26/04/2026
अध्ययन... आत्मविश्वास...अनुभव...
जब आप जिला न्यायालय, उच्च न्यायालय और उच्चतम न्यायालय में वकालत करते हैं या उनके आदेशों का नियमित अध्ययन करते हैं तो आप इस बात के जानकार हो जाते हैं कि क्लाइंट को कौन सा रिलीफ किस स्तर पर मिल सकता है और किस स्तर पर नहीं।😇
इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ बेंच में एक बार आरोपी की एंटीसिपेटरी बेल की बहस जैसे ही शुरू करी तो जज साहब ने तुरंत कहा कि , ये क्या ? 376,और SC/ST के मुकदमे में एंटीसिपेटरी बेल लेने आए हो 🤨
अभी withdraw करो petition नहीं तो खारिज़ कर दूंगा। मैंने कहां your lordship, 30 सेकंड्स के लिए मेरी बात सुन लीजिए ,लेकिन उन्होंने कहा कि बहस की तो खारिज़ समझो 😠
मैंने तुरंत कहा कि lordship, मैं मेरिट पर बहस करूंगा और फिर जो hon'ble court को उचित लगे वह फैसला आप कर सकते हैं। कॉन्फिडेंस के साथ बहस की शुरुआत की ,बीच बीच में AGA साहब बोलते रहे कि withdraw कर लो,बच्चे हो अभी तुम,petition खारिज़ हो जाएगी , लेकिन आत्मविश्वास और अनुभव के साथ निरंतर 30 मिनट्स तक बहस की और जज साहब को अपने सारे submissions नोट करवाए और अंततः माननीय जज साहब ने अपने वायदे को निभाते हुए पिटिशन खारिज़ कर दी।
लेकिन पिक्चर अभी बाकी है मेरे दोस्त 😎
अनुभव व अध्ययन से मुझे पता था कि अगर मैने बेल पिटिशन withdraw कर ली तो 226 में FIR quashing के अलावा मेरे पास कोई और विकल्प नहीं होगा और न ही FIR quashing होगी और न ही Stay Arrest मिलेगा,और क्लाइंट jail चला जाएगा ( क्योंकि धाराएं गंभीर थी और FIR कई facts से भरपूर थीं,जिन्हें सिर्फ trial court ही डिसाइड कर सकती थी,226 में High court न करती ) लेकिन अगर बेल खारिज़ होती है तो मैं सुप्रीम कोर्ट में उस ऑर्डर को challenge कर सकता हूं और वहां से उसे पक्का बेल मिलेगी ( सुप्रीम कोर्ट के जजमेंट पढ़ने के फायदे)।
जो सोचा था वही हुआ । हम सुप्रीम कोर्ट गए और High court के ऑर्डर को चैलेंज किया और पहली तारीख पर interim anticipatory bail मिली जो कुछ तारीखों में absolute हो गई ।
कुछ ही समय में पुलिस ने chargesheet भी दाखिल कर दी और क्लाइंट को उपरोक्त गंभीर धाराओं में जेल भी नहीं जाना पड़ा।