Umesh Sharma

Umesh Sharma राष्ट्रभक्ति ले हृदय में, हो खड़ा यदि देश सारा।
संकटो पर मात कर, यह राष्ट्र विजयी हो हमारा।।

कारगिल विजय दिवस 🇮🇳26 जुलाई केवल एक तिथि नहीं, बल्कि भारतीय सैनिकों के अदम्य साहस, अटूट संकल्प और सर्वोच्च बलिदान का अमर...
26/07/2026

कारगिल विजय दिवस 🇮🇳

26 जुलाई केवल एक तिथि नहीं, बल्कि भारतीय सैनिकों के अदम्य साहस, अटूट संकल्प और सर्वोच्च बलिदान का अमर प्रतीक है। कारगिल की दुर्गम चोटियों पर हमारे वीर जवानों ने असाधारण वीरता का परिचय देते हुए यह सिद्ध किया कि भारत की संप्रभुता और सम्मान की रक्षा के लिए भारतीय सेना किसी भी चुनौती का सामना करने में सक्षम है।
हम उन अमर वीरों को श्रद्धापूर्वक नमन करते हैं जिन्होंने मातृभूमि की रक्षा के लिए अपने प्राण न्योछावर कर दिए। उनके बलिदान के कारण ही हम सुरक्षित वातावरण में अपने अधिकारों और स्वतंत्रता का आनंद ले रहे हैं।
आइए, इस पावन अवसर पर हम राष्ट्र की एकता, अखंडता और सुरक्षा के प्रति अपने दायित्वों का भी संकल्प लें तथा अपने वीर सैनिकों और उनके परिवारों के प्रति सम्मान एवं कृतज्ञता व्यक्त करें।

शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर बरस मेले,
वतन पर मिटने वालों का यही बाकी निशाँ होगा।

जय हिन्द! 🇮🇳
जय भारत!
वन्दे मातरम्!

नीट पेपर लीक, CJP आंदोलन और मोदी सरकार का निर्णय: जवाबदेही की जीत, अवसरवादी राजनीति के लिए सबक।नीट जैसी राष्ट्रीय परीक्ष...
26/07/2026

नीट पेपर लीक, CJP आंदोलन और मोदी सरकार का निर्णय: जवाबदेही की जीत, अवसरवादी राजनीति के लिए सबक।

