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मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर बेंच के जस्टिस गजेंद्र सिंह ने कहा है कि गंभीर जालसाजी के उपयुक्त मामलों में सिविल कोर्ट ध...
26/09/2026

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर बेंच के जस्टिस गजेंद्र सिंह ने कहा है कि गंभीर जालसाजी के उपयुक्त मामलों में सिविल कोर्ट धारा 151 CPC के तहत अपनी inherent powers का इस्तेमाल करते हुए पुलिस को शिकायत भेजकर FIR दर्ज कराने का निर्देश दे सकता है।

मामला कृषि भूमि के पारिवारिक विवाद से जुड़ा था, जिसमें मुकदमे के दौरान पेश की गई कथित वसीयत को सिविल कोर्ट ने जाली माना था। इसके बाद धारमपुरी पुलिस स्टेशन में BNS की धाराओं 61, 336, 338 और 340 के तहत FIR दर्ज हुई। FIR रद्द करने की मांग को हाईकोर्ट ने खारिज करते हुए Sachida Nand Singh और Manohar Lal Chopra के फैसलों का भी उल्लेख किया।

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि दस्तावेज की जालसाजी अदालत में पेश किए जाने से पहले और अदालत के बाहर हुई है, तो केवल बाद में उसे कोर्ट में पेश किए जाने के कारण धारा 195 CrPC की रोक लागू नहीं हो जाती।

📌Case Title: Himmat Singh v. State of Madhya Pradesh

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पिता के जीवित रहते प्रतीक संपत्ति पर बेटे का हक नहीं हाई कोर्ट ने दूसरी अपील खारिज करते हुए सुनाया फैसलापैतृक या संयुक्त...
26/09/2026

पिता के जीवित रहते प्रतीक संपत्ति पर बेटे का हक नहीं हाई कोर्ट ने दूसरी अपील खारिज करते हुए सुनाया फैसला

पैतृक या संयुक्त परिवार की संपत्ति को लेकर अक्सर यह सवाल उठता है कि क्या पिता के जीवित रहते बेटा अपनी हिस्सेदारी का दावा कर सकता है। ऐसे मामलों में संपत्ति की वास्तविक प्रकृति और पक्षकारों के अधिकार महत्वपूर्ण होते हैं। केवल इस आधार पर कि संपत्ति परिवार में चली आ रही है, हर स्थिति में बेटे का तत्काल हिस्सा तय नहीं हो जाता।

उच्च न्यायालय ने एक मामले में दूसरी अपील खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि संपत्ति पर अधिकार का निर्धारण केवल रिश्ते के आधार पर नहीं किया जा सकता। यह देखना आवश्यक है कि संबंधित संपत्ति किस प्रकृति की है, उसका स्वामित्व किसके नाम है और लागू कानून के अनुसार उस पर किसका अधिकार बनता है।

इस फैसले से यह बात समझना जरूरी है कि पिता के जीवित रहते बेटे का संपत्ति पर दावा केवल पुत्र होने के आधार पर स्वतः स्वीकार नहीं किया जा सकता दावे के लिए संपत्ति की प्रकृति और उससे जुड़े दस्तावेजों का परीक्षण आवश्यक होता है।

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🚨 लोन रिकवरी के नाम पर फाइनेंस कंपनियों की 'गुंडागर्दी' पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा चाबुक! ⚖️💥​"कर्ज (Loan) एक देनदारी पैदा...
26/09/2026

🚨 लोन रिकवरी के नाम पर फाइनेंस कंपनियों की 'गुंडागर्दी' पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा चाबुक!
⚖️💥
​"कर्ज (Loan) एक देनदारी पैदा करता है और बैंक को बकाया वसूलने का अधिकार देता है; लेकिन जिस तरीके से उस अधिकार का प्रयोग किया जाता है, वह कानून के दायरे में होना चाहिए!" — सुप्रीम कोर्ट

