21/12/2021
साइबर क्राइम
"कोई भी ऐसा गैर कानूनी कृत्य जिसमें कम्प्यूटर एक औजार के रूप में इस्तेमाल किया गया हो या उसे लक्ष्य बनाया गया हो या वह लक्ष्य तथा औजार दोनों हो, साइबर क्राइम कहलाता है।"
-आई-टी-एक्ट, 2000
अन्तर्राष्ट्रीय विशेषज्ञों द्वारा साइबर क्राइम की निम्नलिखित परिभाषाएं दी गई हैं :-
1- पूर्वाग्रह से ग्रसित लोगों द्वारा सूचना व संचार तंत्र कम्प्यूटर प्रोग्रामों डाटा तथा आंकड़ों को बाधित करने का प्रयास (मार्क पॉलिट एफबीआई USA )।
2- बाधाएँ उत्पन्न करने के प्रयास एवं कम्प्यूटर के माध्यम से लक्ष्य पर निशाना (केविन कोलमैन, टेक्नोलाइटिक्स इंस्टीट्यूट, टेक्सास USA )
3- राजनैतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक या आर्थिक उद्देश्यों की पूर्ति के लिए देश की सरकार या देश के नागरिकों को डराने, धमकाने, प्रताड़ित करने तथा वित्तीय धोखाधड़ी करने के लिए कम्प्यूटर नेटवर्क तथा उसमें सुरक्षित सूचनाओं एवं आँकड़ों को चोट पहुंचाने की कोशिश करना, चाहे वह किसी भी माध्यम से की गई हो।
4- कम्प्यूटर नेटवर्क को हैक करने, उसमें संगृहीत आंकड़ों को चुराना और फिर अपने सामाजिक, राजनैतिक तथा व्यावसायिक प्रतिद्वन्द्वियों के खिलाफ उनका इस्तेमाल करना।
5- सूचना तंत्र की किसी भी प्रकार से चोट पहुंचाने की कोशिश जिसमें वेबसाईट छेड़छाड़ शामिल हैं।
6- साइबर स्पेस में ऐसी कोई भी गतिविधियाँ जो मूलतः मानवीय संवेदनाओं का अपमान कर सकती है। अथवा सूचना तकनीक के जरिए सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक, सांस्कृतिक अथवा भावात्मक रूप से किसी को नुकसान पहुंचाना अथवा संकट में डालना।
भारत में आई टी कानून, 2000 लागू होने के बाद साइबर क्राइम को पहली बार व्यवस्थित ढंग से प्रस्तुत किया गया। इस अधिनियम के अनुसार कोई भी ऐसा गैर कानूनी कृत्य जिसमें कम्प्यूटर एक औजार के रूप में इस्तेमाल किया गया हो या उसे लक्ष्य बनाया गया हो या वह लक्ष्य तथा औजार दोनों हो, साइबर क्राइम कहलाता हैं।
साइबर टेरेरिज्म, साइबर फ्रॉड पासवर्ड, बैंक एकाउन्ट एवं क्रेडिट कार्ड नम्बर चोरी करने के लिए साइबर स्पेस का इस्तेमाल किया जाता है तो यह फ्राड कहलाता है इसी तरह अन्य प्रकार की परिभाषाएं भी दी जाती हैं। इसलिए साइबर क्राइम के ही रूप मगर लक्ष्य तथा उद्देश्य अलग-अलग होने के कारण ही इनकी अलग-अलग शब्दावली है। मसलन किसी एक देश द्वारा अपने प्रतिद्वन्द्वी दूसरे देश की सूचना प्रणाली में सेंध लगाने को साइबर-वार की संज्ञा दी गई हैं। जाहिर है कि साइबर क्राइम के अन्तर्गत आने वाली इस प्रकार की भिन्न-भिन्न शब्दावली के कारण भ्रमित नहीं होना चाहिए।
