अंशुमान दीक्षित एडवोकेट LL.M.

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अंशुमान दीक्षित एडवोकेट LL.M. Anshuman Dixit Advocate LL.M working in Orai District and session court Orai

इलाहाबाद हाईकोर्ट का महत्वपूर्ण फैसला - 8 साल तक टैक्स वसूलने के बाद बेदखली नहीं हो सकती।मामले का सार:मेरठ कैंटोनमेंट बो...
02/09/2026

इलाहाबाद हाईकोर्ट का महत्वपूर्ण फैसला - 8 साल तक टैक्स वसूलने के बाद बेदखली नहीं हो सकती।

मामले का सार:
मेरठ कैंटोनमेंट बोर्ड ने एक सम्पत्ति के कब्जेदारों से लगातार 8 साल तक हाउस टैक्स / प्रॉपर्टी टैक्स वसूला। 8 साल बाद बोर्ड ने उसी सम्पत्ति को अनधिकृत बताते हुए बेदखली (Eviction) की कार्यवाही शुरू कर दी।

पीड़ित पक्ष ने इस कार्यवाही को इलाहाबाद हाईकोर्ट में चुनौती दी।

हाईकोर्ट ने क्या कहा:-

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मेरठ कैंटोनमेंट बोर्ड की कार्यवाही पर कड़ी नाराजगी जताई। कोर्ट ने कहा कि जब आपने 8 साल तक किसी को अपना कब्जेदार मानकर टैक्स लिया है, तो आप बाद में उसे अचानक अनधिकृत कब्जेदार (Unauthorised Occupant) कहकर नहीं निकाल सकते। यह प्रशासनिक मनमानी और नैसर्गिक न्याय के विरुद्ध है।

कोर्ट ने कैंटोनमेंट बोर्ड के CEO द्वारा पारित बेदखली के सभी आदेशों को निरस्त (Set Aside) कर दिया।

इलाहाबाद हाईकोर्ट
माननीय एकल पीठ - जस्टिस रोहित रंजन अग्रवाल जी

कानूनी सिद्धांत:
1. यदि प्राधिकरण ने लंबे समय तक टैक्स वसूल कर कब्जे को मान्यता दी है, तो वह बाद में उसी कब्जे को अवैध नहीं कह सकता - यह Promissory Estoppel का सिद्धांत है। 2. टैक्स वसूलना = कब्जे की वैधता को स्वीकार करना।



















एक वारिस ने दूसरे वारिसों के अधिकार वाली जमीन अपने नाम चढ़वा ली है? ⚠️ध्यान रखें—जमाबंदी/म्यूटेशन में नाम चढ़ जाने से अक...
18/08/2026

एक वारिस ने दूसरे वारिसों के अधिकार वाली जमीन अपने नाम चढ़वा ली है? ⚠️

ध्यान रखें—जमाबंदी/म्यूटेशन में नाम चढ़ जाने से अकेले मालिकाना हक साबित नहीं होता।

अगर एंट्री गलत तरीके से हुई है, तो उसे चुनौती दी जा सकती है। और अगर असली विवाद हिस्सेदारी या मालिकाना हक का है, तो सक्षम सिविल कोर्ट से उचित राहत ली जा सकती है।

👉 अपने जमीन के रिकॉर्ड जरूर जांचें और समय पर कानूनी कदम उठाएं।

यह पोस्ट केवल सामान्य कानूनी जानकारी के लिए है। अपने मामले में योग्य अधिवक्ता से सलाह लें।



















⚖️ सुप्रीम कोर्ट का महत्वपूर्ण फैसलासुप्रीम कोर्ट ने Order 41 Rule 27 CPC के तहत अपील के दौरान Additional Evidence (अतिर...
14/08/2026

