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​"Mushkil waqt mein, ek sahi kanooni salah hi sabse bada sahara hoti hai."

22/09/2026

⚖️ Description Note

अब गवाहों के बयान की भी हो सकती है Audio-Video Recording!

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने आपराधिक जांच को अधिक निष्पक्ष और पारदर्शी बनाने को लेकर महत्वपूर्ण निर्देश दिए हैं। मामला Chandrakanta v. State of U.P., 2026 LiveLaw (AB) 713 का है, जिसकी सुनवाई Justice Arun Kumar Singh Deshwal ने की।

सुनवाई के दौरान कोर्ट के सामने आया कि BNSS की धारा 180 के तहत प्रथम सूचना देने वाले व्यक्ति का बयान दर्ज किया गया, लेकिन उसकी Audio-Video Recording नहीं की गई थी।

कोर्ट ने UP DGP को धारा 180 BNSS के तहत दर्ज होने वाले सभी गवाहों के बयानों की Audio-Video Recording अनिवार्य बनाने पर विचार करने को कहा। साथ ही जांच अधिकारियों को निष्पक्ष जांच, समय पर बयान दर्ज करने और जरूरत के अनुसार E-Sakshya तथा वैज्ञानिक साक्ष्यों के इस्तेमाल पर भी जोर दिया गया।

⚠️ ध्यान रखें: हाईकोर्ट ने यह नहीं कहा है कि आज से प्रत्येक गवाह के बयान की वीडियो रिकॉर्डिंग अनिवार्य हो गई है। DGP को इसे अनिवार्य बनाने पर विचार करने का निर्देश दिया गया है।

कानून की ताकत केवल गिरफ्तारी में नहीं, निष्पक्ष जांच में भी होती है। ⚖️

Faim Ahmad | Advocate


21/09/2026

⚖️ ₹100 की रिश्वत… और 31 साल बाद भी दोषसिद्धि बरकरार!

मामला वर्ष 1995 का है। रेलवे में मोटरसाइकिल बुक कराने के लिए निर्धारित शुल्क से ₹100 अतिरिक्त मांगने का आरोप Parcel Clerk Kali Shankar Dhobi पर लगा। शिकायत के बाद CBI ने कार्रवाई की और मामला अदालत तक पहुँचा।

28 मई 2004 को Special Judge, CBI, Ranchi ने Prevention of Corruption Act की धारा 7 और 13(2) सहपठित 13(1)(d) के तहत दोषी ठहराया।

इसके खिलाफ अपील झारखंड हाईकोर्ट पहुँची। 10 सितंबर 2026 को Justice Pradeep Kumar Srivastava ने दोषसिद्धि बरकरार रखी। हालांकि मामले की लगभग 31 वर्ष की अवधि, आरोपी की उम्र तथा अन्य परिस्थितियों को देखते हुए सजा में कमी की गई, जबकि ₹10,000 का जुर्माना बरकरार रखा गया।

📌 Case: Kali Shankar Dhobi v. State of Jharkhand through CBI
📌 Criminal Appeal (SJ) No. 885 of 2004
📌 Neutral Citation: 2026:JHHC:27298

इस फैसले का महत्वपूर्ण संदेश यह है कि सरकारी काम के लिए निर्धारित शुल्क से अलग मांगी गई रकम को केवल “एक्स्ट्रा चार्ज” कह देने से उसकी कानूनी प्रकृति अपने-आप नहीं बदल जाती।

⚖️ कानून की जानकारी रखें, अपने अधिकार जानें।

Faim Ahmad | Advocate
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यह रहा वीडियो/पोस्ट के साथ लगाने के लिए विवरण नोट:⚖️ ₹100 की रिश्वत… और 31 साल बाद भी दोषसिद्धि बरकरार!मामला वर्ष 1995 क...
21/09/2026

यह रहा वीडियो/पोस्ट के साथ लगाने के लिए विवरण नोट:

⚖️ ₹100 की रिश्वत… और 31 साल बाद भी दोषसिद्धि बरकरार!

मामला वर्ष 1995 का है। रेलवे में मोटरसाइकिल बुक कराने के लिए निर्धारित शुल्क से ₹100 अतिरिक्त मांगने का आरोप Parcel Clerk Kali Shankar Dhobi पर लगा। शिकायत के बाद CBI ने कार्रवाई की और मामला अदालत तक पहुँचा।

28 मई 2004 को Special Judge, CBI, Ranchi ने Prevention of Corruption Act की धारा 7 और 13(2) सहपठित 13(1)(d) के तहत दोषी ठहराया।

