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09/05/2021

तलाक (Divorce) से संबंधित कानून और अधिकारों को जानेंअपने अधिकारों से महिलाएं अक्सर अनजान रहती हैं और पारिवारिक कलह की स्थिति में अपना जीवन बर्बाद कर लेती हैं। इस ब्लॉग में जानें तलाक से जुड़े कानून और अधिकार।जागरूकता20 January 2021भारत में कोर्ट कचहरी से जुड़ी बातों पर ही लोग अक्सर घबराने लगते हैं और तलाक जैसे मुद्दों पर तो ज़्यादा खुलकर बात भी नहीं की जाती। हमारे समाज के सभी धर्मों में शादी को एक पवित्र रिश्ता समझा जाता है इसलिए किसी की शादी का टूट जाना अच्छा नहीं माना जाता। हालांकि कई बार पति-पत्नी के रिश्ते इस कदर बिगड़ जाते हैं कि तलाक लेना ही सही फैसला होता है। देखा जाता है कि तलाक या फिर पारिवारिक लड़ाई की स्थिति में महिलाएं ही ज़्यादातर नुकसान झेलती हैं। कई बार महिलाएं ससुराल में ही अत्याचार सहती रहती हैं तो कई बार बिना तलाक अलग रहने लगती हैं। वहीं, तलाक होने पर कई जानकारियों के अभाव में वे अपने अधिकारों का सही इस्तेमाल नहीं कर पाती हैं। इस ब्लॉग में हम तलाक के जुड़े सभी कानूनों और अधिकारों पर चर्चा करेंगे। क्या है तलाक (Divorce)? पति-पत्नी के कानूनी और सामाजिक तौर पर अलग हो जाने की प्रक्रिया को तलाक कहा जाता है। भारत में तलाक के लिए अलग-अलग कानून हैं (Divorce law in India) हमारे देश में तलाक विभिन्न धर्मों से संबंधित मैरिज एक्ट्स में लिखित धाराओं पर निर्भर करता है। सभी धर्मों में अलग-अलग कानूनों के हिसाब से तलाक की प्रक्रिया अपनाई जाती है। हिंदू, सिख, बौध व जैन धर्मों के लिए हिंदू मैरिज एक्ट 1955 लागू होता है। वहीं, मुस्लिम, पारसी और इसाई धर्मों के लिए अलग कानूनों का प्रावधान है। अंतर-जाति और अंतर-धार्मिक शादियों के लिए विशेष विवाह अधिनियम, 1954 है। इसलिए यहां हम आसान भाषा में तलाक के उन नियमों पर बात करेंगे जो सभी धर्मों के लोगों पर समान रूप से लागू हो सकते हैं। कब पड़ती है तलाक की ज़रूरत:- इन परिस्थितियों में कर सकते हैं तलाक के लिए आवेदन 1- आपसी सहमति से तलाक शादी टूट जाने की स्थिति में आपसी सहमति से तलाक सबसे सही तरीका है क्योंकि पति-पत्नी इसमें बिना सार्वजनिक विवाद के एक दूसरे से सम्मानजनक तरीके से अलग हो सकते हैं। यदि पति और पत्नी आपसी सहमति से अलग होना चाहते हैं तो इसके लिए जरूरी है कि वे एक दूसरे से 1 साल तक अलग रह रहे हों। इसके बाद वे कोर्ट में आपसी सहमति से तलाक की अर्जी दे सकते हैं। हालांकि इसमें भी अदालत द्वारा एक बार दंपति में सुलह समझौते की कोशिश की जाती है। 2- विवाद की स्थिति ये स्थिति तब पैदा होती है जब एक पक्ष तलाक की मांग करता है और दूसरा पक्ष शादी को बनाए रखना चाहता है। ऐसी स्थिति में कोर्ट में केस लड़ा जाता है। बिना आधार के कोर्ट में तलाक की मांग नहीं की जा सकती। विवाद की स्थिति में इन आधारों पर तलाक की अर्जी दी जा सकती है- उत्पीड़न- एक पक्ष द्वारा मानसिक या शारीरिक उत्पीड़न किए जाने की स्थिति में दूसरा पक्ष अदालत में तलाक की अर्जी दे सकता है। दहेज उत्पीड़न के मामलों में कई बार तलाक की मांग की जाती है। व्याभिचार- यदि पति किसी दूसरी स्त्री के साथ शारीरिक संबंध बनाता है तो पत्नी कोर्ट में तलाक के लिए केस दर्ज करवा सकती है। हालांकि पत्नी द्वारा शादी के बाहर संबंध बनाने पर पति ,पत्नी पर व्याभिचार का मामला दर्ज नहीं करवा सकता। मानसिक बीमारी- यदि एक पक्ष मानसिक तौर पर