13/06/2026
क्या न्याय पाने के लिए भी पैसे होना ज़रूरी है?
भारत में कई मामलों में अपील करने के लिए प्री-डिपॉज़िट (Pre-Deposit) करना अनिवार्य होता है। यदि किसी अधिकारी द्वारा गलत, मनमाना या विवादित डिमांड भी बना दी जाए, तब भी प्रभावित व्यक्ति या व्यवसाय को अपनी बात ऊपरी मंच पर रखने से पहले एक निश्चित राशि जमा करनी पड़ती है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जिन लोगों के पास यह राशि जमा करने की क्षमता ही नहीं है, वे न्याय कैसे प्राप्त करें?
यदि किसी अधिकारी से गलती हो जाए, तो उसकी कीमत आम नागरिक, व्यापारी या छोटे व्यवसायी को चुकानी पड़ती है। बड़े कॉरपोरेट समूह शायद इस बोझ को संभाल लें, लेकिन छोटे व्यापारियों, स्टार्टअप्स और मध्यम वर्ग के लिए यह आर्थिक और मानसिक रूप से बेहद कठिन हो सकता है।
बहुत से लोगों का मानना है कि ऐसे मामलों में, जहाँ पहली नज़र में ही डिमांड संदिग्ध या अन्यायपूर्ण प्रतीत होती हो, वहाँ राहत देने की अधिक प्रभावी व्यवस्था होनी चाहिए। न्याय तक पहुँच केवल इस बात पर निर्भर नहीं होनी चाहिए कि किसी व्यक्ति के पास पैसे हैं या नहीं।
भारत में "Ease of Doing Business" की बात होती है, लेकिन अनेक छोटे उद्यमियों के लिए अनुपालन लागत, मुकदमेबाज़ी का खर्च और अनिवार्य प्री-डिपॉज़िट व्यवसाय करना लगातार कठिन बनाते जा रहे हैं।
यह केवल पैसों का मुद्दा नहीं है, बल्कि निष्पक्षता, जवाबदेही और न्याय तक समान पहुँच का प्रश्न है। हर नागरिक को किसी भी गलत निर्णय को चुनौती देने का वास्तविक अवसर मिलना चाहिए, बिना ऐसे आर्थिक अवरोधों के जो उसे न्याय से दूर कर दें।
न्याय तभी सशक्त माना जाएगा, जब वह सभी के लिए सुलभ हो—सिर्फ उन लोगों के लिए नहीं जो उसकी कीमत चुका सकते हैं।
Manish Banka