legal awareness by Anju Tomar

Directions

legal awareness by Anju Tomar हमारा उद्देश्य है कि आप अपने कानूनी अधिकारों को समझें और सही कदम उठाएं। यहां आपको सरल भाषा में कानून

 #डिस्चार्ज एप्लीकेशन (Discharge Application) क्या है❓यदि किसी आपराधिक मामले में चार्जशीट दाखिल होने के बाद न्यायालय को ...
20/07/2026

#डिस्चार्ज एप्लीकेशन (Discharge Application) क्या है❓

यदि किसी आपराधिक मामले में चार्जशीट दाखिल होने के बाद न्यायालय को यह प्रतीत होता है कि अभियुक्त के विरुद्ध प्रथम दृष्टया (Prima Facie) कोई अपराध नहीं बनता या पर्याप्त साक्ष्य उपलब्ध नहीं हैं, तो अभियुक्त न्यायालय से स्वयं को मुकदमे से मुक्त (Discharge) किए जाने का अनुरोध कर सकता है। इसे डिस्चार्ज एप्लीकेशन (Discharge Application) कहा जाता है।

#डिस्चार्ज आवेदन कब लगाया जाता है?
✅ चार्जशीट दाखिल होने के बाद।
✅ आरोप (Charge) तय होने से पहले।

⚖️ #डिस्चार्ज पिटीशन (Discharge Petition) के 👉प्रमुख #आधार (Grounds)

आपराधिक मामलों में यदि न्यायालय के समक्ष उपलब्ध अभिलेखों एवं अभियोजन सामग्री से अभियुक्त के विरुद्ध प्रथम दृष्टया (Prima Facie) मामला नहीं बनता, तो अभियुक्त डिस्चार्ज (Discharge) की प्रार्थना कर सकता है।

#डिस्चार्ज पिटीशन निम्नलिखित आधारों पर दायर की जा सकती है—
✅ प्रथम दृष्टया कोई अपराध (Prima Facie Case) नहीं बनता।
✅ अभियुक्त के विरुद्ध पर्याप्त एवं विश्वसनीय साक्ष्य उपलब्ध नहीं हैं।
✅ FIR अथवा चार्जशीट में लगाए गए आरोप असत्य, मनगढ़ंत या निराधार हैं।
✅ अभियुक्त का नाम केवल संदेह, अनुमान या शंका के आधार पर जोड़ा गया है।
✅ अभियोजन द्वारा प्रस्तुत साक्ष्य विधि सम्मत (Legally Admissible) या विश्वसनीय नहीं हैं।
✅ आरोपित अपराध के आवश्यक कानूनी तत्व (Essential Ingredients of Offence) अनुपस्थित हैं।
✅ विवेचना (Investigation) में गंभीर कानूनी अथवा प्रक्रियागत त्रुटियाँ हुई हैं।
✅ अभियोजन दुर्भावना (Malafide) या प्रतिशोध की भावना से प्रेरित है।
✅ मामला किसी वैधानिक प्रावधान अथवा न्यायालय के आदेश के कारण विधि द्वारा प्रतिबंधित (Barred by Law) है।
✅ अभियोजन की संपूर्ण सामग्री को सत्य मान लेने पर भी कोई अपराध सिद्ध नहीं होता।
✅ मुकदमे को जारी रखना न्यायालय की प्रक्रिया का दुरुपयोग (Abuse of Process of Court) होगा।
✅ अभियुक्त के विरुद्ध कोई प्रत्यक्ष, दस्तावेजी अथवा परिस्थितिजन्य साक्ष्य उपलब्ध नहीं है।

📚 #संबंधित कानूनी प्रावधान (BNSS, 2023)
• धारा 250 BNSS — सत्र वाद में डिस्चार्ज (पूर्व धारा 227 CrPC)
• धारा 262 BNSS — पुलिस रिपोर्ट पर संस्थित वारंट वाद में डिस्चार्ज (पूर्व धारा 239 CrPC)
⚠️ #महत्वपूर्ण: डिस्चार्ज पिटीशन प्रत्येक मामले के तथ्यों एवं उपलब्ध अभिलेखों के आधार पर तय होती है। केवल उपर्युक्त आधारों का उल्लेख पर्याप्त नहीं होता; न्यायालय रिकॉर्ड पर उपलब्ध सामग्री का परीक्षण करके निर्णय देता है।