साइबर क्राइम के सभी रूप ही व्यक्ति, समाज, देश की गोपनीयता, एकता तथा अखण्डता के लिए नुकसानदेह हैं। लेकिन साइबर टेरेरिज्म तथा साइबर-वार सर्वाधिक भयावह साबित हो रहे हैं। भारत में विगत पांच सालों में हुए आतंकवादी हमलों में सूचना एवं संचार माध्यमों की बड़ी बखूबी तथा चतुराई से उपयोग किया गया हैं। इसके अलावा चीन तथा पाकिस्तान द्वारा भारतीय विदेश तथा रक्षा मंत्रलय के साथ-साथ प्रधानमंत्री कार्यालय के कुछ दस्तावेजों में भी सेंध लगाने की समस्या काफी जटिल बन गई हैं। अफसोस इस बात का है कि इस क्षेत्र में भारत द्वारा किए गए सुरक्षात्मक उपाय कारगर साबित नहीं हो रहे हैं।
लगातार बढ़ती वैश्विक प्रतिस्पर्धा तथा आतंकवाद को इस बात के लिए बल मिला हैं कि भावी युद्धों में साइबर स्पेस, निर्णायक भूमिका में होगा और अपने आने वाले समय में आतंकवादी किसी भी देश की रक्षा प्रणाली, सुरक्षा प्रणाली, हवाई सेवाओं, रेल सेवाओं तथा अन्य संचार व परिवहन सेवाओं और कम्पनियों और सरकार के कामकाजों को भी ठप्प कर सकते हैं।
साइबर वार के द्वारा किसी भी देश की सूचना व संचार आधारित उपग्रह प्रणाली और हर प्रकार की रक्षा प्रतिरक्षा प्रणाली को भी ठप्प किया जा सकता है। यहां तक कि जमीन पर बैठे-बैठे किसी देश के हवाई जहाज, उपग्रह लड़ाकू विमान तथा मिसाइलों को गिराया जा सकता है, हाइजैक किया जा सकता है अथवा उनकी दिशा बदली जा सकती है। जाहिर है, भावी जटिलताओं से बचने के लिए अभी से सुरक्षात्मक उपाय करने होंगे ।
साइबर क्राइम का वर्गीकरण
तकनीकी दृष्टि से साइबर क्राइम को दो भागों में वर्गीकृत किया जा सकता हैं-
1- पहली श्रेणी के अन्तर्गत कम्प्यूटर को एक लक्ष्य के रूप में अन्य कम्प्यूटरों पर आक्रमण करने के लिए प्रयुक्त किया जाता है जैसे-हैकिंग, वायरस, वर्मस् तथा इसमें अन्य कम्प्यूटरों को हैक कर या उनमें वायरस डालकर उन्हें बाधित किया जाता है।
2- दूसरी श्रेणी में अपराध करने के लिए कम्प्यूटर का उपयोग एक शस्त्र या हथियार के रूप में किया जाता है जैसे टेरेरिज्म, बौद्धिक सम्पदा अधिकारों का उल्लंघन, क्रेडिट, कार्ड, धोखाधड़ी, ब्लैकमेलिंग, अश्लील सामग्री का वितरण इत्यादि इसमें साइबर स्पेस का प्रयोग अपने किसी भी प्रकार के कुत्सित स्वार्थों, आतंकी घटनाओं को अंजाम देना किसी एकाउंट या क्रेडिट कार्ड नम्बर लेकर वित्तीय फर्जीवाड़ा करना किसी के डाटा व सूचनाओं में छेड़छाड़ करके उसे बदलना अपने प्रतिद्वन्द्वी की गोपनीय सूचनाओं को चुराकर उसके खिलाफ रणनीति बनाना अश्लील असामाजिक तथा उन्माद फैलाने वाली सामग्री का प्रसारण करना दुष्प्रभाव या ब्लैकमेंलिग इत्यादि की पूर्ति के लिए करना।
सैद्धान्तिक रूप से विशेषज्ञों ने साइबर क्राइम को तीन श्रेणियों में वर्गीकृत किया हैं :-
