12/06/2026
#शेखावाटी की गलियों में एक हवेली आज भी खड़ी है, पर उसकी दीवारें अब सिर्फ़ हवाओं से बातें करती हैं। इसे बनवाया था सेठ धरमचंद जी ओसवाल ने, 1870 के आसपास।
धरमचंद जी अफीम और कपास के बड़े व्यापारी थे। कलकत्ता और बम्बई तक उनका कारोबार फैला था। पर कहते हैं, धन से बड़ा उनका दिल था। हवेली बनाते वक्त उन्होंने कारीगरों से कहा था, "ऐसी बनाओ कि देखने वाला रुके, और रुकने वाला समझे कि यहां सिर्फ ईंट-पत्थर नहीं, नियत लगी है।"
हवेली के बाहर सोने के वर्क वाले दरवाजे थे। अंदर चार चौक, 108 कमरे। हर दीवार पर फ्रेस्को। पर सबसे अनोखी थी बैठक की दीवार। उस पर कारीगरों ने ओसवाल समाज का कुलचिन्ह बनाया था, और उसके नीचे एक छोटा सा दृश्य: एक सेठ अपने मुनीम के साथ बही-खाता देख रहा है, और सामने एक भूखा भिखारी खड़ा है। सेठ का एक हाथ बही पर है, दूसरा हाथ भिखारी की तरफ बढ़ा हुआ। नीचे लिखा था: "लक्ष्मी चंचला है, पर धर्म अचल।"
गांव के लोग कहते थे कि अकाल पड़ा तो धरमचंद जी ने हवेली के बड़े दरवाजे खोल दिए। तीन महीने तक रोज़ दो वक्त का खाना बंटा। हवेली के आंगन में चूल्हे जले, और सेठानी खुद पहली रोटी परोसती थीं। किसी ने पूछा, "सेठ जी, इतना खर्च?" तो वे हंसकर बोले, "ये हवेली की नींव में जो चूना लगा है, उसमें मेरी कमाई कम, दुआएं ज़्यादा हैं।"
वक्त बदला। रेल आई, व्यापार के रास्ते बदले। धरमचंद जी के पोते बम्बई बस गए। हवेली में ताले लग गए। धीरे-धीरे छतें टपकने लगीं, फ्रेस्को का रंग उड़ने लगा, सोने का वर्क लुटेरे नोच ले गए।
आज भी अगर तुम उस खंडहर में जाओ, तो बैठक वाली दीवार पर वो फ्रेस्को दिख जाएगा। धूप में अब भी सेठ का बढ़ा हुआ हाथ चमकता है। और कहते हैं, अमावस की रात को हवेली के चौक से रोटियों की सोंधी महक आती है।
लोग कहते हैं, हवेलियां मरती नहीं। बस सांस रोक लेती हैं, किसी के लौटने के इंतज़ार में।
SUMAN