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सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: बिजली न मिलने पर उपभोक्ताओं से डेप्रिसिएशन चार्ज नहीं वसूला जा सकता...⚖️देशभर के बिजली उपभो...
09/05/2026

सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: बिजली न मिलने पर उपभोक्ताओं से डेप्रिसिएशन चार्ज नहीं वसूला जा सकता...⚖️

देशभर के बिजली उपभोक्ताओं को बड़ी राहत देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा है कि जिस अवधि में उपभोक्ताओं को बिजली की सप्लाई ही नहीं दी गई, उस अवधि का डेप्रिसिएशन (मूल्यह्रास) शुल्क उनसे वसूल नहीं किया जा सकता। जस्टिस पामिदिघंतम श्री नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की बेंच ने यह महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा कि उपभोक्ताओं को ऐसी सेवा के लिए भुगतान करने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता, जो उन्हें वास्तव में मिली ही नहीं।

यह मामला Delhi Electricity Regulatory Commission (DERC) vs Tata Power Delhi Distribution Limited (TPDDL) से जुड़ा था। विवाद 108 मेगावाट के गैस आधारित पावर प्लांट का था, जिसे 2010 कॉमनवेल्थ गेम्स से पहले दिल्ली में बढ़ती बिजली मांग को पूरा करने के लिए स्थापित किया गया था। इस प्रोजेक्ट को शुरुआत से ही एक अस्थायी व्यवस्था माना गया था और इसे सीमित अवधि तक संचालित करने की योजना थी।

DERC ने बिजली खरीद समझौते (PPA) को केवल मार्च 2018 तक मंजूरी दी थी। इसके बाद प्लांट ने दिल्ली के उपभोक्ताओं को बिजली देना बंद कर दिया, लेकिन इसके बावजूद APTEL ने TPDDL को पूरे 15 वर्षों की तकनीकी उपयोगिता अवधि के लिए डेप्रिसिएशन वसूलने की अनुमति दे दी थी।

सुप्रीम कोर्ट ने APTEL के फैसले को रद्द करते हुए कहा कि डेप्रिसिएशन केवल उसी अवधि के लिए वसूला जा सकता है, जब वास्तव में उपभोक्ताओं को बिजली सप्लाई की गई हो। अदालत ने यह भी माना कि मार्च 2018 के बाद कंपनी कहीं और बिजली बेचने के लिए स्वतंत्र थी, इसलिए उस अवधि का आर्थिक बोझ उपभोक्ताओं पर नहीं डाला जा सकता।

कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि किसी पावर प्लांट की तकनीकी उपयोगिता अवधि 15 साल होने मात्र से कंपनी को पूरे 15 साल तक उपभोक्ताओं से डेप्रिसिएशन वसूलने का कोई पूर्ण अधिकार नहीं मिल जाता। DERC ने केवल 6 वर्षों की वास्तविक सेवा अवधि के लिए ₹83.34 करोड़ की रिकवरी की अनुमति दी थी और ₹94.59 करोड़ की अतिरिक्त रिकवरी को रोक दिया था। सुप्रीम कोर्ट ने इसी आदेश को बहाल कर दिया।

यह फैसला उपभोक्ता अधिकारों की सुरक्षा, पारदर्शिता और बिजली कंपनियों की जवाबदेही सुनिश्चित करने की दिशा में एक ऐतिहासिक निर्णय माना जा रहा है।

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