16/08/2026
बस्तर की बेटियों का बंदूक से रैंप तक का सफर
बस्तर की धरती लंबे समय तक नक्सल हिंसा की पीड़ा झेलती रही है। बंदूक, भय और हिंसा ने यहां के हजारों परिवारों के जीवन को प्रभावित किया। लेकिन समय बदल रहा है। आज बस्तर से ऐसी तस्वीरें सामने आ रही हैं, जो बताती हैं कि शांति का अर्थ केवल बंदूकों का शांत होना नहीं, बल्कि उन जीवनों में उम्मीद लौटना भी है, जिन्हें हिंसा ने वर्षों तक प्रभावित किया। इसी बदलते बस्तर की एक बेहद भावुक और प्रेरणादायी तस्वीर रायपुर में देखने को मिली, जब बस्तर की 9 पूर्व महिला माओवादियों ने राष्ट्रीय हथकरघा दिवस के अवसर पर कोसा सिल्क और पारंपरिक हथकरघा परिधानों में रैंप वॉक किया।
कभी जंगलों में बंदूक के साये में जीवन बिताने वाली ये महिलाएं जब रैंप पर आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़ रही थीं, तब वह दृश्य केवल एक फैशन कार्यक्रम का हिस्सा नहीं था। यह बदलाव की एक कहानी थी। यह उस यात्रा की तस्वीर थी जिसमें हिंसा का रास्ता पीछे छूटा, आत्मसमर्पण के बाद मुख्यधारा में लौटने का निर्णय लिया गया और अब सम्मान, आत्मनिर्भरता तथा बेहतर भविष्य की ओर कदम बढ़ाया जा रहा है।
7 अगस्त 2026 को रायपुर के पंडित दीनदयाल उपाध्याय ऑडिटोरियम में आयोजित राष्ट्रीय हथकरघा दिवस के कार्यक्रम में इन 9 पूर्व महिला माओवादियों ने हिस्सा लिया। कोसा सिल्क और छत्तीसगढ़ के पारंपरिक हथकरघा परिधानों में उनका रैंप पर उतरना इसलिए भी खास था क्योंकि यह आयोजन केवल फैशन और संस्कृति का प्रदर्शन नहीं था, बल्कि पुनर्वास और सामाजिक पुनर्स्थापन की मानवीय कहानी को सामने ला रहा था।
प्रधानमंत्री श्री Narendra Modi जी ने नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में आए बदलाव को रेखांकित करते हुए कहा है, “जिन नक्सल प्रभावित इलाकों में जाने से दिन में भी लोग डरते थे, वहां हम नेशन फर्स्ट की स्पिरिट के साथ विकास का संकल्प लेकर आगे बढ़े हैं।”
प्रधानमंत्री जी का यह कथन आज बस्तर में दिखाई देने वाले बदलाव को समझने की एक महत्वपूर्ण कड़ी है। लंबे समय तक जिन क्षेत्रों को नक्सलवाद और हिंसा के कारण पहचाना जाता था, वहां अब विकास, खेल, शिक्षा, कौशल, संस्कृति और रोजगार के अवसरों की चर्चा हो रही है। बस्तर ओलंपिक्स जैसे आयोजनों के माध्यम से युवाओं को अपनी प्रतिभा दिखाने का मंच मिल रहा है और स्थानीय संस्कृति तथा प्रतिभा को नई पहचान मिल रही है।
बस्तर में आया यह परिवर्तन किसी एक दिन की कहानी नहीं है। वर्षों तक नक्सलवाद ने क्षेत्र के विकास, शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और सामाजिक जीवन को प्रभावित किया। इसलिए नक्सलवाद के खिलाफ लड़ाई केवल सुरक्षा बलों की कार्रवाई तक सीमित नहीं हो सकती। इसके साथ उन लोगों को भी मुख्यधारा में वापस लाना जरूरी है, जो हिंसा का रास्ता छोड़कर सामान्य जीवन जीना चाहते हैं।
केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री श्री Amit Shah जी ने आत्मसमर्पण और पुनर्वास की नीति को लेकर स्पष्ट संदेश दिया है, “जो हथियार डालते हैं, उनके लिए रेड कार्पेट है।”
यह कथन सरकार के उस दृष्टिकोण को स्पष्ट करता है जिसमें हिंसा का रास्ता छोड़ने वालों के लिए पुनर्वास और सम्मान के साथ नया जीवन शुरू करने का अवसर उपलब्ध कराने पर जोर दिया गया है। संदेश सीधा है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में लौटने का रास्ता खुला है। हथियार छोड़कर मुख्यधारा में आने वाले व्यक्ति को अपने भविष्य को नए सिरे से गढ़ने का अवसर मिलना चाहिए।
इन 9 पूर्व महिला माओवादियों की यात्रा इसी नीति के मानवीय पक्ष को सामने लाती है। आत्मसमर्पण केवल हथियार छोड़ने की प्रक्रिया नहीं है। यह एक कठिन निर्णय है, जिसके बाद व्यक्ति को अपने जीवन की पूरी दिशा बदलनी होती है। वर्षों तक हिंसा के वातावरण में रहने के बाद सामान्य समाज में वापस आना, नए कौशल सीखना, रोजगार से जुड़ना और सम्मान के साथ जीवन जीना अपने आप में एक लंबी यात्रा है।
