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19/07/2022

भरण पोषण का आदेश हो जाने के बाद कैसे वसूली होता है:-

भरण पोषण एक प्रसिद्ध कानूनी अवधारणा है वर्तमान परिस्थितियों में भरण पोषण पति द्वारा छोड़ी गई पत्नी को प्राप्त हो रहा है। हालांकि कानून में ऐसा भरण पोषण प्राप्त करने का अधिकार हर उस व्यक्ति को है जो दूसरे व्यक्ति के ऊपर आश्रित रहता है। जैसे बच्चे को माता पिता से भरण-पोषण करने का अधिकार है, माता पिता को बच्चों से भरण पोषण प्राप्त करने का अधिकार है परंतु समाज में साधारण रूप से पति द्वारा छोड़ी गई पत्नी अधिकांश रूप से ऐसी भरण पोषण की याचिका लेकर न्यायालय में आती है।

भरण पोषण:- एक पति द्वारा छोड़ी गई पत्नी को हिंदू विवाह अधिनियम 1955, विशेष विवाह अधिनियम 1956, घरेलू हिंसा अधिनियम 2005 तथा दंड प्रक्रिया संहिता 1973 की धारा 125 के अंतर्गत भरण पोषण प्राप्त होता है। इन कानूनों के तहत कोई भी पत्नी भरण पोषण प्राप्त कर सकती है। इन कानूनों के तहत कोर्ट एक पत्नी को अपने पति से भरण-पोषण दिलवाने हेतु आदेश कर देती है। इन मामलों में सबसे बड़ी समस्या यह होती है कि यदि कोर्ट द्वारा भरण पोषण का आदेश कर दिया जाता है और पति ऐसे आदेश के बाद भी न्यायालय में भरण पोषण की राशि जमा नहीं कर रहा है तब पत्नी के पास में क्या रास्ता रहता है। उच्चतम न्यायालय में रजनीश विरुद्ध नेहा का मामला भरण पोषण की राशि की वसूली के मामले में एक अच्छा साइटेशन है। इस मामले में न्यायालय ने भरण-पोषण की राशि की वसूली के बहुत सारे तरीके बताए हैं और सभी बातों को स्पष्ट कर दिया है। यदि किसी पत्नी को दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 125 के अंतर्गत कोर्ट द्वारा भरण पोषण का आदेश दिया जाता है और उसके पति द्वारा भरण पोषण की राशि न्यायालय में जमा नहीं की जा रही है तब ऐसे आदेश से 1 साल बीत जाने के बाद भरण-पोषण की राशि की वसूली के लिए धारा 125 (3) के अंतर्गत एक आवेदन लगाकर न्यायालय से भरण-पोषण की राशि की वसूली के संबंध में निवेदन किया जा सकता है जब कभी इस प्रकार से राशि की वसूली के लिए आवेदन न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत किया जाता है तब न्यायालय वसूली वारंट के जरिए राशि की वसूली करता है। कोर्ट वारंट जारी करके पति से कहता है कि शीघ्र से शीघ्र हमारे द्वारा दिए गए आदेश में भरण पोषण की राशि जमा करें। यदि ऐसा भरण पोषण दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 125 के अंतर्गत नहीं किया जाता है तथा घरेलू हिंसा अधिनियम हिंदू विवाह अधिनियम या फिर विशेष विवाह अधिनियम के अंतर्गत किया जाता है तब न्यायालय राशि की वसूली एक उधार धन की राशि की वसूली के प्रकार किए जाने हेतु भी निर्देशित कर सकता अर्थात जिस प्रकार से उधार दिए गए धन की वसूली के लिए मुकदमा न्यायालय के समक्ष किया जाता है। इसी प्रकार से एक मुकदमा भरण-पोषण की राशि की वसूली के लिए भी न्यायालय में लगाया जा सकता है और इतना ही नहीं जिस प्रकार उधार धन की वसूली विपक्षी की संपत्ति को कुर्क करके की जाती है उसी प्रकार भरण पोषण की राशि की वसूली पति की संपत्ति को कुर्क करके की जा सकती है। रजनीश बनाम नेहा के मामले में न्यायालय ने यह भी कहा है कि भरण पोषण के मामले में पति और पत्नी दोनों को एक शपथ पत्र के माध्यम से अपनी आय और अपने खर्चों का स्पष्ट उल्लेख करना होगा तथा उसके अंतर्गत कोई भी झूठा तथ्य नहीं दिया जाएगा जो भी बातें सही हैं उन्हें सत्य प्रतिज्ञा के साथ न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत किया जाएगा। न्यायालय भरण पोषण की राशि तय करते समय पति और पत्नी दोनों की आय और उनके स्टेटस को देखेगा उसके बाद उनकी राशि के लिए आदेश करेगा। जब भरण-पोषण की राशि की वसूली के लिए मुकदमा न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत किया जाएगा न्यायालय वसूली का वारंट जारी करने के बाद व्यक्ति के लिए गिरफ्तारी वारंट भी जारी कर सकेगा और उसकी संपत्ति को कुर्क करने का आदेश भी दे सकेगा या फिर वे एक सरकारी सेवक है तो सीधे उसकी तनख्वाह में से राशि को काटने का आदेश भी जारी कर सकता है। इस मामले के बाद भरण पोषण की राशि की वसूली सरल हो जाती है और किसी भी पत्नी द्वारा सरलतापूर्वक भरण-पोषण की राशि को वसूल किया जा सकता है। न्यायालय भी व्यक्ति की संपत्ति तक को बेचकर इस राशि को प्राप्त करने का अधिकारी हो जाता है। यदि व्यक्ति ऐसी राशि का भुगतान नहीं करता है तब उसे हर 1 महीने की राशि के लिए 1 महीने की जेल भी भुगतने का आदेश किया जाता है। एक महीने के भरण पोषण के लिए एक माह के कारावास का प्रावधान किया गया है।