⏳ #जहाँ प्रथम दृष्टया अपराध का आधार ही नहीं, वहाँ मुकदमा चलाना न्याय का नहीं, बल्कि प्रक्रिया का दुरुपयोग है—डिस्चार्ज अभियुक्त का वैधानिक अधिकार है।"

📌 यदि यह जानकारी आपको उपयोगी लगी हो, तो कृपया हमारे पेज को फॉलो करें, पोस्ट को लाइक, कमेंट और शेयर करें, ताकि यह महत्वपूर्ण कानूनी जानकारी अधिक से अधिक लोगों तक पहुँचे और लोग अपने अधिकारों के प्रति जागरूक बन सकें। ⚖️

Follow me
By Anju Pundir Advocate Civil Court Ghaziabad

गवाह (Witness) की विश्वसनीयता को चुनौती देना ।(Impeaching the Credibility of a Witness) है। इसका उद्देश्य यह दिखाना होता...
11/07/2026

गवाह (Witness) की विश्वसनीयता को चुनौती देना ।

(Impeaching the Credibility of a Witness) है। इसका उद्देश्य यह दिखाना होता है कि गवाह पुलिस के समक्ष दिए गए अपने पूर्व कथन और न्यायालय में दिए गए बयान में एक-दूसरे से भिन्न बातें कह रहा है, जिससे उसकी विश्वसनीयता पर संदेह उत्पन्न हो।

1. गवाह की विश्वसनीयता को चुनौती देना क्या है?
यदि गवाह ने पुलिस विवेचना के दौरान धारा 161 CrPC (अब धारा 175 BNSS) के अंतर्गत एक बात कही और न्यायालय में साक्ष्य देते समय उससे अलग बात कही, तो बचाव पक्ष या अभियोजन (जैसा मामला हो) उस विरोधाभास को रिकॉर्ड पर लाकर गवाह की विश्वसनीयता पर प्रश्न उठा सकता है।
ध्यान रहे कि धारा 161 CrPC/175 BNSS का बयान स्वयं साक्ष्य नहीं होता, बल्कि उसका उपयोग केवल गवाह का विरोधाभास (Contradiction) सिद्ध करने के लिए किया जाता है।

2. विरोधाभास (Contradiction) कैसे सिद्ध किया जाता है?
चरण 1: जिरह (Cross-examination)
गवाह से पहले वही प्रश्न पूछा जाता है जो उसने पुलिस के सामने कथित रूप से कहा था।
उदाहरण:
पुलिस को आपने बताया था कि घटना रात 8 बजे हुई थी?
क्या आपने यह नहीं कहा था कि आपने आरोपी को मौके पर नहीं देखा?
यदि गवाह इनकार करता है या अलग उत्तर देता है, तो उसका विरोधाभास नोट कराया जाता है।
चरण 2: Investigating Officer (IO) की गवाही
बाद में विवेचक (IO) को बुलाकर पूछा जाता है कि क्या गवाह ने वास्तव में धारा 161/175 के बयान में वही बात कही थी।
यदि IO इसकी पुष्टि करता है, तब विरोधाभास विधिक रूप से सिद्ध माना जाता है।

3. भारतीय साक्ष्य अधिनियम के प्रावधान
धारा 145 – पूर्व लिखित कथन के आधार पर जिरह।
धारा 155 – गवाह की विश्वसनीयता पर आघात।
धारा 146 – गवाह की सत्यता की परीक्षा हेतु प्रश्न।

