06/06/2026
मां प्रकृति का इतिहास
प्राचीन काल में—न केवल भारत में बल्कि पूरी दुनिया में—प्रकृति को ही भगवान मानकर पूजा जाता था। आज से हज़ारों साल पहले इंसान पूरी तरह प्रकृति पर निर्भर था, इसलिए पेड़, पौधे, नदियाँ, पहाड़, सूर्य, अग्नि और वायु ही उसके लिए साक्षात देवता थे।
असल में, इस व्यवस्था को किसी एक व्यक्ति या किसी एक शासक ने अचानक खत्म नहीं किया, बल्कि यह इंसानी सभ्यता के विकास, समय के बदलाव और विचारधाराओं के बदलने के कारण धीरे-धीरे पृष्ठभूमि में चली गई। इसके गायब होने के मुख्य कारण निम्नलिखित हैं:
1. मानवीकरण (Anthropomorphism) का दौर
शुरुआत में लोग सीधे प्रकृति की पूजा करते थे (जैसे बहती नदी या जलती हुई आग)। लेकिन जैसे-जैसे इंसानी समझ बढ़ी, इंसानों ने देवताओं को अपने जैसा रूप देना शुरू कर दिया।
ऋग्वैदिक काल में जो इंद्र बिजली और बारिश के देवता थे, या वरुण जो जल के देवता थे, उन्हें धीरे-धीरे इंसानी रूप में देखा जाने लगा।
अमूर्त प्रकृति की जगह मूर्तियों और इंसानी शक्लों वाले देवताओं ने ले ली। इसके बाद लोग सीधे पेड़ या नदी की जगह, उनसे जुड़ी पौराणिक कहानियों और देवी-देवताओं की मूर्तियां पूजने लगे।
2. संगठित धर्मों का उदय - समय के साथ दुनिया में संगठित और संस्थागत धर्मों का उदय हुआ। इन धर्मों ने प्रकृति की जगह 'एक अमूर्त ईश्वर या 'विशिष्ट अवतारों' पर ज्यादा जोर दिया।
पश्चिम और मध्य पूर्व में: अब्राहमिक धर्मों (जैसे ईसाई और इस्लाम धर्म) के प्रसार के बाद यूरोप, अफ्रीका और मध्य पूर्व की पुरानी प्रकृति-पूजक संस्कृतियों (जिन्हें 'Paganism' कहा जाता था) को पूरी तरह समाप्त कर दिया गया। वहाँ प्रकृति पूजा को 'अंधविश्वास' या 'ग़ैर-धार्मिक' घोषित कर दिया गया।
भारत में: यहाँ सनातन संस्कृति ने प्रकृति को कभी पूरी तरह नकारा नहीं, लेकिन समय के साथ 'कर्मकांड', 'यज्ञ' और 'मंदिरों की संस्कृति' इतनी बड़ी हो गई कि मुख्य धारा की पूजा-पद्धति में प्रकृति सीधे तौर पर दिखने के बजाय प्रतीकों (जैसे तुलसी, पीपल, गंगा जल) में सिमट कर रह गई।
3. औद्योगिक क्रांति और वैज्ञानिक दृष्टिकोण
18वीं और 19वीं सदी में जब दुनिया में औद्योगिक क्रांति आई, तब इंसान का प्रकृति के प्रति नजरिया पूरी तरह बदल गया। विज्ञान की मदद से इंसान ने प्रकृति पर विजय पानी शुरू कर दी (जैसे बांध बनाना, जंगलों को काटना, बिजली बनाना) पहले जिस प्रकृति के सामने इंसान आदर और डर से सिर झुकाता था, अब उसे 'उपभोग की वस्तु' समझा जाने लगा। जब प्रकृति को केवल एक संसाधन मान लिया गया, तो उसके प्रति श्रद्धा और पूजा का भाव धीरे-धीरे खत्म होता चला गया।
4. शहरीकरण
जब तक इंसान गांवों और जंगलों के करीब रहता था, वह प्रकृति के चक्र (ऋतुओं, फसलों) से सीधे जुड़ा था। शहरीकरण के कारण इंसान कंक्रीट के जंगलों में रहने लगा, जिससे उसका मिट्टी, पेड़ों और शुद्ध हवा से सीधा संपर्क टूट गया। जो चीज रोजमर्रा की जिंदगी से दूर हो गई, वह पूजा पद्धति से भी दूर होती चली गई। उस पुरानी व्यवस्था को हमें आज भी जीवित रखना होगा जो व्यवस्था का उदय स्वतः अपने आप हुआ था ना किसी व्यक्ति के बनाए धर्म के अनुसार हुआ है। क्योंकि उस समय भी आदिवासी पूरी तरह प्रकृति-पूजक थे और आज जब कभी भी आदिवासी मिलते हैं। उनके लिए जल, जंगल और जमीन ही उनके भगवान हैं। और बिना मांगे ही मां प्रकृति सब कुछ देने वाली हैं क्योंकि वो सब कुछ जानती हैं कि हमें कब क्या और किस चीज की आवश्यकता है।
जय मां प्रकृति।