नीट जैसी राष्ट्रीय परीक्षा केवल प्रवेश परीक्षा नहीं, बल्कि लाखों युवाओं के परिश्रम, अभिभावकों के त्याग और देश की चिकित्सा-शिक्षा व्यवस्था में उनके विश्वास की परीक्षा भी होती है। ऐसे में प्रश्नपत्र का लीक होना साधारण प्रशासनिक चूक नहीं, बल्कि प्रतिभा, समान अवसर और परीक्षा की निष्पक्षता पर गंभीर आघात है। वर्षों तक कठिन परिश्रम करने वाले विद्यार्थियों को यदि किसी संगठित गिरोह या भ्रष्ट तंत्र के कारण दोबारा परीक्षा और अनिश्चितता से गुजरना पड़े, तो उनका आक्रोश पूर्णतः स्वाभाविक है।
CJP के नेतृत्व में हुआ छात्र आंदोलन इसी पीड़ा की लोकतांत्रिक अभिव्यक्ति बनकर सामने आया। इस आंदोलन ने पेपर लीक को केवल एक परीक्षा की गड़बड़ी न रहने देकर राष्ट्रीय जवाबदेही का विषय बना दिया। लोकतंत्र में शांतिपूर्ण विरोध सरकार-विरोधी अथवा राष्ट्र-विरोधी गतिविधि नहीं, बल्कि शासन को उसकी जिम्मेदारी का स्मरण कराने वाला संवैधानिक माध्यम है। युवा प्रदर्शनकारियों ने यह संदेश दिया कि नई पीढ़ी शिक्षा, रोजगार, पारदर्शिता और उत्तरदायित्व जैसे वास्तविक मुद्दों पर अपनी आवाज उठाना जानती है।
इसके साथ यह भी स्वीकार करना होगा कि किसी आंदोलन की वैधता उसके शांतिपूर्ण और संवैधानिक चरित्र में निहित होती है। सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान, हिंसा, सामान्य जनजीवन को अनावश्यक रूप से बाधित करना अथवा विद्यार्थियों के आंदोलन का राजनीतिक दलों द्वारा अपने हित में इस्तेमाल किया जाना उसके मूल उद्देश्य को कमजोर करता है। कानून-व्यवस्था बनाए रखना सरकार का दायित्व है, लेकिन शांतिपूर्ण छात्रों के विरुद्ध बल का प्रयोग सदैव न्यूनतम, आवश्यक और परिस्थितियों के अनुपात में होना चाहिए।
केंद्र सरकार के प्रारम्भिक रवैये पर प्रश्न उठना भी स्वाभाविक है। परीक्षा की सुरक्षा व्यवस्था विफल क्यों हुई, जिम्मेदार अधिकारियों और एजेंसियों पर तत्काल कार्रवाई क्यों नहीं हुई तथा विद्यार्थियों से सीधा संवाद पहले क्यों स्थापित नहीं किया गया—इन प्रश्नों के स्पष्ट उत्तर मिलने चाहिए। सरकार के पास कार्यपालिका की शक्ति है, इसलिए जवाबदेही भी अंततः उसी की होती है। परंतु इस उत्तरदायित्व की मांग और एक निर्वाचित सरकार को अस्थिर करने के राजनीतिक प्रयास के बीच स्पष्ट अंतर बनाए रखना भी उतना ही आवश्यक है।
इस घटनाक्रम में कांग्रेस और समाजवादी पार्टी की भूमिका पर भी गंभीर प्रश्न उठते हैं। विपक्ष का संवैधानिक दायित्व है कि वह विद्यार्थियों की आवाज उठाए, सरकार से उत्तर मांगे और सुधार के लिए दबाव बनाए। परंतु जब छात्र हित के मुद्दे को प्रधानमंत्री आवास के घेराव, संसद को लगातार बाधित करने और इसे सीधे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विरुद्ध राजनीतिक अभियान में बदलने का प्रयास किया गया, तब यह आभास उत्पन्न होना स्वाभाविक था कि उद्देश्य केवल विद्यार्थियों को न्याय दिलाना नहीं, बल्कि इस अवसर के सहारे अपने राजनीतिक हित साधना और पुराना राजनीतिक हिसाब बराबर करना भी था। रॉयटर्स के राजनीतिक विश्लेषण में भी कहा गया कि विपक्षी दलों ने आंदोलन से पैदा हुए राजनीतिक अवसर का लाभ उठाने का प्रयास किया।
