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सुप्रीम कोर्ट ने किशोरों के आपसी सहमति से बने रिश्तों में पॉक्सो एक्ट (POCSO Act) के गलत इस्तेमाल पर गंभीर चिंता जताई है...
03/08/2026

सुप्रीम कोर्ट ने किशोरों के आपसी सहमति से बने रिश्तों में पॉक्सो एक्ट (POCSO Act) के गलत इस्तेमाल पर गंभीर चिंता जताई है। जस्टिस बीवी नागरथना और जस्टिस आर महादेवन की बेंच ने कहा कि जब टीनेज लड़कियां अपने पार्टनर्स के साथ परिवार वालों के बिना अनुमति के शादी करने लेतीं हैं, तो माता-पिता अक्सर अपनी तथाकथित 'इज्जत' बचाने के लिए आपराधिक मामले दर्ज करा देते हैं।

सर्वोच्च न्यायालय ने सख्त लहजे में सवाल किया कि कोई राज्य किसी लड़के और लड़की को भागने से कैसे रोक सकता है? पॉक्सो एक्ट बच्चों के साथ यौन उत्पीड़न और शोषण को रोकने के लिए है। 15 से 18 साल की उम्र एक संवेदनशील उम्र होती है, क्या ऐसे मामलों को सच में पॉक्सो के तहत लाना सही है?

बता दें कि यह सुनवाई किशोरों के 'निजता के अधिकार' को लेकर कोर्ट द्वारा खुद शुरू किए गए (Suo Motu) एक मामले पर हो रही थी। दरअसल, कुछ समय पहले कलकत्ता हाई कोर्ट ने एक विवादित टिप्पणी करते हुए कहा था कि किशोर लड़कियों को रिश्तों में पड़ने के बजाय अपनी इच्छाओं पर काबू रखना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने बाद में हाई कोर्ट के इस फैसले को खारिज कर दिया था।

सुनवाई के दौरान वरिष्ठ वकील माधवी दीवान ने कोर्ट को बताया कि जिस मामले की वजह से कलकत्ता हाई कोर्ट ने वह टिप्पणी की थी, उसमें एक नाबालिग लड़की 25 साल के व्यक्ति के साथ भागगर शादी कर ली थी। वह लड़की अब उस व्यक्ति के साथ पत्नी की तरह खुशी-खुशी रह रही है और उनका एक बच्चा भी है।

वहीं सोशल वर्कर्स की एक कमेटी ने रिपोर्ट दी है कि ऐसे मामलों में हमारा सिस्टम पूरी तरह फेल साबित हो रहा है, क्योंकि 17-18 साल के लड़कों को जेल भेज दिया जाता है।

मामले में कोर्ट ने आगे कहा कि 16 से 18 साल के किशोर आपस में रिश्ता बनाकर चले जाते हैं। माता-पिता कानूनी कार्रवाई का सहारा लेते हैं, लेकिन आखिर में हमें उन्हें बरी ही करना पड़ता है।

बता दें कि साल 2012 में सहमति से संबंध बनाने की उम्र 16 से बढ़ाकर 18 साल की गई थी। मामले में इस बात को आधार बनाते हुए कोर्ट ने कहा कि ऐसा नहीं है कि यह बदलाव 2012 के बाद आया है, यह पहले भी बाल विवाह की तरह होता था। लेकिन उम्र 18 साल तय होने से अब यह गैरकानूनी हो जाता है। मामले में अदालत ने साफ किया कि ऐसे मामलों में सरकार और कोर्ट के निर्देश व्यावहारिक होने चाहिए ताकि किसी का भविष्य बर्बाद न हो।











क्लोजर रिपोर्ट दाखिल होने पर मजिस्ट्रेट पुलिस को चार्जशीट दाखिल करने का निर्देश नहीं दे सकते:-              सुप्रीम कोर्...
30/07/2026

क्लोजर रिपोर्ट दाखिल होने पर मजिस्ट्रेट पुलिस को चार्जशीट दाखिल करने का निर्देश नहीं दे सकते:-
सुप्रीम कोर्ट










बिलासपुर: विवाह के बाद अगर किसी शादीशुदा महिला का दूसरे मर्द से अवैध संबंध है, तो वह पति की जेब से गुजारा भत्ता वसूलने क...
26/07/2026

