18/04/2026
🌿 गोपी का विरह भाव
व्रज में एक नवयुवती गोपी थी, जो श्रीकृष्ण के विरह में अत्यंत व्याकुल रहती थी। रातभर वह करवटें बदलती, आँखों में नींद नहीं—केवल श्याम की स्मृतियाँ।
प्रातःकाल ब्रह्ममुहूर्त में उसकी आँख खुली तो देखा—आकाश काले बादलों से घिरा है और तेज वर्षा हो रही है। उन श्यामल मेघों को देखकर उसके हृदय का विरह और प्रज्वलित हो उठा। वह मन ही मन बोली—
“हे श्याम मेघ! तुम तो मेरे प्रियतम घनश्याम के समान ही दिखते हो। जाओ, उनसे कहना—एक गोपी उनकी स्मृति में हर क्षण तड़प रही है। मेरे आँसुओं को अपने जल में मिलाकर उन पर बरसा देना, शायद मेरी वेदना का स्पर्श उन्हें हो जाए।”
कुछ समय बाद वर्षा थमी। गोपी ने मटकी उठाई और सास से अनुमति लेकर जल भरने पनघट की ओर चल पड़ी। घूँघट में ढका मुख, सिर और कमर पर मटकी, और मन पूरी तरह कृष्ण में लीन—वह धीरे-धीरे आगे बढ़ रही थी।
अचानक फिर वर्षा शुरू हो गई। उसके वस्त्र भीग गए, शरीर को ठंड लगने लगी। बाहर वर्षा की शीतलता थी, पर भीतर विरह की ज्वाला धधक रही थी—एक साथ शीत और अग्नि का अनुभव।
उधर श्रीकृष्ण भी अपनी भक्त की पीड़ा से अछूते न रहे। वे भी व्याकुल हो उठे। तुरंत काली कमली ओढ़कर, मधुर वंशी बजाते हुए यमुना तट की ओर चल पड़े। एक वृक्ष के नीचे खड़े होकर उस गोपी की प्रतीक्षा करने लगे।
थोड़ी ही देर में उन्होंने देखा—वही गोपी घूँघट डाले चली आ रही है। नटखट कृष्ण ने आगे बढ़कर उसका मार्ग रोक लिया और हँसते हुए बोले—
“अरे भाभी! जरा पानी पिला दो, बहुत प्यास लगी है।”
गोपी उन्हें पहचान न सकी। विरह से व्याकुल होकर बोली—
“अरे ग्वाले! दिखता नहीं? मटकी खाली है, जल लेने जा रही हूँ।”
कृष्ण मुस्कुराए और धीरे से उसका घूँघट पकड़कर बोले—
“भाभी! जरा अपना चाँद सा मुख तो दिखाओ।”
अब गोपी घबरा गई। उसने घूँघट कसकर पकड़ लिया, पर कृष्ण भी कहाँ मानने वाले थे! दोनों ओर से खींचातानी होने लगी। अंततः कृष्ण ने घूँघट हटा दिया।
क्षणभर बाद जब दोनों की आँखें मिलीं, तो गोपी चकित रह गई—
“अरे! ये तो मेरे श्याम हैं!”
दोनों की आँखों से प्रेम बरसने लगा। शब्द मौन हो गए, हृदय बोलने लगे। वातावरण अलौकिक प्रेम से भर उठा।
गोपी बोली—
“मैं भाभी नहीं, आपकी गोपी हूँ, आपकी सखी हूँ।”
कृष्ण हँस पड़े—
“अरी गोपी! हम तो तुम्हें चिढ़ाने को भाभी कह रहे थे।”
गोपी लजा गई और बोली—
“अब रास्ता छोड़ो, मुझे जल भरने जाना है।”
कृष्ण हँसते हुए हट गए, पर गोपी द्वंद्व में पड़ गई—जाऊँ तो मिलन अधूरा, न जाऊँ तो घर का भय। इसी उधेड़बुन में उसने देखा—कृष्ण दूर जा रहे हैं। उसके हृदय में फिर विरह की ज्वाला भड़क उठी।
यह लीला मानो एक संदेश देती है—
जो जीव केवल प्रभु का स्मरण करता है, उसे प्रभु साक्षात मिलते हैं; पर जैसे ही मन संसार की ओर मुड़ता है, प्रभु दूर प्रतीत होते हैं। सच्चा विरह ही प्रभु को पुनः समीप लाता है।
गोपी अनमने मन से जल भरकर लौटने लगी। अब उसका ध्यान केवल कृष्ण में था—न घूँघट, न जगत की सुध। वह चारों ओर अपने श्याम को खोजती चल रही थी।
तभी कदंब वृक्ष पर छिपे कृष्ण ने शरारत की—एक कंकड़ मारकर उसकी मटकी फोड़ दी। घबराहट में दूसरी मटकी भी गिर गई। वृक्ष के पत्तों में छिपे श्याम की हँसी गूँज उठी। प्रकृति भी जैसे मुस्कुरा उठी।
गोपी बाहर से रूठी, भीतर से पुलकित। आज श्याम ने उस पर कृपा की थी।
व्रज की गोपियों का प्रेम अद्भुत है—न उसमें स्वार्थ, न सीमा। कोई कृष्ण को पुत्र मानती है, कोई प्रियतम, तो कोई सखा। और कृष्ण भी सभी को उनके भाव अनुसार प्रेम देते हैं।
हे प्रभु! जैसे उस गोपी के हृदय में विरह था, वैसा ही विरह हमारे भीतर भी जागृत करें, ताकि हम भी आपके सच्चे प्रेम का अनुभव कर सकें।
॥ जय श्री राधे ॥
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