कांग्रेस और समाजवादी पार्टी के नेताओं को यह समझना चाहिए कि विद्यार्थियों का स्वतःस्फूर्त आंदोलन किसी दल की चुनावी संपत्ति नहीं है। राहुल गांधी, प्रियंका गांधी और अखिलेश यादव को सरकार की आलोचना करने का पूरा अधिकार है, लेकिन आंदोलन को मोदी सरकार के विरुद्ध व्यापक सत्ता-संघर्ष के रूप में प्रस्तुत करना विद्यार्थियों की मूल मांगों को पीछे धकेल देता है। यदि विपक्ष सचमुच परीक्षा-सुधार चाहता था, तो उसे संसद में विस्तृत चर्चा, सर्वदलीय समिति, जांच की समय-सीमा और ठोस विधायी सुझावों पर जोर देना चाहिए था। केवल इस्तीफे को बहस की पूर्व शर्त बनाकर सदन की कार्यवाही बाधित करना समाधानपरक राजनीति नहीं कहा जा सकता।
इससे भी अधिक चिंताजनक वे राजनीतिक और समर्थक स्वर थे जिनमें भारत के आंदोलन की तुलना नेपाल, बांग्लादेश और श्रीलंका के तथाकथित Gen-Z आंदोलनों से की जाने लगी। उन देशों में आंदोलन अंततः सरकारों के पतन, व्यापक हिंसा, संवैधानिक अस्थिरता और सार्वजनिक संस्थाओं पर हमलों तक पहुंचे थे। भारत एक विशाल, स्थिर और परिपक्व संसदीय लोकतंत्र है, जहां सरकारें सोशल मीडिया के दबाव अथवा सड़क की भीड़ से नहीं, बल्कि संविधान और चुनाव के माध्यम से बदलती हैं। नेपाल या बांग्लादेश जैसी परिस्थिति उत्पन्न करने के संकेत देना लोकतांत्रिक विरोध नहीं, बल्कि गैर-जिम्मेदार राजनीतिक रोमांच है।
महत्त्वपूर्ण बात यह है कि स्वयं CJP के संस्थापक अभिजीत दिपके ने नेपाल और बांग्लादेश से की जा रही तुलना को स्पष्ट रूप से अस्वीकार करते हुए भारतीय युवाओं के आंदोलन को शांतिपूर्ण, संवैधानिक और लोकतांत्रिक बताया था। इसलिए विपक्षी दलों द्वारा ऐसी तुलना को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से हवा देना CJP के घोषित दृष्टिकोण के भी विपरीत था।
कांग्रेस और समाजवादी पार्टी को यह भी स्वीकार करना होगा कि नरेंद्र मोदी सरकार देश के मतदाताओं द्वारा संवैधानिक प्रक्रिया के माध्यम से चुनी गई एक लोकप्रिय सरकार है। किसी प्रशासनिक विफलता पर सरकार को उत्तरदायी ठहराना लोकतंत्र है, लेकिन उसी विफलता को सरकार को अस्थिर करने के राजनीतिक औजार में बदलना जनादेश का अनादर है। लोकतंत्र में विपक्ष का काम सरकार गिराने के अवसर तलाशना मात्र नहीं, बल्कि स्वयं को एक जिम्मेदार और विश्वसनीय विकल्प के रूप में प्रस्तुत करना भी होता है। विपक्ष यदि हर जन-आंदोलन को चुनावी लाभ के चश्मे से देखेगा, तो उसकी नीयत पर प्रश्न उठना स्वाभाविक है।
