Dhara Diary: Clause by Clause "धारा डायरी: धारा-दर-धारा"

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Dhara Diary: Clause by Clause  "धारा डायरी: धारा-दर-धारा" Welcome to Dhara Diary –"Law Simplified, Justice Amplified", your guide to understanding Indian law in simple, clear, and practical language.

Through Dhara Diary, we break down the Bare Acts, sections & legal provisions clause by clause.

🚨🚨 *Vodafone Idea shares in focus ahead of Supreme Court verdict on AGR dues plea*
06/10/2025

🚨🚨 *Vodafone Idea shares in focus ahead of Supreme Court verdict on AGR dues plea*

Previously, India's Solicitor General Tushar Mehta, representing the Department of Telecom (DoT) on behalf of the Centre, sought more time from the Supreme Court. Vodafone Idea said it had no objections to the government seeking more time. The top court delayed its verdict to October 6.

DDP #12 - हिंदू विवाह अधिनियम 1955 के मुख्य बिंदुलागू होने वाला क्षेत्र (Applicability)यह अधिनियम हिंदू, बौद्ध, जैन और स...
03/10/2025

DDP #12 - हिंदू विवाह अधिनियम 1955 के मुख्य बिंदु
लागू होने वाला क्षेत्र (Applicability)
यह अधिनियम हिंदू, बौद्ध, जैन और सिख धर्म के लोगों पर लागू होता है।
उन व्यक्तियों पर भी लागू है जो हिंदू धर्म में परिवर्तित हो चुके हैं।
विवाह की शर्तें (Conditions of Marriage – धारा 5)
दोनों पक्षों का विवाहित न होना (Single होना)।
दोनों की सहमति से विवाह होना।
वर की आयु कम से कम 21 वर्ष और वधू की आयु कम से कम 18 वर्ष।
दोनों का मानसिक रूप से स्वस्थ होना।
वर-वधू आपस में प्रतिबंधित संबंध (prohibited relationship) में न हों (जब तक प्रचलन से अनुमति न हो)।
विवाह की वैधता (Validity)
विवाह तभी वैध माना जाएगा जब उपरोक्त शर्तें पूरी हों।
विवाह का पंजीकरण (Registration)
विवाह का पंजीकरण संबंधित विवाह अधिकारी के पास कराया जा सकता है।
पंजीकरण से विवाह का वैधानिक प्रमाण मिलता है।
एकपत्नी/एकपति प्रथा (Monogamy)
एक समय में केवल एक पत्नी/पति ही वैध है।
यदि पहले से विवाह अस्तित्व में है तो दूसरा विवाह अवैध होगा और दंडनीय अपराध है (बिगैमी)।
वैवाहिक अधिकार (Restitution of Conjugal Rights – धारा 9)
यदि पति या पत्नी बिना उचित कारण के साथ छोड़ देता है तो दूसरा पक्ष अदालत में याचिका दाखिल कर सकता है।
न्यायिक पृथक्करण (Judicial Separation – धारा 10)
पति-पत्नी कुछ कारणों से न्यायालय से पृथक रहने की अनुमति ले सकते हैं, परंतु विवाह बंधन बना रहता है।
विवाह की शून्यता (Void Marriages – धारा 11)
कुछ विवाह स्वतः अवैध (Void) माने जाते हैं जैसे:
पहले से विवाहित होना।
निषिद्ध संबंधों में विवाह।
सगोत्र विवाह (जहाँ वर्जित हो)।
शून्य योग्य विवाह (Voidable Marriages – धारा 12)
ऐसे विवाह जिन्हें न्यायालय द्वारा शून्य घोषित किया जा सकता है, जैसे:
जब सहमति दबाव/धोखे से ली गई हो।
दुल्हन गर्भवती हो और दूल्हे को जानकारी न हो।
तलाक (Divorce – धारा 13)
तलाक के आधार:
व्यभिचार (Adultery)
क्रूरता (Cruelty)
परित्याग (Desertion – 2 वर्ष से अधिक)
धर्म परिवर्तन (Conversion)
मानसिक विकार या असाध्यता
संक्रामक रोग
7 वर्षों से अधिक लापता होना
परस्पर सहमति से तलाक (Divorce by Mutual Consent – धारा 13B)
पति-पत्नी आपसी सहमति से तलाक ले सकते हैं यदि वे कम से कम 1 वर्ष से अलग रह रहे हों।
भरण-पोषण (Maintenance – धारा 24 एवं 25)
पति या पत्नी आर्थिक रूप से निर्भर होने पर भरण-पोषण (Maintenance/Alimony) की मांग कर सकते हैं।