⚖️ सुप्रीम कोर्ट का महत्वपूर्ण फैसला

सुप्रीम कोर्ट ने Order 41 Rule 27 CPC के तहत अपील के दौरान Additional Evidence (अतिरिक्त साक्ष्य) पेश करने को लेकर महत्वपूर्ण दिशानिर्देश दिए हैं। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अतिरिक्त साक्ष्य की अर्जी पर अपीलीय फैसला सुनाने से पहले स्वतंत्र रूप से और उसके गुण-दोष के आधार पर निर्णय करना जरूरी है।

अदालत को यह देखना होगा कि अतिरिक्त साक्ष्य वास्तव में आवश्यक है या नहीं, उसे पहले पेश न किए जाने का उचित कारण क्या था और क्या न्याय के हित में उसे रिकॉर्ड पर लेना जरूरी है। अतिरिक्त साक्ष्य पेश करने की अनुमति स्वतः नहीं मिलती।

📌 Case: Chowdappa v. Hanumantharayappa & Others

रजिस्ट्रार या सब-रजिस्ट्रार 'अदालत' (Court) नहीं हैं! इलाहाबाद हाईकोर्ट का बड़ा फैसला—कहा: "रजिस्ट्रेशन एक्ट की कार्यवाह...
04/08/2026

रजिस्ट्रार या सब-रजिस्ट्रार 'अदालत' (Court) नहीं हैं! इलाहाबाद हाईकोर्ट का बड़ा फैसला—कहा: "रजिस्ट्रेशन एक्ट की कार्यवाहियों में देरी माफ करने के लिए 'लिमिटेशन एक्ट की धारा 5' लागू नहीं होगी।"

मामला क्या था?

मामले की पृष्ठभूमि: बहराइच जिले में एक संस्था (वेदांत संस्था) के नाम दर्ज जमीन का बैनामा एक व्यक्ति द्वारा किया गया। सब-रजिस्ट्रार के समक्ष उपस्थित न होने के कारण बैनामा पंजीकृत नहीं हो सका।

समय बीतने के बाद अपील: खरीदार पक्ष ने निर्धारित समय-सीमा खत्म होने के बाद जिला रजिस्ट्रार/एडीएम (वित्त) के समक्ष अपील दायर की और साथ में देरी माफ करने के लिए 'लिमिटेशन एक्ट की धारा 5' की अर्ज़ी लगाई।

अधिकारी का गलत आदेश: जिला रजिस्ट्रार ने देरी को कानूनी रूप से माफ किए बिना ही अपील स्वीकार कर ली और सब-रजिस्ट्रार को बैनामा पंजीकृत करने का निर्देश दे दिया, जिसे हाईकोर्ट में चुनौती दी गई।

माननीय इलाहाबाद हाईकोर्ट ने क्या कहा?

माननीय इलाहाबाद उच्च न्यायालय के जस्टिस इरशाद अली की एकल पीठ ने जिला रजिस्ट्रार के आदेश को रद्द करते हुए मुख्य कानूनी सिद्धांत तय किए:

रजिस्ट्रार 'अदालत' नहीं है: कोर्ट ने स्पष्ट कहा, "रजिस्ट्रार, एडिशनल रजिस्ट्रार या सब-रजिस्ट्रार के कार्यालय को 'कोर्ट' नहीं माना जा सकता। इसलिए रजिस्ट्रेशन एक्ट के तहत होने वाली कार्यवाहियों पर लिमिटेशन एक्ट की धारा 5 लागू नहीं होगी।"

लोक सेवक बनाम जज : कोर्ट ने रजिस्ट्रेशन एक्ट की धारा 84 का हवाला देते हुए कहा कि हर 'रजिस्टरिंग अधिकारी' एक लोक सेवक तो है, लेकिन वह 'जज' या 'न्यायिक अधिकारी' नहीं है। न्यायिक अधिकारी का मुख्य कार्य न्याय देना है, जबकि रजिस्ट्रार प्रशासनिक दायित्व निभाते हैं।

