कुँवर तेज़ प्रताप सिंह जादौन

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कुँवर तेज़ प्रताप सिंह जादौन ⚖️ Advocate And Solicitar ⚖️

⚔️ शौर्य, स्वाभिमान और राष्ट्रभक्ति के प्रतीकमेवाड़ के महान योद्धा Maharana Pratap जी की जयंती पर उन्हें कोटि-कोटि नमन। ...
08/05/2026

⚔️ शौर्य, स्वाभिमान और राष्ट्रभक्ति के प्रतीक
मेवाड़ के महान योद्धा Maharana Pratap जी की जयंती पर उन्हें कोटि-कोटि नमन। 🚩

मातृभूमि की रक्षा, स्वाभिमान और धर्म के लिए उनका संघर्ष सदैव हम सभी को प्रेरित करता रहेगा।
उनका त्याग, पराक्रम और अदम्य साहस भारतीय इतिहास के स्वर्णिम अध्याय हैं।
“घास की रोटी स्वीकार थी,परन्तु मातृभूमि का अपमान नहीं।”

महाराणा प्रताप जयंती की हार्दिक शुभकामनाएं। 🌸

⚖️ NDPS Act, 1985 | ज़रूरी कानूनी बातें (Important Points)🚨 NDPS कानून बहुत सख्त है, लेकिन Procedure में गलती = Bail का ...
01/05/2026

⚖️ NDPS Act, 1985 | ज़रूरी कानूनी बातें (Important Points)

🚨 NDPS कानून बहुत सख्त है, लेकिन Procedure में गलती = Bail का रास्ता

📌 महत्वपूर्ण पॉइंट्स:

1️⃣ Section 42 Violation
👉 गुप्त सूचना लिखित में नहीं ली = बड़ी कमी

2️⃣ Section 50 Rights
👉 तलाशी से पहले आरोपी को अधिकार बताना जरूरी
❌ नहीं बताया = तलाशी अवैध हो सकती है

3️⃣ Sampling / Sealing Issue
👉 सही सैंपलिंग और सील जरूरी
❌ गड़बड़ी = केस कमजोर

4️⃣ Chain of Custody
👉 जब्ती से FSL तक पूरा रिकॉर्ड जरूरी
❌ रिकॉर्ड गायब = संदेह

5️⃣ FSL Report Mismatch
👉 जब्ती और लैब रिपोर्ट में अंतर = केस पर असर

6️⃣ Independent Witness नहीं
👉 स्थानीय गवाह जरूरी
❌ सिर्फ पुलिस गवाह = शक पैदा होता है

7️⃣ Section 67 Confession
👉 (Tofan Singh Judgment)
❌ NDPS अधिकारी के सामने दिया बयान कोर्ट में मान्य नहीं

8️⃣ Default Bail (Sec 167(2) CrPC)
👉 180 दिन में चार्जशीट नहीं = बेल का अधिकार

📚 निष्कर्ष:
👉 NDPS में "Presumption of Guilt" होता है
👉 इसलिए Procedure का 100% पालन जरूरी
👉 छोटी गलती भी आरोपी को राहत दिला सकती है

⚖️📖

28/04/2026

क्या आपका चेक बाउंस हो गया है या आपको गलत तरीके से फंसाया जा रहा है? ⚖️📑
​अक्सर लोग चेक को हल्के में लेते हैं, लेकिन एक साइन और एक बाउंस आपकी मुश्किल बढ़ा सकता है। चाहे आप अपना पैसा वापस पाना चाहते हों या किसी झूठे केस से बचना चाहते हों—कानून की सही जानकारी ही आपका सबसे बड़ा हथियार है।
​आज की इस पोस्ट में समझें:
✅ चेक बाउंस होने पर लीगल नोटिस भेजने की समयसीमा।
✅ कोर्ट में केस दर्ज करने का सही तरीका।
✅ यदि आप पर गलत केस हुआ है, तो आपके पास क्या बचाव (Defences) हैं।
चेक बाउंस मामला: पूरी प्रक्रिया, अधिकार और बचाव ⚖️

⚠️ “सिर्फ एक चेक… और आपकी पूरी जिंदगी कोर्ट के चक्कर में पड़ सकती है!”
अगर आपका दिया हुआ चेक बाउंस हो गया —
तो सामने वाला सीधे आपके खिलाफ केस कर सकता है।
👉 कैसे?
बैंक चेक रिटर्न करेगा
30 दिन के अंदर आपको लीगल नोटिस आएगा
15 दिन में पैसे नहीं दिए → सीधा केस (धारा 138)
⚖️ सज़ा? 👉 जुर्माना + जेल तक हो सकती है