बीमार है और सामान्य वैवाहिक जीवन जीने के काबिल नहीं है तो ऐसी स्थिति में दूसरा पक्ष तलाक की मांग कर सकता है। संक्रामक रोग- यदि पति या पत्नी में से कोई किसी फैलने वाली गंभीर बीमारी से पीड़ित है जैसे- एड्स, कुष्ठ रोग आदि। ऐसी स्थिति में भी दूसरे पक्ष द्वारा तलाक की मांग की जा सकती है। धर्म परिवर्तन- यदि शादी के बाद पति या पत्नी अपना धर्म बदल ले और दूसरा पक्ष इसमें सहज नहीं है तो वो तलाक के लिए केस फाइल कर सकता है। परित्याग करने पर- यदि पति या पत्नी 2 साल से ज़्यादा समय से साथ न रह रहे हों तो ऐसी स्थिति में दूसरे पक्ष द्वारा तलाक की मांग की जा सकती है। लापता होने की स्थिति में- यदि पति या पत्नी में से कोई 7 साल से ज़्यादा समय से लापता हो तो ऐसी स्थिति में उसे मृत माना जाएगा और दूसरा पक्ष कानूनन तलाक की अर्जी दे सकता है। बलात्कार या अप्राकृतिक यौन संबंध- यदि पति द्वारा पत्नी के साथ जबरन संबंध या अप्राकृतिक यौन संबंध बनाए जाते हैं तो इस स्थिति में भी पत्नी द्वारा कोर्ट में केस किया जा सकता है। तलाक लेने की प्रक्रिया तलाक के लिए फैमिली कोर्ट या जिला कोर्ट में तलाक की याचिका दायर की जाती है। कोर्ट द्वारा 6 महीने का समय सुलह के लिए दिया जाता है।इसके बाद सुनवाई शुरू होती है और दोनों पक्षों के बयान दर्ज किए जाते हैं।विवाद की स्थिति में गवाहों और सबूतों की मदद ली जाती है।आखिरी चरण में कोर्ट अपना फैसला सुनाता है और तलाक होने पर पति-पत्नी कानूनी तौर पर अलग हो जाते हैं। तलाक के बाद का जीवनतलाक के बाद का जीवन निश्चित तौर पर दोनों पक्षों के लिए मुश्किल होता है। लेकिन भारतीय समाज में महिलाओं के लिए ज़्यादा मुश्किलें सामने आती हैं। देखा जाता है कि तलाक के बाद ज़्यादातर पुरूष विवाह कर लेते हैं तो ज़्यादातर महिलाएं अकेले ही जीवन बिता देती हैं। इसलिए महिलाओं को संपत्ति और बच्चों संबंधी अपने अधिकारों का ज्ञान होना चाहिए ताकि वे तलाक के बाद खुशहाल जीवन बिता सकें। गुजारा भत्ता हिंदू मैरिज एक्ट के मुताबिक जब तक तलाक की प्रक्रिया पूरी नहीं हो जाती तब तक पति द्वारा पत्नी को गुजारा भत्ता देना होगा। वहीं, तलाक हो जाने के बाद पति को गुजारा भत्ता की एकमुश्त राशि पत्नी को देनी होगी। अगर पत्नी चाहे तो वो सालाना या मासिक गुजारा भत्ते की भी मांग कर सकती है। जिस पर कोर्ट अपना आखिरी फैसला देगा। संपत्ति पर अधिकार तलाक के बाद पत्नी के नाम जितनी भी संपति है उस पर उसका पूरा अधिकार होगा।शादी के समय मिले उपहारों व नकदी पर भी पत्नी का अधिकार होता है। ज्वॉइंट प्रापर्टी पर पत्नी को बराबर का हिस्सा मिलेगा, पत्नी चाहे तो अपने हिस्से की संपत्ति बेच सकती है। बच्चों की कस्टडी 7 साल से कम उम्र के बच्चे की कस्टडी हमेशा मां को ही सौंपी जाती है।7 साल से ज़्यादा आयु के बच्चे की कस्टडी के लिए दोनों पक्ष कोर्ट में अप्लाई कर सकते हैं।कस्टडी के लिए अप्लाई करने वाले पक्ष को अदालत में साबित करना होगा कि वे उसकी अच्छी देखभाल करने में सक्षम हैं। हालांकि फैमिली एक्ट 1984 में ये स्पष्ट किया गया है कि तलाक से पहले कोर्ट के जज दोनों पक्षों में सुलह की कोशिश करें। इसके लिए पुलिस थानों, परिवार परामर्श केंद्रों और वन स्टॉप सेंटर्स पर भी कॉउंसलिंग मुहैया करवाई जाती है ताकि शादियों को टूटने से बचाया जा सके। पति पत्नी में लड़ाई की परिस्थितियों में भावनाएं दिमाग पर हावी हो जाती हैं, इसलिए जल्दबाजी में तलाक जैसा फैसला ना लें।

