28/01/2026
UGC की नई गाइडलाइंस : संरक्षण के नाम पर संवैधानिक असंतुलन
— अमित दीक्षित ‘आदिदेव’, अधिवक्ता
विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) द्वारा हाल ही में जारी की गई नई गाइडलाइंस का उद्देश्य उच्च शिक्षण संस्थानों में भेदभाव, उत्पीड़न एवं सामाजिक अन्याय के विरुद्ध प्रभावी शिकायत तंत्र स्थापित करना बताया गया है। विशेष रूप से आरक्षित वर्गों के संरक्षण को केंद्र में रखते हुए इन गाइडलाइंस को लागू किया गया है। उद्देश्य निस्संदेह सराहनीय है, किंतु इन गाइडलाइंस की प्रकृति और संरचना पर गंभीर संवैधानिक एवं विधिक प्रश्न खड़े होते हैं।
नई गाइडलाइंस का अध्ययन यह संकेत देता है कि शिकायत प्रक्रिया को इस प्रकार ढाला गया है, जिससे सामान्य अथवा सवर्ण वर्ग के विरुद्ध एक प्रकार का पूर्वाग्रह स्वतः निर्मित हो जाता है। शिकायत दर्ज होते ही आरोपी की सामाजिक, पेशेवर और नैतिक छवि पर प्रश्नचिह्न लग जाता है, जबकि निष्पक्ष सुनवाई और तटस्थ जाँच की गारंटी स्पष्ट रूप से सुनिश्चित नहीं की गई है। यह स्थिति भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14, जो समानता का अधिकार देता है, तथा अनुच्छेद 21, जो सम्मान एवं प्रतिष्ठा के साथ जीवन का अधिकार सुनिश्चित करता है, के विपरीत प्रतीत होती है।
भारतीय न्याय व्यवस्था का मूल सिद्धांत यह है कि दोष सिद्ध होने तक व्यक्ति निर्दोष माना जाता है। किंतु UGC की इन गाइडलाइंस में शिकायतकर्ता के कथन को प्रारंभिक स्तर पर ही अत्यधिक महत्व देकर इस सिद्धांत को कमजोर किया गया है। यदि आरोपी को पर्याप्त अवसर, निष्पक्ष मंच और स्पष्ट प्रक्रिया न मिले, तो यह प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का सीधा उल्लंघन माना जाएगा।
सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि गाइडलाइंस में झूठी, दुर्भावनापूर्ण अथवा व्यक्तिगत द्वेष से प्रेरित शिकायतों के विरुद्ध कोई प्रभावी और स्पष्ट दंडात्मक प्रावधान नहीं दिखाई देता। ऐसी स्थिति में शिकायत तंत्र न्याय का साधन न होकर उत्पीड़न का माध्यम बन सकता है। इसका दुष्प्रभाव शिक्षकों, प्रशासनिक अधिकारियों और शोधकर्ताओं पर पड़ना स्वाभाविक है, जो निर्णय लेने से पहले भय और असुरक्षा का अनुभव करेंगे।
संविधान सामाजिक न्याय की बात करता है, किंतु वह न्याय संतुलन पर आधारित है। किसी वर्ग को संरक्षण देना आवश्यक हो सकता है, परंतु उसका अर्थ यह नहीं कि किसी अन्य वर्ग को संभावित अपराधी मान लिया जाए। आरक्षण और संरक्षण का उद्देश्य समान अवसर उपलब्ध कराना है, न कि असमानता को संस्थागत रूप देना।
शिक्षण संस्थान संवाद, विवेक और स्वतंत्र चिंतन के केंद्र होते हैं। यदि वहाँ एकतरफ़ा शिकायत व्यवस्था लागू होगी, तो अकादमिक स्वतंत्रता, स्वस्थ बहस और सामाजिक समरसता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा। यह स्थिति न केवल शिक्षा की गुणवत्ता को प्रभावित करेगी, बल्कि समाज में विभाजन की रेखाओं को भी और गहरा करेगी।
अतः UGC से यह अपेक्षा की जाती है कि वह अपनी गाइडलाइंस की पुनः समीक्षा करे और शिकायतकर्ता तथा आरोपी—दोनों के लिए समान, पारदर्शी और निष्पक्ष प्रक्रिया सुनिश्चित करे। झूठी शिकायतों पर स्पष्ट प्रावधान और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पालन ही इन गाइडलाइंस को संवैधानिक और व्यवहारिक रूप से स्वीकार्य बना सकता है।
न्याय तभी सार्थक है, जब वह निष्पक्ष, संतुलित और सभी के लिए समान हो।