सौमित्र मिश्र माणिक्य

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सौमित्र मिश्र माणिक्य ⚖️ ADGC (Crime), Kannauj
न्याय | कर्तव्य | सत्य
कानून के माध्यम से समाज सेवा

27/04/2026

1. Case Details
Court: High Court of Judicature at Allahabad, Lucknow Bench
Case Title: Kamal Prasad vs State of U.P.
Case Number: Criminal Appeal No. 694 of 2016
Bench: Hon’ble Rajnish Kumar, J. & Hon’ble Zafeer Ahmad, J.

Trial Court Judgment:
Conviction by Trial Court: Section 302 IPC (Life Imprisonment + Fine ₹10,000)

2. Facts of the Case

The prosecution case arose from an incident dated 19.04.2012 wherein the accused-appellant allegedly assaulted his wife, Indravati, with an axe inside their house, resulting in her death. The FIR was lodged by the son of the deceased, who stated that upon hearing cries, he rushed to the house and saw the accused fleeing while his mother was found dead inside.
The investigation led to recovery of a blood-stained axe from the place of occurrence, and after completion of investigation, a charge sheet under Section 302 IPC was filed. The trial court convicted the accused for murder and sentenced him to life imprisonment. The accused denied the allegations, claiming false implication due to enmity and property disputes.

3. Submissions by Counsel for the Appellant

Learned counsel for the appellant contended that the conviction was unsustainable as the prosecution case suffered from material contradictions between the FIR and the testimonies of key witnesses. It was argued that neither of the witnesses had actually seen the assault, making the case purely circumstantial, and the chain of circumstances was incomplete.

It was further submitted that the medical evidence did not fully corroborate the prosecution story, thereby creating doubt. The witnesses were interested and related, and no independent corroboration was available. It was also argued that important links were missing, making false implication a plausible possibility. On these grounds, acquittal on benefit of doubt was sought.

4. Submissions by Counsel for the State

The learned A.G.A. supported the trial court judgment and argued that the prosecution had successfully proved the case beyond reasonable doubt. It was contended that the testimonies of PW-1 and PW-2 were natural, consistent and trustworthy, and minor discrepancies did not affect the core of the case.
It was further submitted that the ocular evidence was corroborated by medical evidence and recovery of the weapon. The conduct of the accused in fleeing from the spot and failing to explain circumstances under Section 313 Cr.P.C. constituted strong incriminating evidence. The prosecution had established a complete chain of circumstances pointing towards guilt, and hence the appeal deserved dismissal.

5. Order of the Court

The Hon’ble High Court upheld the finding that the accused was responsible for causing the death of the deceased based on a complete chain of circumstantial evidence, including presence at the scene, quarrel, recovery of weapon, and subsequent conduct.
However, the Court observed that the incident occurred in the course of a sudden quarrel without premeditation, and the prosecution failed to establish intention to cause death. Accordingly, the conviction under Section 302 IPC was altered to Section 304 Part II IPC.
Considering that the accused had already undergone more than 15 years of incarceration, exceeding the maximum punishment under Section 304 Part II IPC, the Court held the period already undergone as sufficient sentence. The appeal was partly allowed, and the accused was directed to be released forthwith, if not required in any other case.

6. Case Laws Relied Upon
M.C. Ali vs State of Kerala (2010) 4 SCC 573
State of U.P. vs Anil Singh (1988) 3 SCC 686
Sharad Birdhichand Sarda vs State of Maharashtra
Pundalik vs State of Maharashtra
Surinder Kumar vs UT Chandigarh
Rambir vs State (NCT Delhi)
Kesar Singh vs State of Haryana

घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम, 2005—धारा 12, 2(स), 17, 19 और 23—निवास-स्थान में रहने हेतु प्रार्थना—यदि किसी...
27/04/2026

घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम, 2005—धारा 12, 2(स), 17, 19 और 23—निवास-स्थान में रहने हेतु प्रार्थना—यदि किसी महिला ने अपने “साझी गृहस्थी” (shared household) को अपनी इच्छा से छोड़ दिया है, तो उसे दोबारा उसी घर में वापस बसाने (re-instatement) का अधिकार स्वतः नहीं मिल जाता—अगर मामला वास्तविकता में घरेलू हिंसा का न होकर आपसी संपत्ति विवाद ज्यादा लगता है, तो इस अधिनियम का दुरुपयोग नहीं किया जा सकता—यह कानून महिलाओं को जबरन घर से निकाले जाने (dispossession) से बचाने के लिए है, न कि खुद छोड़े गए घर में फिर से प्रवेश दिलाने के लिए—धारा 19 के तहत मिलने वाली राहत (घर में रहने का अधिकार) अनिवार्य नहीं, बल्कि न्यायालय के विवेक पर निर्भर होती है—“साझी-गृहस्थी” वही मानी जायेगी जो वर्तमान में साथ रहने की व्यवस्था हो, केवल पुराने संबंध के आधार पर नहीं—अगर महिला को दोबारा घर में बसाया जाता है, तो इससे वर्तमान में रह रहे लोगों का स्थिर कब्जा (settled possession) प्रभावित होगा, जो कानून की मंशा के खिलाफ है—याचिका ख़ारिज की जाती है।

