21/11/2025
1984 की एक ठंडी, उदास सर्द शाम थी।
लोकसभा चुनाव के परिणाम आ चुके थे—
भाजपा को महज़ दो सीटें।
पार्टी दफ़्तर में सन्नाटा पसरा था।
कार्यकर्ता सिर झुकाए बैठे थे,
राजनीतिक पंडितों ने फैसला सुना दिया था—
“अब भाजपा का अध्याय लगभग बंद।”
लेकिन उसी शाम,
जब हर तरफ़ हार का मातम था,
दो लोग—अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी—
चुपचाप दफ़्तर से निकले
और पहुँच गए दिल्ली के एक पुराने सिनेमा हॉल में।
स्क्रीन पर चल रही थी फिल्म—“उस्तादों के उस्ताद”।
हॉल में हल्की-फुल्की हँसी और तालियाँ थीं,
पर उनके मन में तूफ़ान।
तभी पर्दे पर वो गीत गूँजा—
“रात जितनी भी संगीन होगी,
सुबह उतनी ही रंगीन होगी।
ग़म न कर जो है कातिल अंधेरा,
किसके रोके रुका है सवेरा…”
गीत ख़त्म हुआ।
अँधेरे में आडवाणी जी ने अटल जी के कंधे पर हल्के से हाथ रखा,
मुस्कुराए और धीमे से बोले—
“अटल जी… यहीं से नई शुरुआत है।”
न कोई आरोप,
न ईवीएम पर सवाल,
न वोट चोरी का शोर।
बस दो आँखों में एक संकल्प—
अब और ज़्यादा मेहनत,
और ज़्यादा जनसंपर्क,
और ज़्यादा भारत की गलियों में उतरना।
ख़ुद का सवेरा ख़ुद लाना है।
समय ने देखा—
वही 1984 की “महाविनाशकारी हार”
भारतीय जनता पार्टी के स्वर्णिम युग की नींव बनी।
वही दो सीटें,
एक दिन 303 तक पहुँचीं।
ज़िंदगी भी कभी-कभी
ऐसी ही “1984 वाली रात” देती है—
जब लगता है सब ख़त्म हो गया।
पर याद रखना,
अंधेरा जितना गहरा होगा,
सुबह उतनी ही चमकदार आएगी।
बशर्ते तुम चलना न छोड़ो।
क्योंकि सवेरा
सबसे पहले उसी के दरवाज़े आता है,
जो रात में भी चलता रहता है।