1- सरकार के विरुद्ध अपराध जैसे-साइबर टेरेरिज्म जिसमें इंटरनेट के जरिए राजनैतिक, धार्मिक, सांप्रदायिक और इस तरह की कई विचारधाराओं के माध्यम से लोगों मे आतंक एवं उन्माद फैलाना तथा आतंकी घटनाओं को अंजाम देने के लिए सूचना माध्यमों के द्वारा रणनीति बनाना।
2- किसी खास व्यक्ति कि विरुद्ध अपराध में जिसमें उस व्यक्ति की साइबर स्पेस में की गई हर प्रकार की छोटी से छोटी गतिविधियों पर नजर रखना तथा उसके बारे में ली गई सूचनाओं के द्वारा उसे हानि पहुंचाने का प्रयास करना।
3- सम्पत्ति से जुड़े अपराध जिसमें किसी व्यक्ति की सम्पत्ति से संबंधित गोपनीय सूचनाएं, वित्तीय लेनदेन, बैंक एकाउन्ट पासवर्ड या क्रेडिट कार्ड से जुड़ी महत्त्वपूर्ण जानकारियों को हासिल किया जाता है।
कुछ प्रमुख साइबर अपराध
1- हैकिंग:- हैकिंग शब्द का इस्तेमाल सर्वप्रथम मेसाच्युसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी में किया गया था। उस समय इसका अर्थ था कोई भी काम चालाकी से या विचारोत्तेजक नई शैली में करना। मगर आज हैकिंग शब्द का इस्तेमाल सूचना एवं संचार प्रौद्योगिकी को नुकसान पहुंचाने के रूप में किया जा रहा है। हैकिंग का शुरूआती मामला अगस्त 1986 में तब पकड़ा गया जब केलिफोर्निया यूनिवर्सिटी के ऑडिट में गड़बड़ी पाई गई।
जांच के बाद पता चला कि यह काम कुछ हैकर्स ने किया हैं। हैकिंग के द्वारा हैकर्स एक तरह से आपकी कम्प्यूटर प्रणाली पर कब्जा जमा लेते हैं और जब तक आपको पता चलता है, तब तक वे आपके नेटवर्क का गलत उद्देश्यों के लिये इस्तेमाल कर चुके होते हैं। हैकर्स आपका ई-मेल ट्रेस कर सकता है, आपकी ई-मेल आईडी, पासवर्ड या वेबसाइट का उपयोग अवांछित गतिविधियों में कर सकता है अथवा साइबर स्पेस में आपकी गतिविधियों पर नजर रखकर आपको नुकसान पहुंचा सकता हैं।
इसके अलावा किसी कम्प्यूटर प्रणाली, सॉफ्टवेयर प्रोग्रामिंग डाटा, मशीन कोड में बदलाव कर उसे ऑरिजिनल फॉर्म से अलग करके हैकर सिस्टम को खत्म कर सकते हैं अथवा महत्त्वपूर्ण जानकारियां चुरा सकते हैं। मुम्बई तथा अहमदाबाद वेबसाइटों को हैक करने के लिए हैकर कई तरह के तरीके अपनाते हैं। वे ऐसे सॉफ्टवेयर का प्रयोग करते हैं जो मोडेम का प्रयोग कर हजारों फोन नम्बर डायल कर कम्प्यूटर से जुड़े अन्य किसी मोडेम को ढूंढता हैं। इसके अलावा कम्प्यूटर की प्रोग्रामिंग मशीन लैंग्वेज में लिखी होती हैं जिसको कम्प्यूटर समझता हैं तथा जिसके आधार पर आपका बनाया गया प्रोग्राम काम करता है। हैकर इसी प्रोग्राम पर काम करता है। हैकर इसी प्र्रोग्राम के बीच में दी गई कंडीशनल स्टेटमेंट जैसे-जंप इफ को विभिन्न कंडीशनों के द्वारा संतुष्ट कराकर हैकिंग करते हैं। वह इंटरनेट को किसी सॉफ्टवेयर के आधार पर पता करते हैं। साथ ही ऑपरेटिंग सिस्टम में कौन सी खामी है जिसके लिए पैच इंस्टाल नहीं किया गया है, को जानने के बाद हैकर उसे हैक कर लेते हैं। इसके अलावा स्कैनर प्रोग्राम के द्वारा नेटवर्क से जुड़े कम्प्यूटरों के आईपी एड्रेस को स्कैन कर ऐसा सिस्टम ढूंढता है जो फिलहाल काम कर रहा हैं।
