Law updates with Rishi Mishra

Law updates with Rishi Mishra there are available all updates related to Legal Development and creativity through legal statutory and coditied systems

08/05/2026

*उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम के तहत मेडिकल लापरवाही के लिए डॉक्टर के कानूनी वारिस भी जवाबदेह: सुप्रीम कोर्ट*

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार (4 मई) को फैसला सुनाया कि किसी डॉक्टर की मृत्यु होने पर उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम के तहत चल रही कार्यवाही में उसके कानूनी वारिसों को उसकी जगह शामिल किया जा सकता है। हालांकि, डॉक्टर की कथित लापरवाही से होने वाले नुकसान के लिए मुआवजे की उनकी जवाबदेही, मृतक से विरासत में मिली संपत्ति तक ही सीमित होगी।

जस्टिस जे.के. माहेश्वरी और जस्टिस अतुल एस. चांदुरकर की बेंच ने कहा,

"पिछली चर्चा और 1986 के अधिनियम के साथ-साथ 2019 के अधिनियम में दिए गए कानूनी ढांचे को देखते हुए हम इस निष्कर्ष पर पहुंचते हैं कि कथित तौर पर मेडिकल लापरवाही करने वाले डॉक्टर की मृत्यु होने पर उसके कानूनी वारिसों को कार्यवाही में पक्षकार बनाया जा सकता है और रिकॉर्ड में शामिल किया जा सकता है।"

बेंच ने यह टिप्पणी करते हुए NCDRC के इस निष्कर्ष को मंज़ूरी दी कि "कार्यवाही पूरी होने पर कानूनी वारिसों की यह जवाबदेही होगी कि वे मृतक द्वारा छोड़ी गई संपत्ति में से, जितना भुगतान संभव हो, उतना भुगतान करके अदालत के आदेश (डिक्री) में तय की गई राशि का भुगतान करें।"

अदालत ने NCDRC के जिस फैसले में तय किए गए कानून से असहमति जताई, वह मामला 'बलबीर सिंह मकोल बनाम चेयरमैन, सर गंगा राम हॉस्पिटल और अन्य, 2001 (1) CPR 45' था। इस फैसले में यह माना गया कि डॉक्टर की मृत्यु होने पर उसके खिलाफ किए गए सभी दावे समाप्त हो जाते हैं—जिनमें डॉक्टर की लापरवाही से मरीज़ को हुए आर्थिक नुकसान के दावे भी शामिल थे। इसके विपरीत, अदालत ने फैसला सुनाया कि भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 306 के तहत डॉक्टर की मृत्यु के बाद भी आर्थिक नुकसान के दावे बने रहेंगे। इन दावों का निपटारा डॉक्टर के कानूनी वारिसों को विरासत में मिली संपत्ति में से उनके हिस्से के अनुसार किया जा सकता है।

भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 306 में यह प्रावधान है कि किसी व्यक्ति की मृत्यु के समय उसके पक्ष में किसी भी प्रकार की कानूनी कार्रवाई या विशेष कार्यवाही को आगे बढ़ाने के जितने भी अधिकार मौजूद होते हैं, वे सभी अधिकार उसकी संपत्ति के निष्पादकों (Executors) या प्रशासकों (Administrators) को हस्तांतरित हो जाते हैं। सिवाय उन मामलों के, जिनमें कार्रवाई का आधार (Cause of Action) केवल व्यक्तिगत चोटें हों और उन चोटों के कारण संबंधित पक्ष की मृत्यु न हुई हो।

*मामले की पृष्ठभूमि*

यह विवाद उपभोक्ता मंचों के समक्ष डॉक्टर के खिलाफ दायर की गई मेडिकल लापरवाही की शिकायत से उत्पन्न हुआ था। शिकायत में यह आरोप लगाया गया कि मेडिकल सेवाओं में कमी थी और मरीज़ को हुई क्षति के लिए मुआवजे की मांग की गई।

राज्य उपभोक्ता आयोग ने डॉक्टर के पक्ष में फैसला सुनाया। इस फैसले से असंतुष्ट होकर मरीज़ (शिकायतकर्ता) ने राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग (NCDRC) के समक्ष पुनर्विचार याचिका (Revision Petition) दायर करके इस फैसले को चुनौती दी। रिवीजन की कार्यवाही के दौरान, डॉक्टर का निधन हो गया। इसके परिणामस्वरूप, NCDRC के समक्ष एक अर्जी दायर की गई, जिसमें मृतक डॉक्टर के स्थान पर उनके कानूनी वारिसों—उनकी पत्नी और बेटे—को पक्षकार बनाने की मांग की गई।