26/04/2026

घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम, 2005—धारा 12, 19 और 23—अंतरिम आदेश (इंजंक्शन) जिसमें संपत्ति को बेचने या उस पर कोई भार (encumbrance) बनाने से रोक लगाया गया है—प्रश्न कि क्या धारा 12 के तहत मामला सुन रहे मजिस्ट्रेट को अपने ही दिए गए आदेश की समीक्षा (review) करने का अधिकार है, ताकि गलती को सुधारा जा सके—निर्णीत, हाँ—मजिस्ट्रेट, जो डी.वी. एक्ट के तहत अधिकार का प्रयोग कर रहा है, वह अपने द्वारा दिए गए अंतरिम आदेश को वापस ले सकता है (recall), रद्द कर सकता है (vacate) या संशोधित (modify) कर सकता है, यदि वह आदेश किसी पक्ष को नुकसान पहुँचा रहा हो या किसी गलती पर आधारित हो— “Actus Curiae Neminem Gravabit” अर्थात, अदालत के कार्य से किसी व्यक्ति को नुकसान नहीं पहुँचना चाहिए—अदालत का यह कर्तव्य है कि वह अपनी गलती को स्वयं सुधार करेसाथ ही, पक्षकार को यह कहना कि वह संपत्ति के अधिकार (title) के लिए सिविल कोर्ट जाए—ऐसा निर्देश गलत है—इसलिए, अधीनस्थ का आदेश रद्द किया जाता है और रिवीजन स्वीकार की जाती है।

⚖️ सिर्फ FIR के आधार पर हथियार लाइसेंस रद्द नहीं: इलाहाबाद हाईकोर्ट का अहम फैसलाAllahabad High Court ने एक महत्वपूर्ण नि...
25/04/2026

⚖️ सिर्फ FIR के आधार पर हथियार लाइसेंस रद्द नहीं: इलाहाबाद हाईकोर्ट का अहम फैसला

Allahabad High Court ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में स्पष्ट किया है कि केवल FIR दर्ज होने के आधार पर किसी व्यक्ति का हथियार (firearm) लाइसेंस रद्द नहीं किया जा सकता, जब तक उस FIR में हथियार के दुरुपयोग (misuse) का कोई उल्लेख न हो।

📌 क्या है मामला?
मामले में प्रशासन द्वारा सिर्फ FIR के आधार पर लाइसेंस रद्द कर दिया गया था, जिसे कोर्ट में चुनौती दी गई।

⚖️ अदालत का स्पष्ट निष्कर्ष
👉 सिर्फ FIR दर्ज होना लाइसेंस रद्द करने का पर्याप्त आधार नहीं है
👉 FIR में यह दिखाना जरूरी है कि—
• हथियार का इस्तेमाल (use) हुआ हो
• या उसका दुरुपयोग (misuse/discharge) हुआ हो

📜 कोर्ट ने अपने निर्णय में कहा कि—
👉 बिना ठोस कारण के लाइसेंस रद्द करना मनमाना (arbitrary) होगा
👉 प्रशासन को Arms Act, 1959 के तहत निर्धारित शर्तों का पालन करना जरूरी है

📂 पूर्व फैसलों पर भरोसा
अदालत ने पहले के निर्णयों का हवाला देते हुए दोहराया कि—
➡️ केवल आपराधिक मामला दर्ज होना या FIR होना पर्याप्त नहीं
➡️ लाइसेंस रद्द करने के लिए विशिष्ट कारण और साक्ष्य जरूरी हैं

📢 कानूनी महत्व
✔️ नागरिकों के अधिकारों की सुरक्षा और प्रशासनिक मनमानी पर रोक
✔️ Arms Licence रद्द करने के लिए स्पष्ट मानक तय
✔️ “Due Process” और न्यायसंगत कार्रवाई पर जोर

📢 बड़ा संदेश:
कानून में संतुलन जरूरी है—सिर्फ आरोप के आधार पर नहीं, बल्कि साक्ष्य और कारणों के आधार पर ही कार्रवाई होगी।

📚 Case Title: Aman Ullah v. State of U.P. (Firearm License Cancellation Case)

साइबर अपराध—बैंक खाता फ्रीज़ करने के संबंध में जाँच अधिकारी के लिए मार्गदर्शक सिद्धांत—(i) BNSS की धारा 106 पुलिस को यह ...
25/04/2026