13/07/2022

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🅾️यदि सीआरपीसी की धारा 41, 41ए का उल्लंघन करते हुए गिरफ्तारी हुई है तो आरोपी जमानत का हकदार : सुप्रीम कोर्ट

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⬛सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि गिरफ्तारी के समय आपराधिक प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 41 और 41 ए का पालन न करने पर आरोपी को जमानत मिल जाएगी। जस्टिस संजय किशन कौल और जस्टिस एमएम सुंदरेश की पीठ ने कहा कि धारा 41 और 41 ए भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 के पहलू हैं।

🟦अदालत ने कहा, "जांच एजेंसियां और उनके अधिकारी संहिता की धारा 41 और 41 ए के आदेश और अर्नेश कुमार के फैसले में जारी निर्देशों का पालन करने के लिए बाध्य हैं। उनकी ओर से किसी भी तरह की लापरवाही को उच्च अधिकारियों के संज्ञान में लाया जाना चाहिए।

☸️अदालत ने राज्य सरकारों और केंद्र शासित प्रदेशों को संहिता की धारा 41 और 41ए के तहत पालन की जाने वाली प्रक्रिया के लिए स्थायी आदेशों की सुविधा प्रदान करने का भी निर्देश दिया।

✳️धारा 41ए पुलिस अधिकारी के सामने पेश होने की प्रक्रिया से संबंधित है, जिसके लिए उस व्यक्ति को नोटिस जारी करना आवश्यक है जिसके खिलाफ उचित शिकायत की गई है, या विश्वसनीय जानकारी प्राप्त हुई है या एक उचित संदेह मौजूद है कि उसने एक संज्ञेय अपराध किया है और धारा 41(1) के तहत गिरफ्तारी की आवश्यकता नहीं है।

⏺️अर्नेश कुमार बनाम बिहार राज्य, (2014) 8 SCC 273 में, अदालत ने धारा 41(1)(b)(i) और (ii) की व्याख्या करते हुए कहा कि एक पुलिस अधिकारी के रूप में विश्वास करने के लिए एक कारण के अस्तित्व के बावजूद , गिरफ्तारी की आवश्यकता के लिए संतुष्टि भी मौजूद होगी।

सुप्रीम कोर्ट ने वर्तमान फैसले में कहा,

🟧 "इस न्यायालय ने स्पष्ट रूप से धारा 41(1)(बी)(i) और (ii) की व्याख्या करते हुए कहा है कि एक पुलिस अधिकारी की योग्यता पर विश्वास करने का कारण मौजूद होने के बावजूद गिरफ्तारी की आवश्यकता के लिए संतुष्टि भी मौजूद होगी।

🟫 इस प्रकार, धारा 41 के उप-खंड (1)(बी)(i) को उप-खंड (ii) के साथ पढ़ा जाना चाहिए और इसलिए 'विश्वास करने का कारण' और 'गिरफ्तारी के लिए संतुष्टि' दोनों तत्व अनिवार्य हैं और तदनुसार पुलिस अधिकारी द्वारा दर्ज किया जाना है।

कोर्ट ने कहा,

🟩"हम यह भी उम्मीद करते हैं कि धारा 41 और धारा 41 ए के उचित अनुपालन के बिना गिरफ्तारी करने वाले अधिकारियों पर अदालतें भारी पड़ सकती हैं। हम अपनी आशा व्यक्त करते हैं कि जांच एजेंसियां अर्नेश कुमार (सुप्रा) में निर्धारित कानून को ध्यान में रखेंगी।

⏩निर्दोषता के अनुमान की कसौटी पर प्रयोग किया जाना है और सीआरपीसी की धारा 41 के तहत प्रदान किए गए सुरक्षा उपाय, क्योंकि गिरफ्तारी अनिवार्य नहीं है। यदि ऐसी गिरफ्तारी को प्रभावित करने के लिए विवेक का प्रयोग किया जाता है तो प्रक्रियात्मक अनुपालन होगा। हमारा विचार व्याख्या से भी परिलक्षित होता है संहिता की धारा 60 ए के तहत विशिष्ट प्रावधान जो संबंधित अधिकारी को कोड के अनुसार सख्ती से गिरफ्तारी करने के लिए वारंट करता है।

🟥 अदालत ने कहा कि दिल्ली पुलिस 2020 का स्थायी आदेश नंबर 109, पुलिस अधिकारियों द्वारा नोटिस या आदेश जारी करने की प्रक्रिया के रूप में दिशानिर्देशों का एक सेट प्रदान करता है। "इस प्रकार हम सभी राज्य सरकारों और केंद्र शासित प्रदेशों को दिल्ली पुलिस द्वारा जारी आदेश 2020 के स्थायी आदेश नंबर 109 को ध्यान में रखते हुए स्थायी आदेशों की सुविधा के लिए निर्देश देना उचित समझते हैं, ताकि धारा 41A के जनादेश का पालन किया जा सके।

✴️ हमें लगता है कि यह निश्चित रूप से न केवल अनुचित गिरफ्तारी का ध्यान रखेगा, बल्कि विभिन्न न्यायालयों के समक्ष जमानत आवेदनों को भी रोकेगा क्योंकि सात साल तक के अपराधों के लिए उनकी आवश्यकता भी नहीं होगी।

कोर्ट ने कई निर्देश इस प्रकार जारी किए :

➡️ ए) भारत सरकार जमानत अधिनियम की प्रकृति में एक अलग अधिनियम की शुरूआत पर विचार कर सकती है ताकि जमानत के अनुदान को सुव्यवस्थित किया जा सके।
बी) जांच एजेंसियां और उनके अधिकारी संहिता की धारा 41 और 41 ए के आदेश और अर्नेश कुमार (सुप्रा) में इस न्यायालय द्वारा जारी निर्देशों का पालन करने के लिए बाध्य हैं। उनकी ओर से किसी भी प्रकार की लापरवाही को अदालत द्वारा उच्च अधिकारियों के संज्ञान में लाया जाना चाहिए