दूसरी ओर, सत्तापक्ष को भी प्रत्येक असहमति को षड्यंत्र या राष्ट्र-विरोध का नाम देकर खारिज नहीं करना चाहिए। विद्यार्थियों की मूल शिकायतें वास्तविक थीं और उन्हें सुनना सरकार की जिम्मेदारी थी। इसी दृष्टि से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्र सरकार द्वारा अंततः उठाए गए कदमों की निष्पक्ष रूप से सराहना की जानी चाहिए। प्रधानमंत्री ने पेपर लीक के मामलों की त्वरित सुनवाई के लिए फास्ट-ट्रैक अदालतें स्थापित करने तथा दोषियों को शीघ्र और कठोर दंड दिलाने की घोषणा की। सरकार ने सार्वजनिक परीक्षा कानून को अधिक प्रभावी बनाने, सजा एवं आर्थिक दंड बढ़ाने और मामलों के समयबद्ध निस्तारण की व्यवस्था करने की दिशा में भी पहल की है। प्रस्तावित संशोधनों में दोषियों के लिए दस वर्ष तक कारावास और दस करोड़ रुपये तक जुर्माने की बात सामने आई है, हालांकि इन्हें अंतिम कानूनी स्वरूप संसद की स्वीकृति के बाद ही मिलेगा।
शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा और केंद्र द्वारा आंदोलनकारियों की प्रमुख मांगों—परीक्षा प्रणाली में सुधार, प्रभावित परिवारों को सहायता तथा शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों के विरुद्ध मामलों पर पुनर्विचार—को स्वीकार करना राजनीतिक दृष्टि से साहसिक और लोकतांत्रिक रूप से उचित निर्णय है। इसके बाद CJP ने आंदोलन वापस लेने और समर्थकों से शांतिपूर्वक घर लौटने की अपील की।
इस निर्णय को मोदी सरकार की पराजय बताना राजनीतिक दुर्भावना होगी। लोकतंत्र में जनभावना सुनना, संवाद के बाद अपने दृष्टिकोण में सुधार करना और राजनीतिक जवाबदेही स्वीकार करना कमजोरी नहीं, बल्कि परिपक्व तथा संवेदनशील नेतृत्व की पहचान है। प्रधानमंत्री मोदी ने यह प्रदर्शित किया कि मजबूत सरकार वह नहीं होती जो प्रत्येक परिस्थिति में अपनी प्रारम्भिक स्थिति पर अड़ी रहे, बल्कि वह होती है जो राष्ट्रहित और युवाओं के भविष्य को राजनीतिक प्रतिष्ठा से ऊपर रखने का साहस दिखाए।
फिर भी केवल इस्तीफा, कठोर कानून अथवा फास्ट-ट्रैक अदालतों की घोषणा से समस्या समाप्त नहीं होगी। त्वरित न्याय के लिए विशेषज्ञ जांच अधिकारी, डिजिटल एवं फोरेंसिक साक्ष्य, सक्षम अभियोजन, गवाहों की सुरक्षा और राज्यों तथा उच्च न्यायालयों का समन्वय आवश्यक होगा। विधि विशेषज्ञों ने भी स्पष्ट किया है कि फास्ट-ट्रैक व्यवस्था तभी सफल होगी जब उसके साथ गुणवत्तापूर्ण जांच और पर्याप्त न्यायिक संसाधन उपलब्ध कराए जाएं।
इस पूरे घटनाक्रम का संतुलित निष्कर्ष यही है कि विद्यार्थियों का आक्रोश न्यायसंगत था, CJP के शांतिपूर्ण आंदोलन ने महत्वपूर्ण लोकतांत्रिक भूमिका निभाई और मोदी सरकार ने अंततः संवाद, जवाबदेही तथा सुधार का सही मार्ग चुना। कांग्रेस और समाजवादी पार्टी सहित विपक्ष को अब राजनीतिक अस्थिरता की भाषा छोड़कर विधायी सुधारों में रचनात्मक सहयोग करना चाहिए। सरकार के निर्णय की वास्तविक सफलता तभी मानी जाएगी जब दोषियों को दंड मिले, परीक्षा व्यवस्था सुरक्षित बने और भविष्य में किसी मेहनती विद्यार्थी का सपना प्रश्नपत्र माफिया अथवा अवसरवादी राजनीति के हाथों न बिक सके।