धारा 5 की सीमित शक्तियां: लिमिटेशन एक्ट की धारा 5 केवल अदालतों को समय सीमा बढ़ाने की शक्ति देती है, प्रशासनिक या पंजीकरण अधिकारियों को नहीं।

Mohd. Yaqoob and another v. District Registrar/A.D.M. F/R Bahraich and 2 others

















⚖️  ग्राम सभा फंड को हुए नुकसान के मामलों में प्रधान या पूर्व प्रधान से सरचार्ज (रिकवरी) की वसूली केवल उत्तर प्रदेश पंचा...
30/07/2026

⚖️ ग्राम सभा फंड को हुए नुकसान के मामलों में प्रधान या पूर्व प्रधान से सरचार्ज (रिकवरी) की वसूली केवल उत्तर प्रदेश पंचायत राज अधिनियम, 1947 की धारा 27 और उससे संबंधित निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार ही की जा सकती है। जस्टिस अजीत कुमार और जस्टिस इंद्रजीत शुक्ला की डिवीजन बेंच ने स्पष्ट किया कि इस प्रकार की जांच करने का अधिकार केवल Chief Audit Officer, Cooperative Societies & Panchayats को है। यदि ज़िला मजिस्ट्रेट किसी अन्य समिति से जांच कराकर उसके आधार पर सरचार्ज या रिकवरी का आदेश जारी करते हैं, तो ऐसी कार्यवाही अधिकार-क्षेत्र से बाहर मानी जाएगी और कानून की नज़र में टिक नहीं पाएगी।

कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि पूर्व प्रधान के खिलाफ भी सरचार्ज की कार्यवाही की जा सकती है, लेकिन इसके लिए कानून में निर्धारित प्रक्रिया और समय-सीमा का पालन अनिवार्य है। अदालत ने कहा कि अधिकार-क्षेत्र और विधि द्वारा निर्धारित प्रक्रिया का पालन किसी भी कानूनी कार्यवाही की वैधता की मूल शर्त है, और इससे थोड़ी भी चूक पूरी कार्यवाही को अवैध बना सकती है।

इस मामले में अदालत ने याचिकाकर्ता के खिलाफ जारी रिकवरी आदेश को निरस्त कर दिया, क्योंकि जांच निर्धारित अधिकारी के बजाय ज़िला मजिस्ट्रेट द्वारा गठित समिति से कराई गई थी। हालांकि, अदालत ने संबंधित अधिकारियों को कानून के अनुसार नई कार्यवाही शुरू करने की स्वतंत्रता भी दी।
















आज दिनांक 18.07.2026 को न्यायालय श्रीमान अपर जिला जज/गैगंस्टर एक्ट जालौन स्थान उरई के निर्णय द्वारा अभियुक्त हरिनारायण श...
19/07/2026