 #मुस्लिम_पर्सनल_लॉ (Muslim Personal Law / शरीयत कानून) मुख्य रूप से विवाह, तलाक, उत्तराधिकार, भरण-पोषण और संपत्ति से सं...
29/09/2025

#मुस्लिम_पर्सनल_लॉ (Muslim Personal Law / शरीयत कानून) मुख्य रूप से विवाह, तलाक, उत्तराधिकार, भरण-पोषण और संपत्ति से संबंधित है। इसके अलग-अलग अधिनियम और धाराएं हैं।

मुस्लिम पर्सनल लॉ के मुख्य बिंदु

1. विवाह (Nikah)

विवाह एक नागरिक अनुबंध (civil contract) है, धार्मिक संस्कार नहीं।

विवाह के लिए प्रस्ताव (Ijab) और स्वीकार (Qubool) आवश्यक है।

दोनों पक्षों की स्वतंत्र सहमति आवश्यक है।

मेहर (Dower) पति द्वारा पत्नी को दिया जाना अनिवार्य है।

मुस्लिम पुरुष को चार पत्नियाँ तक रखने की अनुमति है (लेकिन समान व्यवहार और न्याय आवश्यक है)।

2. तलाक (Divorce)

मुस्लिम पुरुष को तलाक का अधिकार है, जो मौखिक या लिखित हो सकता है।

तलाक के प्रकार:

तलाक-ए-अहसन – एक बार तलाक, इद्दत के दौरान संबंध पुनः स्थापित हो सकते हैं।

तलाक-ए-हसन – तीन बार अलग-अलग समय पर तलाक का उच्चारण।

तलाक-ए-बिद्दत (Triple Talaq) – तीन बार तुरंत तलाक (अब भारत में अवैध घोषित)।

महिला के लिए तलाक के अधिकार:

खुला (Khula) – पत्नी द्वारा तलाक की माँग, मेहर वापस करना पड़ सकता है।

मुबारत – पति-पत्नी दोनों की सहमति से तलाक।

न्यायालय के माध्यम से तलाक (Dissolution of Muslim Marriage Act, 1939)।

तलाक के बाद इद्दत (निर्धारित समय तक प्रतीक्षा अवधि) आवश्यक है।

3. उत्तराधिकार और संपत्ति (Inheritance & Property)

मुस्लिम उत्तराधिकार कुरान और शरीयत के अनुसार होता है।

मृतक की संपत्ति सबसे पहले कर्ज और वसीयत चुकाने में लगती है।

संपत्ति बाँटने के नियम:

पुत्र को पुत्री से दुगना हिस्सा मिलता है।

पत्नी को पति की संपत्ति में 1/8 (यदि संतान है) या 1/4 (यदि संतान नहीं है)।

पति को पत्नी की संपत्ति में 1/4 (यदि संतान है) या 1/2 (यदि संतान नहीं है)।

गोद लिए हुए बच्चे को उत्तराधिकार का अधिकार नहीं मिलता।

4. भरण-पोषण (Maintenance)

पति पर पत्नी और बच्चों का भरण-पोषण करने का दायित्व है।

तलाकशुदा महिला को इद्दत अवधि तक भरण-पोषण मिलता है।
इद्दत के बाद महिला अपने माता-पिता या रिश्तेदारों पर आश्रित हो सकती है।
सुप्रीम कोर्ट (शाह बानो केस, 1985) में महिला को भरण-पोषण का अधिकार दिया गया था, लेकिन मुस्लिम Women (Protection of Rights on Divorce) Act, 1986 के त