बिलासपुर: विवाह के बाद अगर किसी शादीशुदा महिला का दूसरे मर्द से अवैध संबंध है, तो वह पति की जेब से गुजारा भत्ता वसूलने का हक खो देगी। छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने एक ऐसे ही मामले में साफ कह दिया है कि धोखेबाज पत्नी को पति से गुजारा भत्ता पाने का कोई कानूनी अधिकार नहीं है।

यह कड़ा फैसला उन पतियों के लिए एक बड़ी राहत बनकर आया है, जिन्हें पत्नियों की बेवफाई के बाद भी अदालतों के चक्कर काटकर हर महीने अपनी गाढ़ी कमाई लुटाने के लिए मजबूर होना पड़ता था।

शादी के 8 महीने बाद ही दोनों एक-दूसरे से अलग हो गए हाई कोर्ट ने जशपुर की रहने वाली एक महिला और रायपुर के रहने वाले युवक के मामले में यह फैसला सुनाया है। इन दोनों की शादी 19 अप्रैल 2018 को पूरे हिंदू रीति-रिवाज से बड़ी धूमधाम के साथ हुई थी। लेकिन शादी के कुछ दिन बाद ही दोनों के बीच रोज-रोज के झगड़े और मनमुटाव शुरू हो गए। नतीजा यह हुआ कि शादी के महज 8 महीने बाद ही दोनों एक-दूसरे से अलग हो गए।

अलग होने के बाद जब मामला कोर्ट की चौखट पर पहुंचा, तो पत्नी ने पति और उसके परिवार वालों पर प्रताड़ना का आरोप लगाते हुए भारी-भरकम गुजारे भत्ते की मांग ठोक दी। अदालत में खुद को बेकसूर साबित करने के लिए महिला ने रो-रोकर कई गंभीर आरोप लगाए।

उसका कहना था कि उसका पति उसके चरित्र पर हमेशा शक करता रहता था और जब भी वह मोबाइल पर किसी से बात करती थी, तो उसे शारीरिक और मानसिक रूप से प्रताड़ित किया जाता था।
कोर्ट से हर महीने खर्चा बांधने की गुहार लगा रही थी।

महिला ने यह भी आरोप लगाया था कि 3 लाख रुपये दहेज की मांग को लेकर उसे इस कदर परेशान किया गया कि उसने तंग आकर गांव के एक तालाब में कूदकर खुदकुशी करने की कोशिश की थी, लेकिन ऐन वक्त पर ग्रामीणों ने उसे देख लिया और उसकी जान बचाई। महिला इन सभी दुखों का हवाला देकर कोर्ट से हर महीने खर्चा बांधने की गुहार लगा रही थी।

कहानी में असली ट्विस्ट तब आया जब पति ने कोर्ट के सामने पत्नी के अफेयर का कच्चा चिट्ठा खोलकर रख दिया। जब पति ने पत्नी की बेवफाई और उसके अवैध संबंधों को साबित करने वाले सबूत अदालत के सामने पेश किए, तो पत्नी की तरफ से उन सबूतों को झूठा बताने के लिए एक बेहद चौंकाने वाला दावा किया गया।

महिला के वकील ने अदालत में दलील दी कि रायपुर फैमिली कोर्ट ने जिस कथित ऑडियो रिकॉर्डिंग और बातचीत के लिखित ट्रांसक्रिप्ट को मुख्य आधार बनाकर महिला को धोखेबाजी का दोषी माना है, वह पूरी तरह से फर्जी और अवैध है।

महिला का सीधा आरोप था कि उसके पति ने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस टूल का इस्तेमाल करके उसकी नकली आवाज तैयार की है। महिला ने दावा किया कि इस डिजिटल सबूत के साथ बड़ी चालाकी से छेड़छाड़ की गई है, जिसके बाद कोर्ट के आदेश पर इस पूरे डिजिटल साक्ष्य की बाकायदा वैज्ञानिक जांच भी कराई गई।

आखिरकार, यह पूरी कानूनी लड़ाई बिलासपुर हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा की सिंगल बेंच के सामने पहुंची। कोर्ट ने दोनों पक्षों के वकीलों की तीखी दलीलें सुनीं, निचली अदालत के सारे रिकॉर्ड्स खंगाले और मामले से जुड़े सभी वैज्ञानिक व डिजिटल सबूतों की बारीकी से जांच की।