आज दिनांक 18.07.2026 को न्यायालय श्रीमान अपर जिला जज/गैगंस्टर एक्ट जालौन स्थान उरई के निर्णय द्वारा अभियुक्त हरिनारायण शुक्ला नि० खकसीस थाना जालौन जिला जालौन को एक एनडीपीएस के 3 साल पुराने मुकदमे में अधिवक्ता अंशुमान दीक्षित के द्वारा की गयी जोरदार पैरवी एवं बहस उपरांत निर्दोष करार देकर बरी कर दिया गया। अंर्तगत धारा 8/20 एनडीपीएस एक्ट के थाना कोतवाली जालौन की पुलिस द्वारा फर्द बरामदगी के आधार पर जालौन पुलिस मय हमराहियान शांति व्यवस्था में मामूर होकर ग्राम प्रतापपुरा की ओर जा रहे थे कि तभी मुखबिर की सूचना पर एक व्यक्ति जो करीब 5 किलो गांजा एक झोले में लेकर किसी का इंतजार कर रहा था को, दबिश देकर पकड़ा था। उक्त फर्द बरामदगी के आधार पर थाना कोतवाली जालौन पुलिस द्वारा प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज कर उक्त अभियुक्त को जेल भेज दिया गया था ततपश्चात पुलिस ने विवेचना कर अंतिम रिपोर्ट न्यायालय को अंर्तगत धारा 8/20 एनडीपीएस में प्रेषित कर दी गए थी एव न्यायालय ने अंतिम रिपोर्ट के आधार पर 3 मुकदमा दर्ज कर लिया था। उक्त मुकदमे में अधिवक्ता अंशुमान दीक्षित द्वारा इन 3 वर्षों में पुलिस के सरकारी गवाहों से जिरह एवं सवाल जवाव एवं बहस उपरांत निर्णय हेतु तिथि नियत कर दी गयी थी। सुबह करीब 10 बजे से ही उक्त मुकदमे को लेकर जिला जजी न्यायालय परिसर एवं न्यायालय खचाखच भरी एवं गहमागहमी थी इसी को लेकर न्यायालय पुलिस सुरक्षाकर्मी हर आने जाने वाले को लेकर चाक-चोवंद और कड़ी सुरक्षा के बीच वादिकारियो की जामा तलाशी लेकर ही अंदर आने जाने दे रहे थे। मालुम हो की उक्त न्यायालय श्रीमान अपर जिला जज/गैगंस्टर एक्ट जालौन स्थान उरई द्वारा ही पूर्व में कालपी के पूर्व बिधायक छोटे सिंह को एक हत्या के मुकदमे में आजीवन सजा सुना चुके है जिसमे पूर्व बिधायक छोटे सिंह को हाईकोर्ट से भी कोई रियायत नहीं मिली है एवं बर्तमान में आजीवन सजा में जेल में बंद है। करीब 4 घंटे चली लम्बी बहस लम्बी बहस उपरांत निर्णय/फैसला हेतु आदेश के लिए तिथि नियत कर दी गए थी जिसमे श्रीमान अपर जिला जज/गैगंस्टर एक्ट जालौन स्थान उरई द्वारा अपने निर्णय में हरिनारायण शुक्ला को बाईज्जत बरी कर दिया गया तपश्चात हरिनारायण शुक्ला एव उनके भक्तालुओ ने अधिवक्ता अंशुमान दीक्षित को फूल मालाओं से लाद दिया वही अधिवक्ता अंशुमान दीक्षित ने अपनी उक्त मुकदमे में मिली सफलता के लिए क्रमबद्ध मुकदमे की पैरवी एवं उच्च न्यायालय एवं सुप्रीम कोर्ट के मुकदमे की पूर्व के निर्णयों को अपनी बहस में शामिल करना बताया जोकि उक्त मुकदमे में जीत का आधार बना। अधिवक्ता अंशुमान दीक्षित ने कहा की निर्दोष एवं बेगुनाह नागरिकों जैसे गरीब दलित, पिछडे, साधु संतो को सस्ता सुलभ न्याय दिला कर मुकदमे में रिहा करा रहे है जो शासन की मंशा के अनुरूप है अधिवक्ता अंशुमान दीक्षित ने बताया कि मंदिर में जो जमीन लगती है उसको हड़पने के लिए कुछ लोगो ने पुलिस से साठगांठ करके हरिनारायण शुक्ला को झूठा फसा दिया था। न्यायालय श्रीमान अपर जिला जज/गैगंस्टर एक्ट जालौन स्थान उरई साहब ने पुलिस अधीक्षक जालौन को जांच हेतु आदेशित किया है कि मालखाने से सम्बंधित अधिकारी के खिलाफ जांच करे | आज वही मुकदमा से बरी होने वाले वाले व्यक्ति पुजारी हरिनारायण शुक्ला ने कहा कि वह आश्रम में रह कर हनुमान जी के सेवा करते है और मेरे वकील साहब अंशुमान दीक्षित पर हनुमान जी बड़ी कृपा है मुझे पूरा विश्वास था की मेरे बकील साब मुझे मुकदमा से बरी करा देंगे और मुझे कोई सजा होने नहीं देंगे। अधिवक्ता अंशुमान दीक्षित को मुकदमे में मिली बड़ी सफलता से उनके साथी अधिवक्तओं एवं वादकारियों एवं भक्तालुओ ने फूल माला एवं मिठाई खिलाकर उज्जवल भबिष्य की शुभकामानएं दी।

