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Legal services for All civil Case, Divorce and Family matter case, Specific Relief Act, commercial Case, Consumer complaint cases, Cyber Law, Real Estate, Cheque Dishonor Case, Criminal Case, Writ case under Article 226 of Constitutions of India. Services provided by the firms:-
**Constitutional matter including Writ Petition under Article 226 and 227 of the Constitution before the High Court.
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All civil suits at Trial Court and Appellate Court including High Court & Supreme Court.
**Divorce and Family matter case.
**Prosecuting or defending Criminal Case at Trial Court and Appellate court including High Court & Supreme Court.
**Specific Relief Act, cases in all commercial agreement and contract.
**Dishonor of negotiable instrument under section 138 of N.I Act.
**Consumer complaint cases under Consumer protection Act.
**Cyber Authorities and Cyber Tribunals under Information Technology Act.
** Banking Case at DRT (Debt Recovery Tribunal).
** Real Estate Case at RERA. and other various legal issued involved under Civil Law, Corporate & Commercial, Criminal Law, Arbitration, Family Law, Banking & Finance, Real Estate, E-commerce , Cyber Law.

✍️आगामी अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस 21 जून 2026 आयोजित होने बाला है, उसी परिपेक्ष्य में योग विषय का महत्व पर मेरा एक संक्षिप...
10/06/2026

✍️आगामी अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस 21 जून 2026 आयोजित होने बाला है, उसी परिपेक्ष्य में योग विषय का महत्व पर मेरा एक संक्षिप्त लेख।👇

Crime & Criminal अपराध और अपराधी              ✍️कानून की किताबो में बहुत सारे व्याख्याएं अपराध और अपराधी की कनूनविदों के...
29/05/2026

Crime & Criminal अपराध और अपराधी
✍️कानून की किताबो में बहुत सारे व्याख्याएं अपराध और अपराधी की कनूनविदों के द्वारा की गयी है जिसमे माना गया गया है की गलत/ बुरा करना अपराध है। मेरा दृढ़ विश्वास है कि अपराध केवल अपराधी का कृत्य नहीं होता, बल्कि वह उसके विकृत अस्तित्व का परिणाम होता है।
जैसे एक आदमी जो शराबी है, वह शराब पीना तो बंद नहीं करता, लेकिन वह सम्हलकर चलने की कोशिश करता है। सभी शराबी करते हैं। जितने शराबी सम्हलकर चलते हैं उतना संभलकर सामान्य आदमी कोई नहीं चलता। हालांकि वे गिरते हैं। मगर सम्हलकर वे बहुत चलने की कोशिश करते हैं। सामान्य आदमी जिसने शराब नहीं पी है, वह सम्हलकर चलने की कोशिश ही क्यों करेगा? वह सम्हलकर चलता ही है। इसकी कोशिश थोड़े ही करनी होती है।
समाज सदैव अपराधों की निंदा करने, अपराधियों को दंड देने और अवैध कृत्यों को नियंत्रित करने में लगा रहा है। कानून बनाए गए, कारागार निर्मित हुए, न्यायालय स्थापित हुए—इस आशा में कि दंड का भय अपराधों को समाप्त कर देगा। किंतु शताब्दियों के दंड और कठोर व्यवस्थाओं के बाद भी अपराध समाप्त नहीं हुए। यह स्थिति हमें एक गहरे प्रश्न की ओर ले जाती है—क्या अपराध केवल किसी व्यक्ति द्वारा किया गया एक कार्य है, अथवा वह मनुष्य के भीतर की किसी गहरी विकृति का परिणाम है?
समाज प्रायः लक्षणों से लड़ता है, कारणों से नहीं। हम अपराध की निंदा करते हैं, पर उस अचेतना को नहीं देखते जो अपराध को जन्म देती है। हम अपराधी को जेल में डाल देते हैं, लेकिन उसके भीतर की टूटी हुई चेतना और घायल अस्तित्व को स्वस्थ करने का प्रयास नहीं करते।
इसलिए अपराध को केवल कानूनी उल्लंघन के रूप में नहीं, बल्कि अपराधी के विकृत अस्तित्व का परिणाम के संकेत के रूप में समझना चाहिए।

✍️कोई कहता था समंदर हूं मैं,और मेरी जेब में कतरा भी नहीं;खैरियत अपनी लिखा करता हूं,अब तो तकदीर में खतरा भी नहीं।**जब अनु...
24/05/2026

✍️कोई कहता था समंदर हूं मैं,
और मेरी जेब में कतरा भी नहीं;
खैरियत अपनी लिखा करता हूं,
अब तो तकदीर में खतरा भी नहीं।

**जब अनुभव/ज्ञान में सम्पूर्णता नहीं होता है तव जो चीज का अस्तित्व नहीं होता है वो भी दिखता है, लेकिन उसकी वास्तविकता नहीं होता है, और जब अनुभव/ज्ञान पूर्ण होता है यानि कोई भ्रम नहीं होता है तव वास्तविकता का अनुभव होता है — कि सुख-दुःख, लाभ-हानि, भय और भाग्य सब परिवर्तनशील मानसिक अवस्थाएँ हैं, तब भाग्य /तक़दीर का भी खतरा समाप्त हो जाता है।
रामचरितमानस की एक अत्यंत प्रसिद्ध और भावपूर्ण चौपाई है।
जेहि बिधि नाथ होइ हित मोरा।
करहु सो बेगि दास मैं तोरा॥
***अब डर, भय और भाग्य/तकदीर का खतरा नहीं है।🙏🙏

10/05/2026

भारत में समकालीन राजनीतिक परिवर्तन पर एक संक्षिप्त व्याख्यान हर्षवर्धन शर्मा के द्वारा।

02/05/2026

Self Confidence of a Person, a Philosophical Analysis.