​अगर आपने या आपके किसी परिचित ने लोन पर गाड़ी, ट्रक या कोई वाहन लिया है, तो देश की सबसे बड़ी अदालत का यह ऐतिहासिक फैसला आपके लिए जानना बेहद जरूरी है! 👇
​🚛 मामला क्या था?
​उत्तर प्रदेश के हरि दत्ता शर्मा जी ने अपने आजीविका के साधन — Tata SFC 407 ट्रक के लिए 'चोलामंडलम इन्वेस्टमेंट एंड फाइनेंस कंपनी' से लोन लिया था। किश्तें बकाया होने पर 9 अप्रैल 2023 की रात को 1:00 बजे रिकवरी एजेंटों ने बिना किसी लिखित पूर्व नोटिस के, गाड़ी के स्टीयरिंग का ताला तोड़ा और उसे जबरन उठाकर ले गए। बाद में वाहन को चुपके से नीलाम कर दिया गया।
​जब पीड़ित ने हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया, तो उनकी याचिका खारिज हो गई। लेकिन जब मामला सुप्रीम कोर्ट (Hari Dutta Sharma vs State of U.P. & Ors., 2026 INSC 998) पहुंचा, तो जस्टिस आलोक अराधे की पीठ ने फाइनेंस कंपनी की इस मनमानी पर ऐतिहासिक फैसला सुनाया! 🔥
​⚖️ सुप्रीम कोर्ट के 5 कड़े संदेश व आदेश:
​1️⃣ गुंडागर्दी और बलप्रयोग अवैध: लोन डिफॉल्ट होने का मतलब यह नहीं कि फाइनेंस कंपनी या बैंक 'बाहुबल' या गुंडों के जरिए संपत्ति छीन लें। रिकवरी केवल कानूनी प्रक्रिया और RBI गाइडलाइंस के तहत ही हो सकती है।
2️⃣ RBI नियमों और नोटिस का उल्लंघन: समझौते के तहत उचित (7 दिन) पूर्व नोटिस दिए बिना या रात के अंधेरे में जबरन जब्ती पूरी तरह गैर-कानूनी है।
3️⃣ मौलिक अधिकारों (Article 14 & 21) का हनन: गैर-कानूनी तरीके से आजीविका का साधन छीनना संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 (रोजगार और जीवन के अधिकार) का उल्लंघन है।
4️⃣ ₹10 लाख का भारी मुआवजा: सुप्रीम कोर्ट ने फाइनेंस कंपनी को आदेश दिया कि वह मानसिक उत्पीड़न और आजीविका के नुकसान के लिए पीड़ित को ₹10,00,000 (दस लाख रुपये) का मुआवजा दे! 💰
5️⃣ पूरा पैसा ब्याज सहित वापस: नीलाम की गई गाड़ी की बिक्री राशि (₹4,50,000) को 6% ब्याज के साथ लौटाने और पीड़ित के दोनों लोन अकाउंट तुरंत बंद (Close) करने के निर्देश दिए गए।
​📢 हर नागरिक और वाहन मालिक के कानूनी अधिकार:
​👉 समय सीमा: रिकवरी एजेंट असमय (बेवक्त/रात में) आपके घर या कार्यस्थल पर दबंगई नहीं कर सकते।
👉 लिखित नोटिस अनिवार्य: वाहन जब्त करने से पहले नियमानुसार लिखित नोटिस देना अनिवार्य है।
👉 मानसिक प्रताड़ना पर रोक: कोई भी बैंक या NBFC धमकी या मानसिक प्रताड़ना नहीं दे सकती।

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पटना स्थित चाणक्य नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी (CNLU) में भारत के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत ने छात्रों के साथ एक खुले संव...
26/09/2026

पटना स्थित चाणक्य नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी (CNLU) में भारत के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत ने छात्रों के साथ एक खुले संवाद में हिस्सा लिया। इस दौरान छात्रों ने न्यायपालिका, कानूनी शिक्षा और वकालत से जुड़े कई महत्वपूर्ण एवं व्यावहारिक सवाल सीधे CJI के सामने रखे।