इसके बाद हाई कोर्ट ने साफ कह दिया कि रायपुर फैमिली कोर्ट के फैसले में कोई गलती नहीं है और पत्नी के खिलाफ मिले सबूत बिल्कुल पुख्ता हैं। अदालत ने दो टूक शब्दों में बड़ा फैसला सुनाते हुए साफ किया कि अगर कोई पत्नी अपनी मर्जी से व्यभिचार में रह रही है और दूसरे मर्द से संबंध रखती है, तो कानून के मुताबिक वह अपने पति से किसी भी तरह की वित्तीय सहायता या गुजारा भत्ता नहीं मांग सकती।

हाई कोर्ट के इस आदेश के बाद महिला की पुनर्विचार याचिका खारिज हो गई और पीड़ित पति को इस प्रताड़ना से मुक्ति मिल गई।

सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम 1956 की धारा 22 के तहत मिलने वाला प्रा...
25/07/2026

सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम 1956 की धारा 22 के तहत मिलने वाला प्राथमिकता का अधिकार यानी पहले खरीदने का हक, कृषि भूमि यानी खेती की जमीन पर भी लागू होगा।

अदालत ने कहा है कि हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 22 जो क्लास वन उत्तराधिकारियों को किसी अन्य सह उत्तराधिकारी द्वारा ट्रांसफर की जाने वाली संपत्ति खरीदने की प्राथमिकता देने वाला अधिकार देती है, कृषि भूमि पर भी समान रूप से लागू होती है।

इसका मतलब है कि अगर परिवार में किसी सदस्य को विरासत में जमीन मिली है और वो अपने हिस्से को किसी बाहरी व्यक्ति को बेचना चाहता है तो उसे पहले अपने ही परिवार के अन्य क्लास वन उत्तराधिकारियों को मौका देना होगा।

हिंदुओं के पैतृक संपत्ति के अधिकार पर असर डालने वाला यह दूरगामी प्रभाव वाला फैसला न्यायमूर्ति संजय करोल और एन. कोटीश्वर सिंह ने महिंदर तथा अन्य बनाम पूरन सिंह मामले में सुनाया है।

कोर्ट ने महिंदर की अपील खारिज करते हुए पहली अपीलीय अदालत और हाई कोर्ट के फैसले को सही ठहराया है जिसने माना था कि धारा 22 कृषि भूमि पर भी लागू होगी।

इस मामले में याचिकाकर्ता और प्रतिवादी भाई-भाई थे जिन्होंने क्लास वन उत्तराधिकारियों की हैसियत से पिता की कृषि भूमि विरासत में पाई थी।

इनमें से कुछ उत्तराधिकारियों ने विरासत में मिली अपने हिस्से की कृषि भूमि मिल कर 28 दिसंबर 2011 को तीसरे पक्ष यानी श्रीमती पूनम को बेच दी।

लेकिन परिवार के एक अन्य सदस्य ने इसका विरोध किया और हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम 1956 की धारा 22 का आधार लेते हुए सिविल कोर्ट में वाद दायर कर बिक्री को चुनौती दे दी।

उसका कहना था कि धारा 22 के तहत उसे पहले खरीदने का अधिकार है। यानी बाहर वाले को बेचने से पहले परिवार को मौका मिलना चाहिए। सिविल कोर्ट ने यह कहते हुए वाद खारिज कर दिया कि कृषि भूमि पर ऐसा अधिकार लागू नहीं होता।

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पीड़िता की जांघों के बीच पुरुष यौनांग को रगड़कर वीर्यपात करना रेप नहीं, बल्कि रेप का प्रयत्न  हैः जम्मू-कश्मीर हाई कोर्ट...
24/07/2026

पीड़िता की जांघों के बीच पुरुष यौनांग को रगड़कर वीर्यपात करना रेप नहीं, बल्कि रेप का प्रयत्न हैः जम्मू-कश्मीर हाई कोर्ट

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जब भी न्याय प्रणाली में कोई विवाद होता है, तो सबसे पहले अधिवक्ताओं के खिलाफ स्वतः संज्ञान (Suo Motu) लेकर सख्त टिप्पणिया...
24/07/2026