4. किन बातों पर विरोधाभास महत्वपूर्ण माना जाता है?
हर छोटी गलती विरोधाभास नहीं होती।
महत्वपूर्ण विरोधाभास:
आरोपी की पहचान बदल जाना।
घटना का समय बदल जाना।
घटना का स्थान बदल जाना।
हथियार बदल जाना।
घटना देखने की बात से मुकर जाना।
सामान्य या तुच्छ विरोधाभास:
कपड़ों का रंग।
कुछ मिनटों का समय अंतर।
मामूली स्मृति संबंधी त्रुटियाँ।
ऐसी छोटी विसंगतियाँ सामान्यतः गवाही को अविश्वसनीय नहीं बनातीं।

5. प्रभावी जिरह कैसे करें?
पहले गवाह से न्यायालय में स्पष्ट उत्तर दिलवाएँ।
उसके बाद उसके 161/175 BNSS के कथन की ओर ध्यान दिलाएँ।
यदि वह इनकार करे, तो उस हिस्से को रिकॉर्ड पर अंकित कराएँ।
बाद में IO से उस विरोधाभास को सिद्ध कराएँ।
अंतिम बहस में बताइए कि गवाह के कथन विश्वसनीय नहीं हैं।

6. प्रमुख न्यायिक सिद्धांत
सर्वोच्च न्यायालय ने अनेक निर्णयों में कहा है कि:
केवल महत्वपूर्ण (Material) विरोधाभास ही अभियोजन के मामले को प्रभावित करते हैं।
साधारण या तुच्छ विसंगतियाँ गवाही को अस्वीकार करने का आधार नहीं हैं।
धारा 161/175 का बयान केवल Contradiction के लिए उपयोग किया जा सकता है, स्वतंत्र साक्ष्य के रूप में नहीं।

7. उदाहरण
यदि पुलिस के समक्ष गवाह ने कहा:
"मैंने आरोपी को घटना स्थल पर नहीं देखा।"
लेकिन न्यायालय में कहता है:
"मैंने आरोपी को अपने सामने वार करते देखा।"
तो यह Material Contradiction है और बचाव पक्ष इस आधार पर गवाह की विश्वसनीयता पर गंभीर प्रश्न उठा सकता है।

निष्कर्ष

गवाह की विश्वसनीयता पर प्रहार करने का सबसे प्रभावी तरीका है कि धारा 161 CrPC (अब धारा 175 BNSS) के कथन और न्यायालय में दिए गए बयान के बीच के महत्वपूर्ण विरोधाभासों को विधि सम्मत ढंग से सिद्ध किया जाए। केवल विरोधाभास दिखाना पर्याप्त नहीं है; उसे भारतीय साक्ष्य अधिनियम के अनुसार जिरह और विवेचक (IO) की गवाही के माध्यम से विधिवत सिद्ध करना आवश्यक होता है।


Follow me
By Anju Tomar Advocate Civil Court rajnagar ghaziabad

Cross Examination (प्रतिपरीक्षण) को 7 भागों में बाँटकर प्रश्न पूछने की एक व्यावहारिक तकनीक नीचे बताई गई है। यह कोई वैधान...
10/07/2026

Cross Examination (प्रतिपरीक्षण) को 7 भागों में बाँटकर प्रश्न पूछने की एक व्यावहारिक तकनीक नीचे बताई गई है। यह कोई वैधानिक नियम (Law) नहीं है, बल्कि अनुभवी अधिवक्ताओं द्वारा अपनाई जाने वाली एक Trial Strategy है। यदि इन सात भागों के अनुसार जिरह की जाए तो गवाह की विश्वसनीयता (Credibility) को प्रभावी ढंग से परखा जा सकता है।

1. Question on Identity (पहचान संबंधी प्रश्न)
उद्देश्य: यह जानना कि गवाह वास्तव में घटना, अभियुक्त या पीड़ित को कितनी अच्छी तरह पहचानता है।
पूछे जाने वाले प्रश्न
आप अभियुक्त को कब से जानते हैं?
पहली बार कहाँ मिले थे?
घटना के समय कितनी दूरी थी?
प्रकाश (Light) की क्या स्थिति थी?
आपने कितनी देर तक देखा?
पहचान परेड (TIP) हुई थी या नहीं?
क्या आपने पुलिस को पहले ही नाम बता दिया था?
यदि विरोधाभास मिले तो गवाह की पहचान संदिग्ध सिद्ध की जा सकती है।