✡️सी) अदालतों को संहिता की धारा 41 और 41ए के अनुपालन पर खुद को संतुष्ट करना होगा। कोई भी गैर-अनुपालन आरोपी को जमानत देने का अधिकार देगा
डी) सभी राज्य सरकारों और केंद्र शासित प्रदेशों को रिट याचिका (सी) नंबर 7608/ 2018 में दिल्ली हाईकोर्ट के दिनांक 07.02.2018 के आदेश का अनुपालन करने और दिल्ली पुलिस द्वारा जारी स्थायी आदेश यानी स्थायी आदेश संख्या 109, 2020 के तहत संहिता की संहिता की धारा 41 और 41 ए के तहत पालन की जाने वाली प्रक्रिया के लिए निर्देशित किया जाता है।

⏹️ ई) संहिता की धारा 88, 170, 204 और 209 के तहत आवेदन पर विचार करते समय जमानत आवेदन पर जोर देने की आवश्यकता नहीं है।
एफ) सिद्धार्थ मामले में इस अदालत के फैसले में निर्धारित आदेश का कड़ाई से अनुपालन करने की आवश्यकता है (जिसमें यह माना गया था कि जांच अधिकारी को चार्जशीट दाखिल करते समय प्रत्येक आरोपी को गिरफ्तार करने की आवश्यकता नहीं है)।

🛑जी) राज्य और केंद्र सरकारों को विशेष अदालतों के गठन के संबंध में इस न्यायालय द्वारा समय-समय पर जारी निर्देशों का पालन करना होगा। हाईकोर्ट को राज्य सरकारों के परामर्श से विशेष न्यायालयों की आवश्यकता पर एक अभ्यास करना होगा। विशेष न्यायालयों के पीठासीन अधिकारियों के पदों की रिक्तियों को शीघ्रता से भरना होगा।

⏺️एच) हाईकोर्ट को उन विचाराधीन कैदियों का पता लगाने की क़वायद शुरू करने का निर्देश दिया जाता है जो जमानत की शर्तों का पालन करने में सक्षम नहीं हैं। ऐसा करने के बाद रिहाई को सुगम बनाने वाली संहिता की धारा 440 के आलोक में उचित कार्रवाई करनी होगी।
आई) जमानत पर जोर देते समय संहिता की धारा 440 के जनादेश को ध्यान में रखना होगा।

🟦जे) जिला न्यायपालिका स्तर और हाईकोर्ट दोनों में संहिता की धारा 436 ए के आदेश का पालन करने के लिए एक समान तरीके से एक अभ्यास करना होगा जैसा कि पहले भीम सिंह (सुप्रा) में इस न्यायालय द्वारा निर्देशित किया गया था, उसके बाद उचित आदेश होंगे।
के) जमानत आवेदनों का निपटारा दो सप्ताह की अवधि के भीतर किया जाना चाहिए, सिवाय इसके कि प्रावधान अन्यथा अनिवार्य हो, अपवाद हस्तक्षेप करने वाला आवेदन है। किसी भी हस्तक्षेप करने वाले आवेदन के अपवाद के साथ अग्रिम जमानत के लिए आवेदन छह सप्ताह की अवधि के भीतर निपटाए जाने की उम्मीद है।

❇️ एल) सभी राज्य सरकारों, केंद्र शासित प्रदेशों और हाईकोर्ट को चार महीने की अवधि के भीतर हलफनामे/ स्टेटस रिपोर्ट दाखिल करने का निर्देश दिया जाता है।

मामले का विवरण : - सतेंद्र कुमार अंतिल बनाम केंद्रीय जांच ब्यूरो |
2022 लाइव लॉ (एससी) 577 |
2021 का एमए 1849 | 11 जुलाई 2022
कोरम: जस्टिस संजय किशन कौल और एमएम सुंदरेश

10/07/2022

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🅾️सेक्स संबंध के बाद शादी से इनकार करना बलात्कार के अपराध के लिए पर्याप्त नहीं: केरल हाईकोर्ट

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🟫 केरल हाईकोर्ट ने यौन उत्पीड़न के मामले में केंद्र सरकार के वकील को जमानत देते हुए माना कि सेक्स संबंध के बाद शादी से इनकार करना बलात्कार के अपराध का गठन करने के लिए पर्याप्त नहीं है। जस्सिट बेचू कुरियन थॉमस ने कहा कि दो इच्छुक वयस्क सहमति से बनने वाले यौन संबंध भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 376 के दायरे में आने वाले बलात्कार की श्रेणी में नहीं आएंगे, जब तक कि यौन संबंध के लिए ली गई सहमति, धोखे से या गलत बयानी द्वारा से न ली गई हो।

कोर्ट ने कहा,

🟦 भले ही दो इच्छुक भागीदारों के बीच यौन संबंध विवाह में परिणत नहीं होते हैं, फिर भी इसे बलात्कार की श्रेणी में नहीं रखा जाएगा। सेक्स संबंध के बाद शादी से इनकार या रिश्ते के शादी तक पहुंचने से पहले ही खत्म हो जाना ऐसे कारक नहीं हैं जो बलात्कार के अपराध का गठन करने के लिए पर्याप्त हैं। पुरुष और महिला के बीच सेक्स संबंध केवल तभी बलात्कार के अपराध के दायरे में आ सकते हैं जब पुरुष महिला की इच्छा के विरुद्ध या उसकी सहमति के बिना बल या धोखाधड़ी से सहमति हासिल करता है।

🟩 कोर्ट ने यह भी कहा कि शादी के वादे पर होने वाले सेक्स के लिए सहमति केवल तभी बलात्कार होगी जब वादा धोखाधड़ी, झूठ बोलकर या बलपूर्वक लिया गया हो। कोर्ट ने कहा, "शादी के वादे का पालन करने में विफलता के कारण पुरुष और महिला के बीच शारीरिक संबंध को बलात्कार में बदलने के लिए यह आवश्यक है कि महिला का यौन कृत्य में शामिल होने का निर्णय किसी वादे पर आधारित होना चाहिए।