जब भी न्याय प्रणाली में कोई विवाद होता है, तो सबसे पहले अधिवक्ताओं के खिलाफ स्वतः संज्ञान (Suo Motu) लेकर सख्त टिप्पणियां और आदेश जारी कर दिए जाते हैं। वकील न्याय प्रणाली का हिस्सा हैं, अगर वो गलत करेंगे तो उन पर कार्रवाई होनी ही चाहिए, इसमें कोई दो राय नहीं है।
​लेकिन बड़ा सवाल यह है कि जवाबदेही का यह सिद्धांत सिर्फ वकीलों या आम जनता पर ही क्यों लागू होता है?
​निचली अदालत से लेकर ऊपरी अदालत तक आज जो परिस्थितियां दिख रही हैं, वो आम आदमी के भरोसे को तोड़ती हैं, न्यायिक भ्रष्टाचार: कोर्ट परिसर में बिचौलियों का हस्तक्षेप और कथित भ्रष्टाचार की शिकायतें आम हैं, लेकिन उन पर उस तत्परता से स्वतः संज्ञान क्यों नहीं लिया जाता? भाई-भतीजावाद (Nepotism): न्यायपालिका में 'अंकल जज सिंड्रोम' और रसूखदारों को मिलने वाली प्राथमिकता पर कब तक पर्दा डाला जाएगा? कार्रवाई में दोहरा मापदंड: एक आम नागरिक या वकील पर तुरंत FIR हो जाती है, लेकिन न्यायिक तंत्र के भीतर बैठे लोगों पर कार्रवाई की प्रक्रिया को 'न्यायिक स्वतंत्रता' के नाम पर इतना जटिल क्यों बना दिया गया है?
​हमारा स्पष्ट मानना है:
​"न्यायिक स्वतंत्रता (Judicial Independence) का मतलब निष्पक्ष होकर फैसला सुनाना है, इसका मतलब भ्रष्टाचार या जवाबदेही से 'आजादी' (Immunity) पाना नहीं हो सकता!"
​संविधान के अनुच्छेद 14 के तहत कानून के सामने हर संस्था, हर पद और हर व्यक्ति समान होना चाहिए। न्याय व्यवस्था में जनता का विश्वास तभी बहाल होगा, जब स्वतः संज्ञान भी निष्पक्ष दिखेगा और जवाबदेही भी सबके लिए बराबर तय होगी।
​आप इस विषय पर क्या सोचते हैं? अपनी राय कमेंट में जरूर दें।

21/07/2026

#लोकतंत्र : वीडियो रिकॉर्ड करने वाले को तोपों को सलामी..मैं इन सब नकारों को पहले से पहचानता हूं..बस देश के युवा ही नमूनों के पीछे पागल हैं..ये सब कालनेमी हैं..इन सबको नीट नहीं सीट से मतलब है.
इसे खूब गालियां भी मिली उन्हें mute कर दिया है...



















 #लोकतंत्र : @देश की दयनीय स्थिति:ना वांगचुक घायल हुआ, ना दीपके, ना दहिया, ना सौरभ ना नेहा, ना जुनैद ना स्वरा ,ना योगेंद...
21/07/2026

#लोकतंत्र : @देश की दयनीय स्थिति:
ना वांगचुक घायल हुआ, ना दीपके, ना दहिया, ना सौरभ
ना नेहा, ना जुनैद
ना स्वरा ,ना योगेंद्र यादव ,ना प्रशांत भूषण, ना प्रकाश राज
धार्मिक नारे लगाने वाली' औरत
ना सीता माता को गाली देने वाला कामरा
ना केजरीवाल ना सिसोदिया
कोई नहीं पीटा गया
सब एसी कमरे में बैठ कर जंतर मंतर का सीधा प्रसारण देख रहे थे पीटे गए आम आदमी के बच्चे, नौजवान और साधारण घरों से आए पुलिसकर्मी
यही है आजकल की असली क्रान्ति और खांटी वामपंथ, लाल सलाम..
इन दोनों तस्वीरों को ध्यान से देखिए। इनमें एक संदेश छिपा है! आंदोलन की अगुवाई करने वाले, मंत्री के डाइनिंग रूम में ज्ञापन देते हुए मंत्री जी के साथ फोटो खिंचवा रहे हैं!

दूसरी तरफ मासूम बच्चों को पुलिस सड़कों पर दौड़ा दौड़ा कर मार रही है। बच्चे लहूलुहान हैं।

ज्ञापन देने के लिए आंदोलन और अनशन कौन करता है? यही करना था तो पहले ही कर लिए होते! यह तो बहुत आसान काम था। ऐसे भी नड्डा जी न शिक्षा मंत्री हैं और ना ही प्रधानमंत्री! उनको ज्ञापन देने का क्या मतलब ?