कानूनी वारिसों ने उन्हें पक्षकार बनाए जाने का विरोध करते हुए यह तर्क दिया कि मेडिकल लापरवाही का दावा एक व्यक्तिगत वाद-हेतु (Cause of Action) है। इसलिए डॉक्टर की मृत्यु के बाद यह दावा समाप्त हो जाता है। उन्होंने दलील दी कि 'कॉमन लॉ' के सिद्धांत—actio personalis moritur cm persona (व्यक्ति की मृत्यु के साथ ही उसका व्यक्तिगत वाद-हेतु भी समाप्त हो जाता है)—के आलोक में यह कार्यवाही समाप्त हो जानी चाहिए।

हालांकि, NCDRC ने कानूनी वारिसों को पक्षकार बनाने की अनुमति दी और यह माना कि शिकायत की कार्यवाही जारी रह सकती है। इस निर्णय को चुनौती देते हुए कानूनी वारिसों ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया और यह मुद्दा उठाया कि क्या इस तरह के दावे जीवित रहते हैं और क्या उन्हें चल रही कार्यवाही में पक्षकार बनाया जा सकता है।

निर्णय

NCDRC के निर्णय में हस्तक्षेप करने से इनकार करते हुए जस्टिस माहेश्वरी द्वारा लिखे गए निर्णय में यह व्यवस्था दी गई कि मृतक डॉक्टर के कानूनी वारिसों को लंबित कार्यवाही में पक्षकार बनाया जा सकता है। साथ ही यह भी स्पष्ट किया गया कि उनकी देनदारी (liability) केवल उन्हें विरासत में मिली संपत्ति तक ही सीमित होगी और उन्हें मृतक की संपत्ति से परे व्यक्तिगत रूप से उत्तरदायी नहीं ठहराया जा सकता।

न्यायालय ने निर्देश दिया कि उपभोक्ता मंचों को सबसे पहले यह निर्धारित करना चाहिए कि क्या लापरवाही सिद्ध होती है। उसके बाद संपत्ति-आधारित उन दावों के बीच अंतर करना चाहिए जिनकी वसूली संभव है। उन व्यक्तिगत दावों के बीच अंतर करना चाहिए जो व्यक्ति की मृत्यु के साथ ही समाप्त हो जाते हैं।

न्यायालय ने टिप्पणी की,

"दावेदार का यह कर्तव्य है कि वह सबसे पहले मृतक डॉक्टर की लापरवाही को सिद्ध करे। साथ ही 1925 के अधिनियम की धारा 306 के अनुसार संपत्ति से वसूले जाने योग्य दावों को भी सिद्ध करे।"

यदि यह सिद्ध हो जाता है कि संपत्ति से संबंधित दावों की वसूली मृतक डॉक्टर की संपत्ति से की जा सकती है तो "न्यायालय को केवल उन दावों पर विचार करना चाहिए जो संपत्ति के विरुद्ध सुनवाई योग्य हैं, न कि उन व्यक्तिगत दावों पर निर्णय देना चाहिए, जो डॉक्टर की मृत्यु के साथ ही समाप्त हो चुके हैं।"
ये
कानून के निम्नलिखित सिद्धांत निर्धारित किए गए:-

"i. भारत में कॉमन लॉ का सिद्धांत 'actio personalis moritur cm persona' विभिन्न कानूनी दस्तावेजों, जैसे कि Fatal Accidents' Act of 1855, Legal representatives' Suits Act of 1855, Indian Succession Act of 1925, आदि द्वारा कानूनी रूप से संशोधित किया गया।

ii. कि मृतक का कानूनी प्रतिनिधि Legal Representatives Suits Act, 1855 के प्रावधानों के तहत, या Indian Succession Act, 1925 की धारा 306 के तहत एक नया मुकदमा दायर कर सकता है या उस पर नया मुकदमा चलाया जा सकता है।

iii. मृतक के कानूनी प्रतिनिधि द्वारा या उसके विरुद्ध मुकदमे को जारी रखना Indian Succession Act, 1925 की धारा 306 (मूल कानून) के प्रावधानों के अनुसार होना चाहिए।

iv. CPC के आदेश XXII के तहत प्रक्रियात्मक निर्देश, जो मृतक पक्ष के कानूनी प्रतिनिधि के प्रतिस्थापन से संबंधित हैं, की व्याख्या Indian Succession Act की धारा 306 के साथ सामंजस्यपूर्ण ढंग से की जानी चाहिए।