हिमाचल में परिवर्तन की लहर स्पष्ट दिखाई दे रही है।कांग्रेस सरकार की विदाई और भाजपा सरकार के आगमन का समय निकट है।जुब्बल-क...
24/05/2026

हिमाचल में परिवर्तन की लहर स्पष्ट दिखाई दे रही है।
कांग्रेस सरकार की विदाई और भाजपा सरकार के आगमन का समय निकट है।
जुब्बल-कोटखाई विधानसभा क्षेत्र के समग्र विकास, मजबूत नेतृत्व और जनसेवा के संकल्प को आगे बढ़ाने के लिए भाजपा समर्थित जिला परिषद उम्मीदवारों को भारी मतों से विजयी बनाएं।
वार्ड नं. 9 टिक्कर-बुशेहर से श्री अनुपम चौहान
वार्ड नं. 10 सरस्वती नगर से श्रीमती श्वेता चौहान
वार्ड नं. 11 बड़ाल से श्रीमती रचना नेगी
वार्ड नं. 12 कलबोग से श्रीमती नीना चौहान (बबली)

आपका एक वोट क्षेत्र के विकास, युवाओं के भविष्य, महिलाओं के सशक्तिकरण और बेहतर सुविधाओं की दिशा तय करेगा।

आइए, भाजपा समर्थित उम्मीदवारों के पक्ष में मतदान कर विकास, सुशासन और जनसेवा की नई दिशा सुनिश्चित करें।

उमेश शर्मा एडवोकेट
पूर्व मंडल अध्यक्ष
जुब्बल-कोटखाई भाजपा


Chetan Singh Bragta Arun Singh FaltaSanjeev SoodPavan RanaSuresh KashyapRajeev Bindal@highlightB J P JubbalBjp Kotkhai Anupam Chauhan

पश्चिमी मीडिया और कांग्रेस का नैरेटिव गठबंधन : भारत की छवि को निशाना बनाने की राजनीतिप्रधानमंत्री Narendra Modi की हालिय...
21/05/2026

पश्चिमी मीडिया और कांग्रेस का नैरेटिव गठबंधन : भारत की छवि को निशाना बनाने की राजनीति

