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सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसलाभारत के संविदा, एडहॉक और दैनिक वेतन पर काम करने वाले कर्मचारियों के लिए सुप्रीम कोर्ट का हालि...
02/05/2026

सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला
भारत के संविदा, एडहॉक और दैनिक वेतन पर काम करने वाले कर्मचारियों के लिए सुप्रीम कोर्ट का हालिया फैसला काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। यह मामला Singh vs State of (16 अप्रैल 2026) से जुड़ा है, जिसमें यह तय किया गया कि किन परिस्थितियों में संविदा कर्मचारियों को नियमित (स्थायी) किया जा सकता है और किन मामलों में नहीं।
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मामला क्या था?

यह विवाद हरियाणा सरकार द्वारा बनाए गए उन नियमों से जुड़ा था, जिनके तहत संविदा, एडहॉक और दैनिक वेतन पर काम कर रहे कर्मचारियों को नियमित करने की योजना बनाई गई थी।

सरकार ने 2014 में कुछ नोटिफिकेशन जारी किए थे, जिनका उद्देश्य लंबे समय से काम कर रहे कर्मचारियों को राहत देना था। लेकिन इन नियमों को हाई कोर्ट में चुनौती दी गई और बाद में मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।
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#सरकार का पक्ष क्या था?

सरकार और कर्मचारियों का कहना था कि:

* कई कर्मचारी सालों से लगातार काम कर रहे हैं
* उनके पास जरूरी योग्यता भी है
* काम की जरूरत भी बनी हुई है
* ऐसे में उन्हें स्थायी करना उचित है

सरकार का तर्क था कि यह फैसला मानवीय आधार पर लिया गया है ताकि संविदा कर्मी को #सुरक्षा
मिल सके।

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विरोध करने वालों का क्या कहना था?

दूसरी तरफ कुछ लोगों ने इसका विरोध किया। उनका कहना था कि:

* बिना सही भर्ती प्रक्रिया के किसी को स्थायी करना गलत है
* इससे योग्य उम्मीदवारों को मौका नहीं मिलेगा
* यह संविधान के बराबरी के नियमों के खिलाफ है

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#सुप्रीम_कोर्ट ने क्या कहा?

1. कुछ नियम सही माने गए

कोर्ट ने कहा कि 16 जून और 18 जून 2014 के जो नियम थे, वे सही हैं।

क्यों?

* क्योंकि इन नियमों में शर्तें साफ थीं
* कर्मचारी योग्य थे
* वे लंबे समय से काम कर रहे थे
* उनकी नियुक्ति खाली पदों पर हुई थी

इसलिए ऐसे कर्मचारियों को नियमित करने की अनुमति दी गई।

2. कुछ नियम गलत बताए गए
कोर्ट ने 7 जुलाई 2014 वाले नियमों को गलत माना।

कारण:

* इसमें भविष्य की तारीख (2018 तक) को आधार बनाया गया था
* कुछ कर्मचारियों की भर्ती बिना सही प्रक्रिया के हुई थी
* विज्ञापन और इंटरव्यू जैसी जरूरी प्रक्रिया नहीं अपनाई गई

इस वजह से कोर्ट ने कहा कि ऐसे नियम उचित नहीं हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि यदि पति-पत्नी ने आपसी सहमति से सभी विवादों का पूर्ण और अंतिम निपटारा कर लिया है, तो बाद में क...
24/04/2026

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि यदि पति-पत्नी ने आपसी सहमति से सभी विवादों का पूर्ण और अंतिम निपटारा कर लिया है, तो बाद में कोई भी पक्ष मनमाने ढंग से अपनी सहमति वापस नहीं ले सकता। अदालत ने माना कि समझौते के बाद मुकरना न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग है।

यह मामला साल 2000 में हुई एक शादी से जुड़ा है। साल 2023 में पति द्वारा तलाक की याचिका दायर करने के बाद फैमिली कोर्ट ने इसे मध्यस्थता (Mediation) के लिए भेजा था। मध्यस्थता के दौरान दोनों पक्षों के बीच एक लिखित समझौता हुआ...