यही कारण है कि रायपुर का वह रैंप वॉक अपने आप में एक महत्वपूर्ण प्रतीक बन जाता है। वहां केवल परिधान नहीं बदले थे, बल्कि जीवन की दिशा बदली थी। कभी जिन हाथों में बंदूक थी, आज उन्हीं हाथों में हुनर, आत्मविश्वास और अपने भविष्य को गढ़ने की आकांक्षा दिखाई दे रही थी। जिन महिलाओं की पहचान कभी नक्सली हिंसा के साये में थी, वे आज कोसा सिल्क और हथकरघे की समृद्ध परंपरा को प्रस्तुत करते हुए एक नई पहचान के साथ समाज के सामने खड़ी थीं।
कोसा सिल्क केवल एक वस्त्र नहीं है। यह छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक विरासत, स्थानीय कारीगरों की मेहनत और पीढ़ियों से चले आ रहे हुनर की पहचान है। ऐसे में इन महिलाओं का पारंपरिक परिधानों में रैंप पर उतरना इस बात का भी प्रतीक है कि पुनर्वास का अर्थ केवल किसी व्यक्ति को हिंसा से बाहर निकालना नहीं, बल्कि उसे समाज की सकारात्मक गतिविधियों से जोड़ना भी है।
बस्तर की कहानी में महिलाओं की भूमिका विशेष महत्व रखती है। हिंसा का सबसे गहरा असर परिवार और समाज पर पड़ता है। जब कोई महिला हिंसा का रास्ता छोड़कर आत्मनिर्भरता और सम्मान की राह चुनती है, तो उसका परिवर्तन केवल उसके व्यक्तिगत जीवन तक सीमित नहीं रहता। वह परिवार और आने वाली पीढ़ियों के लिए भी एक नई दिशा का आधार बन सकता है।
आज बस्तर में खेल, शिक्षा, कौशल विकास, रोजगार, स्थानीय उत्पादों और संस्कृति के क्षेत्र में बढ़ते अवसर इस व्यापक बदलाव की तस्वीर पेश करते हैं। कभी जिन क्षेत्रों में नक्सलवाद के कारण विकास की गति बाधित रही, वहां अब सरकार और समाज के प्रयासों से लोगों को मुख्यधारा से जोड़ने की कोशिशें तेज हुई हैं। सुरक्षा के साथ विकास और पुनर्वास को जोड़ना इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि स्थायी शांति तभी संभव है, जब लोगों के पास बेहतर भविष्य का विकल्प भी मौजूद हो।
बस्तर की इन 9 पूर्व महिला माओवादियों का रैंप पर आत्मविश्वास के साथ कदम बढ़ाना उन लोगों के लिए भी एक संदेश है, जो हिंसा और भटकाव का रास्ता छोड़कर सामान्य जीवन में लौटना चाहते हैं। लोकतंत्र में वापसी का रास्ता खुला है और सम्मान के साथ जीवन शुरू करने का अवसर भी उपलब्ध है। बंदूक किसी समस्या का स्थायी समाधान नहीं हो सकती, लेकिन शिक्षा, कौशल, रोजगार और विकास किसी व्यक्ति के जीवन की दिशा बदल सकते हैं।
इस तस्वीर का सबसे सुंदर पक्ष यही है कि कभी जिस बस्तर की चर्चा बंदूक और हिंसा के कारण होती थी, आज उसी बस्तर की पहचान कोसा सिल्क, खेल, संस्कृति, प्रतिभा और आत्मविश्वास से भी बन रही है। यह परिवर्तन केवल आंकड़ों या सरकारी योजनाओं में नहीं, बल्कि उन लोगों के जीवन में दिखाई देता है, जिन्होंने अपने अतीत को पीछे छोड़कर भविष्य को चुनने का साहस किया है।
बस्तर की इन बेटियों ने रैंप पर केवल कुछ कदम नहीं बढ़ाए। उन्होंने अपने जीवन की एक नई राह पर कदम रखा है। उनके लिए यह रैंप किसी मंच से अधिक था, यह उस समाज की ओर लौटने का प्रतीक था जहां सम्मान, अवसर और आत्मनिर्भरता के साथ जीवन जिया जा सकता है।
बंदूक से रैंप तक का यह सफर केवल 9 महिलाओं की कहानी नहीं है। यह बदलते बस्तर की कहानी है। यह उस भारत की तस्वीर है जहां हिंसा की जगह शांति, भय की जगह विश्वास, बंदूक की जगह हुनर और निराशा की जगह नए भविष्य की उम्मीद जन्म ले रही है।
बस्तर बदल रहा है और इन बेटियों का सफर उस बदलाव की सबसे मानवीय तस्वीरों में से एक है। यह हमें याद दिलाता है कि जब किसी व्यक्ति को हिंसा से बाहर निकलने, अपने हुनर को पहचानने और सम्मान के साथ आगे बढ़ने का अवसर मिलता है, तो एक जीवन ही नहीं, पूरी पीढ़ी की दिशा बदली जा सकती है।
- डॉ. रागिनी रानी, प्रदेश मंत्री, भाजपा बिहार
Nitin Nabin BJP Bihar Bharatiya Janata Party (BJP) Samrat Choudhary