2. Question on Conduct (आचरण संबंधी प्रश्न)
उद्देश्य: घटना के समय और बाद में गवाह का व्यवहार सामान्य था या असामान्य।
उदाहरण
घटना देखकर आपने क्या किया?
पुलिस को सूचना कब दी?
अस्पताल क्यों नहीं गए?
शोर क्यों नहीं मचाया?
FIR लिखवाने में देरी क्यों हुई?
आपने किसी को बताया या नहीं?
यदि व्यवहार सामान्य मानव आचरण के विपरीत हो, तो गवाही पर संदेह उत्पन्न किया जा सकता है।

3. Documentary Proof (दस्तावेजी साक्ष्य)
उद्देश्य: मौखिक गवाही को दस्तावेजों से मिलाना।
दस्तावेज
FIR
साइट प्लान
केस डायरी
मेडिकल रिपोर्ट
पोस्टमार्टम रिपोर्ट
FSL रिपोर्ट
CDR
CCTV
फोटो
बैंक रिकॉर्ड
रजिस्टर
प्रश्न
क्या यह आपका हस्ताक्षर है?
क्या आपने यह बयान दिया था?
इसमें यह बात क्यों नहीं लिखी है?
दस्तावेज और आपकी गवाही में अंतर क्यों है?

4. Question on Motive (उद्देश्य/दुश्मनी)
उद्देश्य: झूठी गवाही या पक्षपात साबित करना।
उदाहरण
क्या पहले से विवाद था?
जमीन का मुकदमा चल रहा है?
परिवार में रंजिश है?
चुनावी दुश्मनी है?
पैसे का विवाद है?
यदि पूर्व शत्रुता सिद्ध हो जाए तो गवाह की निष्पक्षता पर प्रश्न उठाया जा सकता है।

5. Facts with Law (BSA और BNSS की धाराओं के साथ)
जिरह केवल तथ्यात्मक नहीं होनी चाहिए, बल्कि कानून आधारित भी होनी चाहिए।
उदाहरणतः
भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 2023 (BSA) के अंतर्गत:
गवाह की विश्वसनीयता पर प्रश्न।
पूर्व बयान से विरोधाभास।
जिरह की सीमा।
दस्तावेजों द्वारा विरोधाभास।
BNSS, 2023
पुलिस जांच की वैधानिक प्रक्रिया।
FIR, विवेचना, गिरफ्तारी, बयान आदि में प्रक्रिया का पालन हुआ या नहीं।
उदाहरण
विवेचक ने कानून के अनुसार कार्यवाही की?
गवाह का बयान समय से लिया गया?
अनिवार्य प्रक्रिया का पालन हुआ?

6. Legal Infirmities (TIP एवं जांच की कानूनी कमियाँ)
उद्देश्य: विवेचना की त्रुटियाँ उजागर करना।
उदाहरण
TIP नहीं हुई।
घटना स्थल का नक्शा सही नहीं।
स्वतंत्र गवाह नहीं।
जब्ती पंचनामा में त्रुटि।
सील सुरक्षित नहीं रही।
Chain of Custody टूटी।
इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य का प्रमाणपत्र नहीं।
इन कमियों से अभियोजन की कहानी कमजोर हो सकती है।

