Vidhi Niketan & Associate

Vidhi Niketan & Associate Facing criminal charges? We provide expert legal advocacy and 24/7 support to navigate the justice.

19/07/2026
14/07/2026

योगी सरकार का ऐलान,जिला पंचायत अध्यक्षों को बनाया गया प्रशासक, UP के सभी जिलों में जिला पंचायत अध्यक्ष को बनाया गया प्रशासक।

यह मामला कर्नाटक के चिक्कबल्लापुर (Chikkaballapur) जिले का है, जहां एक 65 वर्षीय महिला को कोर्ट परिसर के अंदर कथित तौर प...
14/07/2026

यह मामला कर्नाटक के चिक्कबल्लापुर (Chikkaballapur) जिले का है, जहां एक 65 वर्षीय महिला को कोर्ट परिसर के अंदर कथित तौर पर तंत्र-मंत्र (काला जादू) करने के आरोप में गिरफ्तार किया गया है।
इस घटना की पूरी जानकारी नीचे दी गई है:
**क्या है पूरा मामला?**
* **तारीख और समय:** यह घटना 9 जुलाई 2026 को सुबह करीब 9:40 बजे हुई।
* **घटनास्थल:** चिक्कबल्लापुर स्थित प्रथम अतिरिक्त वरिष्ठ सिविल न्यायाधीश एवं न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी (JMFCl) की अदालत।
* **महिला की हरकत:** मंजुला नाम की महिला खुले कोर्टरूम में दाखिल हुई और उसने न्यायाधीश (जज) की कुर्सी और मंच (podium) पर सफेद सरसों के दाने (White Mustard Seeds) बिखेर दिए। अदालत प्रशासन के मुताबिक, यह कथित तौर पर किसी तंत्र-मंत्र या काले जादू की प्रक्रिया का हिस्सा था।
**खुलासा कैसे हुआ?**
बाद में जब कोर्ट के कर्मचारियों ने जज की कुर्सी और मंच पर सफेद सरसों के दाने देखे, तो उन्हें शक हुआ। इसके बाद कोर्टरूम के सीसीटीवी (CCTV) फुटेज की जांच की गई, जिसमें महिला साफ तौर पर अंदर जाकर दाने बिखेरती हुई दिखाई दी।
**अदालत की शिकायत और गिरफ्तारी**
अदालत की मुख्य प्रशासनिक अधिकारी नेत्रा की शिकायत पर चिक्कबल्लापुर टाउन पुलिस ने कार्रवाई की। सीसीटीवी फुटेज और शिकायत के आधार पर 11 जुलाई को मंजुला को गिरफ्तार कर लिया गया। गिरफ्तारी के बाद उसे अदालत में पेश किया गया, जहां से उसे **14 दिन की न्यायिक हिरासत (Judicial Custody)** में भेज दिया गया है।
**ऐसा करने के पीछे की वजह:**
पुलिस जांच में सामने आया है कि मंजुला के परिवार से जुड़ा एक दीवानी विवाद (Civil Suit) इसी अदालत में पेंडिंग (लंबित) है। महिला के भाई वेंकटरामा इस मुकदमे में तीसरे प्रतिवादी (Respondent No. 3) हैं। महिला ने कथित रूप से यह तंत्र-मंत्र इसी अंधविश्वास में किया था कि ऐसा करने से मुकदमे का फैसला उसके परिवार के पक्ष में आ जाएगा।
**किस कानून के तहत हुई कार्रवाई?**
पुलिस ने आरोपी महिला के खिलाफ **कर्नाटक प्रिवेंशन एंड इरैडिकेशन ऑफ इनह्यूमन ईविल प्रैक्टिसेज एंड ब्लैक मैजिक एक्ट, 2017** (Karnataka Prevention and Eradication of Inhuman Evil Practices and Black Magic Act, 2017) के तहत मामला दर्ज किया है। फिलहाल पुलिस इस मामले की आगे की जांच कर रही है।

12/07/2026

नकली या भ्रामक AI से बने उदाहरण न्यायिक फैसलों को अस्थिर बनाते हैं; सुप्रीम कोर्ट ने NCLT और NCLAT के आदेशों को रद्द किय...
02/07/2026

नकली या भ्रामक AI से बने उदाहरण न्यायिक फैसलों को अस्थिर बनाते हैं; सुप्रीम कोर्ट ने NCLT और NCLAT के आदेशों को रद्द किया

देश की  #न्याय_व्यवस्था को अधिक तेज़,  #पारदर्शी और  #तकनीक-संचालित बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए नेशनल ...
11/06/2026