⬛एकल न्यायाधीश ने यह भी कहा कि झूठा वादा करने के लिए वादा करने वाले को इसे करते समय अपनी बात को कायम रखने का कोई इरादा नहीं होना चाहिए और उक्त वादे ने महिला को शारीरिक संबंध के लिए खुद को प्रस्तुत करने के लिए प्रेरित किया होगा। इसका तात्पर्य यह है कि शारीरिक मिलन और विवाह के वादे के बीच सीधा संबंध होना चाहिए।

🟪याचिकाकर्ता को पिछले महीने भारतीय दंड संहिता की धारा 376(2)(एन) और धारा 313 के तहत गिरफ्तार किया गया था। शिकायतकर्ता ने दलील दी थी कि वे पिछले चार साल से वे रिलेशनशिप में थे।

हालांकि,

🟧उसने पाया कि होटल में आरोपी दूसरी महिला से शादी कर रहा है। शिकायतकर्ता ने इसके तुरंत बाद कथित तौर पर अपनी कलाई काटकर आत्महत्या करने का प्रयास किया और उसे तुरंत अस्पताल में भर्ती कराया गया।

✳️अभियोजन पक्ष ने आगे आरोप लगाया कि जांच के दौरान यह पता चला कि पीड़िता को याचिकाकर्ता के कहने पर दो बार गर्भपात कराने के लिए मजबूर किया गया था, इसलिए आईपीसी की धारा 313 को भी शामिल किया गया। घटना का पता तब चला जब उसने पुलिस को बयान देकर आत्महत्या के प्रयास के पीछे का कारण बताया। इसी के तहत याचिकाकर्ता को गिरफ्तार किया गया।

मामले में नियमित जमानत की मांग करते हुए याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था।

🟥मामले को जब गुरुवार को उठाया गया तो न्यायालय ने युवा वयस्कों के बीच संबंधों की विकसित होती प्रकृति पर इसी तरह की टिप्पणियां कीं। न्यायाधीश ने कहा कि रिश्तों में इस बदलाव के कारण इन जोड़ों के टूटने और दूसरों से शादी करने के बाद बलात्कार के आरोपों की संख्या बढ़ रही है।

हालांकि,

❇️ इसका हमेशा यह अर्थ नहीं होता कि किसी एक साथी को शादी के झूठे वादे पर यौन संबंध बनाने के लिए मजबूर किया गया है। अदालत ने याचिकाकर्ता को कुछ शर्तों के अधीन जमानत दे दी। कोर्ट ने यह देखते हुए जमानत दी कि हालांकि उसके खिलाफ आरोप गंभीर हैं, फिर भी यह असंभव है कि वह न्याय से भाग जाएगा, क्योंकि वह केंद्र सरकार का वकील है।

केस टाइटल: नवनीत एन नाथ बनाम केरल राज्य
साइटेशन: 2022 लाइव लॉ (केरल) 335़

09/07/2022

लिव-इन रिलेशनशिप में रहने वाले कपल के क्या अधिकार है:-

बिना शादी किये साथ रहने वाले लोगों के ये अधिकार है? उससे जुड़े पांच एहम फैसले।
लिव-इन रिलेशनशिप का मतलब “शादी जैसा रिश्ता” होता है। जब एक अनमैरिड लड़का और लड़की मैरिड कपल की तरह एक ही छत्त के नीचे रहते है, तो उसे लिव इन रिलेशनशिप माना जाता है। लेकिन भारत के कानून में लिव इन रिलेशनशिप को ढंग से परिभाषित नहीं किया गया है। यहाँ लिव इन रिलेशनशिप को दो अनमैरिड लोगों के बीच ”नेचर ऑफ मैरिज” के तौर पर रखा जाता है।

इसीलिए कई बार समस्याएं जन्म लेती है। लेकिन कोर्ट ने काफी हद तक इन समस्याओं का हल निकाल दिया है। अभी तक लिव इन रिलेशनशिप को लेकर कोई कानून तो नहीं बनाया लेकिन कुछ केसिस के दौरान लिव-इन रिलेशनशिप में रहने वाले कपल के अधिकारों को जरूर परिभाषित किया गया है। आईये देखते है वो कौनसे अधिकार है।

लिव-इन रिलेशनशिप में रहने वाले कपल के अधिकार:-
(1) गुज़ारा भत्ता – लिव इन रिलेशनशिप में रह रही महिला भी घरेलू हिंसा कानून का इस्तेमाल कर सकती है। सुप्रीम कोर्ट के अनुसार , “अगर कोई महिला किसी आदमी के साथ लिव-इन में रहती है और महिला ये नहीं जानती की आदमी पहले से मैरिड है, तो इस सिचुएशन में दोनों पार्टनर्स के साथ रहने को ‘डोमेस्टिक रिलेशनशिप’ माना जाएगा।” और महिला को घरेलू हिंसा अधिनियम, 2005 के तहत गुज़ारा भत्ता लेने का अधिकार दिया गया है।

(2) कपल्स को सुरक्षा जरूर दी जाएगी – राजस्थान हाई कोर्ट ने एक केस में फैसला सुनाया था कि एक मैरिड व्यक्ति का लिव-इन रिलेशनशिप में रहना कानून की नजर में वैध नहीं थी। लेकिन उसे पुलिस प्रोटेक्शन दी जाएगी। कोर्ट का कहना है कि दो लोगों के रिलेशन को सामाज के विरुद्ध और अनैतिक माना जा सकता है, लेकिन फिर भी उन लोगों के जीवन के अधिकार और आजादी को नहीं छीना जा सकता है।

संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत सभी नागरिकों को जीवन के अधिकार और आजादी का अधिकार है और राजस्थान पुलिस एक्ट, 2007 के सेक्शन 29 के तहत, सभी नागरिकों की लाइफ और उनकी आजादी की रक्षा करना राज्य के सभी पुलिस अफसरों की ड्यूटी है।