7. Medical & Forensic Evidence (चिकित्सीय एवं वैज्ञानिक साक्ष्य)
उद्देश्य: मौखिक गवाही और वैज्ञानिक साक्ष्य का मिलान करना।
पूछे जाने वाले प्रश्न
चोट किस हथियार से संभव है?
डॉक्टर की राय क्या है?
मृत्यु का समय क्या है?
DNA रिपोर्ट क्या कहती है?
Fingerprint मिले या नहीं?
Blood Group मेल खाता है?
FSL रिपोर्ट क्या बताती है?
यदि मेडिकल साक्ष्य और मौखिक गवाही में विरोधाभास हो तो गवाह की विश्वसनीयता प्रभावित होती है।
प्रभावी Cross Examination के 10 स्वर्णिम नियम
केवल Leading Questions पूछें।
एक प्रश्न में केवल एक तथ्य रखें।
ऐसे प्रश्न पूछें जिनका उत्तर "हाँ" या "नहीं" में हो।
ऐसा प्रश्न न पूछें जिसका उत्तर पहले से ज्ञात न हो।
गवाह से बहस न करें।
अनावश्यक प्रश्न न पूछें।
प्रत्येक उत्तर को अगले प्रश्न से जोड़ें।
दस्तावेजों से विरोधाभास अवश्य दिखाएँ।
जिरह का स्पष्ट उद्देश्य रखें।
जब आवश्यक तथ्य सिद्ध हो जाएँ, तो जिरह समाप्त करें।

निष्कर्ष -
Cross examination उपरोक्त 7-भागीय पद्धति कानून में निर्धारित नियम नहीं, बल्कि अनुभवी अधिवक्ताओं द्वारा अपनाई जाने वाली एक प्रभावी Cross-Examination Framework है। यदि इसे BSA, 2023, BNSS, 2023, और उच्चतम न्यायालय/उच्च न्यायालय के सिद्धांतों के साथ अपनाया जाए, तो यह आपराधिक मुकदमों में अत्यंत प्रभावशाली सिद्ध हो सकती है।
जा सकता है।

1. Question on Identity (पहचान संबंधी प्रश्न)
उद्देश्य: यह जानना कि गवाह वास्तव में घटना, अभियुक्त या पीड़ित को कितनी अच्छी तरह पहचानता है।
पूछे जाने वाले प्रश्न
आप अभियुक्त को कब से जानते हैं?
पहली बार कहाँ मिले थे?
घटना के समय कितनी दूरी थी?
प्रकाश (Light) की क्या स्थिति थी?
आपने कितनी देर तक देखा?
पहचान परेड (TIP) हुई थी या नहीं?
क्या आपने पुलिस को पहले ही नाम बता दिया था?
यदि विरोधाभास मिले तो गवाह की पहचान संदिग्ध सिद्ध की जा सकती है।

2. Question on Conduct (आचरण संबंधी प्रश्न)
उद्देश्य: घटना के समय और बाद में गवाह का व्यवहार सामान्य था या असामान्य।
उदाहरण
घटना देखकर आपने क्या किया?
पुलिस को सूचना कब दी?
अस्पताल क्यों नहीं गए?
शोर क्यों नहीं मचाया?
FIR लिखवाने में देरी क्यों हुई?
आपने किसी को बताया या नहीं?
यदि व्यवहार सामान्य मानव आचरण के विपरीत हो, तो गवाही पर संदेह उत्पन्न किया जा सकता है।

3. Documentary Proof (दस्तावेजी साक्ष्य)
उद्देश्य: मौखिक गवाही को दस्तावेजों से मिलाना।
दस्तावेज
FIR
साइट प्लान
केस डायरी
मेडिकल रिपोर्ट
पोस्टमार्टम रिपोर्ट
FSL रिपोर्ट
CDR
CCTV
फोटो
बैंक रिकॉर्ड
रजिस्टर
प्रश्न
क्या यह आपका हस्ताक्षर है?
क्या आपने यह बयान दिया था?
इसमें यह बात क्यों नहीं लिखी है?
दस्तावेज और आपकी गवाही में अंतर क्यों है?

4. Question on Motive (उद्देश्य/दुश्मनी)
उद्देश्य: झूठी गवाही या पक्षपात साबित करना।
उदाहरण
क्या पहले से विवाद था?
जमीन का मुकदमा चल रहा है?
परिवार में रंजिश है?
चुनावी दुश्मनी है?
पैसे का विवाद है?
यदि पूर्व शत्रुता सिद्ध हो जाए तो गवाह की निष्पक्षता पर प्रश्न उठाया जा सकता है।