⚖️ चेक बाउंस मामला: पूरी प्रक्रिया, अधिकार और बचाव
🧾 1. चेक बाउंस क्या है?
जब कोई व्यक्ति आपके पक्ष में चेक देता है और बैंक उसे भुगतान नहीं करता (जैसे—पर्याप्त शेष राशि न होना, खाता बंद होना, भुगतान रोकना आदि), तो इसे चेक बाउंस कहा जाता है। ऐसे मामलों में धारा 138 के अंतर्गत आपराधिक कार्यवाही हो सकती है।
📌 2. वैध केस बनाने की अनिवार्य शर्तें
चेक कानूनी देनदारी/ऋण के भुगतान के लिए दिया गया हो।
चेक वैधता अवधि (आम तौर पर 3 माह) के भीतर बैंक में प्रस्तुत किया गया हो।
बैंक द्वारा चेक अस्वीकृत (Dishonour) हो गया हो।
चेक बाउंस के 30 दिनों के भीतर विधिक नोटिस भेजा गया हो।
नोटिस प्राप्ति के 15 दिनों के भीतर भुगतान न किया गया हो।
👉 इन शर्तों के बिना धारा 138 का मामला मज़बूत नहीं बनता।
🧑‍⚖️ 3. चेक बाउंस केस कैसे दर्ज करें (Step-by-Step)
🔹 चरण 1: बैंक से अस्वीकृति पर्ची लें
बैंक “रिटर्न मेमो” देता है—इसे सुरक्षित रखें।
🔹 चरण 2: विधिक नोटिस भेजें
बाउंस होने के 30 दिनों के भीतर रजिस्टर्ड/स्पीड पोस्ट से नोटिस भेजें।
नोटिस में राशि, चेक का विवरण और 15 दिनों में भुगतान की मांग लिखें।
🔹 चरण 3: प्रतीक्षा अवधि
नोटिस प्राप्ति के बाद 15 दिन का समय दें।
यदि भुगतान हो जाता है, तो मामला समाप्त।
🔹 चरण 4: शिकायत (Complaint) दायर करें
15 दिन बाद भी भुगतान न हो तो अगले 30 दिनों के भीतर न्यायालय में परिवाद (Complaint) दाखिल करें।
क्षेत्राधिकार: जहाँ चेक प्रस्तुत/जमा किया गया बैंक स्थित है (वर्तमान विधि के अनुसार)।
🔹 चरण 5: आवश्यक दस्तावेज
मूल चेक (या उसकी प्रमाणित प्रति)
बैंक का रिटर्न मेमो
विधिक नोटिस की प्रति व डाक रसीद/ट्रैकिंग
किसी भी प्रकार का समझौता/लेन-देन का प्रमाण
🔹 चरण 6: न्यायालयी कार्यवाही
न्यायालय संज्ञान लेकर समन जारी करता है।
दोष सिद्ध होने पर जुर्माना/कारावास (अधिकतम 2 वर्ष) या दोनों हो सकते हैं।
⚠️ 4. यदि आप पर झूठा चेक बाउंस आरोप लगाया गया हो (बचाव व समाधान)
🔍 आम झूठे आरोप की स्थितियाँ
आपने ब्लैंक/सिक्योरिटी चेक दिया था, जिसका दुरुपयोग हुआ।
चेक खो गया/चोरी हो गया और उसका दुरुपयोग किया गया।
कोई वास्तविक देनदारी (legally enforceable debt) थी ही नहीं।
चेक पर जाली हस्ताक्षर/छेड़छाड़ की गई।
🛡️ 5. आपका कानूनी बचाव (Defence Strategy)
✔ 1. देनदारी का अभाव सिद्ध करें
साबित करें कि कोई कानूनी ऋण/देनदारी नहीं थी (रसीदें, बैंक स्टेटमेंट, ई-मेल/चैट, समझौता आदि)।
✔ 2. ब्लैंक/सिक्योरिटी चेक का तथ्य
दिखाएँ कि चेक सुरक्षा हेतु दिया गया था, भुगतान हेतु नहीं।
सुप्रीम कोर्ट के सिद्धांतों के अनुसार, सिर्फ हस्ताक्षर होना पर्याप्त नहीं, देनदारी भी सिद्ध होनी चाहिए।
✔ 3. हस्ताक्षर/विवरण में विसंगति
हस्ताक्षर मिलान, स्याही/हस्तलिपि भिन्नता, दिनांक/राशि में परिवर्तन—इन पर आपत्ति उठाएँ।
✔ 4. समयसीमा/नोटिस में त्रुटि
नोटिस 30 दिनों में नहीं भेजा गया, या सेवा (service) सिद्ध नहीं—तो केस कमजोर पड़ता है।
परिवाद समयसीमा से बाहर दायर हुआ—तो भी आपत्ति लें।
✔ 5. बैंक/लेन-देन के साक्ष्य
अपने बैंक स्टेटमेंट, भुगतान के प्रमाण, पहले से निपटान (settlement) के सबूत प्रस्तुत करें।
🧭 6. आपको तुरंत क्या करना चाहिए (Practical Action)
👉 यदि आपके पक्ष का चेक बाउंस हुआ है
रिटर्न मेमो लें
30 दिन के भीतर विधिक नोटिस भेजें
15 दिन प्रतीक्षा करें
30 दिन के भीतर परिवाद दायर करें
👉 यदि आप पर झूठा आरोप है
तुरंत वकील से परामर्श लेकर जवाबी रणनीति बनाएं
नोटिस का समय पर उत्तर दें
अपने सभी दस्तावेज/साक्ष्य सुरक्षित करें
आवश्यकता हो तो धोखाधड़ी/जालसाजी के विरुद्ध अलग से शिकायत/एफआईआर पर विचार करें
🎯 7. निष्कर्ष (Conclusion)
चेक बाउंस केवल एक तकनीकी गलती नहीं, बल्कि कानूनी जिम्मेदारी का विषय है।
यदि आप पीड़ित हैं—तो समयसीमा के भीतर सही प्रक्रिया अपनाकर न्याय पाना संभव है।
यदि आप पर झूठा आरोप है—तो देनदारी के अभाव और साक्ष्यों के आधार पर मज़बूत बचाव उपलब्ध है।
👉 समयसीमा (30 दिन + 15 दिन + 30 दिन) का पालन ही सफलता की कुंजी है।
👉 सही दस्तावेज और सही रणनीति—मामले का परिणाम बदल देती है।