2- कम्प्यूटर वायरस/वर्मस्:- यह एक खास तरह का प्रोग्र्राम होता है जिसे इस तरह विकसित किया जाता है ताकि वह कम्प्यूटर के डाटा को नुकसान पहुंचा सके। दूसरे शब्दों में कहें तो कम्प्यूटर वायरस संक्रामक बीमारी के वायरस की तरह स्वयं अपनी प्रतिलिपियों को कम्प्यूटर के अन्य प्रोग्रामों से जोड़कर उन्हें संक्रमित कर लेता है जिसके कारण मूल प्रोग्राम सुचारू रूप से काम नहीं करता और कम्प्यूटर की कार्य प्रणाली एवं क्षमता को पूरी तरह विघटित कर देता है। वायरस के अन्य विध्वंशक कार्य हैं डाटा को डिलीट या खराब करना अथवा उसमें परिवर्तन करना, ड्राइव को पढ़ने योग्य न रहने देना, संचार व सूचना में बाधा डालना तथा कम्प्यूटर के सुरक्षा कमांड को तोड़ देना। वर्ष 1950 में जॉन वन न्यूमेन ने सर्वप्रथम कम्प्यूटर वायरस की कल्पना की थी।
वर्ष 1987 में कमांड डॉट कॉम फाइलों का इफेक्ट करने वाले पहले वायरस का नाम लाइह रखा गया। इसके बाद अस्तित्व में आए कुछ कुख्यात वायरस थे सी-व्रेन या पाकिस्तानी वायरस लव-बग, लेटलिंग ब्लडी 8290 रेडलोफ लवलेटर, लवगेट सिरकेम इत्यादि वर्ष 2000 में अस्तित्व में आए। अकेले लव बग वायरस ने अमरीका को 200 बिलियन डॉलर का चूना लगाया था। वायरस की खतरनाक विशेषता यह है कि वह अपने सम्पर्क में आने वाले अन्य कम्प्यूटर्स की हार्ड-डिस्क तथा फ्रलापी को भी संक्रमित करता हैं और इसके प्रकार नेटवर्क से जुड़े अन्य कम्प्यूटर्स में इसका क्रमशः प्रसार होता जाता हैं। यह ऑडियो, वीडियो, वर्ड या किसी अन्य शक्ल में हो सकता। यह ई-मेल, पेन-ड्राइव, सीडी से डाटा ट्रांसफर करते समय या इंटरनेट से कोई फाईल डाउनलोड करते समय कम्प्यूटर में समा जाते हैं। इसी तरह वर्मस् जब किसी कम्प्यूटर में घुसते हैं, उस समय ये तब तक अपनी प्रतिलिपियां बनाते जाते हैं, जब तक कि उसकी मेमोरी का पूरा स्पेस खत्म न कर लें।
3- इंटरनेट पाइरेसी:- इंटरनेट पाइरेसी के बारे में आम यूजर्स को अधिक पता नहीं होता है जबकि जाने-अनजाने में भी इस काम को अंजाम दे चुके होते हैं अथवा इसका शिकार हो चुके होते हैं। इंटरनेट पाइरेसी भी साइबर क्राइम की श्रेणी में आता हैं। इंटरनेट पाइरेसी यानि किसी कॉपीराइट डिजिटल फाइल को गैर कानूनी तरीके से इंटरनेट पर चुराना कई तरह की फाइल जैसे-फिल्में, संगीत फाइलें, ई-बुक्स सॉफ्टवेयर तथा अन्य सामग्री की चोरी इंटरनेट पाइरेसी के अन्तर्गत आती हैं। इंटरनेट पाइरेसी में शामिल लोग अपने विज्ञापन तथा सेल जैसे कार्य भी नेट के जरिए करते हैं। पाइरेसी आज वैश्विक समस्या के रूप में उभर रही हैं। सॉफ्टवेयर के मामले में पाइरेसी आम है। लोग अक्सर बिना जानकारी के चुराए गए सॉफ्टवेयर खरीद लेते हैं। इंटरनेट पाइरेट अपने चोरी के सामान को बेचने के लिए नकली वेबपेज भी बना लेते हैं जिससे वह अपना विज्ञापन करते हैं।
