12/07/2026
⚖️📌 मध्यप्रदेश हाईकोर्ट: चिकित्सकीय लापरवाही एवं उपचार से इंकार संबंधी आरोपों में, यदि शिकायत एवं प्रारंभिक साक्ष्य प्रथमदृष्टया अपराध प्रकट करते हों, तो धारा 482 CrPC के अंतर्गत कार्यवाही निरस्त नहीं की जा सकती। ⚖️📌
⚖️ हाईकोर्ट ने कहा – यह प्रश्न कि चिकित्सक ने वास्तव में उपचार से इंकार किया था या धन की मांग की थी, साक्ष्य का विषय है और इसका निर्णय ट्रायल के दौरान ही किया जा सकता है। केवल साक्ष्य की कथित कमी या विवादित तथ्यों के आधार पर आपराधिक कार्यवाही प्रारंभिक स्तर पर समाप्त नहीं की जा सकती।
मामला: Dr. Mandavi v. Anish Khan
न्यूट्रल सिटेशन: 2026:MPHC-JBP:45744
मामला संख्या: M.Cr.C. No. 2320 of 2016
निर्णय दिनांक: 23 जून 2026
न्यायालय: माननीय मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय, जबलपुर
पीठ: माननीय न्यायमूर्ति हिमांशु जोशी।
---
⚖️ मामले के संक्षिप्त तथ्य
शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया कि उसकी पत्नी जैबुन निशा को प्रसव पीड़ा होने पर सरकारी अस्पताल, टीकमगढ़ लाया गया। मरीज की स्थिति गंभीर होने पर ऑपरेशन की आवश्यकता बताई गई।
आरोप था कि आवेदिका डॉ. मांडवी, जो उस समय आपातकालीन ड्यूटी पर थीं, सूचना दिए जाने के बावजूद अस्पताल नहीं आईं तथा बाद में कथित रूप से निजी नर्सिंग होम में उपचार हेतु ₹50,000/- की मांग की। शिकायतकर्ता द्वारा असमर्थता व्यक्त करने पर राशि कम कर ₹5,000/- बताई गई, किंतु ₹2,000/- होने की जानकारी देने पर कथित रूप से उपचार से इंकार कर दिया गया। बाद में मरीज को झांसी रेफर किया गया, किंतु रास्ते में उसकी मृत्यु हो गई।
---
⚖️ आवेदिका के तर्क
आवेदिका ने तर्क दिया कि—
✔️ वह एक सरकारी चिकित्सक हैं और अपने आधिकारिक कर्तव्यों का निर्वहन कर रही थीं;
✔️ उनके विरुद्ध शिकायत दुर्भावना से प्रेरित है;
✔️ धारा 197 CrPC के अंतर्गत पूर्व स्वीकृति (Sanction) के बिना संज्ञान नहीं लिया जा सकता था;
✔️ कोई पोस्टमार्टम रिपोर्ट प्रस्तुत नहीं की गई है;
✔️ मृत्यु का कारण एवं चिकित्सकीय लापरवाही का कोई चिकित्सकीय साक्ष्य उपलब्ध नहीं है;
✔️ शिकायत घटना के लगभग पाँच माह बाद दायर की गई, जिससे आरोपों की सत्यता संदिग्ध हो जाती है।
---
⚖️ हाईकोर्ट के महत्वपूर्ण निष्कर्ष
न्यायालय ने कहा—
> प्रारंभिक स्तर पर न्यायालय को आरोपों की सत्यता अथवा असत्यता का परीक्षण नहीं करना होता। यदि शिकायत एवं प्रारंभिक साक्ष्य प्रथमदृष्टया अपराध प्रकट करते हैं, तो मामले का परीक्षण ट्रायल में किया जाना चाहिए।
न्यायालय ने पाया कि शिकायतकर्ता एवं उसके गवाहों के बयानों में यह आरोप दोहराया गया है कि आवेदिका ने गंभीर स्थिति में मरीज को उपचार प्रदान नहीं किया और धन की मांग की।
---
⚖️ साक्ष्य की कमी कार्यवाही निरस्त करने का आधार नहीं
न्यायालय ने कहा—
> पोस्टमार्टम रिपोर्ट अथवा अन्य चिकित्सकीय दस्तावेजों की अनुपस्थिति मात्र से प्रारंभिक स्तर पर कार्यवाही समाप्त नहीं की जा सकती। साक्ष्यों का मूल्यांकन ट्रायल के दौरान किया जाएगा।
