24/08/2026
कल कोर्ट सं 10 हाईकोर्ट लखनऊ मे एक विधिक विषय पर सुनवाई है
156(3) CrPC / 173 (4) Bnss का प्रार्थना-पत्र मजिस्ट्रेट द्वारा खारिज होने के बाद भी पुलिस उनही आरोपों पर FIR दर्ज कर सकती है। #डा_शमशेर_यादव_जगराना
*********सुप्रीम कोर्ट ***********
1. केस का पूरा विवरण
Case Title: Pramod Kumar Shukla v. State of Uttar Pradesh & Others
SLP (Criminal) No.: 12908 of 2025
Criminal Appeal No.: 3931 of 2026
Neutral Citation: 2026 INSC 887
निर्णय की तारीख: 19 अगस्त 2026
पीठ: माननीय न्यायमूर्ति Prashant Kumar Mishra एवं N.V. Anjaria
परिणाम: अपील खारिज।
2. इस निर्णय का मुख्य कानूनी प्रश्न
सुप्रीम कोर्ट के सामने मूल प्रश्न यह था:
यदि मजिस्ट्रेट ने धारा 156(3) CrPC के तहत FIR दर्ज करने/पुलिस जांच का निर्देश देने वाला आवेदन खारिज कर दिया हो, तो क्या उसके बाद उसी या लगभग उन्हीं आरोपों के आधार पर पुलिस द्वारा धारा 154 CrPC के तहत FIR दर्ज करना कानूनी रूप से प्रतिबंधित हो जाता है?
सुप्रीम कोर्ट ने इसका उत्तर “नहीं” में दिया।
अर्थात—
156(3) CrPC का आवेदन खारिज होना, अपने आप में बाद में FIR दर्ज करने पर रोक नहीं लगाता।
और ऐसी rejection को res judicata (पूर्व निर्णय से मामला बाधित होना) नहीं माना जाएगा, क्योंकि 156(3) पर आदेश सामान्यतः आरोपों के गुण-दोष का अंतिम न्यायिक निर्णय नहीं होता।
3. मामले के तथ्य
इस मामले में शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया कि Pramod Kumar Shukla ने यह विश्वास दिलाया कि उनके प्रभाव के माध्यम से शिकायतकर्ता के बेटे और पोते को शिक्षा विभाग, प्रयागराज में क्लर्क की नौकरी दिलाई जा सकती है।
इसके लिए लगभग ₹20 लाख की मांग की गई थी।
शिकायतकर्ता के अनुसार उसने अलग-अलग तारीखों पर बैंक खाते से रकम भेजी—
₹50,000 — 12 जनवरी 2023
₹25,000 — 13 जनवरी 2023
₹50,000 — 16 जनवरी 2023
₹50,000 — 17 जनवरी 2023
बाद में आरोप लगाया गया कि नौकरी नहीं मिली और पैसा वापस मांगने पर धमकी दी गई। साथ ही कथित रूप से फर्जी परिणाम/दस्तावेज देने का भी आरोप लगाया गया।
इसके आधार पर FIR में IPC की धाराएँ 406, 419, 420, 467, 468, 471, 504 और 506 लगाई गईं।
4. महत्वपूर्ण बात—पहले 156(3) का आवेदन खारिज हुआ था
इस मामले की सबसे महत्वपूर्ण procedural history यही है।
FIR से पहले शिकायतकर्ता ने धारा 156(3) CrPC के अंतर्गत मजिस्ट्रेट के सामने आवेदन दिया था।
मजिस्ट्रेट ने पुलिस से रिपोर्ट मंगाई।
पुलिस रिपोर्ट में कथित रूप से विवाद को भूमि की खरीद-बिक्री/व्यावसायिक लेन-देन से संबंधित बताया गया था, जबकि शिकायतकर्ता ने 156(3) आवेदन में नौकरी दिलाने के नाम पर पैसे लेने का आरोप लगाया था।
इस आधार पर Additional Chief Judicial Magistrate, Prayagraj ने 11.09.2024 को 156(3) आवेदन खारिज कर दिया।
उस आदेश के विरुद्ध revision भी खारिज हो गया।
इसके बाद पुलिस के समक्ष शिकायत दी गई और FIR No. 405/2024 दर्ज हुई।
यही FIR आरोपी ने हाईकोर्ट में चुनौती दी।
5. आरोपी का मुख्य तर्क क्या था?