13/02/2021

रेंट एग्रीमेंट – आजकल अतिरिक्त आमदनी के स्रोतों में किराया सबसे अधिक प्रचलित है। जिन लोगों के पास कोई खाली मकान अथवा प्रॉपर्टी है। तो वह आपने प्रॉपर्टी को किराए पर देकर अपने आय के साधनों में बढ़ोतरी करते हैं। वहीं दूसरी तरफ ऐसे लोगों को जिन्हें मकान आदि की जरूरत होती है। वह किराए पर मकान लेकर अपना काम चला लेते हैं। बढ़ती महंगाई के कारण हर कोई अपना आशियाना नहीं बना सकता है। इसलिए किराए पर मकान लेकर लोग अपना जीवन व्यतीत करते हैं।किराए पर सामान लेना काफी समय से चला आ रहा है। जब भी कोई व्यक्ति को किसी ऐसी वस्तु की जरूरत होती है। जो उसके पास नहीं है। और वह व्यक्ति उस वस्तु को खरीदने में असमर्थ है। तब ऐसी स्थिति में वह व्यक्ति ऐसी जरूरी वस्तु को किराए पर लेकर अपना काम चला लेता है।किराए पर कोई वस्तु लेते समय किराए पर देने और लेने वाले व्यक्ति के बीच में कुछ समझौता होता है। पहले यह समझौता जुबानी तौर पर हो जाया करता था। क्योंकि तब लोगों के बीच में काफी ज्यादा मेल भाव होता था। लेकिन आज के आधुनिक युग में लोगों की बढ़ती चालाकी से अब यह सब प्रक्रिया कानूनी तौर पर पूरी की जाती है। जिसे हम रेंट एग्रीमेंट / किरायानामा के नाम से जानते हैं।