DDP #10-240925-Specific relief act 📘 Specific Relief Act, 1963विशिष्ट राहत अधिनियम, 1963Chapter 1 – Preliminary (धारा 1–...
24/09/2025

DDP #10-240925-Specific relief act
📘 Specific Relief Act, 1963
विशिष्ट राहत अधिनियम, 1963
Chapter 1 – Preliminary (धारा 1–4)
Definitions & Application
👉 परिभाषाएँ और प्रयोजन
Relief only for enforcing rights, not penalties
👉 राहत केवल अधिकार लागू करने हेतु, दंडस्वरूप नहीं
Chapter 2 – Recovery of Property (धारा 5–13)
Possession of Immovable Property
👉 अचल संपत्ति का कब्ज़ा
Possession of Movable Property
👉 चल संपत्ति का कब्ज़ा
Specific Performance of Contracts
👉 अनुबंध का विशिष्ट पालन
Partial Performance allowed in some cases
👉 आंशिक पालन कुछ स्थितियों में संभव
Chapter 3 – Specific Performance of Contracts (धारा 14–24)
Contracts not enforceable (personal services, etc.)
👉 जिन अनुबंधों का पालन संभव नहीं
Who can demand performance
👉 पालन की मांग कौन कर सकता है
Court’s discretion in granting relief
👉 न्यायालय का विवेकाधिकार
Compensation + Performance
👉 क्षतिपूर्ति + पालन
Chapter 4 – Rescission of Contracts (धारा 25–30)

Cancellation of Contract
👉 अनुबंध का निरस्तीकरण

Rectification of Instruments
👉 दस्तावेज़ों में सुधार

Rights of parties after rescission
👉 निरस्तीकरण के बाद पक्षकारों के अधिकार
Chapter 5 – Declaratory Decrees (धारा 31–33)

Cancellation of Documents
👉 दस्तावेज़ों का निरस्तीकरण

Discretion of Court
👉 न्यायालय का विवेक

Compensation in rescission
👉 निरस्तीकरण में क्षतिपूर्ति
Chapter 6 – Injunctions (धारा 34–42)

Declaratory Decree
👉 घोषणात्मक डिक्री

Temporary & Permanent Injunctions
👉 अस्थायी एवं स्थायी निषेधाज्ञा

Mandatory Injunctions
👉 अनिवार्य निषेधाज्ञा

When Injunction not granted
👉 कब निषेधाज्ञा नहीं दी जाएगी

Negative Contract enforcement
👉 नकारात्मक अनुबंध का प्रवर्तन
Chapter 7 – Miscellaneous (धारा 43–44)

Great 👍I’ll make a bilingual (English + Hindi) poster-style chart summary of the Specific Relief Act, 1963.Here’s the st...
24/09/2025

Great 👍
I’ll make a bilingual (English + Hindi) poster-style chart summary of the Specific Relief Act, 1963.
Here’s the structured content you can directly put into a poster/infographic:

📘 Specific Relief Act, 1963

विशिष्ट राहत अधिनियम, 1963

Chapter 1 – Preliminary (धारा 1–4)

Definitions & Application
👉 परिभाषाएँ और प्रयोजन

Relief only for enforcing rights, not penalties
👉 राहत केवल अधिकार लागू करने हेतु, दंडस्वरूप नहीं

Chapter 2 – Recovery of Property (धारा 5–13)

Possession of Immovable Property
👉 अचल संपत्ति का कब्ज़ा

Possession of Movable Property
👉 चल संपत्ति का कब्ज़ा

Specific Performance of Contracts
👉 अनुबंध का विशिष्ट पालन

Partial Performance allowed in some cases
👉 आंशिक पालन कुछ स्थितियों में संभव

Chapter 3 – Specific Performance of Contracts (धारा 14–24)

