legal awareness by Anju Tomar

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12/06/2026
देश की न्याय व्यवस्था को अधिक तेज़, पारदर्शी और तकनीक-संचालित बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए नेशनल इंस्टी...
08/06/2026

देश की न्याय व्यवस्था को अधिक तेज़, पारदर्शी और तकनीक-संचालित बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ़ टेक्नोलॉजी (NIC) ने “E-Prisons Early Release Processing Module” को लॉन्च किया है। इस पहल पर हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने संज्ञान लेते हुए न केवल इसकी सराहना की बल्कि संबंधित कार्यवाही को औपचारिक रूप से समाप्त भी कर दिया।

यह मामला Surendra @ Sunda v. State of Uttar Pradesh से संबंधित था, जिसमें उम्रकैद की सजा काट रहे कैदियों की समय से पहले रिहाई की प्रक्रिया में हो रही देरी का गंभीर मुद्दा उठाया गया था। सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट की बेंच में भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्य कांत के साथ जस्टिस जे.के. माहेश्वरी, जस्टिस पंकज मित्तल, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस विपुल एम. पंचोली शामिल थे। इससे पहले 13 अप्रैल 2026 को जस्टिस जे.के. माहेश्वरी और जस्टिस अतुल एस. चंदुरकर की बेंच ने इस पूरे विषय पर विस्तृत निर्देश जारी किए थे, जिसमें देशभर में एक समान और ऑटोमेटेड सिस्टम विकसित करने पर जोर दिया गया था।

कोर्ट ने पाया कि विभिन्न राज्यों की जेलों में सजा में छूट और समय से पहले रिहाई से जुड़े मामलों में लंबे समय तक देरी हो रही थी, जिसका मुख्य कारण पारंपरिक फाइल-आधारित प्रक्रिया थी। कई मामलों में योग्य कैदियों की अर्जियां वर्षों तक लंबित पड़ी रहती थीं, जिससे न्याय में देरी हो रही थी। इसी समस्या के समाधान के लिए तकनीक आधारित प्रणाली विकसित करने का निर्देश दिया गया था।

इसके बाद NIC ने मौजूदा e-Prisons प्लेटफॉर्म के भीतर यह नया मॉड्यूल तैयार किया, जो अब ऐसे कैदियों की पहचान करने, उनके मामलों को डिजिटल रूप से प्रोसेस करने और हर स्तर पर होने वाली देरी पर नज़र रखने में सक्षम है। इसे शुरुआती तौर पर आगरा सेंट्रल जेल और लखनऊ जिला जेल में पायलट प्रोजेक्ट के रूप में लागू किया गया, जिसके सकारात्मक परिणाम सामने आने के बाद इसे देशव्यापी स्तर पर लागू करने की दिशा में कदम बढ़ाया गया।

सुप्रीम कोर्ट ने अपने हालिया आदेश में कहा कि इस पूरी व्यवस्था के क्रियान्वयन की जिम्मेदारी राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण (SLSA) और जेल प्रशासन के अन्य संबंधित अधिकारियों के साथ मिलकर निभाई जाएगी। कोर्ट ने यह भी माना कि इस डिजिटल पहल से न केवल प्रक्रिया में तेजी आएगी बल्कि पारदर्शिता भी बढ़ेगी और योग्य कैदियों को समय पर न्याय मिल सकेगा। इसी आधार पर अदालत ने मामले की कार्यवाही को औपचारिक रूप से बंद करने का आदेश दिया।

इस महत्वपूर्ण प्रक्रिया में योगदान देने वाले एमिकस क्यूरी सीनियर एडवोकेट के. परमेश्वर और एडवोकेट रवि रघुनाथ की भी कोर्ट ने विशेष रूप से सराहना की, जिनके प्रयासों से यह पहल पायलट स्तर से आगे बढ़कर राष्ट्रीय स्तर तक पहुंच सकी।

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*सुप्रीम कोर्ट ने आज फैसला सुनाया कि न्यायिक मजिस्ट्रेट को दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 196/197 के तहत धारा 156(3) के तह...
29/04/2026

*सुप्रीम कोर्ट ने आज फैसला सुनाया कि न्यायिक मजिस्ट्रेट को दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 196/197 के तहत धारा 156(3) के तहत एफआईआर दर्ज करने का निर्देश देने के लिए पूर्व स्वीकृति की आवश्यकता नहीं है।*

वकालत की दुनिया में अगर “ #डेयरडेविल” शब्द को किसी एक शख्सियत में ढालना हो, तो वो नाम बिना किसी हिचक के होगा — Ram Jethm...
11/04/2026

वकालत की दुनिया में अगर “ #डेयरडेविल” शब्द को किसी एक शख्सियत में ढालना हो, तो वो नाम बिना किसी हिचक के होगा — Ram Jethmalani।