प्रधानमंत्री Narendra Modi की हालिया यूरोप यात्रा के दौरान एक विदेशी पत्रकार द्वारा पूछे गए प्रश्न को जिस प्रकार अंतरराष्ट्रीय मीडिया और भारत में कांग्रेस समर्थित नैरेटिव समूहों ने प्रस्तुत किया, उसने एक बार फिर यह स्पष्ट कर दिया कि भारत के विरुद्ध एक सुनियोजित वैचारिक अभियान चलाया जा रहा है। नॉर्वे में एक पत्रकार ने प्रधानमंत्री से यह प्रश्न किया कि वे “दुनिया की सबसे स्वतंत्र प्रेस” से प्रश्न क्यों नहीं लेते। इस घटना को कुछ पश्चिमी मीडिया संस्थानों ने तुरंत “भारतीय लोकतंत्र” और “प्रेस स्वतंत्रता” के संकट के रूप में प्रस्तुत करना शुरू कर दिया। यह पहली बार नहीं है।
जब भी भारत वैश्विक स्तर पर मज़बूत होता है, अपनी स्वतंत्र विदेश नीति अपनाता है, सांस्कृतिक आत्मविश्वास दिखाता है या विश्व राजनीति में निर्णायक भूमिका निभाता है, तब पश्चिमी मीडिया का एक वर्ग अचानक भारत में लोकतंत्र, अल्पसंख्यक अधिकार, प्रेस स्वतंत्रता और मानवाधिकारों को लेकर सक्रिय हो जाता है। वही नैरेटिव भारत के भीतर कांग्रेस और उसके सहयोगी वैचारिक समूह तुरंत उठाकर राजनीतिक हथियार बना लेते हैं।
विडम्बना यह है कि जिन पश्चिमी देशों में स्वयं मीडिया कॉर्पोरेट हितों, वैचारिक लॉबियों और सत्ता समूहों से प्रभावित रहता है, वही भारत को लोकतंत्र का पाठ पढ़ाने लगते हैं। भारत जैसे विशाल और बहुलतावादी लोकतंत्र को पश्चिमी मापदंडों से आंकना ही एक प्रकार की औपनिवेशिक मानसिकता है।
हाल ही में प्रधानमंत्री मोदी की इटली यात्रा के दौरान भी यही प्रवृत्ति देखने को मिली। इटली की प्रधानमंत्री Giorgia Meloni और प्रधानमंत्री मोदी के बीच हुए एक हल्के-फुल्के सांस्कृतिक संवाद और “Melodi” क्षण को सोशल मीडिया पर व्यापक लोकप्रियता मिली। लेकिन भारत में कांग्रेस नेताओं और विपक्षी इकोसिस्टम ने उसी को घरेलू समस्याओं से जोड़कर उपहास और राजनीतिक हमले का माध्यम बना दिया।
यहाँ सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि क्या भारत की हर अंतरराष्ट्रीय उपलब्धि और कूटनीतिक सफलता को घरेलू राजनीति के लिए बदनाम करना उचित है?
पश्चिमी मीडिया के एक हिस्से की समस्या केवल मोदी सरकार नहीं है। वास्तविक समस्या भारत का उभरता हुआ आत्मविश्वास है। आज का भारत पश्चिमी शक्तियों का अनुगामी राष्ट्र नहीं बल्कि स्वतंत्र वैश्विक शक्ति बन रहा है। भारत रूस से भी संबंध रखता है, अमेरिका से भी; पश्चिम एशिया में भी प्रभाव रखता है और वैश्विक दक्षिण की आवाज़ भी बन रहा है। यही नई भारतीय विदेश नीति कई पश्चिमी वैचारिक समूहों को असहज करती है।
नॉर्वे की पत्रकार के प्रश्न को लेकर जिस प्रकार अंतरराष्ट्रीय मीडिया ने एक समन्वित विमर्श चलाया, उससे स्पष्ट होता है कि भारत को लेकर पहले से तैयार वैचारिक ढाँचा मौजूद है। भारत में प्रेस प्रतिदिन सरकार की आलोचना करती है, टीवी डिबेट्स में प्रधानमंत्री और सरकार पर खुले आरोप लगाए जाते हैं, सोशल मीडिया पूरी तरह सक्रिय है, विपक्ष संसद से सड़क तक आंदोलन करता है — फिर भी भारत को “दबावग्रस्त लोकतंत्र” बताने का प्रयास जारी रहता है।
यह भी ध्यान देने योग्य है कि कई पश्चिमी मीडिया संस्थान भारत को आज भी उसी औपनिवेशिक दृष्टि से देखते हैं जिसमें एक आत्मविश्वासी और सांस्कृतिक रूप से जागृत भारत उन्हें स्वीकार्य नहीं है। हाल ही में एक यूरोपीय अख़बार में प्रधानमंत्री मोदी का अपमानजनक कार्टून प्रकाशित किया गया, जिसे भारत में व्यापक विरोध का सामना करना पड़ा। यह केवल एक कार्टून नहीं था, बल्कि उस मानसिकता का प्रतीक था जो भारत को अब भी रूढ़ छवियों में देखना चाहती है।
दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि कांग्रेस जैसी राष्ट्रीय पार्टी ऐसे अवसरों पर भारत के पक्ष में खड़े होने के बजाय उन्हीं विदेशी नैरेटिव्स को राजनीतिक लाभ के लिए आगे बढ़ाती दिखाई देती है। यह स्वस्थ लोकतांत्रिक विपक्ष की भूमिका नहीं है। लोकतंत्र में सरकार की आलोचना आवश्यक है, लेकिन राष्ट्र की वैश्विक छवि को कमजोर करना और विदेशी वैचारिक अभियानों का अप्रत्यक्ष हिस्सा बनना अत्यंत खतरनाक प्रवृत्ति है।
आज विश्व राजनीति केवल सीमाओं पर नहीं, बल्कि नैरेटिव और सूचना के स्तर पर भी लड़ी जा रही है। सोशल मीडिया, संपादकीय अभियान, चयनात्मक रिपोर्टिंग और वैचारिक पत्रकारिता आधुनिक “सूचना युद्ध” के उपकरण बन चुके हैं।
भारत के नागरिकों को यह समझना होगा कि हर वायरल वीडियो, हर विदेशी रिपोर्ट और हर अंतरराष्ट्रीय आलोचना निष्पक्ष नहीं होती। कई बार उसके पीछे भू-राजनीतिक हित, वैचारिक पूर्वाग्रह और राजनीतिक एजेंडा छिपे होते हैं।
भारत की लोकतांत्रिक शक्ति उसकी जनता है, न कि पश्चिमी संपादकीय कक्षों की स्वीकृति।
और भारत का भविष्य दिल्ली, काशी, मुंबई और बेंगलुरु में तय होगा — न कि लंदन, ओस्लो या न्यूयॉर्क के वैचारिक गलियारों में।
-Umesh Sharma, Advocate