यदि आप भी कोई मकान अथवा प्रॉपर्टी किसी व्यक्ति को किराए पर दे रहे हैं। या किसी व्यक्ति से किराए पर ले रहे हैं। तो आपको कानूनी तौर पर रेंट एग्रीमेंट / किरायानामा बनवा लेना चाहिए। ताकि आप भविष्य में किसी प्रकार की समस्याओं और विवादों से बचे रहें। और रेंट पर लिए गए मकान और और प्रॉपर्टी का सही तरीके से उपयोग कर सके। अक्सर लोग किराए पर मकान लेते समय रेंट एग्रीमेंट / किरायानामा तो बनाते हैं। लेकिन उस में लिखी बातों पर ध्यान नहीं देते हैं। जिसके कारण उन्हें भविष्य में कई तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ता है। इसलिए आज हम आपको इस आर्टिकल के माध्यम से बताएंगे कि आपको रेंट एग्रीमेंट / किरायानामा बनाते समय कौन-कौन सी बातों का ध्यान रखना चाहिए।रेंट एग्रीमेंट / किरायानामा बनवाने के बारे में जानने से पहले यह जानना बेहद आवश्यक है। कि आखिर रेंट एग्रीमेंट / किरायानामा क्या होता है? बात करें रेंट एग्रीमेंट / किरायानामा की तो रेंट एग्रीमेंट / किरायानामा एक ऐसा दस्तावेज है। जो किसी प्रॉपर्टी को किराए पर देने से पहले किराएदार और मकान मालिक के बीच में समझौते के तौर पर बनाया जाता है। इसमें मकान मालिक की सभी शर्तें लिखी जाती हैं। जिस पर मकान मालिक और किराएदार अपनी सहमति देते हुए इस पर अपने दस्तखत करते हैं।लिखित रूप में सभी नियम और शर्तों पर सहमत होने के पश्चात किराएदार और मकान मालिक के बीच में किसी प्रकार असमंजस नहीं रह जाता है। इसके साथ ही यदि भविष्य में मकान मालिक द्वारा या किराएदार द्वारा किसी प्रकार के बदलाव करने हैं। तो इसके लिए उसे 30 दिन पहले नोटिस देना होता है।
रेंट एग्रीमेंट / किरायानामा बनाने के लिए आपको निम्नलिखित दस्तावेजों की आवश्यकता होगी –

किराएदार मकान मालिक दोनों का आधार कार्ड की फोटो कॉपी एवं ओरिजिनल
दो गवाह एवं गवाहों के आइडेंटी प्रूफ के रूप में आधार कार्ड की फोटो कापी एवं ओरिजिनल
स्टांप पेपर
किराएदार मकान मालिक का पासपोर्ट साइज फोटो
मकान का किराया एवं सिक्योरिटी धनराशि
यदि आप किरायेदार हैं। या फिर आप मकान मालिक हैं। तो अपना कोई मकान या प्रॉपर्टी किराए पर देने से पहले रेंट एग्रीमेंट / किरायानामा जरूर तैयार करा लें। साथ ही रेंट एग्रीमेंट / किरायानामा बनाते समय नीचे बताई जा रही आवश्यक बातों का ध्यान जरूर रखें –

जब भी आप कोई किरायानामा अथवा रेंट एग्रीमेंट / किरायानामा बनवाए। तो उसे हमेशा ₹100 के स्टांप पेपर पर ही बनवाएं। अक्सर लोग ₹50 के स्टांप पेपर पर रेंट एग्रीमेंट / किरायानामा तैयार करवा लेते हैं। जो कि मान्य नहीं है।
स्टांप पेपर एक्ट के अनुसार किसी भी प्रकार के जनरल एग्रीमेंट को ₹100 के स्टांप पेपर पर ही बनवाना चाहिए।
रेंट एग्रीमेंट / किरायानामा पर यह साफ तौर पर लिखा होना चाहिए। कि कौन सी प्रॉपर्टी आप कितने समय के लिए रेंट पर ले रहे हैं। और किरायानामा आपका किस दिन से किस तारीख को बनाया जा रहा है।
स्टांप पेपर पर किराएदार और मकान मालिक दोनों के हस्ताक्षर होना बेहद जरूरी है।
इसके साथ ही कोई भी रेंट एग्रीमेंट / किरायानामा बिना गवाहों के पूरा नहीं माना जाता है। इसलिए इसके साथ दो गवाह भी होने आवश्यक है।
किरायानामा पर मकान मालिक और किराएदार दोनों का नाम पता साफ-साफ लिखा होना चाहिए। जोकि आधार कार्ड के अनुसार होना चाहिए।
रेंट एग्रीमेंट / किरायानामा में मकान या प्रॉपर्टी का किराया देने की तारीख या अवधि भी लिखी जानी चाहिए। साथ ही यदि किराया देने में किसी प्रकार की देरी होती है। तो उसके लिए कितनी पेनल्टी होगी। और यह पेनाल्टी कितने समय की देरी के लिए होगी। यह भी साफ तौर पर लिखा होना चाहिए।
साथ ही किराएदार द्वारा मकान मालिक को सिक्योरिटी के तौर पर दिए जाने वाली रकम का भी किरायानामा पर स्पष्ट रूप से उल्लेख हो ना चाहिए।
बिजली, पानी आदि का भुगतान यह किराए में नहीं है। तो इसका जिक्र भी किरायानामा में अवश्य रूप से करना चाहिए।
मकान या प्रॉपर्टी किराए पर देने में मकान मालिक द्वारा कौन-कौन सी सुविधाएं किराएदार को प्रदान की जाएंगी। इसका भी उल्लेख किरायानामा पर होना आवश्यक है। यह सुविधाएं – पंखा, गीजर, लाइट, फिटिंग, पानी और पानी का मोटर आदि हो सकती हैं।
मकान मालिक द्वारा घर खाली कराने या किराएदार द्वारा घर छोड़ने से 1 महीने पहले लीगल नोटिस देना भी आवश्यक है। इसलिए किरायानामा पर यह भी लिखा जाना चाहिए। कि कितने समय पहले लीगल नोटिस दिया जाना चाहिए।
रेंट एग्रीमेंट / किरायानामा बनाते समय अन्य आवश्यक बातें –
ऊपर बताई गई जानकारी के साथ साथ और भी कई ऐसी बातें हैं। जिनका ध्यान आपको रेंट एग्रीमेंट / किरायानामा बनवाते समय रखना चाहिए। ये बातें इस प्रकार हैं –

