजवादी पार्टी सहित विपक्ष को अब राजनीतिक अस्थिरता की भाषा छोड़कर विधायी सुधारों में रचनात्मक सहयोग करना चाहिए। सरकार के निर्णय की वास्तविक सफलता तभी मानी जाएगी जब दोषियों को दंड मिले, परीक्षा व्यवस्था सुरक्षित बने और भविष्य में किसी मेहनती विद्यार्थी का सपना प्रश्नपत्र माफिया अथवा अवसरवादी राजनीति के हाथों न बिक सके।