v. आदेश XXII नियम 2 (नियम 4 के साथ पठित) के तहत 'मुकदमा करने के अधिकार' को जारी रखने की स्थिति को मृत्यु की तारीख के आधार पर देखा जाना चाहिए।

vi. सामान्य तौर पर मुकदमा चलाने के सभी अधिकार और दायित्व Indian Succession Act, 1925 की धारा 306 के तहत कानूनी प्रतिनिधि को हस्तांतरित हो जाते हैं। हालांकि, जब Indian Succession Act, 1925 की धारा 306 के पहले अपवाद के तहत दावों का निर्णय किया जाता है तो व्यक्तिगत चोट के दावे समाप्त हो जाते हैं, जबकि मृतक की संपत्ति के पक्ष में या उसके विरुद्ध किए गए दावे जीवित रहते हैं।"

Cause Title: Kumud Lall VERSUS Suresh Chandra Roy (Dead) Through LRs and Others (with connected matter)

04/05/2026

अगर जांच अधिकारी (IO) गलत विवेचना करके चार्जशीट न्यायालय में भेज देता है, तो आपके पास निम्नलिखित कानूनी विकल्प उपलब्ध हैं:
1. हाई कोर्ट में क्वैशिंग (Quashing) याचिका
अगर जांच पूरी तरह से पक्षपाती या गलत है, तो आप भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 528 (पुराने CrPC की धारा 482) के तहत हाई कोर्ट जा सकते हैं।
उद्देश्य: आप अदालत से चार्जशीट को रद्द करने की मांग कर सकते हैं।
आधार: यदि चार्जशीट में लगाए गए आरोप कानूनन सही नहीं हैं या आपके खिलाफ कोई ठोस सबूत नहीं है।
2. डिस्चार्ज (Discharge) की अर्जी
जब मामला ट्रायल कोर्ट में हो और आरोप (Charges) तय किए जाने वाले हों, तब आप डिस्चार्ज एप्लीकेशन लगा सकते हैं।
इसमें आप जज को यह समझा सकते हैं कि पुलिस द्वारा पेश किए गए साक्ष्य और गवाह आपके खिलाफ मुकदमा चलाने के लिए पर्याप्त नहीं हैं।
3. पुनः जांच या अग्रिम जांच की मांग (Further Investigation)
आप BNSS की धारा 193(9) (पुराने CrPC की धारा 173(8)) के तहत मजिस्ट्रेट के सामने आवेदन दे सकते हैं।
यदि विवेचना में महत्वपूर्ण सबूतों को नजरअंदाज किया गया है, तो कोर्ट पुलिस को 'फरदर इन्वेस्टिगेशन' (आगे की जांच) के आदेश दे सकता है।
4. पुलिस अधिकारी के खिलाफ शिकायत
अगर जांच अधिकारी ने जानबूझकर गलत रिपोर्ट तैयार की है, तो आप उनके खिलाफ वरिष्ठ अधिकारियों से शिकायत कर सकते हैं:
एसएसपी (SSP) या पुलिस कमिश्नर को लिखित शिकायत दें।
यदि भ्रष्टाचार का मामला है, तो विजिलेंस विभाग में शिकायत करें।
झूठे साक्ष्य गढ़ने के लिए पुलिसकर्मी पर BNS की धारा 251 (पुरानी IPC 193) के तहत भी कार्रवाई की मांग की जा सकती है।
5. प्रोटेस्ट पिटीशन (Protest Petition)
यदि आप शिकायतकर्ता (Victim) हैं और पुलिस ने आरोपी को बचाने के लिए गलत या कमजोर चार्जशीट फाइल की है, तो आप मजिस्ट्रेट के सामने प्रोटेस्ट पिटीशन दायर कर सकते हैं।
सुझाव: इन कानूनी प्रक्रियाओं के लिए एक अनुभवी क्रिमिनल वकील से परामर्श जरूर लें, क्योंकि हर मामले के तथ्य अलग होते हैं।

03/05/2026

यदि अभियुक्त के विरुद्ध Chargesheet दाखिल हो चुकी है, सेशन कोर्ट ने Discharge Application खारिज कर दी, और अब मामला धारा 482 CrPC (अब 528 BNSS में समकक्ष inherent jurisdiction) के अंतर्गत हाई कोर्ट में लंबित है, तो हाई कोर्ट में अभियुक्त को राहत दिलाने हेतु निम्न 10 प्रमुख केस लॉ (Supreme Court / High Court) अत्यंत उपयोगी माने जाते हैं। ये विशेषतः तब प्रभावी होते हैं जब आरोप प्रथमदृष्टया नहीं बनते, दुर्भावना हो, साक्ष्य अपर्याप्त हों, या न्यायालय ने यांत्रिक ढंग से आदेश पारित किया हो।

अभियुक्त को लाभ देने वाली 10 मुख्य केस लॉ Citation.