पश्चिमी मीडिया और कांग्रेस का नैरेटिव गठबंधन : भारत की छवि को निशाना बनाने की राजनीतिप्रधानमंत्री Narendra Modi की हालिय...
21/05/2026

पश्चिमी मीडिया और कांग्रेस का नैरेटिव गठबंधन : भारत की छवि को निशाना बनाने की राजनीति

प्रधानमंत्री Narendra Modi की हालिया यूरोप यात्रा के दौरान एक विदेशी पत्रकार द्वारा पूछे गए प्रश्न को जिस प्रकार अंतरराष्ट्रीय मीडिया और भारत में कांग्रेस समर्थित नैरेटिव समूहों ने प्रस्तुत किया, उसने एक बार फिर यह स्पष्ट कर दिया कि भारत के विरुद्ध एक सुनियोजित वैचारिक अभियान चलाया जा रहा है। नॉर्वे में एक पत्रकार ने प्रधानमंत्री से यह प्रश्न किया कि वे “दुनिया की सबसे स्वतंत्र प्रेस” से प्रश्न क्यों नहीं लेते। इस घटना को कुछ पश्चिमी मीडिया संस्थानों ने तुरंत “भारतीय लोकतंत्र” और “प्रेस स्वतंत्रता” के संकट के रूप में प्रस्तुत करना शुरू कर दिया। यह पहली बार नहीं है।
जब भी भारत वैश्विक स्तर पर मज़बूत होता है, अपनी स्वतंत्र विदेश नीति अपनाता है, सांस्कृतिक आत्मविश्वास दिखाता है या विश्व राजनीति में निर्णायक भूमिका निभाता है, तब पश्चिमी मीडिया का एक वर्ग अचानक भारत में लोकतंत्र, अल्पसंख्यक अधिकार, प्रेस स्वतंत्रता और मानवाधिकारों को लेकर सक्रिय हो जाता है। वही नैरेटिव भारत के भीतर कांग्रेस और उसके सहयोगी वैचारिक समूह तुरंत उठाकर राजनीतिक हथियार बना लेते हैं।
विडम्बना यह है कि जिन पश्चिमी देशों में स्वयं मीडिया कॉर्पोरेट हितों, वैचारिक लॉबियों और सत्ता समूहों से प्रभावित रहता है, वही भारत को लोकतंत्र का पाठ पढ़ाने लगते हैं। भारत जैसे विशाल और बहुलतावादी लोकतंत्र को पश्चिमी मापदंडों से आंकना ही एक प्रकार की औपनिवेशिक मानसिकता है।
हाल ही में प्रधानमंत्री मोदी की इटली यात्रा के दौरान भी यही प्रवृत्ति देखने को मिली। इटली की प्रधानमंत्री Giorgia Meloni और प्रधानमंत्री मोदी के बीच हुए एक हल्के-फुल्के सांस्कृतिक संवाद और “Melodi” क्षण को सोशल मीडिया पर व्यापक लोकप्रियता मिली।  लेकिन भारत में कांग्रेस नेताओं और विपक्षी इकोसिस्टम ने उसी को घरेलू समस्याओं से जोड़कर उपहास और राजनीतिक हमले का माध्यम बना दिया। 
यहाँ सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि क्या भारत की हर अंतरराष्ट्रीय उपलब्धि और कूटनीतिक सफलता को घरेलू राजनीति के लिए बदनाम करना उचित है?