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने देवरिया जिले के थाना भलुनी में बिजली और सीसीटीवी व्यवस्था को लेकर गंभीर नाराजगी जताई है। मामला एक ...
12/07/2026

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने देवरिया जिले के थाना भलुनी में बिजली और सीसीटीवी व्यवस्था को लेकर गंभीर नाराजगी जताई है। मामला एक व्यक्ति की कथित हिरासत से जुड़ा है, जिसकी पुष्टि के लिए सीसीटीवी फुटेज देखी जानी थी। अदालत ने इस मामले में थाना भलुनी के थानाध्यक्ष प्रदीप कुमार पांडेय को व्यक्तिगत रूप से तलब किया।

नागेंद्र कुमार यादव की याचिका पर सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति अजित कुमार और न्यायमूर्ति इंद्रजीत शुक्ला की खंडपीठ के समक्ष थानाध्यक्ष ने बताया कि 3 अप्रैल 2026 को थाने में बिजली नहीं होने के कारण सीसीटीवी फुटेज की जांच नहीं हो सकी।

अदालत के पूछने पर थानाध्यक्ष ने यह भी स्वीकार किया कि थाने में जेनरेटर मौजूद है, लेकिन वह भी खराब है। इस पर कोर्ट ने टिप्पणी की कि थाने जैसी संवेदनशील जगह का बिना बिजली के अंधेरे में रहना और सरकारी जेनरेटर का खराब होना आश्चर्यजनक है।

हाई कोर्ट ने संबंधित विद्युत उपकेंद्र के अधिशासी अभियंता को 3 अप्रैल 2026 की बिजली आपूर्ति का रिकॉर्ड पेश करने का निर्देश दिया है। वहीं, पुलिस अधीक्षक को व्यक्तिगत हलफनामा दाखिल कर यह बताने को कहा गया है कि जेनरेटर खराब क्यों है और उसकी मरम्मत के लिए अब तक क्या कार्रवाई हुई।
इसके साथ ही अदालत ने सीसीटीवी की हार्ड ड्राइव सुरक्षित रूप से जब्त करने का निर्देश दिया ताकि उससे किसी प्रकार की छेड़छाड़ न हो सके। थानाध्यक्ष को हर सुनवाई में उपस्थित रहने का निर्देश देते हुए मामले की अगली सुनवाई 28 जुलाई 2026 तय की गई है।

















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12/07/2026

⚖️📌 मध्यप्रदेश हाईकोर्ट: चिकित्सकीय लापरवाही एवं उपचार से इंकार संबंधी आरोपों में, यदि शिकायत एवं प्रारंभिक साक्ष्य प्रथमदृष्टया अपराध प्रकट करते हों, तो धारा 482 CrPC के अंतर्गत कार्यवाही निरस्त नहीं की जा सकती। ⚖️📌

⚖️ हाईकोर्ट ने कहा – यह प्रश्न कि चिकित्सक ने वास्तव में उपचार से इंकार किया था या धन की मांग की थी, साक्ष्य का विषय है और इसका निर्णय ट्रायल के दौरान ही किया जा सकता है। केवल साक्ष्य की कथित कमी या विवादित तथ्यों के आधार पर आपराधिक कार्यवाही प्रारंभिक स्तर पर समाप्त नहीं की जा सकती।