(3) गुज़ारा भत्ता देना होगा वापस – दिल्ली हाई कोर्ट के अनुसार, एक लम्बे समय से चल रही शादी की तरह ही, लम्बे समय से चल रहे लिव इन रिलेशनशिप में ही महिला गुज़ारा भत्ता मांग सकती है।

मतलब लिव इन में रह रही महिला को उसके पार्टनर से गुज़ारा भत्ता तभी मिलेगा अगर वो बहुत लम्बे समय से एक साथ कपल की तरह रह रहे हो। महिला को कोर्ट में सबूत पेश करने होंगे कि वो और उसका लिव इन पार्टनर लंबे टाइम से साथ रह रहे है। और अगर महिला का दावा झूठा निकला तो उसे लिव-इन पार्टनर से इंटरिम मेंटेनेंस के रूप में मिले हुए सारे पैसे, ब्याज के साथ वापस लौटने होंगे।

(4) टाइम पीरियड – कपल के रिलेशनशिप का टाइम पीरियड बहुत अहमियत रखता है। अगर कपल कुछ दिनों तक साथ रहे फिर किसी कारण से अलग हो गए। फिर कुछ समय बाद साथ में कपल की तरह ही रहने लगे। तो यह सही नहीं माना जायेगा। लगातार एक ही छत्त के नीचे रहना जरूरी है। तभी कपल को लिव-इन पार्टनर्स समजह जायेगा और उसके अधिकार दिए जायेंगे।

हाई कोर्ट के अनुसार, अगर एक मैरिड महिला या पुरुष बिना डाइवोर्स लिए किसी और के साथ लिव-इन रिलेशनशिप में रहते है। तो यह सामजिक और नैतिक तौर पर गलत है। साथ ही, कानूनी तौर पर वैध नहीं है।
लिव इन रिलेशनशिप में रहने के लिए कंडीशंस:-
(1) बालिग़ – सबसे पहली शर्त है कि लिव-इन में रहने वाले दोनों पार्टनर्स बालिग़ मतलब 18+ होने चाहिए।

(2) अनमैरिड – अगर कोई लड़का और लड़की लिव-इन में रहना चाहते है, तो दोनों का अनमैरिड होना जरूरी है। अगर किसी पार्टनर की पहले शादी हुई है, तो उसकी डाइवोर्स की डिक्री जारी होने के बाद ही वो कानूनी रूप से लिव इन में रह सकते है।

(3) कपल की तरह रहना – लिव इन मे लड़का और लड़की को समाजिक तौर पर एक कपल की तरह ही पेश आना जरूरी है। एक दूसरे की तरफ अपनी जिम्मेदारियां निभाना आवश्यक है। और मैरिड कपल की तरह ही सेक्सुअल रिलेशन में रहना होगा।

27/05/2021

Wed, 26 May 2021
*दिल्ली लॉकडाउन : अब वकीलों को कर्फ्यू पास की जरूरत नहीं, लेकिन दिखाना होगा आईडी कार्ड*

*दिल्ली में लगे लॉकडाउन में अब वकीलों को आने-जाने के लिए कर्फ्यू पास की जरूरत नहीं है। वह अपना आईडी कार्ड दिखाकर जा सकते हैं। दिल्ली सरकार ने हाईकोर्ट को बताया कि कोरोना महामारी के चलते राजधानी में लागू लॉकडाउन में वकीलों को आवाजाही के लिए कर्फ्यू पास की जरूरत नहीं है। सरकार ने कहा है कि वकील अपना वैध पहचान पत्र दिखाकर जा सकते हैं।*

*सरकार ने एक अधिवक्ता की ओर से दाखिल याचिका पर जवाब दाखिल करते हुए यह जानकारी न्यायालय को दी है।*

*जस्टिस सुरेश कुमार कैत सरकार का पक्ष सुनने के बाद अब पुलिस व अन्य संबंधित प्राधिकार से कहा है कि यदि कोई वकील अपना वैध पहचान पत्र दिखाता है तो उन्हें नहीं रोका जाए। इसके साथ ही उन्होंने अधिवक्ता धर्मेंद्र की याचिका का निपटारा कर दिया। उन्होंने याचिका में याचिका में कहा था कि पुलिस वकीलों को जबरन कर्फ्यू पास के लिए मजबूर कर रही है और उनको ई-पास बनाने के लिए कह रही है। याचिका में कहा गया था कि 19अप्रैल,2021 को जारी आदेश के तहत वकीलों को पास बनाने की जरूरत नहीं है बल्कि उनका पहचान पत्र ही मान्य है। साथ ही कहा कि बावजूद इसके पुलिस अधिकारी वकीलों को परेशान कर रही है।*

जानें भारत में सिविल केस दर्ज कराने की प्रक्रिया क्या हैहम में से अधिकांश लोगों को कई बार आपसी विवाद के निबटारे के लिए अ...
04/02/2021

जानें भारत में सिविल केस दर्ज कराने की प्रक्रिया क्या है

हम में से अधिकांश लोगों को कई बार आपसी विवाद के निबटारे के लिए अदालत की शरण में जाना पड़ता है, जहां लंबे समय तक वकीलों के इर्द-गिर्द चक्कर लगाना पड़ता है. इसके पीछे सबसे महत्वपूर्ण कारण यह है कि अधिकांश लोग अदालत की कारवाई से वाकिफ नहीं हैं. अतः इस लेख में हम चरणबद्ध तरीके से उन सभी प्रक्रियाओं का विस्तृत विवरण दे रहे हैं जिसके तहत एक आम भारतीय नागरिक अदालत में सिविल केस दर्ज करवा सकता है.