Contracts not enforceable (personal services, etc.)
👉 जिन अनुबंधों का पालन संभव नहीं

Who can demand performance
👉 पालन की मांग कौन कर सकता है

Court’s discretion in granting relief
👉 न्यायालय का विवेकाधिकार

Compensation + Performance
👉 क्षतिपूर्ति + पालन

Chapter 4 – Rescission of Contracts (धारा 25–30)

Cancellation of Contract
👉 अनुबंध का निरस्तीकरण

Rectification of Instruments
👉 दस्तावेज़ों में सुधार

Rights of parties after rescission
👉 निरस्तीकरण के बाद पक्षकारों के अधिकार

Chapter 5 – Declaratory Decrees (धारा 31–33)

Cancellation of Documents
👉 दस्तावेज़ों का निरस्तीकरण

Discretion of Court
👉 न्यायालय का विवेक

Compensation in rescission
👉 निरस्तीकरण में क्षतिपूर्ति

Chapter 6 – Injunctions (धारा 34–42)

Declaratory Decree
👉 घोषणात्मक डिक्री

Temporary & Permanent Injunctions
👉 अस्थायी एवं स्थायी निषेधाज्ञा

Mandatory Injunctions
👉 अनिवार्य निषेधाज्ञा

When Injunction not granted
👉 कब निषेधाज्ञा नहीं दी जाएगी

Negative Contract enforcement
👉 नकारात्मक अनुबंध का प्रवर्तन
Chapter 7 – Miscellaneous (धारा 43–44)
Effect on other laws
👉 अन्य कानूनों पर प्रभाव
Repeal & Savings
👉 निरस्तीकरण व बचाव

DDP #10-210925 #भारतीय_अनुबंध_अधिनियम  #प्रदर्शन_की_विफलता (Performance of Breach) के मुख्य बिंदु निम्नलिखित हैं:*प्रदर्...
21/09/2025

DDP #10-210925
#भारतीय_अनुबंध_अधिनियम
#प्रदर्शन_की_विफलता (Performance of Breach) के मुख्य बिंदु निम्नलिखित हैं:

*प्रदर्शन की विफलता क्या है?*

प्रदर्शन की विफलता तब होती है जब एक पक्ष अनुबंध के तहत अपने दायित्वों को पूरा नहीं करता है, जिससे दूसरे पक्ष को नुकसान होता है।

*प्रदर्शन की विफलता के प्रकार*

1. *पूर्ण विफलता*: जब एक पक्ष अपने दायित्वों को पूरी तरह से पूरा नहीं करता है।
2. *आंशिक विफलता*: जब एक पक्ष अपने दायित्वों को आंशिक रूप से पूरा करता है, लेकिन पूरी तरह से नहीं।

*प्रदर्शन की विफलता के परिणाम*

1. *नुकसान का दावा*: प्रभावित पक्ष नुकसान के लिए दावा कर सकता है।
2. *अनुबंध की समाप्ति*: प्रभावित पक्ष अनुबंध को समाप्त कर सकता है।
3. *मुआवजा*: दोषी पक्ष को मुआवजा देने की आवश्यकता हो सकती है।

*प्रदर्शन की विफलता के बचाव*

1. *अप्रत्याशित परिस्थितियाँ*: यदि अप्रत्याशित परिस्थितियों के कारण प्रदर्शन की विफलता होती है।
2. *दूसरे पक्ष की गलती*: यदि दूसरे पक्ष की गलती के कारण प्रदर्शन की विफलता होती है।

भारतीय अनुबंध अधिनियम 1872 के तहत शून्य और अवैध अनुबंध के मुख्य बिंदु निम्नलिखित हैं:*शून्य अनुबंध*- जब कोई अनुबंध कानून...
20/09/2025

भारतीय अनुबंध अधिनियम 1872 के तहत शून्य और अवैध अनुबंध के मुख्य बिंदु निम्नलिखित हैं:

*शून्य अनुबंध*

- जब कोई अनुबंध कानूनी रूप से लागू नहीं किया जा सकता है, तो उसे शून्य माना जाता है।
- शून्य अनुबंध के उदाहरणों में शामिल हैं:
- जब कोई प्रस्ताव अधूरा या शर्तों के साथ स्वीकार किया जाता है।
- जब स्वीकृति की सूचना वचनदाता को नहीं दी जाती है।
- जब प्रतिफल वैध नहीं होता है, जैसे कि वचनदाता की इच्छा के बिना दिया गया हो।

*अवैध अनुबंध*

- जब कोई अनुबंध कानून द्वारा निषिद्ध होता है या सार्वजनिक नीति के विरुद्ध होता है, तो उसे अवैध माना जाता है।
- अवैध अनुबंध के उदाहरणों में शामिल हैं:
- जब कोई अनुबंध कानून द्वारा प्रतिबंधित गतिविधि को बढ़ावा देता है।
- जब कोई अनुबंध कपटपूर्ण या अनैतिक उद्देश्यों के लिए किया जाता है।
- जब कोई अनुबंध किसी अन्य व्यक्ति या संपत्ति को नुकसान पहुंचाने के लिए किया जाता है।

*कुछ महत्वपूर्ण बिंदु*

- एक अनुबंध शून्य या अवैध हो सकता है यदि यह कानूनी आवश्यकताओं को पूरा नहीं करता है, जैसे कि प्रतिफल या वैध उद्देश्य।
- एक अनुबंध को शून्य या अवैध घोषित करने से पहले न्यायालय को मामले की जांच करनी होती है।
- शून्य या अवैध अनुबंधों के परिणामस्वरूप पक्षों के लिए कानूनी परिणाम हो सकते हैं। ¹

DDP #8-190925 - भारतीय अनुबंध अधिनियम ✦ पक्षकारों की क्षमता – मुख्य बिन्दुसक्षम व्यक्ति ही अनुबंध कर सकता हैअधिनियम की ध...
19/09/2025

DDP #8-190925 - भारतीय अनुबंध अधिनियम
✦ पक्षकारों की क्षमता – मुख्य बिन्दु
सक्षम व्यक्ति ही अनुबंध कर सकता है
अधिनियम की धारा 11 के अनुसार, अनुबंध करने की क्षमता उन्हीं व्यक्तियों को है जो–
(क) वयस्क हों (18 वर्ष पूरे कर चुके हों),
(ख) सुसound मस्तिष्क (Sound Mind) के हों,
(ग) कानून द्वारा अयोग्य घोषित न किए गए हों।
अल्पवयस्क (Minor) की स्थिति
18 वर्ष से कम आयु का व्यक्ति अनुबंध करने में सक्षम नहीं होता।
अल्पवयस्क द्वारा किया गया अनुबंध शुरुआत से ही शून्य (Void ab initio) होता है।
अल्पवयस्क को अनुबंध से कोई व्यक्तिगत दायित्व (Liability) नहीं होता।
स्वस्थ मस्तिष्क (Sound Mind)
अनुबंध उसी व्यक्ति द्वारा वैध है जो अनुबंध करते समय–
अपने हित-अहित को समझ सके,
अपने निर्णय के परिणामों को समझ सके।
पागलपन, नशे या अस्थायी मानसिक असंतुलन की स्थिति में किया गया अनुबंध अवैध होगा।
कानून द्वारा अयोग्य घोषित व्यक्ति
कुछ व्यक्तियों को विशेष कानूनों द्वारा अनुबंध करने से रोका गया है, जैसे–
विदेशी शत्रु (Alien enemy),
दिवालिया घोषित व्यक्ति,
पदधारी व्यक्ति (जैसे सरकारी सेवक) यदि कानून या सेवा नियमावली उन्हें रोकती हो।
अल्पवयस्क के लिए लाभकारी अनुबंध
यदि अनुबंध अल्पवयस्क के हित में हो (जैसे शिक्षा, आवश्यक वस्तुएँ), तो वह वैध माना जा सकता है।
कानूनी महत्व
यदि किसी भी पक्ष की अनुबंध करने की क्षमता न हो, तो अनुबंध अमान्य (Void) हो जाता है।
👉 सरल शब्दों में:
"भारतीय अनुबंध अधिनियम के अनुसार, केवल वही व्यक्ति अनुबंध कर सकते हैं जो वयस्क, स्वस्थ मस्तिष्क के और कानून द्वारा अयोग्य घोषित न हों।"