आरोपी की ओर से सुप्रीम कोर्ट में मुख्यतः यह तर्क दिया गया कि:
(1) पहले 156(3) आवेदन खारिज हो चुका है
इसलिए उसी आरोप पर दोबारा FIR नहीं हो सकती।
(2) 156(3) का आदेश अंतिम है
मजिस्ट्रेट ने पुलिस रिपोर्ट देखने के बाद आवेदन खारिज किया था और revision भी खारिज हो गया था।
इसलिए मामला समाप्त माना जाना चाहिए।
(3) विवाद वास्तव में civil/property transaction है
आरोपी का कहना था कि दोनों पक्षों के बीच पहले से जमीन और पैसों के लेन-देन का व्यावसायिक संबंध था।
(4) FIR mala fide है
156(3) खारिज होने के बाद उसी प्रकार के आरोप लगाकर FIR कराना criminal process का misuse है।
(5) Section 420 आदि के ingredients नहीं बनते
इसलिए FIR को Section 482 CrPC के तहत quash किया जाना चाहिए।
6. सुप्रीम कोर्ट ने 156(3) की प्रकृति को कैसे समझाया?
यह निर्णय का अत्यंत महत्वपूर्ण हिस्सा है।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि Section 156(3) CrPC का उद्देश्य Magistrate द्वारा स्वयं आरोपों का अंतिम फैसला करना नहीं है।
Section 156(3) का मूल उद्देश्य है कि यदि पुलिस ने cognizable offence की सूचना पर कार्रवाई नहीं की है, तो Magistrate पुलिस को investigation करने का निर्देश दे सकता है।
कोर्ट ने Section 154, 156(3) और 190 CrPC की पूरी statutory scheme को समझाया।
इसका सरल अर्थ:
Section 154 CrPC → Police के पास FIR
यदि पुलिस FIR नहीं लिखती:
Section 154(3) → वरिष्ठ पुलिस अधिकारी
फिर भी समस्या रहे:
Section 156(3) → Magistrate
इसलिए 156(3) स्वयं criminal trial नहीं है।
7. सबसे महत्वपूर्ण निष्कर्ष—156(3) rejection merits का final decision नहीं है
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट रूप से कहा कि Section 156(3) के तहत आदेश—
आरोपों की सत्यता का अंतिम निर्धारण नहीं करता;
आरोपी की liability तय नहीं करता;
proposed accused को acquit नहीं करता;
trial के बाद final adjudication नहीं है।
इसलिए केवल 156(3) आवेदन खारिज होने से यह नहीं कहा जा सकता कि बाद में वही आरोप FIR का आधार नहीं बन सकते।
कोर्ट का महत्वपूर्ण निष्कर्ष:
Section 156(3) application की rejection subsequent FIR को स्वतः bar नहीं करती।
यह निर्णय के Para 39 का मूल ratio है।
8. Res Judicata के संबंध में महत्वपूर्ण फैसला
यहाँ सुप्रीम कोर्ट ने S.C. Garg v. State of Uttar Pradesh, 2025 SCC OnLine SC 791 के सिद्धांत को भी लागू किया।
कोर्ट ने समझाया कि criminal proceedings में res judicata का प्रश्न इस बात पर निर्भर करता है कि पहले की proceeding में final adjudication on merits हुआ था या नहीं।
यदि किसी मामले में competent court ने पहले ही merits पर अंतिम निर्णय कर दिया है, तो अलग स्थिति हो सकती है।
लेकिन—
156(3) application की rejection ऐसा final adjudication नहीं है।
इसलिए उसे res judicata बनाकर subsequent FIR को रोकना उचित नहीं है।
9. Mahendri Judgment को Supreme Court ने विशेष रूप से महत्व दिया
इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने Mahendri & Others v. State of U.P. & Another, Criminal Appeal No. 2021 of 2009, decided on 18.03.2015 का उल्लेख किया।
वहाँ भी 156(3) application पहले reject हुई थी और बाद में FIR दर्ज हुई।
Supreme Court ने कहा था कि 156(3) application को reject करने से बाद में दर्ज FIR के आरोपों की veracity या merits प्रभावित नहीं होते।
इसलिए Pramod Kumar Shukla निर्णय ने Mahendri के सिद्धांत को और स्पष्ट रूप से reaffirm किया है।
10. Lalita Kumari का सिद्धांत भी लागू किया
सुप्रीम कोर्ट ने Lalita Kumari v. Government of Uttar Pradesh, (2014) 2 SCC 1 का हवाला देते हुए कहा कि यदि पुलिस को दी गई सूचना से cognizable offence prima facie disclose होता है, तो FIR registration की statutory duty Section 154 CrPC से आती है।
यह duty किसी Magistrate के 156(3) order पर निर्भर नहीं है।
इसलिए बहुत महत्वपूर्ण proposition:
156(3) application की rejection पुलिस की Section 154 CrPC वाली स्वतंत्र statutory duty को समाप्त नहीं करती।
यही इस judgment का सबसे महत्वपूर्ण legal proposition है।
11. क्या पुलिस हर स्थिति में 156(3) rejection के बाद FIR कर सकती है?
