26/05/2026
⚖️ राजस्थान हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में यह स्पष्ट किया है कि घरेलू हिंसा अधिनियम (Domestic Violence Act) के तहत सुनवाई करने वाली अदालतें उन आरोपों के आधार पर मुआवजा नहीं दे सकतीं, जो पहले से किसी आपराधिक अदालत में विचाराधीन हों और जिन पर अंतिम निर्णय अभी तक नहीं आया हो।
यह मामला माननीय न्यायमूर्ति Farzand Ali की पीठ के समक्ष विचाराधीन था, जिसमें निचली अदालत द्वारा पत्नी को मानसिक प्रताड़ना के आरोपों के आधार पर 2 लाख रुपये मुआवजा देने का आदेश दिया गया था। बाद में अपीलीय अदालत ने भरण-पोषण की राशि में तो कमी कर दी, लेकिन मुआवजे के आदेश को बरकरार रखा, जिसे पति ने हाईकोर्ट में चुनौती दी।
हाईकोर्ट ने सुनवाई के दौरान यह महत्वपूर्ण टिप्पणी की कि जब क्रूरता और उत्पीड़न जैसे गंभीर आरोप पहले से ही सक्षम आपराधिक अदालत में लंबित हों, तो DV Act के तहत कार्यवाही कर रही अदालतों द्वारा उन आरोपों पर अंतिम निष्कर्ष देना उचित नहीं है। ऐसा करना न केवल पूर्व निर्णय जैसा होगा, बल्कि इससे दोनों पक्षों के अधिकार भी प्रभावित हो सकते हैं।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि घरेलू हिंसा अधिनियम का उद्देश्य किसी आपराधिक मुकदमे का विकल्प बनना नहीं है, बल्कि पीड़ित महिला को तत्काल नागरिक राहत उपलब्ध कराना है, जिसमें भरण-पोषण, आवास, सुरक्षा और आर्थिक सहायता शामिल है ताकि वह सम्मानपूर्वक जीवन जी सके। जब तक आपराधिक अदालत में आरोपों पर अंतिम निर्णय नहीं आ जाता, तब तक DV Act के तहत मुआवजा देने जैसे आदेश विवादित निष्कर्षों पर आधारित नहीं हो सकते।
इसी आधार पर Rajasthan High Court ने निचली अदालत द्वारा दिए गए 2 लाख रुपये मुआवजे के आदेश को रद्द कर दिया।