Narsingh katiyar Advocate law tips

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17/07/2026

Shyam sri vs sumant Kumar 2023 Allahabad High court Diglot jclrpage 164 Vedio Law 13 B (2) Hindu Marriage act 1955 Katiyar advocate chembur no 78 Central bar Association Pilibhit

09/07/2026

Allahabad high court 2026 Arpit Garg vs Ekta Garg 2026 #14 Hindu Marriage act 1956 # 13 B Hindu Marriage act Bench Vedio Katiyar advocate chembur no 78 Central bar Association Pilibhit Uttar Pradesh

05/07/2026

Chitranshi vs Raj Narayan Tripathi High Court 6 Rule 17 Groud ground #2026 jclrdiglotpage464 Katiyar advocate chembur no 78 Central bar Association Pilibhit

25/06/2026

2026(1)0474 supreme court Diglot state of Haryana vs Amin lal Since deceased राज्य अपने नागरिक की संपत्ति पर प्रतिकूल कब्जा का दावा नहीं कर सकता है Vedio possession Katiyar advocate chembur no 78 Central bar Association Pilibhit

18/05/2026

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08/02/2026

गुजारा भत्ता वसूली में सीधे गिरफ्तारी अवैध — Mohd. Shahzad बनाम Sajia Khan (2025), इलाहाबाद हाईकोर्टइलाहाबाद हाईकोर्ट ने Mohd. Shahzad बनाम Sajia Khan (2025) मामले में स्पष्ट किया कि धारा 125/128 CrPC के अंतर्गत गुजारा भत्ता न देने पर पति की सीधे गिरफ्तारी नहीं की जा सकती।
न्यायालय के अनुसार पहले कानूनी वसूली प्रक्रिया अपनाना अनिवार्य है, जिसमें—
धारा 421 CrPC के अंतर्गत जुर्माने की भांति वसूली
या धारा 461 भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) के तहत वसूली वारंट
पति की चल या अचल संपत्ति से राशि की वसूली
शामिल है।
👉 केवल तब, जब वसूली के सभी उपाय विफलकेवल तब, जब वसूली के सभी उपाय विफल हो जाएँ, अंतिम विकल्प के रूप में गिरफ्तारी की जा सकती है।
यह निर्णय पति-पत्नी दोनों के अधिकारों में संतुलन स्थापित करता है और निचली अदालतों को प्रक्रियात्मक अनुशासन का पालन करने का स्पष्ट निर्देश देता है।
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02/02/2026

माता-पिता एवं वरिष्ठ नागरिकों का भरण-पोषण और कल्याण अधिनियम, 2007 : संतान व उत्तराधिकारियों की कानूनी जिम्मेदारीमाता-पिता एवं वरिष्ठ नागरिकों का भरण-पोषण और कल्याण अधिनियम, 2007 के अंतर्गत 60 वर्ष या उससे अधिक आयु के वरिष्ठ नागरिक, जिनमें माता-पिता भी शामिल हैं, अपनी संतान से भरण-पोषण का दावा कर सकते हैं। माता-पिता अपनी संतान के विरुद्ध आवेदन प्रस्तुत कर सकते हैं, वहीं संतानहीन वरिष्ठ नागरिक अपने उन संबंधियों के विरुद्ध आवेदन कर सकते हैं जो उनकी संपत्ति के उत्तराधिकारी हैं।
संतान एवं नातेदारी संबंधियों का दायित्व है कि वे माता-पिता एवं वरिष्ठ नागरिकों का भरण-पोषण करें ताकि वे सम्मानजनक एवं सामान्य जीवन यापन कर सकें।
आवेदन राज्य सरकार द्वारा स्थापित भरण-पोषण अधिकरण के समक्ष किया जाता है, जिसे सिविल न्यायालय की शक्तियाँ प्राप्त होती हैं। अधिकरण को 6 माह के भीतर आवेदन का निस्तारण करना होता है तथा कार्यवाही से पूर्व मध्यस्थता का प्रावधान भी है।
जिले में अपीलीय अधिकरण का गठन किया जाता है और भरण-पोषण अधिकारी इसकी निगरानी करता है। भरण-पोषण न देने वाली संतान के विरुद्ध 1 माह से 3 माह तक के कारावास का प्रावधान है।प्रत्येक जिले में वृद्धाश्रम, सरकारी अस्पतालों में वृद्धों की देखभाल तथा वृद्ध नागरिकों के जीवन, संपत्ति और स्वतंत्रता की सुरक्षा हेतु पुलिस सहायता की भी व्यवस्था की गई है। #मातापिता_भरणपोषण
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31/01/2026