दरअसल इंटरनेट पर प्रत्येक व्यक्ति को बिना अपनी जानकारी दिये सौदे का हक होता है। अन्य भौतिक उत्पादों से इतर वहां खाते की डिजिटल फाइल बनाने की जरूरत नहीं होती जिसके चलते पाइरेसी काफी अधिक होती हैं। शक के दायरे में आने पर ऐसे कथित विक्रेता गायब भी हो जाते हैं और खरीददार हाथ मलते रह जाते हैं। इसलिए पाइरेटेड सॉफ्टवेयर को न खरीदें और वहीं से खरीददारी करें जो वेबसाइट रजिस्टर्ड हो तथा जिसके बारे में अधिकांश लोग जानते हों बिना आज्ञा किसी भी कॉपीराइट फाइल या सॅाफ्रटवेयर के गुपचुप इस्तेमाल को लेकर पूरी दुनिया में बहस चल रही है। और कुछ देशों ने इस संबंध में कानून भी बना लिए हैं मगर प्रत्येक देश के कानून इस मामले में अलग-अलग हैं। कनाडा में म्यूजिक फाइलों को अपने निजी इस्तेमाल के लिए डाउनलोड करने की आज्ञा है जबकि अमरीका में यह गैरकानूनी हैं। फिल्में डाउनलोड करना अधिकांश जगह गैरकानूनी हैं।
4- ट्रोजन अटैक/वेब जैकिंग:- ट्रोजन एक ऐसा प्रोग्राम है जो किसी बड़े प्रोग्राम के बीच में ऐसे डाल दिया जाता हैं कि किसी को खबर भी नहीं और अन्य प्रोग्राम्स के साथ यह भी आसानी से क्रियान्वित होता रहता है। किसी कम्प्यूटर नेटवर्क को हैक करके और ट्रोजन के जरिए ई-मेल का आदान-प्रदान करके आतंकी आतंकवादी घटनाओं से पूर्व इसका खूब इस्तेमाल कर रहे हैं। इसी तरह वेब जैकिंग के अन्तर्गत यदि एक बार किसी वेबसाइट को जैक किया जाता है तो वेबसाइट का मालिक उस पर अपना नियंत्रण खो देता है। इसके बाद जैकर वेबसाइट को अवांछितित कार्यों के लिए प्रयुक्त कर सकता है। साइट की सूचनाओं को खत्म कर सकता है या उन्हें बदल सकता हैं।
5- लॉजिक बम या ई-मेल बांबिंग डिनायल ऑफ सर्विसेज अटैक:- लॉजिक बम ऐसा क्रोड प्रोग्राम है जो किसी विशेष दिन या सुनिश्चित समय पर सक्रिय होकर न सिर्फ कम्प्यूटर के मुख्य प्रोग्राम में बाधा डालता है बल्कि उसे गुमराह भी कर देता है। इसी प्रकार अत्यधिक संख्या में ई-मेल भेजकर किसी के सर्वर या ई-मेल एकाउंट को नष्ट करना ई-मेल बांबिंग कहलाता हैं। इसी तरह इंटरनेट यूजर्स की लगातार बढ़ती संख्या से वेब सर्वर पर अत्यधिक दबाव पड़ जाता है जिससे कभी-कभी उसकी क्षमता कम हो जाती हैं। इस प्रकार सर्वर की ओवरलोडिंग के कारण सरकारी व निजी संस्थानों के दैनिक कामकाजों पर बुरा असर पड़ता है मसलन बिजली तथा पानी की आपूर्ति जैसी सुविधाएं भी इससे कुछ समय के लिए ठप्प हो जाती हैं इसे डिनायल ऑफ सर्विसेज अटैक का नाम दिया गया है।