5. Facts with Law (BSA और BNSS की धाराओं के साथ)
जिरह केवल तथ्यात्मक नहीं होनी चाहिए, बल्कि कानून आधारित भी होनी चाहिए।
उदाहरणतः
भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 2023 (BSA) के अंतर्गत:
गवाह की विश्वसनीयता पर प्रश्न।
पूर्व बयान से विरोधाभास।
जिरह की सीमा।
दस्तावेजों द्वारा विरोधाभास।
BNSS, 2023
पुलिस जांच की वैधानिक प्रक्रिया।
FIR, विवेचना, गिरफ्तारी, बयान आदि में प्रक्रिया का पालन हुआ या नहीं।
उदाहरण
विवेचक ने कानून के अनुसार कार्यवाही की?
गवाह का बयान समय से लिया गया?
अनिवार्य प्रक्रिया का पालन हुआ?

6. Legal Infirmities (TIP एवं जांच की कानूनी कमियाँ)
उद्देश्य: विवेचना की त्रुटियाँ उजागर करना।
उदाहरण
TIP नहीं हुई।
घटना स्थल का नक्शा सही नहीं।
स्वतंत्र गवाह नहीं।
जब्ती पंचनामा में त्रुटि।
सील सुरक्षित नहीं रही।
Chain of Custody टूटी।
इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य का प्रमाणपत्र नहीं।
इन कमियों से अभियोजन की कहानी कमजोर हो सकती है।

7. Medical & Forensic Evidence (चिकित्सीय एवं वैज्ञानिक साक्ष्य)
उद्देश्य: मौखिक गवाही और वैज्ञानिक साक्ष्य का मिलान करना।
पूछे जाने वाले प्रश्न
चोट किस हथियार से संभव है?
डॉक्टर की राय क्या है?
मृत्यु का समय क्या है?
DNA रिपोर्ट क्या कहती है?
Fingerprint मिले या नहीं?
Blood Group मेल खाता है?
FSL रिपोर्ट क्या बताती है?
यदि मेडिकल साक्ष्य और मौखिक गवाही में विरोधाभास हो तो गवाह की विश्वसनीयता प्रभावित होती है।
प्रभावी Cross Examination के 10 स्वर्णिम नियम
केवल Leading Questions पूछें।
एक प्रश्न में केवल एक तथ्य रखें।
ऐसे प्रश्न पूछें जिनका उत्तर "हाँ" या "नहीं" में हो।
ऐसा प्रश्न न पूछें जिसका उत्तर पहले से ज्ञात न हो।
गवाह से बहस न करें।
अनावश्यक प्रश्न न पूछें।
प्रत्येक उत्तर को अगले प्रश्न से जोड़ें।
दस्तावेजों से विरोधाभास अवश्य दिखाएँ।
जिरह का स्पष्ट उद्देश्य रखें।
जब आवश्यक तथ्य सिद्ध हो जाएँ, तो जिरह समाप्त करें।

निष्कर्ष -
Cross examination उपरोक्त 7-भागीय पद्धति कानून में निर्धारित नियम नहीं, बल्कि अनुभवी अधिवक्ताओं द्वारा अपनाई जाने वाली एक प्रभावी Cross-Examination Framework है। यदि इसे BSA, 2023, BNSS, 2023, और उच्चतम न्यायालय/उच्च न्यायालय के सिद्धांतों के साथ अपनाया जाए, तो यह आपराधिक मुकदमों में अत्यंत प्रभावशाली सिद्ध हो सकती है।

Following me
By Anju Tomar Advocate ghaziabad Court ..

12/06/2026
देश की न्याय व्यवस्था को अधिक तेज़, पारदर्शी और तकनीक-संचालित बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए नेशनल इंस्टी...
08/06/2026

देश की न्याय व्यवस्था को अधिक तेज़, पारदर्शी और तकनीक-संचालित बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ़ टेक्नोलॉजी (NIC) ने “E-Prisons Early Release Processing Module” को लॉन्च किया है। इस पहल पर हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने संज्ञान लेते हुए न केवल इसकी सराहना की बल्कि संबंधित कार्यवाही को औपचारिक रूप से समाप्त भी कर दिया।