1. State of Haryana v. Bhajan Lal

Citation: 1992 Supp (1) SCC 335

यदि FIR/Chargesheet से कोई अपराध नहीं बनता, मामला दुर्भावनापूर्ण है, या न्यायालय प्रक्रिया का दुरुपयोग हो रहा है, तो हाई कोर्ट 482 में कार्यवाही रद्द कर सकता है।

2. R.P. Kapur v. State of Punjab

Citation: AIR 1960 SC 866

यदि अभियोजन विधिक रूप से टिकाऊ नहीं है, या आरोप absurd हैं, तो proceeding quash की जा सकती है।

3. Pepsi Foods Ltd. v. Special Judicial Magistrate

Citation: (1998) 5 SCC 749

Criminal law को harassment का हथियार नहीं बनाया जा सकता।

4. Amit Kapoor v. Ramesh Chander

Citation: (2012) 9 SCC 460

Charge framing या discharge order judicial mind से होना चाहिए, mechanical order नहीं।

5. Sajjan Kumar v. CBI

Citation: (2010) 9 SCC 368

केवल strong suspicion पर्याप्त नहीं, material judicial scrutiny से गुजरना चाहिए।

6. P. Vijayan v. State of Kerala

Citation: (2010) 2 SCC 398

यदि रिकॉर्ड से grave suspicion नहीं बनता तो discharge होना चाहिए।

7. Dilawar Balu Kurane v. State of Maharashtra

Citation: (2002) 2 SCC 135

यदि दो views संभव हों और evidence कमजोर हो तो discharge होना चाहिए।

8. Madhavrao Jiwajirao Scindia v. Sambhajirao Angre

Citation: (1988) 1 SCC 692

यदि prosecution के सफल होने की संभावना नहीं है, तो proceeding quash की जा सकती है।

9. Neeharika Infrastructure v. State of Maharashtra

Citation: (2021) SCC OnLine SC 315

यद्यपि quashing power सीमित है, पर उचित मामलों में हाई कोर्ट हस्तक्षेप कर सकता है।

10. Zandu Pharmaceutical Works Ltd. v. Mohd. Sharaful Haque

Citation: (2005) 1 SCC 122

जब criminal proceeding mala fide हो तो quash उचित है।

हाई कोर्ट में Practical ग्राउंड्स, यदि आपका मामला 482 में है तो ये 10 तर्क जोड़ें:

1. FIR और Chargesheet पढ़ने पर offence नहीं बनता
2. Essential ingredients absent हैं
3. Civil dispute को criminal colour दिया गया
4. Evidence hearsay है
5. Independent witness नहीं
6. Recovery fabricated है
7. Delay unexplained है
8. Mala fide prosecution है
9. Session Court ने speaking order नहीं दिया
10. Trial abuse of process है

14/04/2026

बैनामा (रजिस्ट्री) निरस्तीकरण का अर्थ है कानूनी प्रक्रिया द्वारा पहले से पंजीकृत विक्रय पत्र को अमान्य घोषित करना। यह विशिष्ट राहत अधिनियम, 1963 की धारा 31 के तहत सिविल कोर्ट में मुकदमा दायर करके किया जाता है, जिसके लिए मुख्यतः धोखाधड़ी, दबाव, या अनैतिक तरीके से रजिस्ट्री कराने जैसे कारण मान्य हैं।

बैनामा निरस्तीकरण के मुख्य नियम और आधार:
मुख्य आधार: रजिस्ट्री कपटपूर्वक (fraud), बालिग न होने पर, बिना सहमति, गलत जानकारी, या बिना प्रतिफल (पैसा दिए) के कराई गई हो।समय सीमा (Limitation): बैनामा निरस्तीकरण का वाद जानकारी होने के 3 वर्ष के भीतर दायर किया जाना चाहिए।