⚠️ हर साल 'डेवलपमेंट फीस' और 'री-एडमिशन फीस' के नाम पर वसूली!क्या आपका स्कूल भी हर साल बिल्डिंग फंड या री-एडमिशन के नाम ...
20/04/2026

⚠️ हर साल 'डेवलपमेंट फीस' और 'री-एडमिशन फीस' के नाम पर वसूली!
क्या आपका स्कूल भी हर साल बिल्डिंग फंड या री-एडमिशन के नाम पर भारी रकम वसूलता है?
कानूनी टिप: RTE Act की धारा 13 के तहत किसी भी प्रकार की 'Capitation Fee' (डोनेशन या बिना रसीद का शुल्क) मांगना एक दंडनीय अपराध है। ऐसा करने पर स्कूल पर मांगी गई रकम का 10 गुना तक जुर्माना लग सकता है।
इसके अलावा, यूपी सहित कई राज्यों में 'Fee Regulation Act' लागू है, जिसके तहत स्कूल मनमाने ढंग से फीस नहीं बढ़ा सकते। अगर स्कूल दबाव बनाए, तो 'ज़िला शुल्क नियामक समिति' (District Fee Regulatory Committee) में ऑनलाइन या ऑफलाइन शिकायत ज़रूर करें।



⚠️ Disclaimer: यह जानकारी केवल जागरूकता के लिए है। इसे कानूनी सलाह न मानें। हर केस के तथ्य अलग होते हैं, इसलिए कोई भी कदम उठाने से पहले विशेषज्ञ वकील से सलाह लें।

राजपूत सम्राट राणा सांगा जी की जयंती पर कोटि कोटि नमन 🙏🫡 जय राणा सांगा  ⚔️🚩🚩⚔️
12/04/2026

राजपूत सम्राट राणा सांगा जी की जयंती पर कोटि कोटि नमन 🙏🫡
जय राणा सांगा
⚔️🚩🚩⚔️

मालिक की जरूरत साबित होने पर किरायेदार को मकान खाली करना होगा:-हाईकोर्टइलाहाबाद हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि यदि मकान म...
05/04/2026

मालिक की जरूरत साबित होने पर किरायेदार को मकान खाली करना होगा:-हाईकोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि यदि मकान मालिक अपनी वास्तविक और bona fide आवश्यकता सिद्ध कर देता है, तो किरायेदार को संपत्ति खाली करनी होगी। अदालत ने कहा कि नए किरायेदारी कानून के लागू होने के बाद अब तुलनात्मक कठिनाई का प्रश्न पहले जैसा प्रभावी नहीं रह गया है।

न्यायालय ने माना कि संपत्ति पर मालिक का अधिकार सर्वोपरि है। यदि वह अपने या अपने परिवार की जरूरत के लिए मकान या दुकान मांगता है और उसकी आवश्यकता वास्तविक पाई जाती है, तो किरायेदार केवल लंबे समय से कब्जे का हवाला देकर उसे रोके नहीं रख सकता।

अदालत ने यह भी कहा कि कानून का उद्देश्य मालिक और किरायेदार के बीच संतुलन बनाना है, लेकिन वास्तविक आवश्यकता सिद्ध होने पर मालिक को उसकी संपत्ति से वंचित नहीं किया जा सकता।