साइबर अपराध—बैंक खाता फ्रीज़ करने के संबंध में जाँच अधिकारी के लिए मार्गदर्शक सिद्धांत—

(i) BNSS की धारा 106 पुलिस को यह असीमित अधिकार नहीं देती कि वह किसी भी बैंक खाते को मनमाने ढंग से फ्रीज़ कर दे। खाता फ्रीज़ करने का अधिकार तभी बनता है जब ठोस सामग्री के आधार पर वाजिब कारण (reasonable belief) हो। केवल शक के आधार पर या सामान्य पैसे के लेन-देन के विवाद में खाता फ्रीज़ नहीं किया जा सकता।

(ii) अनिवार्य प्रक्रिया—खाता फ्रीज़ करने के लिए जाँच अधिकारी को संबंधित बैंक या पेमेंट सर्विस ऑपरेटर (PSO) के नोडल अधिकारी को लिखित सूचना भेजनी होगी, जिसमें कथित अपराध का पूरा विवरण हो, और एफआईआर या शिकायत की प्रति संलग्न हो। यदि यह प्रक्रिया पूरी नहीं की जाती है, तो बैंक या PSO कानूनी रूप से खाते को फ्रीज़ करने से इंकार कर सकता है।

(iii) सीमित अधिकार—पुलिस केवल उसी रकम पर रोक (लियन) लगाने का निर्देश दे सकती है, जो कथित रूप से अपराध से जुड़ी हो। पूरे बैंक खाते को एक साथ फ्रीज़ करना या पूरी तरह बंद कर देना कानूनन गलत है।

(iv) न्यायिक निगरानी—खाता फ्रीज़ करने, रोकने या लियन लगाने की सूचना 24 घंटे के भीतर संबंधित क्षेत्र के न्यायिक मजिस्ट्रेट को देना अनिवार्य है। ऐसा न करने पर खाता फ्रीज़ करने की कार्रवाई अवैध मानी जा सकती है।

(v) बैंक का उत्तरदायित्व—यदि कोई बैंक या PSO निर्धारित कानूनी प्रक्रिया का पालन किए बिना किसी खाते को फ्रीज़ करता है तो वह खाताधारक को हुए आर्थिक नुकसान और प्रतिष्ठा की क्षति के लिए दीवानी और आपराधिक कार्रवाई का जिम्मेदार होगा।

25/04/2026
हिंदू विवाह अधिनियम, 1955—धारा 13(1)(i-a)—पति द्वारा विवाह-विच्छेद याचिका प्रस्तुत—मानसिक क्रूरता—विचारण न्यायालय द्वारा...
25/04/2026

हिंदू विवाह अधिनियम, 1955—धारा 13(1)(i-a)—पति द्वारा विवाह-विच्छेद याचिका प्रस्तुत—मानसिक क्रूरता—विचारण न्यायालय द्वारा ख़ारिज—पत्नी ने लिखित-कथनों में पति पर अवैध संबंध (Illicit relationship) के गंभीर आरोप लगाए, लेकिन इन आरोपों को साबित करने के लिए कोई भी सबूत (जैसे मौखिक गवाही, दस्तावेज, कॉल रिकॉर्ड आदि) पेश नहीं किया गया—ये आरोप झूठे और आधारहीन पाए गए, जिससे पति और उसके परिवार को मानसिक पीड़ा और सामाजिक बदनामी झेलनी पड़ी—पति CISF जैसी अनुशासित सेवा में कार्यरत है, इसलिए ऐसे आरोप यदि सही भी मान लिए जाते तो उसकी नौकरी पर भी खतरा आ सकता था—इस प्रकार के बेबुनियाद आरोप केवल लगाने मात्र से ही “मानसिक क्रूरता” की परिधि में आएंगे, और इसी आधार पर पति को विवाह-विच्छेद करने का अधिकार प्राप्त है—अतः विचारण न्यायालय का आदेश अपास्त—पति को तलाक की डिक्री प्रदान की जाती है—अपील स्वीकार।

25/04/2026

📌📌 इस मामले में याचिकाकर्ता ने अपनी दूसरी मैटरनिटी लीव रद्द किए जाने के खिलाफ हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। 'अनुपम यादव और अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और अन्य' मामले में यह फैसला दिया गया था कि एक बार जब उत्तर प्रदेश राज्य में 'मैटरनिटी बेनिफिट्स एक्ट, 1961' के प्रावधानों को अपना लिया गया तो 'फाइनेंशियल हैंडबुक' के प्रावधान इस एक्ट के प्रावधानों पर भारी नहीं पड़ सकते। यह माना गया कि 'फाइनेंशियल हैंडबुक' कार्यकारी निर्देशों का एक समूह है, जिसे किसी विधायी कानून के प्रावधानों के सामने झुकना चाहिए।
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका स्वीकार की इसी तरह के हालात में उस मामले की याचिकाकर्ता को 'फाइनेंशियल हैंडबुक' के आधार पर दूसरी मैटरनिटी लीव देने से मना किया गया, जिसे कोर्ट ने पलट दिया था। तदनुसार, कोर्ट ने फैसला दिया कि पहली मैटरनिटी लीव के 2 साल के अंदर दूसरी मैटरनिटी लीव मांगी जा सकती है और इस एक्ट के तहत इस पर कोई रोक नहीं है। रिट याचिका स्वीकार करते हुए कोर्ट ने प्रतिवादी को निर्देश दिया कि वह याचिकाकर्ता की दूसरी मैटरनिटी लीव मंजूर करे। Source - live law

