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सुप्रीम कोर्ट का बड़ा संदेशतलाक के मामलों में गुजारा भत्ता (अलिमनी) तय करने का कोई तय फार्मूला नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने...
09/07/2026

सुप्रीम कोर्ट का बड़ा संदेश

तलाक के मामलों में गुजारा भत्ता (अलिमनी) तय करने का कोई तय फार्मूला नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हर मामले की परिस्थितियाँ अलग होती हैं, इसलिए अदालत पति-पत्नी की आय, विवाह की अवधि, आर्थिक स्थिति, बच्चों की जिम्मेदारी, संपत्ति और अन्य तथ्यों को ध्यान में रखकर फैसला करेगी।

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि भरण-पोषण का उद्देश्य किसी पक्ष को दंडित करना नहीं, बल्कि आर्थिक रूप से कमजोर जीवनसाथी को न्यायसंगत सहायता देना है।

आपकी राय क्या है? क्या भारत में अलिमनी तय करने के लिए स्पष्ट और समान दिशानिर्देश होने चाहिए?

08/07/2026

#अंधे_कानून_और_मक्कार_लोग
देश का कानून और कानून व न्याय व्यवस्था अत्यंत दयनीय हैं..आज सबसे ज्यादा महिला कानून व SCST एक्ट का दुरुपयोग होता है..तमाम निर्दोष बेचारे पहले झूठे FIR/परिवाद में जेल झेलते हैं और उसके बाद भ्रष्ट पोलिस,थाना और फिर कोर्ट, कचहरी का तिलिस्म झेलते हुए सालों साल कोर्ट कचहरी के चक्कर काटते रहते है ऊपर से झूठे मुकदमें में सजा भी हो जाए तो कोई बड़ी बात नहीं..

देखिए कैसे एक पुजारी से एक कथित शोषित वंचित अपना दुपट्टा खोलकर लिपट रही है...!!

उनकी धोती भी खोलने की कोशिश कर रही है , ताकि इनको फंसाकर जमीन कब्जा कर सके...!!
भाई वीडियो बना रहा है ... !!
विचार कीजिए क्या ये शोषित है ... ???

सीकर के गणेड़ी गांव की वायरल घटना ने कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

अगर किसी पुरुष द्वारा किसी महिला के साथ दुर्व्यवहार होता है, तो समाज और कानून सख्त कार्रवाई की मांग करते हैं। यह होना भी चाहिए।

लेकिन यदि कोई व्यक्ति—चाहे वह महिला हो या पुरुष—जानबूझकर किसी निर्दोष को फँसाने की साज़िश रचता है, झूठा आरोप लगाता है या किसी की प्रतिष्ठा नष्ट करने की कोशिश करता है, तो क्या उसके खिलाफ भी उतनी ही सख्त कार्रवाई होगी?

क्या कानून उन लोगों के खिलाफ भी समान कठोरता दिखाएगा जिन्होंने:
👉 किसी निर्दोष व्यक्ति या संत की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुँचाने की कोशिश की।
👉 अपने लिंग का अनुचित लाभ उठाकर किसी को फँसाने का प्रयास किया।
👉 कानून का दुरुपयोग करके निर्दोष लोगों को परेशान किया।
👉 निजी स्वार्थ के लिए किसी का मानसिक, सामाजिक या शारीरिक उत्पीड़न किया।

अगर वास्तव में “बेटा-बेटी एक समान” और “कानून सबके लिए समान” है, तो कानून का दुरुपयोग करने वालों के खिलाफ भी निष्पक्ष और सख्त कार्रवाई होनी चाहिए—चाहे वे महिला हों या पुरुष।

न्याय का अर्थ किसी एक पक्ष का साथ देना नहीं, बल्कि सत्य और साक्ष्यों के आधार पर निष्पक्ष निर्णय करना है






सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फैसला सुनाते हुए कहा है कि संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मिलने वाला निजता का अधिकार इतना व्यापक ...
05/07/2026

सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फैसला सुनाते हुए कहा है कि संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मिलने वाला निजता का अधिकार इतना व्यापक नहीं है कि उसका इस्तेमाल पति या पत्नी से अफेयर के सबूत छिपाने के लिए किया जाए। सर्वोच्च अदालत ने स्पष्ट किया तलाक के मामलों में यदि व्यभिचार साबित करने के लिए मोबाइल कॉल रिकॉर्ड या होटल में ठहरने का रिकॉर्ड जरूर हो, तो सिर्फ निजता का हवाला देकर इन दस्तावेजों को अदालत में पेश होने से नहीं रोका जा सकता है।

शुक्रवार को जस्टिस मनमोहन और जस्टिस के विनोद चंद्रन की बेंच ने सुनवाई करते हुए कहा, दिल्ली हाई कोर्ट के उस फैसले को सही ठहराया और पति की अपील को खारिज कर दिया। पति ने तर्क दिया था कि उसके रिकॉर्ड और होटल में ठहरने की जानकारी अदालत में मंगाना उसके मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है।