DDP #7-180925भारतीय अनुबंध अधिनियम, 1872 के अनुसार किसी अनुबंध (Contract) को वैध (Valid) माने जाने के लिए कुछ आवश्यक तत्...
18/09/2025

DDP #7-180925
भारतीय अनुबंध अधिनियम, 1872 के अनुसार किसी अनुबंध (Contract) को वैध (Valid) माने जाने के लिए कुछ आवश्यक तत्व (Essential Elements) होना ज़रूरी है। ये इस प्रकार है
वैध अनुबंध के आवश्यक तत्व (Essential Elements of a Valid Contract)
1. प्रस्ताव और स्वीकृति (Offer and Acceptance)
एक पक्ष द्वारा वैध प्रस्ताव होना चाहिए और दूसरे पक्ष द्वारा स्पष्ट एवं बिना शर्त स्वीकृति दी जानी चाहिए।
2. कानूनी संबंध बनाने का इरादा (Intention to Create Legal Relationship)
अनुबंध का उद्देश्य कानूनी रूप से बाध्यकारी संबंध स्थापित करना होना चाहिए।
3. प्रतिफल (Consideration)
प्रत्येक अनुबंध में वैध प्रतिफल होना चाहिए। यानी दोनों पक्षों को कुछ न कुछ लाभ या हानि होना चाहिए।
4. संविदा करने की क्षमता (Capacity of Parties)
अनुबंध करने वाले पक्ष सक्षम होने चाहिए, जैसे कि:
वयस्क (18 वर्ष से ऊपर)
स्वभारतीय अनुबंध अधिनियम, 1872 के अनुसार किसी अनुबंध (Contract) को वैध (Valid) माने जाने के लिए कुछ आवश्यक तत्व (Essential Elements) होना ज़रूरी है। ये इस प्रकार हैं:
वैध अनुबंध के आवश्यक तत्व (Essential Elements of a Valid Contract)
1. प्रस्ताव और स्वीकृति (Offer and Acceptance)
एक पक्ष द्वारा वैध प्रस्ताव होना चाहिए और दूसरे पक्ष द्वारा स्पष्ट एवं बिना शर्त स्वीकृति दी जानी चाहिए।
2. कानूनी संबंध बनाने का इरादा (Intention to Create Legal Relationship)
अनुबंध का उद्देश्य कानूनी रूप से बाध्यकारी संबंध स्थापित करना होना चाहिए।
3. प्रतिफल (Consideration)
प्रत्येक अनुबंध में वैध प्रतिफल होना चाहिए। यानी दोनों पक्षों को कुछ न कुछ लाभ या हानि होना चाहिए।
4. संविदा करने की क्षमता (Capacity of Parties)
अनुबंध करने वाले पक्ष सक्षम होने चाहिए, जैसे कि:
वयस्क (18 वर्ष से ऊपर)
स्वस्थ मस्तिष्क वाला
कानून द्वारा अयोग्य घोषित न हो
5. स्वतंत्र सहमति (Free Consent)
पक्षों की सहमति जबरदस्ती, धोखाधड़ी, गलतबयानी, अनुचित प्रभाव या भूल के कारण नहीं होनी चाहिए।
6. वैध उद्देश्य (Lawful Object)
अनुबंध का उद्देश्य वैध होना चाहिए, जो कानून, नैतिकता और सार्वजनिक नीति के खिलाफ न हो।
7. निषिद्ध अनुबंध न हो (Not Expressly Declared Void)
अनुबंध ऐसा नहीं होना चाहिए जिसे कानून शून्य घोषित करता है, जैसे- असंभव कार्य, अवैध कार्य आ