पक्षकार: केवल वही व्यक्ति दावा कर सकता है जिसका नाम खतौनी में हो या जिसे बेनामे से प्रत्यक्ष चोट (हानि) पहुंची हो।प्रक्रिया: एक सिविल सूट (Diwani Suit) के माध्यम से, साक्ष्यों के साथ अदालत में साबित करना होता है कि बैनामा फर्जी है।

आपसी सहमति: यदि दोनों पक्ष सहमत हों, तो आपसी सहमति से भी रजिस्ट्री रद्द करवाई जा सकती है।
अदालती फीस: निरस्तीकरण के मामले में, अक्सर बैनामा के मूल्य के बराबर अदालती फीस (court fee) देनी पड़ती है।
नोट: यह जानकारी सामान्य कानूनी नियमों पर आधारित है। भूमि विवाद के मामलों में स्थानीय वकील से परामर्श करना उचित है।

14/04/2026

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक फैसले में यह स्पष्ट कर दिया है कि यदि किसी व्यक्ति का किसी संपत्ति पर वास्तविक कब्जा (actual possession) है, तो उसे BNSS की धारा 164/165 के तहत बेदखल नहीं किया जा सकता।

केस का शीर्षक (Case Title):
इन्दु टंडन बनाम उत्तर प्रदेश राज्य व अन्य (Indu Tandon v. State Of U.P. Thru. Prin. Secy. Home Lko. And 2 Others (2026)

तथ्य:-
मामले में याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया था कि विपक्षी उसकी जमीन पर अवैध कब्जा करने की कोशिश कर रहा है और उसने जिला प्रशासन के समक्ष शिकायत भी दर्ज कराई। पुलिस ने अपनी रिपोर्ट में कानून-व्यवस्था बिगड़ने की आशंका जताई, जिसके आधार पर सिटी मजिस्ट्रेट ने BNSS की धारा 165 के तहत संबंधित दुकान को अटैच कर दिया। हालांकि, प्रतिवादी ने इस आदेश को पुनरीक्षण में चुनौती दी, जहां अटैचमेंट आदेश को रद्द कर दिया गया। इसके बाद मामला हाईकोर्ट पहुंचा।

हाईकोर्ट ने सुनवाई के दौरान यह पाया कि संबंधित संपत्ति पर वास्तविक कब्जा प्रतिवादी के पास था।
फैसले के मुख्य बिंदु:
➡️वास्तविक कब्जा मायने रखता है: यदि कब्जा स्पष्ट है और कोई व्यक्ति वहां रह रहा है, तो मजिस्ट्रेट सीधे तौर पर पुलिस रिपोर्ट पर कब्जा खाली नहीं करवा सकते।
➡️BNSS 164/165 (पुराना 145/146) का दायरा: यह धारा केवल शांति व्यवस्था बनाए रखने के लिए है, न कि स्वामित्व तय करने के लिए। यदि कब्जा पहले से ही स्थापित है, तो उस पर हस्तक्षेप नहीं किया जा सकता।
➡️ऐसे मामलों में उचित उपाय सिविल अदालत के समक्ष मुकदमा दायर करना है, न कि प्रशासनिक कार्यवाही के माध्यम से बेदखली करना ।

21/02/2026
Major changes from old forms to new। Forms In new income tax act
21/02/2026

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12/02/2026

In Criminal liability:Principal of "Reasonable Doubt":
“It is better that ten guilty persons escape than that one innocent suffer.”
— Blackstone

S. 223 BNSS | Pre-Cognizance Hearing Not Mandatory For S. 138 NI Act Proceedings: J&K&L High Court
24/01/2026

S. 223 BNSS | Pre-Cognizance Hearing Not Mandatory For S. 138 NI Act Proceedings: J&K&L High Court

The Jammu & Kashmir High Court dismissed a petition seeking the quashing of proceedings under Section 138 of the Negotiable Instruments Act, 1881, ruling that the requirement of hearing the accused...

समय सीमा के बाद संज्ञान लेना गलत; 'सद्भावनापूर्ण चूक' और 'सामान्य चलन' मजिस्ट्रेट के लिए कोई बहाना नहीं: इलाहाबाद हाईकोर...
23/01/2026

समय सीमा के बाद संज्ञान लेना गलत; 'सद्भावनापूर्ण चूक' और 'सामान्य चलन' मजिस्ट्रेट के लिए कोई बहाना नहीं: इलाहाबाद हाईकोर्ट

Source: live law

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सोमवार को चोरी के एक मामले में आपराधिक कार्यवाही रद्द की, जिसमें मजिस्ट्रेट ने CrPC की धारा 468 [सम...

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