Case Title: Manisha Yadav v. State Of U.P. Thru. Addl. Chief Secy./ Prin. Secy., Deptt. Of Technical Edu. Lko. And Another

23/04/2026

📌📌 संबंधित केस में हाईकोर्ट ने माना कि बच्चों की विदेशी शिक्षा के प्रति पति की जिम्मेदारी और पत्नी की आवश्यक जरूरतों को देखते हुए, 2,500 रुपये प्रतिदिन (कुल 75,000 रुपये प्रति माह) की राशि याचिका के लंबित रहने के दौरान प्रतिवादी की सहायता के लिए उचित होगी।

कोर्ट ने 25,000 रुपये के मुकदमेबाजी खर्च को बरकरार रखा। यह स्पष्ट किया गया कि ये टिप्पणियां केवल धारा 24 के तहत अंतरिम भरण-पोषण तय तय करने की सीमा तक प्रथम दृष्टया (prima facie) प्रकृति की हैं।

केस विवरण: केस शीर्षक: सचिन बनाम हर्षदा अग्ने

केस संख्या: रिट याचिका संख्या 2210/2023 पीठ: जस्टिस एम. डब्ल्यू. चांदवानी
दिनांक: 10 अप्रैल, 2026

22/04/2026

क्या है "रास्ते का अधिकार" – क्या कहता है कानून?
क्या करें जब पड़ोसी खेत में से निकलने का रास्ता बंद कर दे?

रास्ते का अधिकार यानी किसी भूमि से होकर गुजरने का कानूनी हक। अक्सर ग्रामीण क्षेत्रों में यह विवाद सामने आता है कि किसी व्यक्ति के घर या खेत तक जाने का रास्ता पड़ोसी की जमीन से होकर गुजरता है, और वह पड़ोसी उस रास्ते को बंद कर देता है।

ऐसी स्थिति में कानून आपको कई अधिकार देता है—

1. सुखाधिकार (Easementary Right):
भारतीय सुखाधिकार अधिनियम, 1882 (Indian Easements Act, 1882) के तहत, यदि कोई व्यक्ति लंबे समय से किसी रास्ते का उपयोग करता आ रहा है, तो उसे उस रास्ते से गुजरने का अधिकार प्राप्त हो सकता है।
2. प्रिस्क्रिप्टिव सुखाधिकार (Prescriptive Easement):
यदि किसी व्यक्ति ने 20 वर्षों या उससे अधिक समय तक बिना किसी बाधा के रास्ते का उपयोग किया है, तो वह उस रास्ते पर अधिकार का दावा कर सकता है।
3. आवश्यकता का सुखाधिकार (Easement of Necessity):
यदि किसी व्यक्ति के पास अपनी भूमि तक पहुंचने का कोई अन्य रास्ता नहीं है, तो उसे पड़ोसी की जमीन से रास्ता लेने का अधिकार मिल सकता है।
4. निषेधाज्ञा (Injunction):
यदि कोई पड़ोसी जबरन रास्ता बंद करता है, तो आप सिविल कोर्ट में निषेधाज्ञा के लिए आवेदन कर सकते हैं।
(Specific Relief Act, 1963 की धारा 38 व 39)
5. क्षतिपूर्ति का दावा (Claim for Damages):
यदि रास्ता बंद होने से नुकसान हुआ है, तो आप हर्जाना भी मांग सकते हैं।
6. स्थानीय प्राधिकरण से संपर्क:
ग्राम पंचायत या स्थानीय प्रशासन कई मामलों में इस विवाद को सुलझाने में मदद कर सकते हैं।
7. न्यायालय के निर्णय:
सुप्रीम कोर्ट व हाई कोर्ट ने कई मामलों में रास्ते के अधिकार को मान्यता दी है, जैसे B. Shyamkumar vs Francis George (2009)।
👉 निष्कर्ष:
रास्ते का अधिकार एक महत्वपूर्ण कानूनी अधिकार है। यदि कोई व्यक्ति आपके आने-जाने के रास्ते में बाधा डालता है, तो आप कानूनी उपाय अपनाकर अपना अधिकार सुरक्षित कर सकते हैं।

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Moh/Buddhwari
Kannauj
209725

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