हाँ, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि पुलिस किसी भी परिस्थिति में मनमाने ढंग से FIR कर सकती है।
सुप्रीम कोर्ट का निर्णय यह कहता है कि केवल इस आधार पर FIR quash नहीं होगी कि पहले 156(3) application reject हो गई थी।
बाद की FIR में यदि cognizable offence disclose होता है, तो Section 154 के तहत पुलिस कार्रवाई कर सकती है।
लेकिन यदि FIR स्वयं ऐसी हो कि उसमें कोई cognizable offence बनता ही नहीं, या मामला Bhajan Lal की किसी category में स्पष्ट रूप से आता हो, तो High Court की quashing jurisdiction अलग से उपलब्ध रहती है।
12. Section 482 CrPC के संबंध में दूसरा महत्वपूर्ण सिद्धांत
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि FIR quashing के stage पर Court को यह देखना है कि:
FIR में लगाए गए आरोपों को face value पर सही मानने पर क्या cognizable offence बनता है?
Court इस stage पर सामान्यतः यह तय नहीं करेगा कि:
बैंक transaction वास्तव में किस कारण हुआ;
कौन सही बोल रहा है;
audio recording कितनी genuine है;
document असली है या नकली;
civil transaction था या criminal transaction;
defence version ज्यादा probable है या prosecution version।
ये सब सामान्यतः evidence appreciation/trial के विषय हैं।
13. इस मामले में FIR क्यों quash नहीं हुई?
Supreme Court ने देखा कि FIR में आरोप थे कि:
1. नौकरी दिलाने का झांसा दिया गया;
2. पैसे लिए गए;
3. पैसे आरोपी के बैंक खाते में गए;
4. कथित forged admit card/result दिए गए;
5. पैसा वापस मांगने पर धमकी दी गई।
इन आरोपों को यदि prima facie स्वीकार किया जाए तो cognizable offences दिखाई देते हैं।
इसलिए High Court द्वारा FIR quash करने से इनकार करना Supreme Court को गलत नहीं लगा।
14. एक और महत्वपूर्ण तथ्य—पांच FIR का उल्लेख
Supreme Court ने यह भी नोट किया कि रिकॉर्ड के अनुसार appellant के विरुद्ध समान प्रकृति के आरोपों वाली पांच FIRs थीं।
हालाँकि केवल इतनी बात से दोष सिद्ध नहीं हो जाता, लेकिन Court ने इसे FIR में लगाए गए आरोपों की prima facie nature पर विचार करते समय रिकॉर्ड के एक तथ्य के रूप में देखा।
15. Mohan Karthik judgment का अंतर
आरोपी की ओर से Mohan Karthik & Others v. State of Tamil Nadu & Another, Criminal Appeal No. 2193/2026, decided 27.04.2026 पर भरोसा किया गया था।
Supreme Court ने कहा कि Mohan Karthik में प्रश्न यह था कि क्या पहले 156(3) application खारिज होने के बाद दूसरी बार Section 156(3) application maintainable है।
जबकि वर्तमान मामले में प्रश्न था:
क्या 156(3) rejection के बाद police independently Section 154 के तहत FIR दर्ज कर सकती है?