30/04/2026

तर्क से परे जीवन का नियम:
पहली दृष्टि में तर्क यह कहता है कि जो व्यक्ति दिन भर आराम करेगा, वह रात में और अधिक सुखपूर्वक विश्राम कर सकेगा। यह विचार सीधा, सरल और बौद्धिक रूप से ठीक लगता है। किंतु जीवन का वास्तविक अनुभव इस तर्क को चुनौती देता है। जीवन गणितीय समीकरणों या तर्कों से संचालित नहीं होता; वह अपने भीतर एक गहरी, अनुभवजन्य और कभी-कभी विरोधाभासी व्यवस्था समेटे हुए है।
*वास्तव में, जो व्यक्ति दिन में श्रम करता है, वही रात में गहन विश्राम का अधिकारी बनता है। श्रम शरीर को थकाता है, किंतु उसी थकान में विश्राम की मधुरता छिपी होती है। इसके विपरीत, जो व्यक्ति दिन भर निष्क्रिय रहता है, उसका शरीर तो स्थिर रहता है, पर मन अशांत हो उठता है। परिणामस्वरूप, रात उसके लिए विश्राम का नहीं, बल्कि बेचैनी और असंतोष का समय बन जाती है।

स्वास्थ सेवा वनाम न्याय सेवा, दार्शनिक और मनोवैज्ञानिक विश्लेषण।✍️*स्वास्थ्य सेवा मनुष्य के जीवन (existence) को बनाए रखत...
21/04/2026

स्वास्थ सेवा वनाम न्याय सेवा, दार्शनिक और मनोवैज्ञानिक विश्लेषण।
✍️*स्वास्थ्य सेवा मनुष्य के जीवन (existence) को बनाए रखती है, जबकि न्याय सेवा उसके अर्थ (meaning) और गरिमा (dignity) को संरक्षित करती है। केवल जीवित रहना पर्याप्त नहीं है-मानव जीवन का उद्देश्य सम्मानपूर्वक और न्यायपूर्ण ढंग से जीना है। यदि किसी व्यक्ति का शरीर स्वस्थ है लेकिन उसे अन्याय सहना पड़ रहा है, तो उसका अस्तित्व अधूरा और अपमानित हो जाता है।
*इस दृष्टि से न्याय, स्वास्थ्य से एक स्तर ऊपर स्थित है—क्योंकि यह तय करता है कि जीवन“कैसा" जिया जाएगा, न कि केवल “कितना”जिया जाएगा।
*स्वास्थ्य का संकट तत्काल और दृश्य होता है- दर्द, बीमारी, मृत्यु का भय।
*लेकिन न्याय में विलम्ब का प्रभाव गहरा और अदृश्य होता है-
👉व्यक्ति में असहायता (helplessness)
👉आत्म-सम्मान का ह्रास (loss of self-worth)
👉सिस्टम पर अविश्वास (institutional distrust)
👉और अंततः आत्मिक विघटन (inner disintegration)
*मनोविज्ञान के स्तर पर, अन्याय व्यक्ति के भीतर स्थायी आघात (chronic trauma) पैदा करता है। यह केवल एक घटना नहीं रहती, बल्कि व्यक्ति की पहचान (identity) और आत्मबोध (self-concept) को क्षीण कर देती है।
*स्वास्थ्य सेवा जीवन बचाती है, पर न्याय सेवा जीवन को मूल्य देती है।
*स्वास्थ्य में विलम्ब मृत्यु ला सकता है—यह एक अंत है। लेकिन न्याय में विलम्ब व्यक्ति को जीवित रहते हुए अंदर से समाप्त कर देता है-यह एक सतत क्षय है।
इसीलिए कहा जा सकता है:
“स्वास्थ्य जीवन का आधार है, पर न्याय जीवन का सार है"।

20/04/2026

Returning to the Patna High Court from Civil Court Vaishali at Hajipur after finishing an argument in Civil Suit.

19/04/2026

कभी-कभी एक पुरानी तस्वीर सिर्फ एक पल को नहीं दिखाती—यह चुपचाप बीते हुए पूरे जीवन के द्वार खोल देती है। उस स्थिर फ्रेम में समय ठहर जाता है, फिर भी दिल में वह फिर से चलने लगता है। कुछ भावनाएँ ऐसी होती हैं जिन्हें शब्दों में व्यक्त करना असंभव है। उन्हें केवल महसूस किया जा सकता है—जैसे अतीत की एक कोमल गूँज वर्तमान को छू रही हो। उस क्षण आपको एहसास होता है कि जीवन केवल आगे आने वाला समय ही नहीं है, बल्कि वह भी है जो खूबसूरती से आपके भीतर समाया हुआ है।

Advocate Association Election-2026.Today, I exercised my right to vote in the Patna High Court Advocate Association Elec...
17/04/2026

Advocate Association Election-2026.
Today, I exercised my right to vote in the Patna High Court Advocate Association Election, 2026, with a firm belief in strengthening our institution. My vote is not just a choice of candidates, but a commitment to transparency, integrity, and the collective progress of our Bar. Let us uphold the dignity of our profession and work together for a more accountable and progressive Association.

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