इसी आधार पर हाईकोर्ट ने निचली अदालत के निर्णय को बरकरार रखते हुए किरायेदार को निर्धारित समय में परिसर खाली करने का निर्देश दिया।
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 !! जाली दस्तखत कर कई चार्जशीट बनाई, महिला सब इंस्पेक्टर का कारनामा ‼️ दोषी करार हो गयी अब होगा Jail जाना ‼️ कानून का पा...
04/04/2026

!! जाली दस्तखत कर कई चार्जशीट बनाई, महिला सब इंस्पेक्टर का कारनामा ‼️ दोषी करार हो गयी अब होगा Jail जाना ‼️ कानून का पालन कराने वालों द्वारा कानून का दुरईस्तेमाल,

अपने सीनियर अधिकारियों ACP /SHO के जाली हस्ताक्षर करी बहुत सारी CHARGESHEETS

 , अपराधियों के इतने हौसले बुलंद हो गए है वकीलों के परिवार पर गोली चला रहे हैं और दिल्ली पुलिस को हत्यारो का एक हफ़्ते स...
25/03/2026

, अपराधियों के इतने हौसले बुलंद हो गए है वकीलों के परिवार पर गोली चला रहे हैं और दिल्ली पुलिस को हत्यारो का एक हफ़्ते से कोई सुराग नही ।

दिल्ली पुलिस अब केवल नाम की पुलिस है जो केवल नेताओं और VIP लोगों की सुरक्षा के लिए रह गई है। आपराधिक जांच में ज़ीरो है ।

दिल्ली हाई कोर्ट ने 18 मार्च 2026 को बेल मामलों में एक बहुत महत्वपूर्ण बदलाव किया है — अब हर बेल एप्लीकेशन के साथ डिटेल्...
20/03/2026

दिल्ली हाई कोर्ट ने 18 मार्च 2026 को बेल मामलों में एक बहुत महत्वपूर्ण बदलाव किया है — अब हर बेल एप्लीकेशन के साथ डिटेल्ड एफिडेविट (शपथ पत्र) लगाना अनिवार्य कर दिया गया है।

अब क्या-क्या बताना होगा?

FIR नंबर, धाराएं और अधिकतम सजा
गिरफ्तारी की तारीख और कुल कस्टडी अवधि
ट्रायल की स्थिति (कितने गवाह, कितने जांचे गए)
पिछले आपराधिक मामले (अगर कोई हैं)
पहले की बेल एप्लीकेशन्स का पूरा विवरण
NBW / PO की स्थिति।

16/03/2026

मार्च को सूरजपुर जिला न्यायालय परिसर में उस समय तनावपूर्ण माहौल बन गया जब एक अधिवक्ता को कथित रूप से अवैध हिरासत

 #अधिवक्ता_साथियों_के_लिए_जरूरी_अनुभवअक्सर देखा गया है कि जब कोई अधिवक्ता अपने मुवक्किल के मामले में थाने जाता है, तो कु...
09/03/2026

#अधिवक्ता_साथियों_के_लिए_जरूरी_अनुभव

अक्सर देखा गया है कि जब कोई अधिवक्ता अपने मुवक्किल के मामले में थाने जाता है, तो कुछ पुलिस अधिकारी उसे गंभीरता से लेने के बजाय अभद्र व्यवहार करने लगते हैं। कई बार स्थिति बहस और टकराव तक पहुंच जाती है।

हमारे चैंबर के एक साथी अधिवक्ता एक बार अपने मुवक्किल के घरेलू हिंसा के मामले में जानकारी लेने थाने गए। वहां उनके साथ भी वही हुआ जो अक्सर अधिवक्ताओं के साथ होता है —
अभद्र भाषा, अनावश्यक रौब और अपमानजनक व्यवहार।
उन्होंने हमें फोन किया।

हमने उनसे सिर्फ एक ही बात कही —
“बहस मत करो, वापस आ जाओ।”

अगले दिन मजिस्ट्रेट कोर्ट में सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक निर्णय
“परमवीर सिंह सैनी बनाम बलजीत सिंह” के आधार पर एक आवेदन दिया गया कि जिस समय अधिवक्ता थाने में मौजूद थे उस समय की सीसीटीवी फुटेज कोर्ट में प्रस्तुत कराई जाए।

फिर जो हुआ, वह अपने आप में सबक है।
जिस थाने में कल तक “तुम” चल रहा था, वहां अचानक “आप” शुरू हो गया।
पूरा थाना परेशान हो गया।
फुटेज कोर्ट में प्रस्तुत हुई और अंत में संबंधित अधिकारी को दंडित भी किया गया।

सीख साफ है —

थाने में बहस मत कीजिए।
कानून को काम करने दीजिए।
क्योंकि
थाने की आवाज से ज्यादा ताकत अदालत के आदेश में होती है।
⚖️
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