इसलिए मैं कहता हूं कि मासूम बच्चों के साथ धोखा हुआ है!
देश को जलाने की साजिश हो रही हैं और हम इसे क्रांति समझ रहे हैं...देश की आम जनता कब तक मूर्ख बनती रहेगी..यहां पक्ष विपक्ष सब कालनेमी हैं..चेहरों से ऊपर उठें पहले सही नेतृत्व वाला व्यक्ति चुनें 🙏

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि गाली-गलौज या अभद्र भाषा का इस्तेमाल करना हमेशा अश्लीलता के दायरे में नहीं आता है। शुक...
20/07/2026

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि गाली-गलौज या अभद्र भाषा का इस्तेमाल करना हमेशा अश्लीलता के दायरे में नहीं आता है। शुक्रवार को जस्टिस संजय करोल और जस्टिस विपुल एम पंचोली की बेंच ने कहा कि कोई शब्द तभी अश्लील माना जाएगा, जब वह कामुकता को बढ़ावा देने वाला हो या लोगों को भ्रष्ट करने की प्रवृत्ति रखता हो।

कोर्ट ने यह टिप्पणी तमिलनाडु के एक मामले में सुनवाई के दौरान की। आरोपी मणि को जमीन विवाद के दौरान मां की गाली देने के लिए अश्लीलता के आरोप में दोषी ठहराया गया था।
अगस्त 2017 में जमीन विवाद को लेकर आरोपी ने शिकायतकर्ता के साथ गाली-गलौज की थी। पीड़ित का आरोप था कि आरोपी ने जातिसूचक शब्दों भी कहे। बाद में घर से हथियार लाकर हमला कर दिया, जिससे उसकी नाक की हड्डी टूट गई थी।

निचली अदालत ने उसे अश्लीलता, गंभीर चोट और धमकी के लिए दोषी माना था।

सुप्रीम कोर्ट ने अश्लीलता और आपराधिक धमकी (IPC की धारा 506) के आरोपों से आरोपी को बरी कर दिया। कोर्ट ने कहा कि गाली देने से किसी को परेशानी हुई, यह साबित नहीं हुआ। हालांकि, शिकायतकर्ता को गंभीर चोट पहुंचाने (IPC की धारा 326) के मामले में उसकी सजा बरकरार रखी गई है।

आरोपी की उम्र करीब 70 साल होने और स्वास्थ्य स्थितियों को देखते हुए कोर्ट ने उसकी सजा को घटाकर 'कोर्ट उठने तक की कैद' कर दिया है। साथ ही, उसे 2 महीने के भीतर 50,000 रुपए का जुर्माना भरने का निर्देश दिया गया है।

10 जुलाई को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान एक वकील ने हंगामा किया। सीजेआई सूर्यकांत को अपशब्द कहे और फाइल भी फेंकी। इस दौरान सीजेआई कोर्ट रूम में मौजूद नहीं थे।

यह घटना जस्टिस केवी विश्वनाथन, जस्टिस आलोक अराधे की बेंच के सामने हुई। हंगामे के बाद कोर्ट के आदेश पर सिक्योरिटी ने वकील को तुरंत बाहर निकाल दिया।

जब उस याचिकाकर्ता वकील ने अभद्रता शुरू की, तब कोर्ट रूम में कुछ देर के लिए सन्नाटा छा गया। दिल्ली पुलिस वकील को पूछताछ के लिए ले गई है।


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पहले पतियों को केवल कमाने घर चलाने को चिंता होती थी लेकिन अब उन्हें पत्नी से अपनी जान बचाने की भी चिंता होती हैं..मेरठ क...
19/07/2026

पहले पतियों को केवल कमाने घर चलाने को चिंता होती थी लेकिन अब उन्हें पत्नी से अपनी जान बचाने की भी चिंता होती हैं..

मेरठ की दामिनी ने प्रेमी तुषार को 15 हजार देकर जहरीला सांप मंगवाया था. दावा है कि 3 दिन तक दामिनी ने सांप को भूखा रखा गया. फिर अतुल को दूध में नशीली गोलियां मिलाकर खिला दी. और बिस्तर पर सांप छोड़ दिया. जिसके बाद सांप ने काट लिया और अतुल की मौत हो गई.

पुलिस ने बताया कि हत्या के बाद कमरे में सांप छोड़कर हादसा दिखाने की कोशिश की गई. इसके बाद आरोपी पत्नी घटना के बाद शव के पास बैठकर रोती रही.

अपने की स्कूल के बस ड्राइवर से थी मोहब्बत! मेरठ की दामिनी ने 20 लाख का बीमा लेने पति अतुल पंवार को सांप से कटवाकर मार डाला,

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