माता-पिता एवं वरिष्ठ नागरिकों का भरण-पोषण और कल्याण अधिनियम, 2007 – कानूनी अधिकार और संरक्षणमाता-पिता एवं वरिष्ठ नागरिकों का भरण-पोषण और कल्याण अधिनियम, 2007 भारत सरकार द्वारा बनाया गया एक महत्वपूर्ण सामाजिक कानून है, जिसका उद्देश्य माता-पिता एवं वरिष्ठ नागरिकों को उनके बच्चों/वारिसों से भरण-पोषण, सम्मानजनक जीवन और सुरक्षा प्रदान करना है।
इस अधिनियम के अंतर्गत माता-पिता एवं वरिष्ठ नागरिक भरण-पोषण हेतु न्यायाधिकरण में आवेदन कर सकते हैं। कानून में अधिकतम मासिक भरण-पोषण राशि, संपत्ति की सुरक्षा, वृद्धाश्रम की व्यवस्था तथा उपेक्षा करने पर दंड का प्रावधान किया गया है।
यह अधिनियम वृद्धजनों के अधिकारों की रक्षा करते हुए उन्हें सामाजिक और आर्थिक सुरक्षा प्रदान करता है। #माता_पिता_भरणपोषण_अधिनियम
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22/01/2026

घरेलू हिंसा अधिनियम 2005: पति के अलावा अन्य रिश्तेदार कब बन सकते हैं प्रतिवादी?
इलाहाबाद हाईकोर्ट का अहम फैसला | धारा 3, 12 व 2(q) #घरेलू_हिंसा_अधिनियम

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ेलू हिंसा अधिनियम, 2005 की धारा 3 एवं 12 के अंतर्गत केवल पति ही नहीं, बल्कि अन्य रिश्तेदारों के विरुद्ध भी कार्यवाही तभी संभव है जब वे व्यथित महिला के साथ साझा घरेलू निवास (Shared Household) में रह रहे हों और घरेलू हिंसा के कृत्य में प्रत्यक्ष रूप से शामिल हों।
इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि
➡️ केवल रिश्तेदारी के आधार पर
➡️ अलग-अलग रह रही बहनों या अन्य परिजनों को
➡️ बिना साझा निवास और ठोस आरोपों के
प्रतिवादी बनाना कानून का दुरुपयोग है।धारा 2(q) के अंतर्गत प्रतिवादी वही व्यक्ति हो सकता है जो व्यथित महिला के साथ घरेलू संबंध में रहा हो।
इसी आधार पर पाँच अलग रह रही बहनों के विरुद्ध की गई कार्यवाही को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने विखंडित (Quash) कर दिया।
यह निर्णय घरेलू हिंसा मामलों में झूठे या अनावश्यक पक्षकार बनाए जाने पर रोक लगाने वाला एक महत्वपूर्ण न्यायिक दृष्टांत है।
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18/01/2026

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#लंबेसमयसेअलगाव

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#वैवाहिकसमझौता

🔹 विवाह विच्छेद मंजूर #विवाहविच्छेद
#तलाकमंजूर

#15वर्षकीलड़की

#बच्चीकेहितमें

🔹 पत्नी को ₹12,00,000 की राशि
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