पति की शर्तें: पति ने पत्नी को 1.5 करोड़ रुपये (दो किस्तों में), 14 लाख रुपये की कार और कुछ जेवर देने पर सहमति जताई।
पत्नी की शर्तें: इसके बदले में पत्नी जॉइंट बिजनेस अकाउंट से 2.5 करोड़ रुपये पति को ट्रांसफर करने पर राजी हुई।
विवाद की शुरुआत: समझौते के बाद आंशिक भुगतान भी हुआ और दोनों ने मिलकर तलाक की याचिका दाखिल की। लेकिन अंतिम सुनवाई (Second Motion) से ठीक पहले पत्नी ने अपनी सहमति वापस ले ली और पति पर घरेलू हिंसा का आरोप लगा दिया।

170 करोड़ के जेवरों का दावा और 'आफ्टरथॉट'
पत्नी ने कोर्ट में एक नया दावा पेश किया कि लिखित समझौते के अलावा पति ने मौखिक रूप से 120 करोड़ के जेवर और 50 करोड़ के सोने के बिस्किट देने का वादा किया था, जिसे टैक्स बचाने के लिए कागजों पर नहीं दिखाया गया।

जस्टिस राजेश बिंदल और जस्टिस विजय बिश्नोई की पीठ ने पत्नी के इस दावे को पूरी तरह खारिज कर दिया। अदालत ने कहा कि 23 साल की शादी के दौरान घरेलू हिंसा का कोई आरोप न होना और समझौते के बाद अचानक ऐसे दावे करना केवल एक ‘आफ्टरथॉट’ (बाद में गढ़ा गया विचार) है।

सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी और फैसला
अदालत ने कहा कि हालांकि आपसी सहमति से तलाक में डिक्री मिलने तक पीछे हटने का विकल्प होता है, लेकिन जब मध्यस्थता के जरिए हुआ समझौता अदालत स्वीकार कर लेती है, तो वह एक कानूनी बंधन बन जाता है।

न्यायिक प्रक्रिया का सम्मान: समझौते से पीछे हटना मध्यस्थता व्यवस्था की बुनियाद पर चोट है।

अनुच्छेद 142 का उपयोग: सुप्रीम कोर्ट ने अपनी विशेष शक्तियों (Article 142) का इस्तेमाल करते हुए शादी को भंग कर दिया और तलाक की डिक्री जारी की।

लागत और निर्देश: अदालत ने पत्नी पर भारी जुर्माना लगाया, घरेलू हिंसा के मामलों को रद्द किया!

केस का नाम: निकहत परवीन @ खुशबू खातून बनाम रफीक @ शिल्लू शादी 2 मार्च 2016 को हुई। सिर्फ एक महीने बाद, 2 अप्रैल 2016 को ...
24/04/2026

केस का नाम: निकहत परवीन @ खुशबू खातून बनाम रफीक @ शिल्लू

शादी 2 मार्च 2016 को हुई। सिर्फ एक महीने बाद, 2 अप्रैल 2016 को पत्नी (निकहत परवीन @ खुशबू खातून) ने बेटी को जन्म दिया। शादी के कुछ समय बाद वैवाहिक कलह शुरू हो गई। पत्नी ने प्रोटेक्शन ऑफ वीमेन फ्रॉम डोमेस्टिक वायलेंस एक्ट, 2005 के तहत केस दायर किया और खुद व बच्ची के लिए अंतरिम भरण-पोषण (maintenance) की मांग की (लगभग ₹25,000 प्रति माह)।

पति (रफीक @ शिल्लू) ने कोर्ट में पितृत्व (paternity) पर संदेह जताते हुए DNA टेस्ट कराने की अर्जी दी। मजिस्ट्रेट ने टेस्ट कराया। DNA रिपोर्ट में साफ-साफ आया कि बच्ची पति की जैविक संतान नहीं है। पत्नी ने खुद इस टेस्ट को कंसेंट दिया था और बाद में रिपोर्ट के निष्कर्ष को कभी चुनौती नहीं दी।