मामला: Dr. Mandavi v. Anish Khan

न्यूट्रल सिटेशन: 2026:MPHC-JBP:45744

मामला संख्या: M.Cr.C. No. 2320 of 2016

निर्णय दिनांक: 23 जून 2026

न्यायालय: माननीय मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय, जबलपुर

पीठ: माननीय न्यायमूर्ति हिमांशु जोशी।

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⚖️ मामले के संक्षिप्त तथ्य

शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया कि उसकी पत्नी जैबुन निशा को प्रसव पीड़ा होने पर सरकारी अस्पताल, टीकमगढ़ लाया गया। मरीज की स्थिति गंभीर होने पर ऑपरेशन की आवश्यकता बताई गई।

आरोप था कि आवेदिका डॉ. मांडवी, जो उस समय आपातकालीन ड्यूटी पर थीं, सूचना दिए जाने के बावजूद अस्पताल नहीं आईं तथा बाद में कथित रूप से निजी नर्सिंग होम में उपचार हेतु ₹50,000/- की मांग की। शिकायतकर्ता द्वारा असमर्थता व्यक्त करने पर राशि कम कर ₹5,000/- बताई गई, किंतु ₹2,000/- होने की जानकारी देने पर कथित रूप से उपचार से इंकार कर दिया गया। बाद में मरीज को झांसी रेफर किया गया, किंतु रास्ते में उसकी मृत्यु हो गई।

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⚖️ आवेदिका के तर्क

आवेदिका ने तर्क दिया कि—

✔️ वह एक सरकारी चिकित्सक हैं और अपने आधिकारिक कर्तव्यों का निर्वहन कर रही थीं;

✔️ उनके विरुद्ध शिकायत दुर्भावना से प्रेरित है;

✔️ धारा 197 CrPC के अंतर्गत पूर्व स्वीकृति (Sanction) के बिना संज्ञान नहीं लिया जा सकता था;

✔️ कोई पोस्टमार्टम रिपोर्ट प्रस्तुत नहीं की गई है;

✔️ मृत्यु का कारण एवं चिकित्सकीय लापरवाही का कोई चिकित्सकीय साक्ष्य उपलब्ध नहीं है;

✔️ शिकायत घटना के लगभग पाँच माह बाद दायर की गई, जिससे आरोपों की सत्यता संदिग्ध हो जाती है।

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⚖️ हाईकोर्ट के महत्वपूर्ण निष्कर्ष

न्यायालय ने कहा—

> प्रारंभिक स्तर पर न्यायालय को आरोपों की सत्यता अथवा असत्यता का परीक्षण नहीं करना होता। यदि शिकायत एवं प्रारंभिक साक्ष्य प्रथमदृष्टया अपराध प्रकट करते हैं, तो मामले का परीक्षण ट्रायल में किया जाना चाहिए।

न्यायालय ने पाया कि शिकायतकर्ता एवं उसके गवाहों के बयानों में यह आरोप दोहराया गया है कि आवेदिका ने गंभीर स्थिति में मरीज को उपचार प्रदान नहीं किया और धन की मांग की।

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⚖️ साक्ष्य की कमी कार्यवाही निरस्त करने का आधार नहीं

न्यायालय ने कहा—

> पोस्टमार्टम रिपोर्ट अथवा अन्य चिकित्सकीय दस्तावेजों की अनुपस्थिति मात्र से प्रारंभिक स्तर पर कार्यवाही समाप्त नहीं की जा सकती। साक्ष्यों का मूल्यांकन ट्रायल के दौरान किया जाएगा।

न्यायालय ने यह भी कहा कि साक्ष्य की पर्याप्तता या अपर्याप्तता का परीक्षण धारा 482 CrPC की कार्यवाही में नहीं किया जा सकता।

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⚖️ धारा 197 CrPC (Sanction) का प्रश्न

न्यायालय ने कहा—

> क्या कथित कृत्य वास्तव में सरकारी कर्तव्यों के निर्वहन से प्रत्यक्ष रूप से संबंधित थे अथवा नहीं, यह तथ्य एवं साक्ष्य का प्रश्न है, जिसका उचित परीक्षण ट्रायल कोर्ट द्वारा किया जा सकता है।