🔹 शांतिपूर्ण प्रदर्शन का अधिकार: छात्रों द्वारा शांतिपूर्ण छात्र प्रदर्शनों के खिलाफ पुलिस कार्रवाई पर सवाल उठाए जाने पर CJI ने लोकतांत्रिक तरीके से अपनी बात रखने के अधिकार और शांतिपूर्ण प्रदर्शन के मौलिक अधिकार की रक्षा के प्रति न्यायपालिका की प्रतिबद्धता पर जोर दिया।

🔹 पहली पीढ़ी के वकीलों की चुनौतियां: आर्थिक और पेशेवर कठिनाइयों को लेकर चर्चा में शुरुआती वर्षों में युवा वकीलों की सहायता के लिए Professional Assistance Corpus जैसे उपायों की जरूरत पर बात हुई।

🔹 कॉलेजियम में असहमति और गोपनीयता: कॉलेजियम की बैठकों में दर्ज नकारात्मक टिप्पणियों को सार्वजनिक न करने के सवाल पर CJI ने बताया कि ऐसी टिप्पणियों के सार्वजनिक होने से संबंधित व्यक्ति की गरिमा और प्रतिष्ठा प्रभावित हो सकती है।

🔹 लॉ स्कूल फीस और स्कॉलरशिप: छात्रों ने बढ़ती फीस और पर्याप्त छात्रवृत्ति की कमी का मुद्दा भी उठाया। CNLU के अनुसार, CJI ने इस विषय पर सकारात्मक प्रतिक्रिया देते हुए इसे ध्यान में रखने की बात कही।

🔹 5 वर्षीय लॉ कोर्स में कोर्ट अप्रेंटिसशिप: CNLU के कुलपति प्रो. फैजान मुस्तफा ने अंतिम वर्ष में अनिवार्य कोर्ट अप्रेंटिसशिप शामिल करने का सुझाव दिया, ताकि छात्रों को पढ़ाई के दौरान ही अदालतों का व्यावहारिक अनुभव मिल सके।

🔹 हाईकोर्ट क्लर्कशिप: पटना हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस वी. कामेश्वर राव ने न्यायिक क्लर्कशिप को अधिक प्रतिस्पर्धी और आर्थिक रूप से आकर्षक बनाने की आवश्यकता पर जोर दिया।

ऐसे खुले संवाद न केवल कानून के छात्रों को न्यायपालिका को करीब से समझने का अवसर देते हैं, बल्कि कानूनी शिक्षा और न्यायिक व्यवस्था से जुड़े महत्वपूर्ण सवालों को भी सामने लाते हैं।

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पुलिस अपना काम सही से नहीं करती है सिर्फ और सिर्फ कानून तोड़के काम करना, सही किया गया मजिस्ट्रेट द्वारा
26/09/2026

पुलिस अपना काम सही से नहीं करती है सिर्फ और सिर्फ कानून तोड़के काम करना, सही किया गया मजिस्ट्रेट द्वारा

उत्तराखंड हाईकोर्ट के जस्टिस आलोक महरा ने कहा कि यदि चेक पर हस्ताक्षर स्वीकार हैं, तो NI Act की धारा 118(ए) और 139 के तह...
26/09/2026

उत्तराखंड हाईकोर्ट के जस्टिस आलोक महरा ने कहा कि यदि चेक पर हस्ताक्षर स्वीकार हैं, तो NI Act की धारा 118(ए) और 139 के तहत कानूनी धारणा लागू होती है। चेक के बाकी विवरण किसी अन्य व्यक्ति द्वारा भरे जाने या हस्ताक्षर और लिखावट अलग होने मात्र से यह धारणा समाप्त नहीं होती।

मामले में ₹2 लाख का चेक अपर्याप्त धनराशि के कारण बाउंस हुआ था। याचिकाकर्ता ने दावा किया कि उसने केवल हस्ताक्षर किया हुआ खाली चेक दिया था, जिसका बाद में दुरुपयोग हुआ। हाईकोर्ट ने Bir Singh v. Mukesh Kumar में सुप्रीम कोर्ट के सिद्धांत का हवाला देते हुए कहा कि केवल खाली चेक दिए जाने या उसके विवरण किसी और द्वारा भरे जाने का दावा पर्याप्त बचाव नहीं है। ठोस और विश्वसनीय साक्ष्य से ही कानूनी धारणा को खारिज किया जा सकता है। हाईकोर्ट ने आपराधिक पुनरीक्षण याचिका खारिज कर दी।