निचली अदालतों का फैसला:

ट्रायल कोर्ट (मजिस्ट्रेट कोर्ट) ने DNA रिपोर्ट के आधार पर पत्नी की भरण-पोषण की मांग खारिज कर दी। दिल्ली हाई कोर्ट ने भी ट्रायल कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा।

सुप्रीम कोर्ट का फैसला (21 अप्रैल 2026):
जस्टिस संजय करोल और जस्टिस नोंगमेइकापम कोटिस्वर सिंह की बेंच ने पत्नी की अपील खारिज कर दी।

सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला....⚖️मध्यस्थता में हुआ Full & Final Settlement अब सिर्फ समझौता नहीं, बल्कि बाध्यकारी माना जा...
16/04/2026

सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला....⚖️
मध्यस्थता में हुआ Full & Final Settlement अब सिर्फ समझौता नहीं, बल्कि बाध्यकारी माना जाएगा।
एक बार सभी विवाद निपटने के बाद मनमाने तरीके से पीछे हटना स्वीकार्य नहीं होगा।
कोर्ट ने साफ किया—ऐसे मामलों में न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग नहीं किया जा सकता।

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🚨 पुलिस प्रेशर बना रही है? अपने परिवार को बचाना सीखिए! अगर आपके खिलाफ FIR दर्ज है, तो क्या पुलिस आपके घरवालों को उठाकर ल...
10/04/2026

🚨 पुलिस प्रेशर बना रही है? अपने परिवार को बचाना सीखिए!

अगर आपके खिलाफ FIR दर्ज है, तो क्या पुलिस आपके घरवालों को उठाकर ले जा सकती है? 🤔
👉 नहीं! ये पूरी तरह Illegal Detention है।

⚖️ आपके अधिकार:
✔️ बिना वजह परिवार को उठाना कानून के खिलाफ है
✔️ तुरंत वीडियो रिकॉर्डिंग करें 📹
✔️ SP ऑफिस में लिखित शिकायत दें
✔️ राहत न मिले तो सीधे कोर्ट जाएं

📌 कानूनी रास्ता:
🔹 Article 226 – High Court में Habeas Corpus
🔹 Article 32 – Supreme Court में Petition

👨‍⚖️ कोर्ट ऐसे पुलिस अधिकारियों पर सख्त कार्रवाई और सस्पेंशन तक का आदेश दे सकती है

❌ डरिए मत
✅ अपने अधिकार जानिए
✅ अपने परिवार को बचाइए

📲 ऐसे ही कानूनी जागरूकता व जानकारी के लिए Follow करना मत भूलिए!

सुप्रीम कोर्ट ने आवासीय कॉलोनियों में बिनाअनुमति के व्यावसायिक भवन बनाने पर सख्त रुख अपनाया है... सभी नगर निगमों को जांच...
09/04/2026

सुप्रीम कोर्ट ने आवासीय कॉलोनियों में बिना

अनुमति के व्यावसायिक भवन बनाने पर सख्त रुख अपनाया है... सभी नगर निगमों को जांच करने और कार्रवाई दर्ज करने के निर्देश दिए गए हैं।

अदालत ने इस मुद्दे पर देशभर में विस्तृत सर्वेक्षण का आदेश दिया है।

अधिक जानकारी के लिए कमेंट पढ़ें।


कल्पना कीजिए कि आप एक ऐसे डॉक्टर से अपनी सर्जरी करवा रहे हैं, जिसने प्रवेश परीक्षा में नकारात्मक (negative) अंक प्राप्त ...
26/03/2026

कल्पना कीजिए कि आप एक ऐसे डॉक्टर से अपनी सर्जरी करवा रहे हैं, जिसने प्रवेश परीक्षा में नकारात्मक (negative) अंक प्राप्त किए थे। सुनने में यह डरावना लग सकता है, लेकिन NEET PG 2025-26 की काउंसलिंग में यह एक कड़वी सच्चाई बन चुका है।