DDP #6-170925भारतीय उपबंध अधिनियम, 1882 (Indian Easements Act, 1882) का हकदार।✅ संक्षेप में:यह अधिनियम दो भागों में बँटा...
17/09/2025

DDP #6-170925
भारतीय उपबंध अधिनियम, 1882 (Indian Easements Act, 1882)
का हकदार।
✅ संक्षेप में:
यह अधिनियम दो भागों में बँटा है –

1. उपबंध (Easement) – किसी दूसरे की भूमि पर अधिकार (जैसे रास्ता, पानी, रोशनी)।

2. लाइसेंस (License) – केवल अनुमति, जिससे कोई अधिकार स्थायी रूप से उत्पन्न नहीं होता।
भाग 1 – उपबंध (Easements)
धारा 1–2: प्रारंभिक
धारा 1 – अधिनियम का नाम, विस्तार और लागू होने की तिथि।
धारा 2 – परिभाषाएँ:
उपबंध (Easement) – किसी व्यक्ति को दूसरे की भूमि पर अपनी भूमि के लाभ हेतु अधिकार (जैसे रास्ता, हवा, रोशनी, पानी)।
प्रधान संपत्ति (Dominant Heritage) – वह भूमि जिसे लाभ मिलता है।
अधीन संपत्ति (Servient Heritage) – वह भूमि जिस पर अधिकार चलता है
धारा 4–7: उपबंध का स्वरूप
धारा 4 – उपबंध का अर्थ = किसी और की भूमि में कुछ करने या रोकने का अधिकार।
धारा 5 – यह अधिकार अधीन संपत्ति के मालिक के अधिकारों को सीमित करता है।
धारा 6 – उपबंध सकारात्मक (कुछ करने देना) या नकारात्म (कुछ रोकना) हो सकता है।
धारा 7 – उपबंध में हवा, रोशनी, पानी, सहारा, रास्ता आदि के अधिकार शामिल।
धारा 8–13: कौन उपबंध लगा सकता है
धारा 8 – जिसे संपत्ति का हस्तांतरणीय अधिकार है, वह उपबंध लगा सकता है।
धारा 9 – पट्टेदार (lessee) सीमित हद तक उपबंध लगा सकता है।
धारा 10 – उपबंध अधिकार दाता के अधिकार से अधिक नहीं हो सकता।
धारा 11–12 – उपबंध स्थायी, अस्थायी, सशर्त या निरशर्त हो सकता है।
धारा 13 – मकान मालिक–किरायेदार, बंधकदाता–बंधकग्राही के बीच भी उपबंध बन सकता है।
धारा 14–23: उपबंध की विशेषताएँ
धारा 14 – उपबंध संपत्ति की प्रकृति के अनुरूप होना चाहिए।
धारा 15 – उपबंध प्रस्क्रिप्शन (Prescription) से भी बनता है = 20 साल की निर्बाध उपयोग (सरकारी भूमि पर 30 साल)।
धारा 16–20 – उपबंध स्पष्ट/अस्पष्ट, सतत/असतत, पूर्ण/सीमित, समय या प्रयोजन हेतु हो सकता है।
धारा 21–23 – उपबंध जगह, मौसम या तरीके के अनुसार सीमित हो सकता है।
धारा 24–28: अधिकार और कर्तव्य
धारा 24 – प्रधान मालिक उपबंध का उचित उपयोग करेगा।
धारा 25 – प्रधान मालिक अनावश्यक भार नहीं बढ़ाएगा।
धारा 26 – अधीन मालिक उपबंध में बाधा नहीं डाल सकता।
धारा 27 – अधीन मालिक अपनी भूमि का उपयोग कर सकता है जब तक उपबंध प्रभावित न हो।
धारा 28 – उपबंध का विस्तार उद्देश्य और प

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