6- डाटा डिडलिंग तथा इंटरनेट टाइम चोरी:- कम्प्यूटर पर प्रोसेस होने से पूर्व डाटा में परिवर्तन कर देना तथा प्रोसेस के बाद फिर उसे वास्तविक रूप में बदल देना डाटा डिडलिंग कहलाता है। इसी तरह डाटा इंटरनेट पासवर्ड प्राप्त कर किसी अन्य द्वारा खरीदे गए टाइम का इस्तेमाल करना डिनायल टाइम थेफ्रट कहलाता है।
हैकिंग से बचाव
सर्वप्रथम इंटरनेट तथा कम्प्यूटर यूजर प्रत्येक व्यक्ति को साइबर शिक्षा अवश्य दी जानी चाहिए। उन्हें साइबर स्पेस के कायदे-कानूनों का अवश्य पता होना चाहिए, इससे संबंधित जन-जागरूकता अभियान विभिन्न स्तरों पर चलाए जा सकते हैं। मसलन शैक्षणिक संस्थानों में इंटरनेट की कार्यविधि, सीमाओं तथा राष्ट्रीय-अन्तर्राष्ट्रीय आईटी कानूनों की व्यावहारिक जानकारी विशेषज्ञों द्वारा समय-समय पर अवश्य दी जानी चाहिए।
इससे सामाजिक जागरूकता फैलेगी तथा प्रत्येक इंटरनेट यूजर अपने कार्यों, दायित्वों के प्रति सजग होगा, गतिविधियाँ काफी हद तक कम हो जाएगी। इसके अलावा सूचना प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में नित नए परिवर्तन व अविष्कार हो रहे हैं। अतः उनके अनुसार समय-समय पर आईटी कानूनों की समीक्षा करके उसमें आवश्यक फेरबदल करने चाहिए।
ई-मेल का इस्तेमाल करते हुए सावधानी बरतें, यह आपका सुरक्षित पहला कदम होगा। संदेहास्पद मेल्स को कदापि न खोलें जिनका आपसे कोई सरोकार नहीं है, बल्कि उन्हें तुरन्त डिलीट कर दें।
अपने पीसी का पासवर्ड सदा गोपनीय रखें, हो सके तो अपनी आईडी तथा पासवर्ड को लम्बा रखें तथा सुरक्षा की दृष्टि से पासवर्ड बदला भी जा सकता है। अपना पासवर्ड, क्रेडिट कार्ड या बैंक एकाउंट नम्बर किसी को न बताएँ। किसी अनजान व्यक्ति को अपने सिस्टम पर काम न करने दें।
अगर किसी कारण से विंडो स्लो हो गया है तो समझ लीजिए कि आपका पीसी हैक हुआ है। ऐसे में पीसी को फॉर्मेट करना ही ठीक होगा।
कम्प्यूटर में सदैव आधिकारिक तथा मान्यता प्राप्त साफ्रटवेयर का ही प्रयोग करना चाहिए।
आजकल मार्केट में कई एडवांस्ड सिक्योरिटी सिस्टम्स आ रहे हैं जो न केवल समय के अनुसार उपयोगी हैं, बल्कि उनमें जीरो डे वायरस प्रोटेक्शन सॉल्यूशन भी मिलता है, ऐसे सिस्टम का इस्तेमाल करने से काफी हद तक पीसी हैकिंग में सुरक्षात्मक उपायों के लिए विशेषज्ञों से राय ली जा सकती है।
वायरस से बचाव
कम्प्यूटर पर काम करते समय ध्यान रखें कि कहीं कम्प्यूटर की स्थापित मेमोरी 640 किलोबाइट से कम तो नहीं हो गई है या स्क्रीन पर कोई अनचाहा संदेश तो प्राप्त नहीं हो रहा है या कोई प्रोग्राम फाइल अस्वाभाविक रूप से घट-बढ़ तो नहीं रहा है अथवा आपका पीसी हार्डडिस्क से बूट प्रोग्राम पढ़कर भी आरम्भ क्यों नहीं हो रहा है, जाहिर है, आपके कम्प्यूटर पर वायरस का अटैक हो चुका हैं।