भारत में सिविल केस दर्ज कराने की प्रक्रिया
भारत में सिविल केस दर्ज कराने के लिए एक विस्तृत प्रक्रिया निर्धारित है और यदि उस प्रक्रिया का पालन नहीं किया जाता है, तो रजिस्ट्रार के पास केस को खारिज करने का अधिकार होता है. भारत में सिविल केस दर्ज कराने की प्रक्रिया निम्नलिखित है:

मुकदमा / अभियोग दायर करना (Filing of Suit/Plaint)

आम आदमी की भाषा में अभियोग का अर्थ “लिखित शिकायत” या “आरोप” है. जो व्यक्ति मुकदमा दर्ज करवाता है, उसे "वादी" (Plaintiff) और जिसके खिलाफ केस दर्ज किया जाता है, उसे "प्रतिवादी" (Defendant) कहा जाता है. शिकायतकर्ता को अपना अभियोग सीमा अधिनियम में निर्धारित समय सीमा के भीतर दर्ज कराना होता है. अभियोग की प्रति टाइप होनी चाहिए और उस पर न्यायालय का नाम, शिकायत की प्रकृति, पक्षों के नाम और पता का स्पष्ट रूप से उल्लेख होना चाहिए. अभियोग में वादी द्वारा दिया गया शपथ-पत्र भी संलग्न होना चाहिए, जिसमें यह कहा गया हो कि अभियोग में उल्लिखित सभी बातें सही हैं.
जानें उपभोक्ता अदालत में केस दर्ज करने की प्रक्रिया क्या है?civil law

वकालतनामा (Vakalatnama)
"वकालतनामा" एक ऐसा दस्तावेज है, जिसके द्वारा कोई पार्टी केस दर्ज करवाने के लिए वकील को अपनी ओर से प्रतिनिधित्व करने के लिए अधिकृत करता है.
वकालतनामा में निम्नलिखित बातों का उल्लेख होता हैं:
(i) मुवक्किल (client) किसी भी फैसले के लिए वकील को जिम्मेदार नहीं ठहराएगा.
(ii) मुवक्किल (client) अदालती कार्यवाही के दौरान किए गए सभी खर्चों को वहन करेगा.
(iii) जब तक वकील को पूरी फीस का भुगतान नहीं किया जाता है, तब तक उसे केस से संबंधित सभी दस्तावेजों को अपने पास रखने का अधिकार होगा.
(iv) मुवक्किल (client) अदालती कार्यवाही के किसी भी स्तर पर वकील को छोड़ने के लिए स्वतंत्र है.
(v) वकील को अदालत में सुनवाई के दौरान मुवक्किल के हित में अपने दम पर निर्णय लेने का पूरा अधिकार होगा.
वकालतनामा को अभियोग की प्रति के आखिरी पृष्ठ के साथ जोड़कर अदालत के रिकॉर्ड में रखा जाता है. वकालतनामा तैयार करवाने के लिए कोई शुल्क की आवश्यकता नहीं होती है. हालांकि, आजकल दिल्ली हाई कोर्ट के नियमों के अनुसार वकालतनामा के साथ 10 रुपये का "अधिवक्ता कल्याण डाक टिकट" लगाया जाता है.
इसके बाद पहली सुनवाई के लिए, वादी को एक तारीख दी जाती है. इस दिन अदालत यह तय करता है कि कार्यवाही को आगे जारी रखना है या नहीं. यदि वह निर्णय करता है कि इस मामले में कोई सच्चाई नहीं है तो वह "प्रतिवादी" को बुलाए बिना ही केस को खारिज कर देता है. लेकिन यदि अदालत को लगता है कि इस मामले में कोई सच्चाई है तो वह कार्यवाही को आगे जारी रखता है.

अदालती कार्यवाही की प्रक्रिया

सुनवाई के पहले दिन यदि अदालत को लगता है कि इस मामले में सच्चाई है तो वह प्रतिवादी पक्ष को एक निश्चित तारीख तक अपना बहस दर्ज कराने के लिए नोटिस भेजता है. प्रतिवादी पक्ष को नोटिस भेजने से पहले वादी को निम्नलिखित कार्य करना आवश्यक है:
1. अदालती कार्यवाही के लिए आवश्यक शुल्क का भुगतान
2. अदालत में प्रत्येक प्रतिवादी के लिए अभियोग की 2 प्रतियां जमा करना अर्थात यदि 3 प्रतिवादी हैं, तो अभियोग की 6 प्रतियां जमा करना होगा. प्रत्येक प्रतिवादी के पास जमा किए गए अभियोग की 2 प्रतियों में से एक को रजिस्ट्री डाक / कूरियर के द्वारा भेजा जाता है, जबकि दूसरी प्रति को साधारण पोस्ट द्वारा भेजा जाता है.
3. अदालत में प्रतिवादी के पास भेजे जाने वाले अभियोग की प्रतियों को आदेश / नोटिस जारी करने की तारीख से 7 दिनों के भीतर जमा करना पड़ता है.
सूचना का अधिकार (RTI): आम आदमी का हथियारLaw suit

लिखित बयान (Written Statement)
जब प्रतिवादी को नोटिस जारी किया जाता है, तो उसे नोटिस में उल्लेखित तिथि पर अदालत में उपस्थित होना अनिवार्य है.

ऐसी तारीख से पहले, प्रतिवादी को अपना "लिखित बयान" दर्ज कराना पड़ता है अर्थात उसे 30 दिनों के भीतर या न्यायालय द्वारा दिए गए समय सीमा के भीतर वादी द्वारा लगाए गए आरोपों के खिलाफ अपना बचाव तैयार करना पड़ता है. लिखित बयान में विशेष रूप से उन आरोपों से इनकार करना चाहिए, जिसके बारे में प्रतिवादी सोचता है कि वह झूठे हैं.