"BJP मुर्दाबाद" कहने पर जिला बदर? — जज ने कहा: नागरिक गुलाम नहीं हैंआज बॉम्बे हाईकोर्ट में कुछ असाधारण हुआ।एक जज ने वह क...
04/07/2026

"BJP मुर्दाबाद" कहने पर जिला बदर? — जज ने कहा: नागरिक गुलाम नहीं हैं

आज बॉम्बे हाईकोर्ट में कुछ असाधारण हुआ।

एक जज ने वह कहा — जो शायद ही कभी किसी अदालत ने इतनी साफगोई से कहा हो।

जस्टिस माधव जामदार ने कहा — "नागरिकों को भारत सरकार का गुलाम बनाया जा रहा है। वे प्रदर्शन नहीं कर सकते, आंदोलन नहीं कर सकते — यह क्या है?"

मामला क्या था

Socialist Democratic Party of India के महासचिव सईद अहमद अब्दुल वहीद चौधरी CAA और ज्ञानवापी विवाद के खिलाफ मोर्चे और धरने आयोजित कर रहे थे।

मुंबई पुलिस ने उन्हें एक साल के लिए जिला बदर कर दिया — पांच FIR के आधार पर जो ज़्यादातर सरकार विरोधी प्रदर्शनों के लिए थीं।

जस्टिस जामदार ने यह आदेश देखा।

और आगबबूला हो गए।

जज ने जो कहा — वह इतिहास में दर्ज होगा

"याचिकाकर्ता ने तो सिर्फ 'BJP Government Murdabad', 'Amit Shah Murdabad' जैसे नारे लगाए। नागरिक ऐसे नारे क्यों नहीं लगा सकते? ऐसे नारों के लिए जिला बदर आदेश क्यों?"

"पुलिस मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री की सेवक नहीं है — वे जनसेवक हैं। मैं आपके अधिकारियों पर भारी जुर्माना लगाऊंगा।"

"अगर लोग विरोध करें तो आप केस थोप देंगे — यह क्या है? नागरिकों का प्रदर्शन करना उनका अधिकार है।"

और फिर — "वॉशिंग मशीन" वाली टिप्पणी

जस्टिस जामदार ने महाराष्ट्र की राजनीति में चल रहे "horse-trading" पर भी टिप्पणी की।

उन्होंने कहा — "एक 10 साल के बच्चे की दुर्घटना में मौत हो गई और राज्य विधानसभा में चर्चा हो रही थी कि Presiding Officer कैसे चुना जाए और वह एक पार्टी से दूसरी पार्टी में कैसे shift हो गया। पूरे महाराष्ट्र में horse-trading चल रही है — केस बदलने पर विचार करें, वॉशिंग मशीन है।"

फैसला

जस्टिस जामदार ने अपने आदेश में लिखा — "सरकार के फैसलों का विरोध करने और उसके खिलाफ नारे लगाने मात्र से किसी नागरिक को जिला बदर नहीं किया जा सकता। यह कार्रवाई दुर्भावनापूर्ण है और संविधान के अनुच्छेद 19 और 21 के तहत मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है।"

जिला बदर आदेश रद्द।

यह फैसला इतना बड़ा क्यों है

आज के भारत में —

जहाँ असहमति को देशद्रोह कहा जाता है।

जहाँ विरोध प्रदर्शन पर UAPA लगाया जाता है।

जहाँ "BJP मुर्दाबाद" कहने पर जिला बदर किया जाता है।

एक जज ने खड़े होकर कहा — नागरिक गुलाम नहीं हैं।

पुलिस प्रधानमंत्री की नौकर नहीं है।

विरोध करना — अधिकार है।

यह फैसला नज़ीर है।

इसे शेयर करें।

क्योंकि जब अदालतें जागती हैं —

तो लोकतंत्र सांस लेता है।





इलाहाबाद हाईकोर्ट का कहना है कि संकट के दौरान पत्नी को मायके का सहारा मिलना, पति को उसके गुजारा भत्ता देने के दायित्व से...
03/07/2026

इलाहाबाद हाईकोर्ट का कहना है कि संकट के दौरान पत्नी को मायके का सहारा मिलना, पति को उसके गुजारा भत्ता देने के दायित्व से मुक्त नहीं कर सकता। अदालत ने बुलंदशहर की परिवार अदालत के निर्णय के खिलाफ पत्नी और उसके दो नाबालिग बच्चों की ओर से दायर की गई आपराधिक पुनरीक्षण याचिका स्वीकार कर ली है। इससे पहले परिवार अदालत ने दिसंबर 2023 में पत्नी के गुजारा भत्ता दावे को खारिज कर दिया था। साथ ही हर बच्चे को प्रति माह 3,000 रुपये गुजारा भत्ता देने का आदेश दिया था। इस पूरे मामले की गंभीरता को देखते हुए न्यायमूर्ति गरिमा प्रसाद ने कहा कि पत्नी को भारतीय दंड संहिता की धारा 125 के तहत अपने पति से गुजारा भत्ता पाने से केवल इसलिए मना नहीं किया जा सकता, क्योंकि संकट के दौरान पत्नी के माता पिता उसकी मदद करते हैं। इतना ही नहीं अदालत ने साफ किया कि पत्नी के माता-पिता की आय को पत्नी की आय नहीं माना जा सकता। मायके की सहायता, पति की ओर से पत्नी को प्रदान किए जाने वाले गुजारा भत्ता के कानूनी दायित्व का विकल्प नहीं है।