अपने सिस्टम में हमेशा अच्छे एंटी वायरस सॉफ्टवेयर खासतौर पर कम्प्यूटर का इस्तेमाल करें। एंटी वायरस सॉफ्टवेयर खासतौर पर कम्प्यूटर को वायरस से बचाने के लिए प्रोग्राम किये जाते हैं। ये वायरस हमले से कम्प्यूटर को बचाते हैं, वायरस को फैलने से रोकते हैं और उन्हें हटाते भी हैं। प्रतिदिन इंटरनेट का इस्तेमाल करने वालों को रोजाना एंटीवायरस सॉफ्टवेयर को अपडेट करते रहना चाहिए। कुछ एंटी वायरस सॉफ्टवेयर में ऑटोमेटिक अपडेट होने की सुविधा रहती हैं। एंटी वायरस सॉफ्टवेयर किन्हीं खास तरह के कोड्स को ध्यान में रखकर बनाए जाते हैं।
जब कोई फाइल इन कोड्स से मिलती-जुलती है तो यह प्रोग्राम उसे ब्लॉक कर देता हैं तथा आपको आगाह कर देता हैं कि आपके कम्प्यूटर में वायरस हैं। ई-मेल, पेन ड्राइव या सीडी से डाटा ट्रांसफर करने और इंटरनेट से कोई फाइल डाउनलोड करते समय सावधानी बरतें। ऐसा करते समय इन्हें एंटीवायरस से स्कैन कराएं। उसके बाद ही उनका उपयोग करें। अब आपके कम्प्यूटर में वायरस मिल जाएगा और मिलते ही उसे डिलीट कर दें। मार्केट में मैक्फे, एवीजी, नार्टनअवास्ट, अवीरा, पाण्डा पीसी, क्लाइन इत्यादि सॉफ्टवेयर मौजूद हैं। इन्हें मार्केट से या फिर ऑनलाइन खरीद सकते हैं।
इसके अलावा इनका फ्री वर्जन भी इंटरनेट से डाउनलोड कर सकते हैं। मगर कम्पनियों द्वारा फ्री वर्जन कुछ समय के लिए ही दिये जाते हैं तथा इनसे सुरक्षा की पूरी गांरटी भी नहीं दी जा सकती। ऐसे पेन ड्राइव, सीडी या डीवीडी का उपयोग न करें जो वायरस वाले कम्प्यूटर पर चली हो। अगर आपको काफी समय बाद पता चलता हैं कि आपके पीसी पर वायरस मौजूद है तो नेटवर्क पर मौजूद अन्य लोगों को सूचना अवश्य दें कि वायरस फैल गया है जिससे वे समय रहते ही अपने सिस्टम को एंटीवायरस से स्कैन कर सकें। अपने सारे महत्वपूर्ण डाक्यूमेंट तथा प्रोग्रामिंग से जुड़े सॉफ्टवेयर को अलग सीडी पर लोड करके रखना चाहिए, ताकि समय आने पर उसका उपयोग किया जा सके।
इंटरनेट बैंकिंग में सुरक्षा
बैंक द्वारा आपको मुहैया करवाया गया नेट बैंकिंग यूजर आई-डी और पासवर्ड किसी और को कदापि न बताएं। यहाँ तक कि बैंक ऑफिसर को भी नहीं। अपने पासवर्ड को अपने मोबाइल, पीडीए आर्गेनाइजर डायरी आदि में नोट न करें। अपना पासवर्ड बदलते रहें। कोशिश करें कि आपका नेट बैंकिंग पासवर्ड आपके ई-मेल, दूसरे लॉग इन आइडी से मिलता-जुलता या समान न हो।