यह मामला Surendra @ Sunda v. State of Uttar Pradesh से संबंधित था, जिसमें उम्रकैद की सजा काट रहे कैदियों की समय से पहले रिहाई की प्रक्रिया में हो रही देरी का गंभीर मुद्दा उठाया गया था। सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट की बेंच में भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्य कांत के साथ जस्टिस जे.के. माहेश्वरी, जस्टिस पंकज मित्तल, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस विपुल एम. पंचोली शामिल थे। इससे पहले 13 अप्रैल 2026 को जस्टिस जे.के. माहेश्वरी और जस्टिस अतुल एस. चंदुरकर की बेंच ने इस पूरे विषय पर विस्तृत निर्देश जारी किए थे, जिसमें देशभर में एक समान और ऑटोमेटेड सिस्टम विकसित करने पर जोर दिया गया था।

कोर्ट ने पाया कि विभिन्न राज्यों की जेलों में सजा में छूट और समय से पहले रिहाई से जुड़े मामलों में लंबे समय तक देरी हो रही थी, जिसका मुख्य कारण पारंपरिक फाइल-आधारित प्रक्रिया थी। कई मामलों में योग्य कैदियों की अर्जियां वर्षों तक लंबित पड़ी रहती थीं, जिससे न्याय में देरी हो रही थी। इसी समस्या के समाधान के लिए तकनीक आधारित प्रणाली विकसित करने का निर्देश दिया गया था।

इसके बाद NIC ने मौजूदा e-Prisons प्लेटफॉर्म के भीतर यह नया मॉड्यूल तैयार किया, जो अब ऐसे कैदियों की पहचान करने, उनके मामलों को डिजिटल रूप से प्रोसेस करने और हर स्तर पर होने वाली देरी पर नज़र रखने में सक्षम है। इसे शुरुआती तौर पर आगरा सेंट्रल जेल और लखनऊ जिला जेल में पायलट प्रोजेक्ट के रूप में लागू किया गया, जिसके सकारात्मक परिणाम सामने आने के बाद इसे देशव्यापी स्तर पर लागू करने की दिशा में कदम बढ़ाया गया।

सुप्रीम कोर्ट ने अपने हालिया आदेश में कहा कि इस पूरी व्यवस्था के क्रियान्वयन की जिम्मेदारी राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण (SLSA) और जेल प्रशासन के अन्य संबंधित अधिकारियों के साथ मिलकर निभाई जाएगी। कोर्ट ने यह भी माना कि इस डिजिटल पहल से न केवल प्रक्रिया में तेजी आएगी बल्कि पारदर्शिता भी बढ़ेगी और योग्य कैदियों को समय पर न्याय मिल सकेगा। इसी आधार पर अदालत ने मामले की कार्यवाही को औपचारिक रूप से बंद करने का आदेश दिया।

इस महत्वपूर्ण प्रक्रिया में योगदान देने वाले एमिकस क्यूरी सीनियर एडवोकेट के. परमेश्वर और एडवोकेट रवि रघुनाथ की भी कोर्ट ने विशेष रूप से सराहना की, जिनके प्रयासों से यह पहल पायलट स्तर से आगे बढ़कर राष्ट्रीय स्तर तक पहुंच सकी।

ऐसी ही अपडेट्स के लिए हमारे पेज को ज़रूर फॉलो करें और इस पोस्ट को शेयर करें।

*सुप्रीम कोर्ट ने आज फैसला सुनाया कि न्यायिक मजिस्ट्रेट को दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 196/197 के तहत धारा 156(3) के तह...
29/04/2026

*सुप्रीम कोर्ट ने आज फैसला सुनाया कि न्यायिक मजिस्ट्रेट को दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 196/197 के तहत धारा 156(3) के तहत एफआईआर दर्ज करने का निर्देश देने के लिए पूर्व स्वीकृति की आवश्यकता नहीं है।*

वकालत की दुनिया में अगर “ #डेयरडेविल” शब्द को किसी एक शख्सियत में ढालना हो, तो वो नाम बिना किसी हिचक के होगा — Ram Jethm...
11/04/2026