चिकित्सा शिक्षा के गिरते मानक और शून्य कट-ऑफ का विवाद

​केंद्र सरकार द्वारा कट-ऑफ स्कोर को घटाकर 'शून्य' और 'नकारात्मक' तक लाने के फैसले के बाद, सरकारी मेडिकल कॉलेजों में एमएस (MS) ऑर्थोपेडिक्स और जनरल सर्जरी जैसी महत्वपूर्ण सीटें महज 4 से 10 अंकों पर आवंटित की गई हैं। इस निर्णय ने न केवल योग्य छात्रों के बीच भारी असंतोष पैदा कर दिया है, बल्कि सर्वोच्च न्यायालय (सुप्रीम कोर्ट) को भी हस्तक्षेप करने पर मजबूर कर दिया है।

​आखिर सरकार ने मानकों में इतनी बड़ी गिरावट क्यों की?
​सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या यह फैसला देश के स्वास्थ्य तंत्र के लिए घातक साबित नहीं होगा? इस पूरे मामले पर अब सुप्रीम कोर्ट ने कड़े सवाल उठाए हैं। कोर्ट ने 'नेशनल बोर्ड ऑफ एग्जामिनेशन इन मेडिकल साइंसेज' (NBEMS) से पूछा है कि आखिर कट-ऑफ में इतनी अधिक कटौती क्यों की गई?

​न्यायालय के समक्ष दो मुख्य पक्ष हैं:

​सरकार का तर्क: सीटें खाली न रहें और संसाधनों का पूर्ण उपयोग हो।
​विशेषज्ञों की चिंता: चिकित्सा शिक्षा और पेशेवरों के मानकों में भारी गिरावट आ सकती है।

​अदालत के अनुसार, इन दोनों के बीच संतुलन बनाना अनिवार्य है। कोर्ट ने स्पष्ट रूप से कहा कि यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि इस फैसले का मेडिकल शिक्षा के स्तर पर क्या प्रभाव पड़ेगा। फिलहाल, बोर्ड से इस पर विस्तृत जवाब मांगा गया है।

सुप्रीम कोर्ट ने सोशल मीडिया पर वीडियो अपलोड करने की बढ़ती प्रवृत्ति पर चिंता जताते हुए कहा कि आज फोन रखने वाला हर व्यक्...
25/03/2026

सुप्रीम कोर्ट ने सोशल मीडिया पर वीडियो अपलोड करने की बढ़ती प्रवृत्ति पर चिंता जताते हुए कहा कि आज फोन रखने वाला हर व्यक्ति खुद को मीडिया समझने लगा है, जो निष्पक्ष ट्रायल के लिए खतरा बन सकता है।

याचिका में यह मुद्दा उठाया गया कि कई मामलों में पुलिस द्वारा गिरफ्तार आरोपियों के वीडियो सोशल मीडिया पर डाल दिए जाते हैं। इससे आम लोगों के मन में पहले से ही एक धारणा बन जाती है, जो बाद में न्यायिक प्रक्रिया को प्रभावित करती है। जब ऐसे मामलों में सबूतों की कमी के कारण आरोपी बरी होते हैं, तो लोग न्यायपालिका पर ही सवाल उठाने लगते हैं।

यह स्थिति मीडिया ट्रायल जैसी बन जाती है, जहां फैसला अदालत से पहले ही जनता की राय में हो जाता है। जबकि कानून का मूल सिद्धांत है कि हर व्यक्ति तब तक निर्दोष है, जब तक अदालत उसे दोषी साबित न कर दे।

अदालत की यह चिंता एक जरूरी संदेश देती है कि सूचना साझा करना और न्याय प्रक्रिया को प्रभावित करना दो अलग बातें हैं। सोशल मीडिया का जिम्मेदार उपयोग ही न्याय व्यवस्था की निष्पक्षता को सुरक्षित रख सकता है।

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