गवाह की पात्रता देखें – रेंट एग्रीमेंट / किरायानामा बनाते समय जिन 2 लोगों की गवाही लग रही है। वह गवाह शारीरिक और मानसिक रूप से पूरी तरह सक्षम होना चाहिए। साथ ही गवाहों की उम्र 18 वर्ष से ऊपर होनी चाहिए। और उन पर किसी भी प्रकार का कोई दवाब नहीं होना चाहिए।

एग्रीमेंट की समयसीमा रजिस्टर करें – यदि आप एग्रीमेंट को सिर्फ नोटरी करवा रहे हैं। तो आप अपना एग्रीमेंट 11 महीने का ही बनाना चाहिए। क्योंकि 11 महीने का एग्रीमेंट सरकार की दृष्टि में अनरजिस्टर्ड होता है। जिसका उपयोग किया जा सकता है।
प्रॉपर्टी पर कोई विवाद है या नहीं – आपको यह भी चेक करना है। जो प्रॉपर्टी आपको किराए पर ले रहे हैं। उस पर किसी प्रकार का कोई विवाद या स्टे तो नहीं है।
मकान किराए पर लेते समय ध्यान देने योग्य बातें –
किसी व्यक्ति को मकान किराए पर देते समय आपको निम्न कार्य करने चाहिए –

पुलिस वेरीफिकेशन – किसी व्यक्ति को आप मकान किराए पर देते हैं। तो उसका पुलिस वेरीफिकेशन जरूर करवा लें। जो कि कानूनी तौर पर भी बेहद जरूरी है। पुलिस वेरिफिकेशन से आपको यह पता चल जाएगा। कि वह व्यक्ति अपराधिक प्रवृत्ति का तो नहीं है। यदि व्यक्ति अपराध प्रवृति का है। तो आपको भविष्य में परेशानी का सामना करना पड़ सकता है।

मकान का मैटेनंस – मकान की किसी भी प्रकार की रिपेयरिंग और रंगाई पुताई का दायित्व मकान मालिक का ही होता है। किराएदार को यह अधिकार प्राप्त है। कि वह इसके बारे में मकान मालिक से कह सकता है।

किराए की बढ़ोतरी – रेंट एग्रीमेंट / किरायानामा 11 महीने तक ही वैध होता है। और नए एग्रीमेंट मकान मालिक 10% तक का किराया वृद्धि कर सकता है। लेकिन यदि कोई मकान मालिक तो 10% से ज्यादा किराया में वृद्धि करता है। तो इस पर किराएदार आपत्ति जता सकता है।

