24/06/2026
SC/ST (Prevention of Atrocities) Act-:
1989 के तहत सिद्धांत रूप में अग्रिम जमानत (anticipatory bail) पर प्रतिबंध है, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने बार‑बार यह कहा है कि यदि FIR/शिकायत के तथ्यों से Act के तहत कोई prima facie अपराध बनता ही नहीं है, तो अदालतें पूर्व‑ग्रहण जमानत दे सकती हैं। नियमित जमानत (regular bail) गिरफ्तारी के बाद उपलब्ध रहती है और वह सामान्य CrPC के सिद्धांतों के अनुसार दी जाती है, बस यह ध्यान रखते हुए कि इस विशेष अधिनियम का उद्देश्य SC/ST समुदाय की सख़्त सुरक्षा है।
2024–2026 के हाल के सुप्रीम कोर्ट के रुझान
2024–2025 की केस‑लॉ में बार‑बार दोहराया गया कि anticipatory bail पर प्रतिबंध स्वतः नहीं लग जाता; अदालतों को SC/ST आरोप का prima facie परीक्षण पहले करना होगा।
2026 में भी एक बेंच (जस्टिस पारडीवाला और जस्टिस भूयान) ने यह कहा कि केवल FIR में SC/ST की धाराएँ जोड़ देने से अग्रिम जमानत का दरवाज़ा अपने‑आप बंद नहीं हो जाता; पहले यह देखना अनिवार्य है कि तथ्यों से धारा 3 के तत्व पूरे होते हैं या नहीं, तभी धारा 18 लागू होगी।
अलग‑अलग मामलों में सुप्रीम कोर्ट ने धारा 3(1)(xi) जैसे प्रावधानों के अंतर्गत दोषसिद्धि को तथ्यों के आधार पर परखा है और जहाँ ingredients साबित नहीं हुए, वहाँ दोषमुक्ति (acquittal) भी दी है, तथा ट्रायल कोर्टों को साक्ष्य के सावधानीपूर्वक मूल्यांकन की याद दिलाई है।
अग्रिम जमानत की कानूनी स्थिति (धारा 18 और 18A)
धारा 18 यह कहती है कि दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 438 (anticipatory bail) SC/ST Act के अपराधों पर लागू नहीं होगी।
2018 के संशोधन से जो धारा 18A जोड़ी गई, उसने यह प्रतिबंध फिर दोहराया और यह भी स्पष्ट कर दिया कि
(i) FIR दर्ज करने से पहले प्रारंभिक जांच (preliminary inquiry) आवश्यक नहीं है, और
(ii) गिरफ्तार करने के लिए वरिष्ठ पुलिस अधिकारी की पूर्व स्वीकृति की आवश्यकता नहीं है।
Prathvi Raj Chauhan v. Union of India (2020) में सुप्रीम कोर्ट ने इन संशोधनों की संवैधानिक वैधता को सही माना, लेकिन साथ ही यह स्पष्ट कर दिया कि यदि रिकॉर्ड पर दिखता है कि Act के तहत कोई अपराध prima facie बनता ही नहीं है, तो ऐसे मामले में anticipatory bail देना संभव है।
हाल के सुप्रीम कोर्ट के आदेशों से निकला मुख्य सिद्धांत:
सिर्फ इसलिए कि FIR में SC/ST Act की धाराएँ लगा दी गई हैं, अदालत anticipatory bail को यांत्रिक (mechanical) तरीके से खारिज नहीं कर सकती;
न्यायाधीश को पहले यह देखना होगा कि क्या आरोपों से धारा 3 के किसी अपराध के आवश्यक घटक (ingredients) सचमुच सामने आ रहे हैं या नहीं।
यदि FIR और अन्य सामग्री से यह नहीं दिखता कि घटना में जाति‑आधारित मंशा (caste‑based intent) थी, या “जाति के आधार पर” अपमान/धमकी दी गई, या अन्य आवश्यक तत्व मौजूद हैं, तो धारा 18 की बाधा लागू नहीं होगी और anticipatory bail दी जा सकती है।