न्यायालय ने यह भी कहा कि साक्ष्य की पर्याप्तता या अपर्याप्तता का परीक्षण धारा 482 CrPC की कार्यवाही में नहीं किया जा सकता।
---
⚖️ धारा 197 CrPC (Sanction) का प्रश्न
न्यायालय ने कहा—
> क्या कथित कृत्य वास्तव में सरकारी कर्तव्यों के निर्वहन से प्रत्यक्ष रूप से संबंधित थे अथवा नहीं, यह तथ्य एवं साक्ष्य का प्रश्न है, जिसका उचित परीक्षण ट्रायल कोर्ट द्वारा किया जा सकता है।
इस स्तर पर यह निर्णायक रूप से नहीं कहा जा सकता कि आरोपित कृत्य पूर्णतः आधिकारिक कर्तव्य के दायरे में थे।
---
⚖️ महत्वपूर्ण अवलोकन
न्यायालय ने कहा—
> विवादित प्रश्नों (Disputed Questions of Fact) का निर्णय धारा 482 CrPC की अंतर्निहित अधिकारिता के अंतर्गत नहीं किया जा सकता।
यदि शिकायत प्रथमदृष्टया अपराध प्रकट करती है, तो अभियुक्त को ट्रायल का सामना करना होगा।
---
🎯 निर्णय
✅ धारा 482 CrPC के अंतर्गत दायर याचिका खारिज कर दी गई।
✅ मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट, टीकमगढ़ द्वारा पारित संज्ञान आदेश तथा पुनरीक्षण न्यायालय के आदेश को बरकरार रखा गया।
---
🎯 निर्णय का विधिक सिद्धांत (Ratio Decidendi)
> यदि शिकायत एवं प्रारंभिक साक्ष्य प्रथमदृष्टया अपराध प्रकट करते हों, तो साक्ष्यों की पर्याप्तता, चिकित्सकीय दस्तावेजों की अनुपस्थिति, देरी अथवा अन्य विवादित तथ्यों के आधार पर धारा 482 CrPC के अंतर्गत आपराधिक कार्यवाही निरस्त नहीं की जा सकती। ऐसे विवादों का निर्णय साक्ष्य के आधार पर ट्रायल में किया जाना चाहिए।
🏛️ व्यावहारिक उपयोग (Practical Utility)
✅ Medical Negligence Cases में महत्वपूर्ण निर्णय।
✅ Section 482 CrPC Quashing Petitions से संबंधित मामलों में उपयोगी।
✅ Prima Facie Case एवं Disputed Questions of Fact के सिद्धांत को पुनः स्थापित करता है।
✅ सरकारी चिकित्सकों के विरुद्ध अभियोजन एवं Section 197 CrPC Sanction संबंधी मामलों में महत्वपूर्ण दृष्टांत।
⚖️ निष्कर्ष
> मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने पुनः स्पष्ट किया कि धारा 482 CrPC की शक्ति असाधारण है और इसका प्रयोग अत्यंत सीमित परिस्थितियों में ही किया जाना चाहिए। जहां शिकायत एवं प्रारंभिक साक्ष्य प्रथमदृष्टया अपराध प्रकट करते हों, वहां विवादित तथ्यों एवं साक्ष्यों का परीक्षण ट्रायल कोर्ट द्वारा ही किया जाएगा।
⚠️ अस्वीकरण (Disclaimer): यह सारांश केवल विधिक जागरूकता एवं शैक्षणिक उद्देश्य से तैयार किया गया है। यह माननीय मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय के निर्णय Dr. Mandavi v. Anish Khan, M.Cr.C. No.2320 of 2016, Neutral Citation No.2026:MPHC-JBP:45744, निर्णय दिनांक 23.06.2026, पर आधारित है। प्रत्येक मामले का निर्णय उसके विशेष तथ्यों, उपलब्ध साक्ष्यों एवं लागू विधि पर निर्भर करेगा। किसी भी न्यायिक कार्यवाही में उपयोग से पूर्व मूल निर्णय का अध्ययन अवश्य किया जाना चाहिए।