कहानी सिर्फ उनकी कानूनी पकड़ की नहीं थी, बल्कि उस बेखौफ अंदाज़ की थी, जो अदालत की दीवारों में भी गूंजता था।

एक बार सुप्रीम कोर्ट में बहस के दौरान माननीय जज साहब ने संविधान की एक व्याख्या की, जो जेठमलानी साहब को स्वीकार नहीं थी। अब आम वकील क्या करता? सिर हिलाता, “As Your Lordship pleases” कहकर आगे बढ़ जाता।
लेकिन यहाँ बात जेठमलानी की थी…

उन्होंने तुरंत टोक दिया।

जज साहब नाराज़ हुए। माहौल तन गया। अदालत में सन्नाटा छा गया।

और तभी उस सन्नाटे को चीरते हुए जेठमलानी साहब ने कहा—
“When I wear this uniform, you are not in liquid form.”

ये सिर्फ एक वाक्य नहीं था, ये उस आत्मविश्वास की पराकाष्ठा थी जो 65+ साल की प्रैक्टिस, संविधान की गहरी समझ, और अपने पेशे के प्रति अटूट विश्वास से आती है।

वो अदालत में सिर्फ केस नहीं लड़ते थे —
वो न्यायिक संवाद को जीवित रखते थे।
वो याद दिलाते थे कि कोर्टरूम में वकील सिर्फ “ submit” करने नहीं, बल्कि “चैलेंज” करने भी आता है — पूरे सम्मान के साथ, लेकिन बिना डर के।

आज के दौर में, जब कई बार वकालत “सेफ प्ले” का खेल बनती जा रही है, जेठमलानी साहब की ये शैली एक संदेश देती है—
कानून की असली ताकत किताबों में नहीं, उसे निर्भीकता से रखने वाले लोगों में होती है।

हाँ, ये भी सच है कि ऐसी बेबाकी हर किसी के बस की बात नहीं…
क्योंकि इसके पीछे सिर्फ हिम्मत नहीं, बल्कि गहरी तैयारी और असाधारण ज्ञान भी चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट ने ज़ाबा खान बनाम स्टेट ऑफ़ यूपी- में ज़मानत प्रार्थना पत्र (Bail Application) आवेदनों में हलफनामा (Affida...
06/04/2026

सुप्रीम कोर्ट ने ज़ाबा खान बनाम स्टेट ऑफ़ यूपी- में ज़मानत प्रार्थना पत्र (Bail Application) आवेदनों में हलफनामा (Affidavit) दाखिल करने के नियम कड़े कर दिए हैं। आवेदकों को जमानत याचिका के साथ एक विस्तृत हलफनामा जमा करना अनिवार्य है।

जिसमें निम्नलिखित जानकारी देना अनिवार्य है -

➡️ एफिडेविट में FIR नंबर, तारीख, संबंधित थाना, जांच एजेंसी और धाराएं लिखनी होंगी।
➡️ आवेदक को यह बताना होगा कि क्या पहले कोई आपराधिक मामला दर्ज है या नहीं।
➡️ उच्च न्यायालय या सत्र न्यायालय में पहले कोई जमानत दायर की गई थी तो, उसका विवरण देना होगा।
➡️यदि पहले कोई गैर-जमानती वारंट (NBW) या प्रक्रिया जारी हुई है, तो उसे भी बताना होगा।
➡️ जिस अपराध में बेल लेना है उस धारा में अधिकतम कितनी सजा हो सकती है, यह बताना जरूरी है।

Kya aapke Cheque bounce case mai bhi 82/83 ho gya hai ??? To jane ab kya kare....Cheque Bounce Case (Section 138 NI Act)...
07/03/2026

Kya aapke Cheque bounce case mai bhi 82/83 ho gya hai ??? To jane ab kya kare....Cheque Bounce Case (Section 138 NI Act) में अगर 82/83 हो जाए तो क्या करें?

बहुत लोग डर जाते हैं जब कोर्ट से 82/83 CrPC जारी हो जाता है।
लेकिन घबराने की जरूरत नहीं है।

अगर Section 138 NI Act के केस में 82/83 हो गया है, तो सबसे पहले आरोपी को उसी कोर्ट में surrender करना होता है जहाँ से order जारी हुआ है।

उसके बाद वकील के माध्यम से:
1️⃣ Surrender application
2️⃣ 82/83 cancel कराने की application
3️⃣ Bail application

लगाई जाती है।

याद रखें – Section 138 NI Act एक bailable offence है, इसलिए अधिकतर मामलों में कोर्ट से बेल मिल जाती है, अगर आरोपी आगे कोर्ट में उपस्थित रहने का भरोसा देता है।

📌 इसलिए 82/83 आने पर छुपने की बजाय कानूनी प्रक्रिया अपनाना ही सही रास्ता है।

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