इसके खिलाफ अपील झारखंड हाईकोर्ट पहुँची। 10 सितंबर 2026 को Justice Pradeep Kumar Srivastava ने दोषसिद्धि बरकरार रखी। हालांकि मामले की लगभग 31 वर्ष की अवधि, आरोपी की उम्र तथा अन्य परिस्थितियों को देखते हुए सजा में कमी की गई, जबकि ₹10,000 का जुर्माना बरकरार रखा गया।

📌 Case: Kali Shankar Dhobi v. State of Jharkhand through CBI
📌 Criminal Appeal (SJ) No. 885 of 2004
📌 Neutral Citation: 2026:JHHC:27298

इस फैसले का महत्वपूर्ण संदेश यह है कि सरकारी काम के लिए निर्धारित शुल्क से अलग मांगी गई रकम को केवल “एक्स्ट्रा चार्ज” कह देने से उसकी कानूनी प्रकृति अपने-आप नहीं बदल जाती।

⚖️ कानून की जानकारी रखें, अपने अधिकार जानें।

Faim Ahmad | Advocate


⚖️ वसीयत को लागू कराने के लिए हर बार कोर्ट जाना जरूरी नहीं!जम्मू-कश्मीर एवं लद्दाख हाईकोर्ट ने वसीयत से जुड़े एक महत्वपू...
20/09/2026

⚖️ वसीयत को लागू कराने के लिए हर बार कोर्ट जाना जरूरी नहीं!

जम्मू-कश्मीर एवं लद्दाख हाईकोर्ट ने वसीयत से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में स्पष्ट किया कि हर परिस्थिति में वसीयत का Probate कराना अनिवार्य नहीं होता। यह इस बात पर निर्भर करता है कि वसीयत किस क्षेत्र और किन कानूनी प्रावधानों के अंतर्गत आती है।

📌 इसलिए केवल वसीयत बनाना ही काफी नहीं—उसकी वैधता, गवाह, संपत्ति का विवरण और लागू होने वाली कानूनी प्रक्रिया समझना भी जरूरी है।

⚠️ नोट: प्रत्येक मामले के तथ्य अलग हो सकते हैं। संपत्ति या वसीयत से जुड़े विवाद में संबंधित दस्तावेजों के आधार पर कानूनी सलाह लें।

⚖️ Faim Ahmad | Advocate
📱

#वसीयत

⚖️ अनुच्छेद 21 — जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकारभारतीय संविधान का अनुच्छेद 21 प्रत्येक व्यक्ति के जीवन और व्यक्ति...
19/09/2026

⚖️ अनुच्छेद 21 — जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 21 प्रत्येक व्यक्ति के जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की सुरक्षा करता है। न्यायालयों ने समय-समय पर इसकी व्यापक व्याख्या करते हुए गरिमा के साथ जीवन, निजता, स्वास्थ्य और स्वच्छ पर्यावरण जैसे कई पहलुओं को इसके दायरे से जोड़ा है।

📚 इस पेज पर हम कानून, आपके अधिकार और महत्वपूर्ण न्यायालयीन फैसलों को आसान भाषा में समझेंगे।

कानून जानिए, अपने अधिकार पहचानिए। ⚖️

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#भारतीयसंविधान #कानून

भारत के संविधान में अपनी मर्जी से या पसंद के व्यक्ति से शादी करने का अधिकार अनुच्छेद 21 में दिया गया है जो भारत के किसी ...
18/09/2026

भारत के संविधान में अपनी मर्जी से या पसंद के व्यक्ति से शादी करने का अधिकार अनुच्छेद 21 में दिया गया है
जो भारत के किसी भी नागरिक किसी भी धर्म में शादी करने का अधिकार देता है
Advocate
Faim Ahmad
District Court Rampur

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 14 (Article 14) मूल रूप से 'विधि के समक्ष समता' (Equality before Law) और 'विधियों का समान संर...
18/09/2026

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 14 (Article 14) मूल रूप से 'विधि के समक्ष समता' (Equality before Law) और 'विधियों का समान संरक्षण' (Equal Protection of the Laws) की गारंटी देता है।
Advocate Faim Ahmad
District
Court Rampur. ( UP)

17/09/2026

⚖️ SC/ST Act की राहत राशि पर Allahabad High Court का अहम आदेश

SC/ST Act के तहत पीड़ितों को मिलने वाली सरकारी राहत राशि से जुड़े एक मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने विस्तृत और निष्पक्ष जांच के निर्देश दिए हैं।

Case 1: Arvind Kumar and 2 Others v. State of U.P. and 2 Others — Criminal Appeal No. 10745 of 2024
Case 2: Santosh Kumar Dohrey v. State of U.P. and 2 Others — Criminal Appeal No. 10484 of 2024
Neutral Citation: 2026:AHC:167807
Judge: Justice Santosh Rai
Judgment: 11 August 2026

