13/06/2026
जिस समाज में बेटियां डरकर जीती हैं, वह समाज कभी गर्व से सिर ऊंचा नहीं उठा सकता।
बेटियां केवल किसी परिवार की नहीं, बल्कि राष्ट्र की सबसे अनमोल धरोहर हैं। उनके जन्म के साथ केवल एक बच्ची नहीं आती, बल्कि संस्कार, संवेदनशीलता, करुणा और एक बेहतर भविष्य जन्म लेता है।
हमारे शास्त्र कहते हैं "यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते, रमन्ते तत्र देवताः।" अर्थात जहाँ नारी का सम्मान होता है, वहीं देवताओं का वास होता है।
भारत का संविधान भी बेटियों को समानता, गरिमा और सुरक्षा का अधिकार प्रदान करता है। अनेक कानून उनके संरक्षण और सशक्तिकरण के लिए बनाए गए हैं। किंतु एक महत्वपूर्ण प्रश्न आज भी हमारे सामने खड़ा है
क्या केवल कानून बना देना पर्याप्त है?
जब तक समाज अपनी सोच नहीं बदलेगा, तब तक कानून पुस्तकों के पन्नों तक सीमित रह जाएगा। कानून अपराधियों को दंड दे सकता है, लेकिन बेटियों को वास्तविक सुरक्षा तभी मिलेगी जब सम्मान हमारे संस्कार, व्यवहार और सामाजिक चेतना का हिस्सा बनेगा।
आज आवश्यकता केवल "बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ" का नारा देने की नहीं, बल्कि ऐसा वातावरण बनाने की है जहाँ हर बेटी निर्भय होकर अपने सपनों को जी सके। क्योंकि जब किसी बेटी की आँखों में भय होता है, तब केवल एक परिवार नहीं, पूरी मानवता हारती है।
हम विकास, तकनीक और प्रगति की बातें करते हैं, लेकिन किसी भी राष्ट्र की वास्तविक उन्नति उसकी ऊँची इमारतों, सड़कों और आंकड़ों से नहीं, बल्कि उसकी बेटियों के चेहरे पर दिखने वाली सुरक्षा, शिक्षा, आत्मविश्वास और सम्मान से मापी जाती है।
याद रखिए
बेटी बोझ नहीं, ईश्वर का सबसे सुंदर विश्वास है। उसे जन्म देना प्रकृति का कार्य है, उसे शिक्षित करना परिवार का दायित्व है, उसे सुरक्षित रखना समाज का धर्म है, और उसे सम्मान देना मानवता का सर्वोच्च कर्तव्य है।
आइए केवल संदेश साझा न करें, बल्कि एक संकल्प लें
हर बेटी को जन्म का अधिकार मिले, शिक्षा का अवसर मिले, सुरक्षा का विश्वास मिले और सम्मान के साथ जीने का वातावरण मिले।
क्योंकि बेटी बचेगी तो परिवार बचेगा, परिवार बचेगा तो समाज बचेगा, और समाज बचेगा तो राष्ट्र का भविष्य सुरक्षित रहेगा।
नारी सम्मान ही राष्ट्र सम्मान है। बेटी की सुरक्षा केवल कानून की जिम्मेदारी नहीं, पूरे समाज की सामूहिक जिम्मेदारी है।
— अधिवक्ता अंजना शर्मा
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