वकालत की दुनिया में अगर “ #डेयरडेविल” शब्द को किसी एक शख्सियत में ढालना हो, तो वो नाम बिना किसी हिचक के होगा — Ram Jethmalani।

कहानी सिर्फ उनकी कानूनी पकड़ की नहीं थी, बल्कि उस बेखौफ अंदाज़ की थी, जो अदालत की दीवारों में भी गूंजता था।

एक बार सुप्रीम कोर्ट में बहस के दौरान माननीय जज साहब ने संविधान की एक व्याख्या की, जो जेठमलानी साहब को स्वीकार नहीं थी। अब आम वकील क्या करता? सिर हिलाता, “As Your Lordship pleases” कहकर आगे बढ़ जाता।
लेकिन यहाँ बात जेठमलानी की थी…

उन्होंने तुरंत टोक दिया।

जज साहब नाराज़ हुए। माहौल तन गया। अदालत में सन्नाटा छा गया।

और तभी उस सन्नाटे को चीरते हुए जेठमलानी साहब ने कहा—
“When I wear this uniform, you are not in liquid form.”

ये सिर्फ एक वाक्य नहीं था, ये उस आत्मविश्वास की पराकाष्ठा थी जो 65+ साल की प्रैक्टिस, संविधान की गहरी समझ, और अपने पेशे के प्रति अटूट विश्वास से आती है।

वो अदालत में सिर्फ केस नहीं लड़ते थे —
वो न्यायिक संवाद को जीवित रखते थे।
वो याद दिलाते थे कि कोर्टरूम में वकील सिर्फ “ submit” करने नहीं, बल्कि “चैलेंज” करने भी आता है — पूरे सम्मान के साथ, लेकिन बिना डर के।

आज के दौर में, जब कई बार वकालत “सेफ प्ले” का खेल बनती जा रही है, जेठमलानी साहब की ये शैली एक संदेश देती है—
कानून की असली ताकत किताबों में नहीं, उसे निर्भीकता से रखने वाले लोगों में होती है।

हाँ, ये भी सच है कि ऐसी बेबाकी हर किसी के बस की बात नहीं…
क्योंकि इसके पीछे सिर्फ हिम्मत नहीं, बल्कि गहरी तैयारी और असाधारण ज्ञान भी चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट ने ज़ाबा खान बनाम स्टेट ऑफ़ यूपी- में ज़मानत प्रार्थना पत्र (Bail Application) आवेदनों में हलफनामा (Affida...
06/04/2026

सुप्रीम कोर्ट ने ज़ाबा खान बनाम स्टेट ऑफ़ यूपी- में ज़मानत प्रार्थना पत्र (Bail Application) आवेदनों में हलफनामा (Affidavit) दाखिल करने के नियम कड़े कर दिए हैं। आवेदकों को जमानत याचिका के साथ एक विस्तृत हलफनामा जमा करना अनिवार्य है।

जिसमें निम्नलिखित जानकारी देना अनिवार्य है -

➡️ एफिडेविट में FIR नंबर, तारीख, संबंधित थाना, जांच एजेंसी और धाराएं लिखनी होंगी।
➡️ आवेदक को यह बताना होगा कि क्या पहले कोई आपराधिक मामला दर्ज है या नहीं।
➡️ उच्च न्यायालय या सत्र न्यायालय में पहले कोई जमानत दायर की गई थी तो, उसका विवरण देना होगा।
➡️यदि पहले कोई गैर-जमानती वारंट (NBW) या प्रक्रिया जारी हुई है, तो उसे भी बताना होगा।
➡️ जिस अपराध में बेल लेना है उस धारा में अधिकतम कितनी सजा हो सकती है, यह बताना जरूरी है।

Address

Sector 23 Sanjay Nagar
Ghaziabad
201002

Website

Alerts

Be the first to know and let us send you an email when legal awareness by Anju Tomar posts news and promotions. Your email address will not be used for any other purpose, and you can unsubscribe at any time.

Shortcuts

Share