इस स्तर पर यह निर्णायक रूप से नहीं कहा जा सकता कि आरोपित कृत्य पूर्णतः आधिकारिक कर्तव्य के दायरे में थे।

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⚖️ महत्वपूर्ण अवलोकन

न्यायालय ने कहा—

> विवादित प्रश्नों (Disputed Questions of Fact) का निर्णय धारा 482 CrPC की अंतर्निहित अधिकारिता के अंतर्गत नहीं किया जा सकता।

यदि शिकायत प्रथमदृष्टया अपराध प्रकट करती है, तो अभियुक्त को ट्रायल का सामना करना होगा।

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🎯 निर्णय

✅ धारा 482 CrPC के अंतर्गत दायर याचिका खारिज कर दी गई।

✅ मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट, टीकमगढ़ द्वारा पारित संज्ञान आदेश तथा पुनरीक्षण न्यायालय के आदेश को बरकरार रखा गया।

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🎯 निर्णय का विधिक सिद्धांत (Ratio Decidendi)

> यदि शिकायत एवं प्रारंभिक साक्ष्य प्रथमदृष्टया अपराध प्रकट करते हों, तो साक्ष्यों की पर्याप्तता, चिकित्सकीय दस्तावेजों की अनुपस्थिति, देरी अथवा अन्य विवादित तथ्यों के आधार पर धारा 482 CrPC के अंतर्गत आपराधिक कार्यवाही निरस्त नहीं की जा सकती। ऐसे विवादों का निर्णय साक्ष्य के आधार पर ट्रायल में किया जाना चाहिए।

🏛️ व्यावहारिक उपयोग (Practical Utility)

✅ Medical Negligence Cases में महत्वपूर्ण निर्णय।

✅ Section 482 CrPC Quashing Petitions से संबंधित मामलों में उपयोगी।

✅ Prima Facie Case एवं Disputed Questions of Fact के सिद्धांत को पुनः स्थापित करता है।

✅ सरकारी चिकित्सकों के विरुद्ध अभियोजन एवं Section 197 CrPC Sanction संबंधी मामलों में महत्वपूर्ण दृष्टांत।

⚖️ निष्कर्ष

> मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने पुनः स्पष्ट किया कि धारा 482 CrPC की शक्ति असाधारण है और इसका प्रयोग अत्यंत सीमित परिस्थितियों में ही किया जाना चाहिए। जहां शिकायत एवं प्रारंभिक साक्ष्य प्रथमदृष्टया अपराध प्रकट करते हों, वहां विवादित तथ्यों एवं साक्ष्यों का परीक्षण ट्रायल कोर्ट द्वारा ही किया जाएगा।

⚠️ अस्वीकरण (Disclaimer): यह सारांश केवल विधिक जागरूकता एवं शैक्षणिक उद्देश्य से तैयार किया गया है। यह माननीय मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय के निर्णय Dr. Mandavi v. Anish Khan, M.Cr.C. No.2320 of 2016, Neutral Citation No.2026:MPHC-JBP:45744, निर्णय दिनांक 23.06.2026, पर आधारित है। प्रत्येक मामले का निर्णय उसके विशेष तथ्यों, उपलब्ध साक्ष्यों एवं लागू विधि पर निर्भर करेगा। किसी भी न्यायिक कार्यवाही में उपयोग से पूर्व मूल निर्णय का अध्ययन अवश्य किया जाना चाहिए।
















10/07/2026

⚖️ इलाहाबाद हाईकोर्ट की जस्टिस प्रवीण कुमार गिरी की पीठ ने झांसी के अतिरिक्त प्रधान जज, फैमिली कोर्ट श्री हरिशचंद्र से यह स्पष्ट करने को कहा है कि जब रिकॉर्ड पर यह तथ्य मौजूद था कि तलाक के बाद पत्नी ने दूसरा विवाह कर लिया है, तब भी पहले पति को पत्नी के लिए ₹10,000 प्रतिमाह गुजारा भत्ता देने का आदेश किस आधार पर पारित किया गया।