सुनवाई के दौरान राज्य की ओर से कोर्ट को बताया गया कि Advocate Santosh Kumar Dohrey और उनके परिवार के सदस्यों को विभिन्न आपराधिक मामलों में अब तक ₹23,36,250 की राहत/आर्थिक सहायता मिल चुकी है। इसके अलावा करीब 10–12 अन्य मामले आगे की राहत के लिए विचाराधीन बताए गए।

⚖️ हाईकोर्ट ने DM और SSP, Jhansi को तीन महीने के भीतर निष्पक्ष एवं विस्तृत जांच कराने का निर्देश दिया। साथ ही उत्तर प्रदेश में ऐसे दावों की प्रभावी निगरानी और सत्यापन की व्यवस्था विकसित करने के निर्देश भी दिए गए।

⚠️ सबसे महत्वपूर्ण बात: हाईकोर्ट ने यह घोषित नहीं किया है कि संबंधित व्यक्ति या परिवार ने धोखाधड़ी अथवा SC/ST Act का दुरुपयोग किया है। अदालत ने जांच का आदेश दिया है; misuse पर अंतिम निष्कर्ष नहीं दिया है।

SC/ST Act का उद्देश्य अत्याचार के वास्तविक पीड़ितों को सुरक्षा और सहायता उपलब्ध कराना है। इसलिए वास्तविक पीड़ित को समय पर राहत मिलना जितना जरूरी है, उतना ही जरूरी है कि सरकारी सहायता की व्यवस्था पारदर्शी रहे।

कानून का उद्देश्य पीड़ित को न्याय देना है—और सरकारी सहायता सही पात्र व्यक्ति तक पहुँचना भी उसी न्याय का हिस्सा है।

Faim Ahmad | Advocate
⚖️

⚖️ अनुच्छेद 21 — जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकारसंविधान का अनुच्छेद 21 हर व्यक्ति के जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता...
17/09/2026

⚖️ अनुच्छेद 21 — जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार

संविधान का अनुच्छेद 21 हर व्यक्ति के जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा करता है। कानून द्वारा स्थापित प्रक्रिया के बिना किसी व्यक्ति को इससे वंचित नहीं किया जा सकता।

कानून जानिए, अपने अधिकार पहचानिए। ⚖️

#संविधान #कानूनीजागरूकता

16/09/2026

⚖️ 7 साल का रिश्ता, शादी नहीं हुई तो रेप? Jharkhand High Court का अहम फैसला

क्या लंबे समय तक दो बालिग व्यक्तियों के बीच सहमति से संबंध रहने के बाद केवल शादी न होने से उस पूरे रिश्ते को रेप माना जा सकता है?

झारखंड हाईकोर्ट ने इस महत्वपूर्ण कानूनी सवाल पर फैसला दिया है।

Case Title: Lalu Mahtha @ Lalu Mahta v. State of Jharkhand & Another
Case No.: Cr.M.P. No. 915 of 2025
Neutral Citation: 2026:JHHC:26065
Court: Jharkhand High Court, Ranchi
Judge: Justice Anil Kumar Choudhary
Decision: 29 August 2026

मामले में महिला का आरोप था कि युवक ने शादी का वादा करके उसके साथ शारीरिक संबंध बनाए और दोनों का रिश्ता सात साल से अधिक समय तक चला। बाद में शादी नहीं होने पर युवक के खिलाफ IPC की धारा 376(2)(n) के तहत मामला दर्ज हुआ।

⚖️ हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण अंतर स्पष्ट किया—शादी का वादा बाद में पूरा न होना और शुरुआत से ही शादी की नीयत न रखते हुए झूठा वादा करके सहमति प्राप्त करना, दोनों कानूनी रूप से एक बात नहीं हैं।

कोर्ट ने मामले की परिस्थितियों को देखते हुए आरोपी के संबंध में Mahila (Sadar) P.S. Case No. 12 of 2023, उससे जुड़ी आपराधिक कार्यवाही और 16 अगस्त 2024 के cognizance order को रद्द कर दिया।

लेकिन इस फैसले को यह समझना गलत होगा कि शादी का झूठा वादा करके शारीरिक संबंध बनाना कभी अपराध नहीं हो सकता। यदि तथ्यों से यह साबित हो कि शुरुआत से ही शादी करने की नीयत नहीं थी और झूठे वादे का इस्तेमाल सहमति प्राप्त करने के लिए किया गया, तो कानूनी स्थिति अलग हो सकती है।

📌 याद रखिए—रिश्ता टूट जाना और शुरुआत से धोखा देकर रिश्ता बनाना, कानून की नजर में एक बात नहीं है।

⚠️ यह सामग्री कानूनी जागरूकता के उद्देश्य से है और संबंधित न्यायालय के फैसले पर आधारित है।

Faim Ahmad | Advocate
⚖️

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District Court Rampur
Rampur
244901

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