देश की #न्याय_व्यवस्था को अधिक तेज़, #पारदर्शी और #तकनीक-संचालित बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ़ टेक्नोलॉजी (NIC) ने “E-Prisons Early Release Processing Module” को लॉन्च किया है।
इस पहल पर हाल ही में #सुप्रीम_कोर्ट ने #संज्ञान लेते हुए न केवल इसकी सराहना की बल्कि संबंधित कार्यवाही को औपचारिक रूप से समाप्त भी कर दिया।

यह मामला #केस_टाइटल:- Surendra @ Sunda v. State of Uttar Pradesh से संबंधित था,
जिसमें उम्रकैद की सजा काट रहे कैदियों की समय से पहले #रिहाई की प्रक्रिया में हो रही #देरी का गंभीर मुद्दा उठाया गया था।

सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट की बेंच में भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्य कांत के साथ जस्टिस जे.के. माहेश्वरी, जस्टिस पंकज मित्तल, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस विपुल एम. पंचोली शामिल थे।

इससे पहले 13 अप्रैल 2026 को जस्टिस जे.के. माहेश्वरी और जस्टिस अतुल एस. चंदुरकर की बेंच ने इस पूरे विषय पर #विस्तृत_निर्देश जारी किए थे,
जिसमें देशभर में एक समान और #ऑटोमेटेड_सिस्टम विकसित करने पर जोर दिया गया था।

कोर्ट ने पाया कि विभिन्न राज्यों की #जेलों में सजा में छूट और समय से पहले रिहाई से जुड़े मामलों में लंबे समय तक #देरी हो रही
थी,
जिसका मुख्य कारण पारंपरिक फाइल-आधारित प्रक्रिया थी।

कई मामलों में योग्य कैदियों की अर्जियां वर्षों तक #लंबित पड़ी रहती थीं, जिससे न्याय में देरी हो रही थी।

इसी समस्या के समाधान के लिए #तकनीक आधारित प्रणाली विकसित करने का #निर्देश दिया गया था।

इसके बाद ने मौजूदा ्लेटफॉर्म के भीतर यह नया मॉड्यूल तैयार
किया,
जो अब ऐसे #कैदियों की पहचान करने, उनके मामलों को डिजिटल रूप से प्रोसेस करने और हर स्तर पर होने वाली देरी पर नज़र रखने में सक्षम है।

इसे शुरुआती तौर पर #आगरा_सेंट्रल_जेल और #लखनऊ जिला जेल में #पायलट_प्रोजेक्ट के रूप में लागू किया
गया,
जिसके #सकारात्मक परिणाम सामने आने के बाद इसे #देशव्यापी स्तर पर लागू करने की दिशा में कदम बढ़ाया गया।

सुप्रीम कोर्ट ने अपने हालिया आदेश में कहा कि इस पूरी व्यवस्था के क्रियान्वयन की जिम्मेदारी राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण ( ) और #जेल_प्रशासन के अन्य संबंधित अधिकारियों के साथ मिलकर निभाई जाएगी।

कोर्ट ने यह भी माना कि इस डिजिटल पहल से न केवल प्रक्रिया में तेजी आएगी बल्कि #पारदर्शिता भी बढ़ेगी
और योग्य कैदियों को समय पर #न्याय मिल सकेगा।

इसी आधार पर अदालत ने मामले की कार्यवाही को औपचारिक रूप से बंद करने का आदेश दिया।

इस महत्वपूर्ण प्रक्रिया में योगदान देने वाले एमिकस क्यूरी सीनियर एडवोकेट के. परमेश्वर और एडवोकेट रवि रघुनाथ की भी कोर्ट ने विशेष रूप से सराहना की, जिनके प्रयासों से यह पहल पायलट स्तर से आगे बढ़कर #राष्ट्रीय_स्तर तक पहुंच सकी।
देश की #न्याय_व्यवस्था को अधिक तेज़, #पारदर्शी और #तकनीक-संचालित बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ़ टेक्नोलॉजी (NIC) ने “E-Prisons Early Release Processing Module” को लॉन्च किया है।

⚖️ सुप्रीम कोर्ट ने देश की न्याय प्रणाली में देरी को लेकर एक बेहद महत्वपूर्ण और सख्त टिप्पणी करते हुए हाईकोर्टों के लिए ...
11/06/2026