📌CASE: Ramesh Singh Nagarkoti v. State of Uttarakhand | Crl. Rev. No. 646 of 2026

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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने तीन आरोपियों को महज 30 दिनों के लिए अग्रिम जमानत दिए जाने के ट्रायल कोर्ट के आदेश पर सवाल उठाते हुए...
26/09/2026

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने तीन आरोपियों को महज 30 दिनों के लिए अग्रिम जमानत दिए जाने के ट्रायल कोर्ट के आदेश पर सवाल उठाते हुए संबंधित पीठासीन अधिकारी से उचित स्पष्टीकरण मांगा है। जस्टिस मदन पाल सिंह की पीठ सुरेश यादव और दो अन्य की ओर से दाखिल BNSS की धारा 528 के तहत याचिका पर सुनवाई कर रही थी। याचिका में आजमगढ़ की एडिशनल सेशंस कोर्ट नंबर-1 द्वारा 23 दिसंबर 2025 को पारित आदेश को चुनौती दी गई थी।

ट्रायल कोर्ट ने तीनों आरोपियों को अग्रिम जमानत तो मंजूर की थी, लेकिन गिरफ्तारी से सुरक्षा केवल 30 दिनों तक सीमित कर दी। हाईकोर्ट के समक्ष आरोपियों की ओर से दलील दी गई कि इतनी कम अवधि के लिए सुरक्षा देने का आदेश में कोई स्पष्ट औचित्य नहीं बताया गया है। खास बात यह है कि जांच के दौरान पुलिस ने आरोपियों को गिरफ्तार नहीं किया और चार्जशीट दाखिल होने तक भी उनकी गिरफ्तारी नहीं हुई। आरोपियों ने यह भी बताया कि जिन अपराधों का आरोप लगाया गया है, उनमें अधिकतम सजा सात साल से कम है और उन्होंने BNSS की धारा 35(3) के तहत जारी नोटिस का भी पालन किया था।

आरोपियों ने सुप्रीम कोर्ट के संविधान पीठ के फैसले सुशीला अग्रवाल बनाम राज्य (NCT दिल्ली) का हवाला देते हुए कहा कि उचित शर्तों के साथ अग्रिम जमानत सामान्यतः मुकदमे के निष्कर्ष तक जारी रह सकती है। हाईकोर्ट ने इससे पहले 18 अगस्त 2026 को आरोपियों को अंतरिम सुरक्षा देते हुए ट्रायल कोर्ट से पूछा था कि आखिर अग्रिम जमानत को केवल 30 दिनों तक सीमित करने का आधार क्या था।

हाईकोर्ट ने गौर किया कि इस मामले में चार्जशीट पहले ही दाखिल हो चुकी थी और ट्रायल कोर्ट संज्ञान भी ले चुका था। इसके बावजूद अग्रिम जमानत देते समय यह स्पष्ट नहीं किया गया कि सुरक्षा केवल 30 दिनों के लिए ही क्यों दी जा रही है। अदालत ने कहा कि इस तरह के आदेश का परिणाम यह हो सकता है कि 30 दिन की अवधि समाप्त होने के बाद आरोपियों को दोबारा जमानत के लिए आवेदन करना पड़े, जिससे अनावश्यक उत्पीड़न की स्थिति पैदा हो सकती है।