पति ने मांगा पत्नी के फोन का पासवर्ड — हाईकोर्ट ने कह दिया, ये घरेलू हिंसा है!छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने एक अहम फैसले में कह...
03/07/2026

पति ने मांगा पत्नी के फोन का पासवर्ड — हाईकोर्ट ने कह दिया, ये घरेलू हिंसा है!

छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने एक अहम फैसले में कहा कि पति अपनी पत्नी को मोबाइल फोन या बैंक खाते का पासवर्ड शेयर करने के लिए मजबूर नहीं कर सकता। ऐसा करना पत्नी की निजता का उल्लंघन और घरेलू हिंसा का कृत्य माना जाएगा।

जस्टिस राकेश मोहन पांडे ने कहा — शादी पति को पत्नी की निजी जानकारी, संचार और व्यक्तिगत सामान तक अपने आप पहुंच नहीं देती। भले ही पति-पत्नी साथ जिंदगी बिताते हों, फिर भी दोनों का निजता का अधिकार बरकरार रहता है।

मामला था — पति ने क्रूरता के आधार पर तलाक की अर्जी दी थी और पत्नी के चरित्र पर शक जताते हुए एसएसपी से उसकी कॉल डिटेल रिकॉर्ड मांगी थी। फैमिली कोर्ट ने पहले ही उसकी याचिका खारिज कर दी थी।

हाई कोर्ट ने फैमिली कोर्ट के फैसले को बरकरार रखते हुए सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक पुट्टस्वामी फैसले का हवाला दिया — निजता का अधिकार एक मौलिक अधिकार है, चाहे रिश्ता वैवाहिक ही क्यों न हो।

क्या तलाक का केस शुरू होते ही हर कोई खुद को बेरोजगार बताने लगता है? सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान ऐसी ही एक अहम टिप्प...
02/07/2026

क्या तलाक का केस शुरू होते ही हर कोई खुद को बेरोजगार बताने लगता है? सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान ऐसी ही एक अहम टिप्पणी की।

तलाक के एक मामले में पत्नी ने क्रूरता और परित्याग के आधार पर तलाक की मांग की थी। सुनवाई के दौरान पति ने अदालत को बताया कि वह अब नौकरी नहीं करता और फ्रीलांसर है।

इस पर सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी की कि "तलाक की कार्यवाही शुरू होते ही हर कोई बेरोजगार हो जाता है। कभी पति नौकरी छोड़ देता है, तो कभी पत्नी कहती है कि उसने इस्तीफा दे दिया।

अदालत ने यह भी कहा कि यदि व्यभिचार का आरोप लगाया जाए और वह साबित न हो, तो परिस्थितियों के अनुसार ऐसा झूठा आरोप स्वयं मानसिक क्रूरता का आधार बन सकता है।

सुनवाई के दौरान पत्नी ने स्थायी एलिमनी की मांग नहीं की थी। इसके बावजूद सुप्रीम कोर्ट ने मामले के तथ्यों को देखते हुए पति को ₹50 लाख एकमुश्त स्थायी एलिमनी (Permanent Alimony) देने का आदेश दिया।

⚖️ सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला — एक बार Full & Final Settlement के बाद दोबारा Maintenance नहीं!
30/06/2026

⚖️ सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला — एक बार Full & Final Settlement के बाद दोबारा Maintenance नहीं!





WhatsApp या Email से पुलिस का नोटिस भेजना मान्य नहीं!-सुप्रीम कोर्ट
29/06/2026

WhatsApp या Email से पुलिस का नोटिस भेजना मान्य नहीं!
-सुप्रीम कोर्ट





"सुप्रीम कोर्ट ने Nikhat Parveen @ Khusboo Khatoon बनाम Rafique @ Shillu (Criminal Appeal arising out of SLP (Crl.) No. ...
28/06/2026

"सुप्रीम कोर्ट ने Nikhat Parveen @ Khusboo Khatoon बनाम Rafique @ Shillu (Criminal Appeal arising out of SLP (Crl.) No. 15256 of 2023) में महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है।"

"मामले में महिला ने अपनी बेटी के भरण-पोषण की मांग करते हुए अदालत का दरवाजा खटखटाया। लेकिन जब डीएनए टेस्ट कराया गया, तो रिपोर्ट में संबंधित व्यक्ति बच्ची का जैविक पिता नहीं निकला।"

"सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जब डीएनए टेस्ट से पितृत्व ही साबित नहीं हुआ, तो उस व्यक्ति को बच्चे का भरण-पोषण देने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता।"
"इसी आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले को बरकरार रखते हुए महिला की अपील खारिज कर दी।"

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