⚖️ सुप्रीम कोर्ट ने देश की न्याय प्रणाली में देरी को लेकर एक बेहद महत्वपूर्ण और सख्त टिप्पणी करते हुए हाईकोर्टों के लिए समयबद्ध फैसले सुनाने की बाध्यकारी गाइडलाइन जारी की है। यह फैसला मुख्य रूप से Justice Surya Kant और Justice Joymalya Bagchi की पीठ द्वारा दिया गया, जिसमें अदालत ने साफ कहा कि अब फैसले सुरक्षित रखने के बाद अनिश्चित समय तक लंबित नहीं रखे जा सकते।

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी भी मामले में यदि फैसला सुरक्षित रखा गया है तो उसे अधिकतम तीन महीने के भीतर सुनाना अनिवार्य होगा। जमानत जैसे मामलों में तो आदेश उसी दिन सुनाकर अपलोड करना जरूरी होगा, और यदि किसी कारण से आदेश सुरक्षित रखा गया है तो उसे अगले दिन ही सार्वजनिक कर दिया जाना चाहिए। अदालत ने यह भी निर्देश दिया कि यदि तीन महीने की निर्धारित अवधि के भीतर फैसला नहीं सुनाया जाता, तो मामला संबंधित हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के समक्ष रखा जाएगा, और उसके बाद भी दो सप्ताह में निर्णय न होने पर मामला दूसरी पीठ को स्थानांतरित किया जा सकता है।

इसके अलावा कोर्ट ने यह व्यवस्था भी दी है कि यदि केवल ऑपरेटिव ऑर्डर सुनाया गया है तो विस्तृत कारणयुक्त निर्णय अधिकतम 15 दिनों के भीतर अपलोड करना होगा, जबकि खुली अदालत में सुनाए गए फैसले को 24 घंटे के भीतर हाईकोर्ट की वेबसाइट पर उपलब्ध कराना अनिवार्य होगा। जमानत या सजा निलंबन जैसे आदेशों को तत्काल संबंधित अधिकारियों तक पहुंचाने पर भी जोर दिया गया है ताकि किसी भी पात्र व्यक्ति की रिहाई बिना देरी के सुनिश्चित हो सके। अदालत ने यह भी अनिवार्य किया है कि हर फैसले में यह स्पष्ट रूप से दर्ज किया जाए कि निर्णय कब सुरक्षित रखा गया और कब सुनाया गया, ताकि पूरी प्रक्रिया में पारदर्शिता बनी रहे।

यह मामला झारखंड हाईकोर्ट में लंबित आपराधिक अपीलों में हुई देरी से जुड़ा था, जहां अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग से संबंधित चार दोषियों ने यह तर्क दिया था कि उनकी अपीलों की सुनवाई 2022 में पूरी होने के बावजूद वर्षों तक फैसला नहीं सुनाया गया, जो संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का उल्लंघन है। इस मामले में वरिष्ठ अधिवक्ता Fauzia Shakil ने भी समयबद्ध न्याय के लिए विस्तृत सुझाव कोर्ट के समक्ष रखे थे।

यह निर्णय भारतीय न्याय व्यवस्था में जवाबदेही और त्वरित न्याय सुनिश्चित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है, और पहले के 2001 के “अनिल राय बनाम बिहार राज्य” मामले में दिए गए निर्देशों को और अधिक मजबूत करता है।

📢 ऐसी ही अपडेट्स के लिए हमारे पेज को ज़रूर फॉलो करें और इस पोस्ट को शेयर करें।

बिग न्यूज़: उत्तर प्रदेश –प्रयागराज में मंसूर अहमद को 8 दिन तक अवैध तरीके से न्यायिक हिरासत में रखा गया। इलाहाबाद हाईकोर...
11/06/2026

बिग न्यूज़: उत्तर प्रदेश –
प्रयागराज में मंसूर अहमद को 8 दिन तक अवैध तरीके से न्यायिक हिरासत में रखा गया। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पीड़ित को 2 लाख रुपए मुआवजा देने का निर्देश UP सरकार को दिया है। यह पैसा प्रयागराज में तैनात ACP वेदव्यास मिश्रा की सैलरी से कटेगा।

हाईकोर्ट ने कहा है कि केवल शांतिभंग करने पर व्यक्ति को पर्सनल बॉन्ड भरने का अवसर देना चाहिए। गैरजरूरी न्यायिक हिरासत (जेल भेजने) से बचना चाहिए। 24 घंटे से ज्यादा गैर जरूरी न्यायिक हिरासत होने पर रोजाना 25 हजार रुपए मुआवजा दिया जाए।.. #उत्तरप्रदेश

Address

Amethi Sultanpur
Gauriganj
227405

Website

Alerts

Be the first to know and let us send you an email when Vidhi Niketan & Associate posts news and promotions. Your email address will not be used for any other purpose, and you can unsubscribe at any time.

Shortcuts

Share