पश्चिमी मीडिया के एक हिस्से की समस्या केवल मोदी सरकार नहीं है। वास्तविक समस्या भारत का उभरता हुआ आत्मविश्वास है। आज का भारत पश्चिमी शक्तियों का अनुगामी राष्ट्र नहीं बल्कि स्वतंत्र वैश्विक शक्ति बन रहा है। भारत रूस से भी संबंध रखता है, अमेरिका से भी; पश्चिम एशिया में भी प्रभाव रखता है और वैश्विक दक्षिण की आवाज़ भी बन रहा है। यही नई भारतीय विदेश नीति कई पश्चिमी वैचारिक समूहों को असहज करती है।
नॉर्वे की पत्रकार के प्रश्न को लेकर जिस प्रकार अंतरराष्ट्रीय मीडिया ने एक समन्वित विमर्श चलाया, उससे स्पष्ट होता है कि भारत को लेकर पहले से तैयार वैचारिक ढाँचा मौजूद है।  भारत में प्रेस प्रतिदिन सरकार की आलोचना करती है, टीवी डिबेट्स में प्रधानमंत्री और सरकार पर खुले आरोप लगाए जाते हैं, सोशल मीडिया पूरी तरह सक्रिय है, विपक्ष संसद से सड़क तक आंदोलन करता है — फिर भी भारत को “दबावग्रस्त लोकतंत्र” बताने का प्रयास जारी रहता है।
यह भी ध्यान देने योग्य है कि कई पश्चिमी मीडिया संस्थान भारत को आज भी उसी औपनिवेशिक दृष्टि से देखते हैं जिसमें एक आत्मविश्वासी और सांस्कृतिक रूप से जागृत भारत उन्हें स्वीकार्य नहीं है। हाल ही में एक यूरोपीय अख़बार में प्रधानमंत्री मोदी का अपमानजनक कार्टून प्रकाशित किया गया, जिसे भारत में व्यापक विरोध का सामना करना पड़ा।  यह केवल एक कार्टून नहीं था, बल्कि उस मानसिकता का प्रतीक था जो भारत को अब भी रूढ़ छवियों में देखना चाहती है।
दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि कांग्रेस जैसी राष्ट्रीय पार्टी ऐसे अवसरों पर भारत के पक्ष में खड़े होने के बजाय उन्हीं विदेशी नैरेटिव्स को राजनीतिक लाभ के लिए आगे बढ़ाती दिखाई देती है। यह स्वस्थ लोकतांत्रिक विपक्ष की भूमिका नहीं है। लोकतंत्र में सरकार की आलोचना आवश्यक है, लेकिन राष्ट्र की वैश्विक छवि को कमजोर करना और विदेशी वैचारिक अभियानों का अप्रत्यक्ष हिस्सा बनना अत्यंत खतरनाक प्रवृत्ति है।
आज विश्व राजनीति केवल सीमाओं पर नहीं, बल्कि नैरेटिव और सूचना के स्तर पर भी लड़ी जा रही है। सोशल मीडिया, संपादकीय अभियान, चयनात्मक रिपोर्टिंग और वैचारिक पत्रकारिता आधुनिक “सूचना युद्ध” के उपकरण बन चुके हैं।
भारत के नागरिकों को यह समझना होगा कि हर वायरल वीडियो, हर विदेशी रिपोर्ट और हर अंतरराष्ट्रीय आलोचना निष्पक्ष नहीं होती। कई बार उसके पीछे भू-राजनीतिक हित, वैचारिक पूर्वाग्रह और राजनीतिक एजेंडा छिपे होते हैं।
भारत की लोकतांत्रिक शक्ति उसकी जनता है, न कि पश्चिमी संपादकीय कक्षों की स्वीकृति।
और भारत का भविष्य दिल्ली, काशी, मुंबई और बेंगलुरु में तय होगा — न कि लंदन, ओस्लो या न्यूयॉर्क के वैचारिक गलियारों में। 
-Umesh Sharma, Advocate

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