ट्रायल जज ने 3 सितंबर 2026 को अपना स्पष्टीकरण दाखिल किया, लेकिन हाईकोर्ट उससे संतुष्ट नहीं हुआ। अब अदालत ने ट्रायल जज से यह बताने को कहा है कि उन्होंने कितने मामलों में आरोपियों को 20, 30 या 40 दिनों जैसी सीमित अवधि के लिए जमानत दी है। साथ ही यह भी पूछा गया है कि इस मामले में ऐसी कौन-सी विशेष परिस्थितियां थीं, जिनके आधार पर केवल 30 दिनों की अग्रिम जमानत उचित समझी गई, जबकि कथित अपराधों में अधिकतम सजा सात साल से कम थी और चार्जशीट दाखिल होने तक आरोपियों को गिरफ्तार नहीं किया गया था। अदालत ने यह भी सवाल किया कि 30 दिनों की अवधि समाप्त होने के बाद आरोपियों से क्या अपेक्षा थी और क्या उन्हें ट्रायल कोर्ट के समक्ष आत्मसमर्पण कर दोबारा अग्रिम जमानत के लिए आवेदन करना था।

📌CASE TITLE: Suresh Yadav And 2 Others vs. State of U.P. and Anr.

हाईकोर्ट ने दोहराया कि अग्रिम जमानत की अर्जी पर विचार करते समय अदालत उचित शर्तों के साथ मुकदमे के निष्कर्ष तक सुरक्षा दे सकती है या अपराध की गंभीरता और अन्य प्रासंगिक परिस्थितियों को देखते हुए अर्जी खारिज कर सकती है। फिलहाल तीनों आरोपियों को दी गई अंतरिम सुरक्षा जारी रखने का निर्देश दिया गया है। मामले की अगली सुनवाई 30 सितंबर 2026 को होगी। रजिस्ट्रार (कम्प्लायंस) को आदेश की प्रति आवश्यक अनुपालन के लिए आजमगढ़ के जिला जज को भेजने का निर्देश भी दिया गया है।

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मद्रास हाई कोर्ट ने पति-पत्नी की जिम्मेदारियों को लेकर अहम टिप्पणी की है।कोर्ट ने कहा कि जिस तरह घर संभालने वाली महिला क...
26/09/2026

मद्रास हाई कोर्ट ने पति-पत्नी की जिम्मेदारियों को लेकर अहम टिप्पणी की है।
कोर्ट ने कहा कि जिस तरह घर संभालने वाली महिला को ‘ हाउसवाइफ ’ कहा जाता है, उसी तरह घर की जिम्मेदारी संभालने वाले पुरुष को ‘हाउस-हसबैंड’ कहा जा सकता है।

अदालत के मुताबिक, पति अगर घर और परिवार संभालें और पत्नी अपने करियर पर ध्यान दें तो इससे कुछ वैवाहिक रिश्तों में पैदा होने वाला तनाव कम हो सकता है।

कोर्ट के मुताबिक, ‘होममेकर’ शब्द जेंडर-न्यूट्रल है और इसे एक ‘न्यू नॉर्मल’ के रूप में स्वीकार किया जाना चाहिए। दरअसल जस्टिस जीआर स्वामीनाथन और जस्टिस एमडी सुमति की डिवीजन बेंच एक डॉक्टर दंपति के वैवाहिक विवाद से जुड़ी अपील पर सुनवाई कर रही थी।

दोनों पक्षों की आपसी सहमति के आधार पर हाई कोर्ट ने विवाह को समाप्त करने का आदेश दिया। इस दौरान अदालत ने परिवार और वैवाहिक भूमिकाओं में बदलते सामाजिक बदलावों पर टिप्पणी की।

बेंच ने कहा कि अगर पत्नी घर संभाल सकती है तो पति भी घर की जिम्मेदारी उठा सकता है। कोर्ट ने कहा कि इसे सामान्य बात बनने देना चाहिए, क्योंकि इससे विवाह और परिवार की संस्था को बनाए रखने में मदद मिल सकती है।

कोर्ट ने पारंपरिक वैवाहिक व्यवस्था का जिक्र करते हुए कहा कि पहले पति आमतौर पर आर्थिक संसाधनों की जिम्मेदारी संभालते थे,
जबकि
पत्नियां घर और परिवार की देखभाल करती थीं। कोर्ट ने कहा कि दोनों भूमिकाओं को समान सम्मान दिया जाना चाहिए।

इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया कि केवल आर्य समाज मंदिर द्वारा जारी विवाह प...
26/09/2026

इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया कि केवल आर्य समाज मंदिर द्वारा जारी विवाह प्रमाणपत्र के आधार पर यह नहीं माना जा सकता कि हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 के तहत वैध विवाह संपन्न हुआ था। यह फैसला न्यायमूर्ति राजीव सिंह ने 18 सितंबर 2026 को सुनाया।

मामला सशस्त्र सीमा बल (SSB) के अधिकारी रोहित पांडेय से जुड़ा था। उनके खिलाफ यह आरोप लगाया गया था कि उन्होंने वर्ष 2007 में सुचेता तिवारी के साथ आर्य समाज मंदिर में विवाह किया था, जबकि बाद में सरकारी सेवा में प्रवेश के दौरान स्वयं को अविवाहित बताया। इसी कथित विवाह को आधार बनाकर उनके खिलाफ विभागीय कार्रवाई की गई और अंततः 28 अप्रैल 2022 को उन्हें सेवा से हटा दिया गया।

हाईकोर्ट ने Hindu Marriage Act की Section 7 का उल्लेख करते हुए कहा कि हिंदू विवाह की वैधता के लिए संबंधित पक्षों द्वारा आवश्यक हिंदू रीति-रिवाज और धार्मिक संस्कारों का वास्तव में संपन्न होना जरूरी है। जहां संबंधित प्रथा में सप्तपदी यानी सात फेरे आवश्यक ceremony है, वहां उसके संपन्न होने का विशेष महत्व है। अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल Arya Samaj Mandir द्वारा जारी certificate अपने-आप में यह साबित नहीं करता कि Hindu Marriage Act के तहत वैध विवाह हुआ था।
इस मामले में अदालत ने उपलब्ध साक्ष्यों पर विचार करने के बाद पाया कि कथित विवाह के दौरान आवश्यक हिंदू रीति-रिवाज और सप्तपदी संपन्न होने का पर्याप्त प्रमाण नहीं था। इसलिए हाईकोर्ट ने रोहित पांडेय को सेवा से हटाने वाले 28 अप्रैल 2022 के आदेश को रद्द कर दिया और उन्हें पुनः ड्यूटी पर लेने का निर्देश दिया। हालांकि, 28 अप्रैल 2022 से फैसले की तारीख तक की अवधि के लिए “No Work, No Pay” का सिद्धांत लागू किया गया, लेकिन इस अवधि को उनकी सेवा में break नहीं माना गया।

इस फैसले से एक महत्वपूर्ण कानूनी बात सामने आती है कि Marriage Certificate और वैध विवाह का कानूनी प्रमाण हमेशा एक ही बात नहीं होते। Hindu Marriage Act के तहत विवाह की वैधता निर्धारित करने में आवश्यक वैवाहिक संस्कारों का संपन्न होना और उनका प्रमाण महत्वपूर्ण हो सकता है।

📌Case Title: Rohit Pandey vs. Union of India Thru. Secy. Ministry of Home Affairs & Ors.

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सुप्रीम कोर्ट ने गिरफ्तारी को लेकर अहम फैसला सुनाते हुए कहा है कि आरोपी को उसकी गिरफ्तारी के कारण लिखित रूप में और ऐसी भ...
26/09/2026

सुप्रीम कोर्ट ने गिरफ्तारी को लेकर अहम फैसला सुनाते हुए कहा है कि आरोपी को उसकी गिरफ्तारी के कारण लिखित रूप में और ऐसी भाषा में बताना जरूरी है, जिसे वह समझ सके।

कोर्ट ने कहा कि यह सुरक्षा संविधान के अनुच्छेद 22(1) के तहत हर मामले में लागू होती है। गिरफ्तारी के कारण नहीं बताए जाने पर गिरफ्तारी असंवैधानिक हो जाती है और अदालत को आरोपी की तत्काल रिहाई का आदेश देना होगा।

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि बाद में चार्जशीट दाखिल होने से ऐसी असंवैधानिक गिरफ्तारी वैध नहीं हो जाती।

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