22/05/2026
दिल्ली हाईकोर्ट ने साफ कहा है कि पति मेंटेनेंस (गुजारा भत्ता/भरण-पोषण) से बचने के लिए बेरोजगारी या "नियमित आय नहीं है" का बहाना नहीं बना सकता।
1 अगर पति शारीरिक रूप से स्वस्थ और कमाने में सक्षम है (शिक्षित या स्किल्ड है), तो उसे अपनी पत्नी और नाबालिग बच्चों का भरण-पोषण करना ही पड़ेगा।
"2 मेरी स्थायी नौकरी नहीं है", "कॉन्ट्रैक्ट जॉब है", "बीमार हूँ" आदि दलीलें पर्याप्त नहीं मानी जातीं, जब तक पति ठोस सबूत न दे कि वह पूरी तरह असमर्थ है।
3 पति का पवित्र दायित्व (Sacrosanct Duty) है कि वह पत्नी और बच्चों को मेंटेनेंस दे, भले ही इसके लिए शारीरिक मेहनत करनी पड़े
केस का नाम और डिटेल्स:
केस टाइटल: LKS v. NS
केस नंबर: CRL.REV.P.(MAT.) 177/2024
जज: जस्टिस सौरभ बनर्जी (Justice Saurabh Banerjee)
तारीख: मई 2026
फैसले का सार:
पति ने फैमिली कोर्ट के आदेश को चुनौती दी था, जिसमें उसे पत्नी और दो बेटियों को प्रति व्यक्ति ₹11,000 प्रति माह मेंटेनेंस देने को कहा गया था। पति की दलील थी कि उसकी कोई स्थायी आय नहीं है, वह कॉन्ट्रैक्ट पर काम करता है, बीमार है, मां की जिम्मेदारी है आदि।
हाईकोर्ट ने यह दलील खारिज कर दी और कहा:
पति पहले अच्छी सैलरी (लगभग ₹40,000/माह) कमा चुका है।
उसके बैंक अकाउंट में बड़ी रकम जमा होने के सबूत हैं।
पत्नी की योग्यता (कॉमर्स ग्रेजुएट) होने भर से यह साबित नहीं होता कि वह बच्चों सहित खुद का खर्च चला सकती है।
सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों (जैसे Bhuwan Mohan Singh v. Meena और Anju Garg v. Deepak Kumar Garg) का हवाला देकर कहा गया कि पति की यह जिम्मेदारी से नहीं बच सकता।