यदि लिखित बयान में किसी विशेष आरोप से इनकार नहीं किए जाता है तो ऐसा समझा जाता है कि प्रतिवादी उस आरोप को स्वीकार करता है. लिखित बयान में प्रतिवादी का शपथ-पत्र भी संलग्न होना चाहिए, जिसमें यह कहा गया हो कि लिखित बयान में उल्लिखित सभी बातें सही है. लिखित बयान दर्ज कराने के लिए निर्धारित 30 दिनों की अवधि को अदालत की अनुमति से 90 दिनों तक बढ़ायी जा सकती है.

वादी द्वारा प्रत्युत्तर (Replication by Plaintiff)
"प्रत्युत्तर" वह जवाब है जो वादी द्वारा प्रतिवादी के "लिखित बयान" के खिलाफ दर्ज कराया जाता है. "प्रत्युत्तर" में वादी को लिखित बयान में उठाए गए आरोपों से इनकार करना चाहिए. यदि "प्रत्युत्तर" में किसी विशेष आरोप से इनकार नहीं किया जाता है तो ऐसा समझा जाता है कि वादी उस आरोप को स्वीकार करता है. "प्रत्युत्तर" में वादी का शपथ-पत्र भी संलग्न होना चाहिए, जिसमें यह कहा गया हो कि "प्रत्युत्तर" में उल्लिखित सभी बातें सही है. एक बार जब "प्रत्युत्तर" दर्ज हो जाती है तो याचिका पूरी हो जाती है.

अन्य दस्तावेजों को जमा करना (Filing of Other Documents)

जब एक बार याचिका पूरी हो जाती है तो उसके बाद दोनों पार्टियों को उन दस्तावेजों को जमा कराने का अवसर दिया जाता है, जिन पर वे भरोसा करते हैं और जो उनके दावे को सिद्ध करने के लिए आवश्यक हैं. अंतिम सुनवाई के दौरान ऐसे किसी दस्तावेज को मान्यता नहीं दी जाती है, जिसे अदालत के सामने पहले पेश नहीं किया गया है. एक बार दस्तावेज स्वीकार कर लेने के बाद वह अदालत के रिकॉर्ड का हिस्सा हो जाता है और उस पर केस से संबंधित सभी विवरण जैसे पक्षों के नाम, केस का शीर्षक आदि (O 13 R 49 7) अंकित किया जाता है. अदालत में दस्तावेजों का "मूल" प्रति ही जमा किया जाता है और उसकी एक अतिरिक्त प्रति विरोधी पक्ष को दिया जाता है.

मुद्दों का निर्धारण (Framing of Issues)
इसके बाद अदालत द्वारा उन "मुद्दों" को तैयार किया जाता है, जिसके आधार पर बहस और गवाहों से पूछताछ की जाती है. अदालत द्वारा मुकदमे के जुड़े विवादों को देखते हुए मुद्दों को तैयार किया जाता है और दोनों पार्टियों को "मुद्दे" के दायरे से बाहर जाने की अनुमति नहीं होती है. ये मुद्दे या तो तथ्यात्मक हो सकते हैं या कानूनी हो सकते है. अंतिम आदेश पारित करते समय अदालत प्रत्येक मुद्दों पर अलग से विचार करती है और प्रत्येक मुद्दे पर अलग से निर्णय देती है.

गवाहों की सूची (List of witness)
दोनों पार्टियों को केस दर्ज कराने की तारीख से 15 दिन के भीतर या अदालत द्वारा निर्देशित अन्य अवधि के भीतर अपने-अपने गवाहों की सूची अदालत में पेश करनी पड़ती है. दोनों पक्ष या तो गवाह को स्वंय बुलाते हैं या अदालत से उनसे समन भेजने के लिए कह सकते हैं. अगर अदालत किसी गवाह को समन भेजता है तो ऐसे गवाह को बुलाने के लिए संबंधित पक्ष को अदालत के पास पैसे जमा करने पड़ते हैं, जिसे "आहार मनी" (Diet Money) कहा जाता है. अंत में निर्धारित तारीख पर, दोनों पक्षों द्वारा गवाह से पूछताछ की जाती है. किसी पार्टी द्वारा अपने स्वयं के गवाहों से पूछताछ करने की प्रक्रिया को "एग्जामिनेशन-इन-चीफ" (Examination-in-chief) कहा जाता है, जबकि किसी पार्टी द्वारा विरोधी पक्ष के गवाहों से पूछताछ करने की प्रक्रिया को "क्रॉस एग्जामिनेशन" (cross Examination) कहा जाता है.
एक बार, जब गवाहों से पूछताछ की प्रक्रिया समाप्त हो जाती है और दस्तावेजों की जांच कर ली जाती है, तो अदालत अंतिम सुनवाई के लिए तारीख तय करता है.

अंतिम सुनवाई (Final Hearing)

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अंतिम सुनवाई के लिए निर्धारित तिथि को दोनों पक्ष अपने तर्क प्रस्तुत करते हैं. दोनों पक्षों को अपने तर्क प्रस्तुत करते समय केस से संबंधित मुद्दों का ख्याल रखना पड़ता है. अंतिम तर्क से पहले दोनों पक्ष अदालत की अनुमति से अपनी याचिकाओं में संशोधन कर सकते हैं. अंत में, अदालत "अंतिम फैसला" सुनाता है, जिसे या तो उसी तिथि को या अदालत द्वारा निर्धारित किसी अन्य तिथि को सुनाया जाता है.indian court hammer

आदेश की प्रमाणित प्रति (Certified copy of order)

आदेश की प्रमाणित प्रति उसे कहते हैं जिसमें अदालत के अंतिम आदेश के साथ अदालत की मुहर लगी होती है. अदालत द्वारा जारी आदेश के निष्पादन में या अपील के मामले में आदेश की प्रमाणित प्रति काफी उपयोगी होती है. आदेश की प्रमाणित प्रति की प्राप्ति के लिए मामूली शुल्क के साथ, संबंधित न्यायालय के रजिस्ट्री में आवेदन किया जा सकता है. हालांकि तत्काल आवश्यकता के मामले में कुछ अतिरिक्त राशि भी जमा करनी पड़ती है. "तत्काल आदेश" एक सप्ताह के भीतर प्राप्त किया जा सकता है, जबकि सामान्य रूप से आदेश की प्रमाणित प्रति प्राप्त करने में 15 दिन लग सकते हैं.