दोनों परिस्थितियाँ अलग हैं।
इसलिए Mohan Karthik वर्तमान मामले में लागू नहीं हुआ।
16. आपके लिए सबसे महत्वपूर्ण Ratio
इस judgment को किसी मुकदमे में cite करते समय मुख्य ratio इस प्रकार समझा जा सकता है:
Ratio 1
Section 156(3) CrPC application की rejection अपने आप subsequent FIR पर bar नहीं है।
Ratio 2
156(3) rejection final adjudication on merits नहीं है।
Ratio 3
ऐसी rejection सामान्यतः res judicata के रूप में subsequent FIR को नहीं रोकती।
Ratio 4
Police की Section 154 CrPC के तहत cognizable offence पर FIR दर्ज करने की statutory duty स्वतंत्र है।
Ratio 5
156(3) rejection Police की Section 154 वाली statutory obligation को extinguish नहीं करती।
Ratio 6
Section 482 CrPC में Court FIR की allegations को face value पर देखकर prima facie cognizable offence की मौजूदगी देखता है; disputed evidence की detailed appreciation नहीं करता।
17. लेकिन इस Judgment की एक बहुत महत्वपूर्ण सीमा है
यह बात विशेष रूप से ध्यान देने योग्य है।
इस judgment का अर्थ यह नहीं है कि Magistrate द्वारा 156(3) application reject होने के बाद police हमेशा उसी आरोप पर FIR कर सकती है और FIR कभी quash नहीं होगी।
सही proposition यह है:
सिर्फ 156(3) rejection को आधार बनाकर FIR को barred नहीं माना जा सकता।
यदि subsequent FIR में:
कोई cognizable offence नहीं बनता;
आरोप inherently absurd हैं;
FIR mala fide है;
criminal proceeding स्पष्ट रूप से civil dispute को criminal colour देने के लिए है;
या Bhajan Lal की किसी अन्य category में मामला आता है,
तो Section 482/समुचित jurisdiction में quashing का प्रश्न अलग से विचारणीय रहेगा।
18. आपके पहले बताए गए 173(4) वाले मामले में इसका महत्व
आपने पहले जिस मामले के बारे में बताया था कि मजिस्ट्रेट ने 173(4) BNSS का प्रार्थना-पत्र इस आधार पर खारिज किया कि वादी के अपने व्यक्तिगत हित को नुकसान नहीं हुआ और इसलिए उसे आवेदन देने का अधिकार नहीं है, वहाँ यह judgment सीधे उसी तथ्य पर लागू नहीं होता, क्योंकि Pramod Kumar Shukla का मुख्य प्रश्न 156(3) rejection के बाद subsequent FIR का था।
लेकिन इसका एक महत्वपूर्ण सिद्धांत आपके मामले में उपयोगी हो सकता है:
Criminal proceeding में केवल procedural/technical rejection को merits पर अंतिम adjudication नहीं माना जा सकता, जब तक कानून के अनुसार merits पर अंतिम निर्णय न हुआ हो।
इसलिए आपके 173(4) वाले मामले में यह देखना आवश्यक होगा कि—
1. 173(4) में किस प्रकार की रिपोर्ट/आदेश था;
2. Magistrate ने किस statutory provision के तहत क्या power exercise की;
3. complainant/informant का locus क्या था;
4. alleged offence cognizable था या नहीं;
5. police investigation/closure/final report की स्थिति क्या थी;
6. Magistrate का rejection merits पर था या केवल locus/maintainability पर।
इन तथ्यों के आधार पर Pramod Kumar Shukla का उपयोग आपके पक्ष में कितना प्रभावी होगा, यह निर्धारित किया जा सकता है।
19. एक लाइन में इस निर्णय का सार
“Section 156(3) CrPC का आवेदन खारिज हो जाने मात्र से उसी या substantially similar allegations पर बाद में Section 154 CrPC के तहत दर्ज FIR स्वतः अवैध या res judicata से barred नहीं होती; क्योंकि 156(3) का आदेश आरोपों के merits का final adjudication नहीं है और पुलिस की cognizable offence पर FIR दर्ज करने की statutory duty स्वतंत्र है।”