24/05/2026
दीक्षित जरीवाला हत्याकांड सूरत का एक बेहद चर्चित और सनसनीखेज मामला था, जिसने जून 2016 में पूरे शहर को झकझोर कर रख दिया था। 25 वर्षीय दीक्षित जरीवाला एक समृद्ध परिवार से ताल्लुक रखते थे और सूरत के पॉश इलाके पार्ले पॉइंट में रहते थे। वे एक टेक्सटाइल वीविंग यूनिट (कपड़ा निर्माण इकाई) के मालिक थे।
इस पूरे मामले, पुलिस जांच और अदालत के फैसले का विवरण नीचे दिया गया है:
1. घटना और शुरुआती कहानी (27 जून, 2016)
27 जून 2016 की रात दीक्षित जरीवाला की उनके ही बेडरूम में बेरहमी से हत्या कर दी गई थी।
शुरुआत में, दीक्षित की पत्नी वेल्सी जरीवाला ने उमरा पुलिस स्टेशन में शिकायत दर्ज कराई कि यह हथियारों के बल पर की गई लूटपाट (डकैती) का मामला है। वेल्सी का आरोप था कि:
देर रात जब वे घर लौटे, तो दो नकाबपोश बदमाश उनके बेडरूम में घुस आए।
बदमाशों ने चाकू की नोंक पर वेल्सी को डराया और करीब 60,000 रुपये से अधिक के गहने लूट लिए।
जब दीक्षित ने उन्हें रोकने और खुद का बचाव करने की कोशिश की, तो हमलावरों ने उन पर हमला कर दिया।
वेल्सी ने दावा किया कि बदमाशों ने उसे और उसकी छोटी बेटी को बाथरूम में बंद कर दिया और दीक्षित की हत्या कर फरार हो गए।
2. पुलिस जांच और बड़ा खुलासा (प्लॉट ट्विस्ट)
जब सूरत पुलिस ने मामले की बारीकी से जांच शुरू की, तो लूटपाट की कहानी ज्यादा देर टिक नहीं सकी। पुलिस को वेल्सी के बयानों और समय (टाइमलाइन) में काफी विसंगतियां मिलीं। साथ ही, आस-पास के सीसीटीवी (CCTV) फुटेज भी वेल्सी की कहानी से मेल नहीं खा रहे थे।
पुलिस ने जांच में एक गहरी साजिश का पर्दाफाश किया:
प्रेम प्रसंग: पुलिस जांच में सामने आया कि वेल्सी का कथित तौर पर अपने पूर्व प्रेमी सुकेतु (उर्फ सन्नी) मोदी के साथ एक्स्ट्रा-मैरिटल अफेयर (अवैध संबंध) था।
हत्या की साजिश: अभियोजन पक्ष (Prosecution) के अनुसार, वेल्सी और सुकेतु ने अपने रास्ते का कांटा हटाने के लिए दीक्षित की हत्या की साजिश रची थी। आरोप लगाया गया कि सुकेतु ने अपने ड्राइवर धीरेंद्र चौहान के साथ मिलकर घर के अंदर इस वारदात को अंजाम दिया और पुलिस को गुमराह करने के लिए लूट की झूठी कहानी गढ़ी।
गिरफ्तारी: कॉल डिटेल्स, सीसीटीवी फुटेज और अन्य कड़ियों के आधार पर पुलिस ने वेल्सी को शिकायतकर्ता से सीधे मुख्य आरोपी बना दिया। वेल्सी, सुकेतु और धीरेंद्र तीनों को साजिश और हत्या के आरोप में गिरफ्तार कर लिया गया।
3. अदालत का फैसला: बरी होना (फरवरी 2020)
पुलिस द्वारा पुख्ता चार्जशीट दाखिल करने और मीडिया में भारी चर्चा के बावजूद, जब यह मामला सूरत की स्थानीय अदालत में ट्रायल (सुनवाई) के लिए पहुंचा, तो कहानी पूरी तरह बदल गई।
फरवरी 2020 में, अदालत ने संदेह का लाभ (Benefit of Doubt) देते हुए तीनों आरोपियों—वेल्सी, सुकेतु और धीरेंद्र—को बाइज्जत बरी कर दिया।
अदालत में केस कमजोर होने के मुख्य कारण:
गवाहों का मुकर जाना (Hostile Witnesses): पुलिस का पूरा केस मुख्य रूप से परिस्थितियों के साक्ष्य (Circumstantial Evidence) पर टिका था। सुनवाई के दौरान, 73 गवाहों में से अधिकांश गवाह अपने बयानों से मुकर गए। इसमें वह ऑटो-रिक्शा चालक भी शामिल था, जिसके बारे में पुलिस ने दावा किया था कि
"सूरत का सबसे अमीर दामाद और वो खौफनाक रात... लूट या सोची-समझी साजिश?" (Patr-1)
वह घटना की रात सुकेतु और धीरेंद्र को दीक्षित के घर ले गया था।
प्रत्यक्ष प्रमाण की कमी: दीक्षित की हत्या का कोई चश्मदीद गवाह (Eyewitness) नहीं था। बचाव पक्ष के वकीलों ने अदालत में दलील दी कि पुलिस हत्या के पीछे की वजह (Motive) को अकाट्य रूप से साबित करने में नाकाम रही और साजिश की थ्योरी के पक्ष में कोई ठोस फोरेंसिक या प्रत्यक्ष सबूत पेश नहीं कर सकी।
लूट की थ्योरी का खंडन न होना: बचाव पक्ष ने यह भी तर्क दिया कि पुलिस कानूनी तौर पर इस बात को भी पूरी तरह खारिज नहीं कर पाई कि क्या वाकई किसी बाहरी व्यक्ति ने लूट के इरादे से हमला किया था।
चूंकि गवाहों के मुकर जाने के कारण परिस्थितियों की कड़ियां टूट गईं, इसलिए अभियोजन पक्ष "संदेह से परे" आरोपियों का दोष साबित नहीं कर सका और अदालत ने तीनों को रिहा करने का आदेश दिया।