अपील, संदर्भ और समीक्षा (Appeal, Reference and Review)
जब किसी पार्टी के खिलाफ कोई आदेश पारित किया जाता है, तो ऐसा नहीं है कि उसके पास कोई उपाय नहीं होता है. ऐसी पार्टी अपील, संदर्भ या समीक्षा (Appeal, Reference and Review) के माध्यम से कार्यवाही को आगे बढ़ा सकती है.

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02/02/2021

आवाज की रिकार्डिंग कैसे प्रमाणित की जाए?

कॉल रिकॉर्डिंग को एक दस्तावेज जैसा सबूत माना जाता है और उस के माध्यम से किसी तथ्य को प्रमाणित किया जा सकता है। यह एक स्वाभाविक बात है कि जिस पक्ष के विरुद्ध आप किसी दस्तावेज को प्रस्तुत कर रहे हैं यदि वह उस के विरुद्ध जा रहा है तो वह उस दस्तावेज के असली होने से इन्कार कर सकता है। लेकिन न्यायालय में आरोपित व्यक्ति के मना कर देने से कोई तथ्य अप्रमाणित सिद्ध हो जाए तो फिर किसी भी मामले में निर्णय पर नहीं पहुँचा जा सकता।

काल रिकार्डिंग का उपयोग भारतीय न्यायालयों में वर्षों से हो रहा है। इस संबंध में अत्यन्त स्पष्ट कानून है। राम सिंह व अन्य बनाम कर्नल रामसिंह (1986 AIR 3, 1985 SCR Supl. (2) 399) के प्रकरण में सर्वोच्च न्यायालय ने इस संबंध में मानदंड स्पष्ट किए हैं जो निम्न प्रकार हैं-

“We think that the High Court was quite right in holding that the tape records of speeches were “documents” , as defined by Section 3 of the Evidence Act, which stood on no different footing than photographs, and that they were admissible in evidence on satisfying the following conditions:

(a) The voice of the person alleged to be speaking must be duly identified by the maker of the record or by others who knew it.

(b) Accuracy of what was actually recorded had to be proved by the maker of the record and satisfactory evidence, DIRECT or circumstances, had to be there as to rule out possibilities of tampering with the record.

(c) The subject matter recorded had to be shown to be relevant according to rules of relevancy found in the evidence Act.” (Ephes ours)

Thus, so far as this Court is concerned the conditions for admissibility of a tape recorded statement may be stated as follows:

(1) The voice of the speaker must be duly identified by the maker of the record or by others who recognise his voice. In other words, it manifestly follows as a logical corollary that the first condition for the admissibility of such a statement is to identify the voice of the speaker. Where the voice has been denied by the maker it will require very strick proof to determine whether or not it was really the voice of the speaker.

(2) The accuracy of the tape recorded statement has to be proved by the maker of the record by satisfactory evidence – direct or circumstantial. .

(3) Every possibility of tampering with or erasure of a part of a tape recorded statement must be ruled out otherwise it may render the said statement out of con text and, therefore, inadmissible.

(4) The statement must be relevant according to the rules of Evidence Act.

(5) The recorded cassette must be carefully sealed and kept in safe or official custody.

(6) The voice of the speaker should be clearly audible and not lost or distorted by other sounds or disturbances.

इस मामले में यह स्पष्ट किया गया है कि

1. जिस व्यक्ति की आवाज रिकार्ड की गयी है उसे रिकार्ड बनाने वाले द्वारा अथवा अन्य व्यक्तियों द्वारा स्पष्ट रूप से पहचाना जाना चाहिए कि यह उसी व्यक्ति की आवाज है जिस की कथित की गई है।

2. इस बात की संभावना नहीं होनी चाहिए कि जो आवाज रेकार्ड की गई है उस में कोई गड़बड़ी उत्पन्न की गई है।

3. जो वार्तालाप रिकार्ड किया गया है वह मामले से सुसंगत है।

इस तरह आवाज की रिकार्डिंग के मामले में सब से पहले यह सुनिश्चित होना चाहिए कि जो आवाजें रिकार्ड की गई हैं वे उन्हीं व्यक्तियों की हैं जिन की बताई जा रही हैं। इस के लिए उन्हें संबंधित व्यक्तियों द्वारा न्यायालय के समक्ष पहचान किया जाना चाहिए कि उन्हों ने उन व्यक्तियों की आवाजें सुनी हैं और वे उन्हें पहचानते हैं और वे उन्हीं व्यक्तियों की हैं। विशेष रूप से जब कि जिस की आवाज बताई जा रही है वह खुद अपनी आवाज होने से मना करे तो बहुत ही स्पष्ट रूप से ऐसी साक्ष्य न्यायालय के समक्ष उपलब्ध होनी चाहिए और इस बात की संभावना समाप्त हो जानी चाहिए कि इस में कोई गड़बड़ी उत्पन्न की गई है।

आप के मामले में रिकार्डिंग फोन में हुई है। वैसी स्थिति में वह फोन जिस में मूल रिकार्डिंग है न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत किया जाना चाहिए। यह साबित किया जाना चाहिए कि उस का प्रयोग उस समय उसी व्यक्ति द्वारा किया गया था जिस के लिए बताया गया है। किसी अन्य दवारा उस के उपयोग की कोई संभावना नहीं थी। इस के अलावा आप का तथा कुछ अन्य व्यक्तियों के बयान न्यायालय के समक्ष कराने चाहिए कि वे उस आवाज को पहचानते हैं।

यदि आप निर्विवादित रूप से ऐसी साक्ष्य प्रस्तुत कर सके तो आप वह सब प्रमाणित कर सकेंगे जो करना चाहते हैं।

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Delhi
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