मामले के अनुसार, 30 जुलाई 2025 को झांसी फैमिली कोर्ट ने पति-पत्नी के बीच तलाक की डिक्री पारित की थी। इसके लगभग एक महीने बाद पत्नी ने दूसरा विवाह कर लिया। पति का दावा है कि पत्नी ने अपने शपथपत्र में स्वयं पुनर्विवाह की जानकारी दी थी और CrPC की धारा 125 के तहत चल रही गुजारा भत्ता की कार्यवाही में उसने इस संबंध में आपत्ति भी दर्ज कराई थी। इसके बावजूद फैमिली कोर्ट ने पत्नी के लिए ₹10,000 प्रतिमाह और पुत्र के लिए ₹5,000 प्रतिमाह गुजारा भत्ता देने का आदेश पारित कर दिया।

इस आदेश को चुनौती देते हुए पति ने इलाहाबाद हाईकोर्ट का रुख किया और कहा कि वह अपने पुत्र के भरण-पोषण की राशि देने को तैयार है तथा उसका भुगतान भी कर रहा है, लेकिन पुनर्विवाह कर चुकी पत्नी को पहले पति से गुजारा भत्ता देने का आदेश कानून के अनुरूप नहीं है। उल्लेखनीय है कि CrPC की धारा 125 के अनुसार, तलाकशुदा महिला तभी गुजारा भत्ता पाने की पात्र होती है, जब तक उसने दूसरा विवाह न किया हो।

सुनवाई के दौरान जस्टिस प्रवीण कुमार गिरी ने फैमिली कोर्ट के जज श्री हरिशचंद्र से स्पष्टीकरण मांगा है और मामले में पत्नी को नोटिस जारी करते हुए अगली सुनवाई 21 जुलाई तय की है।

📌Case Title: Rajesh Chaturvedi vs. State of U.P. and Anr. | Criminal Revision No. 3561 of 2026

💬 इस मामले पर आपकी क्या राय है? क्या पुनर्विवाह के बाद पहले पति से गुजारा भत्ता मिलना चाहिए? अपनी राय कमेंट में ज़रूर बताएं।

👉 ऐसी ही अपडेट्स के लिए हमारे पेज को ज़रूर फॉलो करें और इस पोस्ट को शेयर करें।



















08/07/2026

👉🎓🎩क्या सील की गई दुकान खोली जा सकती है?** ⚖️🏪

हाँ, लेकिन खुद से seal तोड़कर नहीं — सही कानूनी प्रक्रिया और सक्षम अधिकारी/court के order से ही दुकान खुल सकती है।

✅ **सबसे पहले क्या करें?**
Sealing order/notice की copy लें और देखें कि दुकान किस authority ने, किस कारण से और किस law के तहत seal की है।

⚠️ **किसको आवेदन दें?**
नगर निगम, Development Authority, Food Safety Officer, Estate Officer या जिस विभाग ने seal किया है, उसी authority को written application दें।

📌 **जरूरी documents**
License, registration, rent/ownership proof, tax receipt, compliance proof, photos/videos और sealing order की copy साथ लगाएं।

📌 **याद रखें**
अगर authority बिना कारण seal नहीं खोल रही है, तो appeal/review या court remedy ली जा सकती है।

बिना permission seal न तोड़ें, वरना अलग legal परेशानी हो सकती है।

कोई भी निर्णय लेने से पहले अपने परिचित या नज़दीकी योग्य अधिवक्ता से सलाह जरूर लें।

Source: Constitution Article 300A, FSS Act 2006, Public Premises Act 1971 & संबंधित State/Local Laws


















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