नेट बैंकिंग पासवर्ड तैयार करते समय ऐसी किसी व्यक्तिगत जानकारी का इस्तेमाल न करें, जिसका कोई अन्य व्यक्ति पासवर्ड तोड़ने के लिए प्रयोग कर सकता है। अपने पासवर्ड में लेटर्स तथा कॅाम्बिनेशन इस्तेमाल करें। नेट बैंकिंग वेबसाइट का प्रयोग करने से पहले अपने ब्राउजर पर ऑटो-कम्पलीट फंक्शन डिसेबल कर दें। साइबर कैफे सार्वजनिक स्थल पर नेट बैंकिंग सेशन के बाद लॉग आउट बटन इस्तेमाल करते हुए सुनिश्चित करें कि कोई आपकी गतिविधियों पर नजर न रख रहा हों। ब्राउजर पर बैंक (URL) खुद टाइप करें। ई-मेल पर मिले मैसेज में लिखें (URL) पर क्लिक कर ट्रांजेक्शन करना जोखिम भरा हो सकता है। इसके अलावा बैंक से या अन्य स्त्रेतों से ऑनलाइन बैंकिंग के सुरक्षा निर्देश अवश्य पता करें।
इंटरनेट खरीददारी/लेन-देन में सुरक्षा
किसी साइट की प्रमाणिकता को जाँचने के लिए ध्यान दें कि उसमें इस्तेमाल भाषा में व्याकरण की गलतियाँ या वर्तनी सम्बन्धी गलतियाँ तो नहीं हैं। प्रामाणिक साइटों पर सामान्यतः ‘टू फैक्टर अथॅारिटी’ (TFA) की व्यवस्था होती है। टू-एफ प्रक्रिया अपनाएँ। इस प्रक्रिया से एक अतिरिक्त डायनेमिक पासवर्ड इंटरनेट पर खरीददारी करते समय सही वेबसाइट की ओर से खरीददार को खरीद की पुष्टि प्राप्त होनी चाहिए। खरीददारी करते समय ग्राहक का नाम, पूरा पता, क्रेडिट कार्ड की किस्म व नम्बर, बैंक अकाउंट नम्बर, पासवर्ड या क्रेडिट कार्ड के खत्म होने के समय से संबंधित अधिक जानकारी चाहने वाली फर्म तथा वेबसाइट संदिग्ध होती है।
अपना पासवर्ड लम्बा रखें तथा उसमें न्यूमेरिक व एल्फाबेटिक दोनों को शामिल करें। संदेहास्पद वेबसाइट को कदापि न खोलें और अपने इंटरनेट वैंडर के बारे में पूरी जानकारी रखें। ऑनलाइन खरीददारी के लिए ‘वर्चुअल क्रेडिट कार्ड’ अपनाएं।
अन्य सावधानियाँ
अपने वेब ब्राउजर के एड्रेस के बारे में सोशल नेटवर्किंग साइट का एड्रेस डालकर उसे एक्सेस करें न कि ई-मेल कि जरिए, साइट में पर्सनल इंफोर्मेशन शेयर करने से बचें। सार्वजनिक स्थानों जैसे-रेलवे स्टेशन, इंटरनेट कैफे, एयरपोर्ट, मॉल्स आदि पर इंटरनेट इस्तेमाल करते समय दोबारा देखें कि आपने ई-मेल या सोशल नेटवर्किंग लॉग आउट कर दिया हैं। वेब व्राउजर को ‘ऑटो सेव’ या पासवर्ड याद रखने की सुविधा का इस्तेमाल न करें। इंटरनेट से फ्री-सॉफ्टवेयर गाने, वीडियो आदि डाउनलोड करने के चक्कर में हम अपने कम्प्यूटर में वायरस तथा मालवेयर जैसे खतरनाक प्रोग्राम भी डाउनलोड करते हैं, जो हमारी महत्वपूर्ण सूचनाओं को चुरा सकते हैं अथवा हमारी कम्प्यूटर प्रणाली को नुकसान पहुँचा सकते हैं।
इसलिए केवल अधिकृत वेबसाइट से ही डाउनलोडिंग करें। कुछ सोशल नेटवर्किंग साइट आपको थर्ड पार्टी सॉफ्टवेयर एप्लीकेशन को डाउनलोड करने की छूट देती हैं ताकि आप नए-नए फीचर्स का उपयोग कर सकें, लेकिन ऐसा करना कभी-कभी आपकी पर्सनल इंफोर्मेशन को हैक कर सकता है। अतः पहले थर्ड पार्टी एप्लीकेशन की सेफ्रटर पॉलिसी को अच्छे तरह जाँच लें।
--------------------------------------------------------------------