मकान का असली मालिक कौन है – मकान किराए पर लेने से पहले यह जानना भी बेहद आवश्यक है। कि जिस व्यक्ति से आप मकान किराए पर ले रहे हैं। वह व्यक्ति मकान का असली मालिक है या नहीं। यदि वह मकान का असली मालिक नहीं है। तो क्या उसके पास रि – टेनेंसी का अधिकार है। यदि आप यह सावधानी नहीं रखते हैं। तो मकान का असली मालिक बिना किसी नोटिस के मकान खाली करवा सकता है।

रेंट एग्रीमेंट / किरायानामा से मिलने वाले लाभ –
रेंट एग्रीमेंट / किरायानामा का उपयोग करके आप निम्नलिखित लाभ प्राप्त कर सकते हैं –

टैक्स में छूट – यदि आप इनकम टैक्स रिटर्न फाइल करते हैं। तो आप रेंट एग्रीमेंट / किरायानामा के आधार पर टैक्स में छूट प्राप्त कर सकते हैं। बिना रेंट एग्रीमेंट / किरायानामा के यदि आप किराए पर रहते हैं। तो आप इसके लिए इनकम टैक्स रिटर्न में क्लेम नहीं कर सकते हैं।

रेजिडेंसी डॉक्युमेंट्स के रूप में यूज कर सकते हैं – किरायानामा आपका एक वैध रेजिडेंसी प्रूफ है। जिसका उपयोग आप कहीं पर भी रेजिडेंसी डॉक्यूमेंट के रूप में कर सकते हैं। किरायानामा का उपयोग आप गैस कनेक्शन लेने, अपना पहचान प्रमाण पत्र बनवाने, पासपोर्ट, लाइसेंस आदि बनवाने कर सकते हैं।

प्रॉपर्टी पर कोई विवाद है या नहीं – आपको यह भी चेक करना है। जो प्रॉपर्टी आपको किराए पर ले रहे हैं। उस पर किसी प्रकार का कोई विवाद या स्टे तो नहीं है।

18/05/2019

पिता की संपत्ति में बेटी का बेटे जैसा बाराबर हक, कोई मना नहीं कर सकता
आमतौर पर हिन्दू परिवार में पिता की संपत्ति पर बेटे का पूरा अधिकार माना जाता है। लेकिन, हकीकत में ऐसा नहीं है। पिता की संपत्ति पर बेटी का भी बेटा जैसा बाराबर का हक है। सरकार ने हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 में साल 2005 में संशोधन कर बेटियों को पिता के पैतृक संपत्ति में समान हिस्सा पाने का कानूनी अधिकार दिया गया। इस कानून में संशोधन होने से बेटियां अपने पिता की पैतृक संपत्ति में हक ले सकती हैं। और पिता, भाई या दूसरे रिश्तेदार इसको देने से मना नहीं कर सकते हैं।

पैतृक संपत्ति में जन्मसिद्ध अधिकार
हिंदू कानून में संपत्ति को दो श्रेणियों में बांटा गया है, पैतृक और खुद से अर्जित संपत्ति। पैतृक संपत्ति के तहत चार पीढ़ी पहले से अर्जित प्रॉपर्टी आती हैं, जिनका बटवारा नहीं हुआ है। इस तरह की प्रॉपर्टी में बेटी का जन्मसिद्ध अधिकार है। वह प्रॉपर्टी में हिस्सेदारी लेने का दावा कर सकती है। साल 2005 से पहले इस तरह की संपत्ति में सिर्फ बेटों को अधिकार मिलता था। लेकिन काननू में संशोधन होन से अब समान अधिकार बेटियों को भी मिल रहा है। इस तरह की प्रॉपर्टी में हिस्सा देने से पिता भी अपनी बेटी को मना नहीं कर सकते हैं।

खुद से अर्जित संपत्ति पर पक्ष कमजोर
पिता द्वारा खुद की कमाई से अर्जित संपत्ति को लेकर बेटियों का पक्ष कमजोर है। यह पिता की मर्जी पर निर्भर करेगा कि वह अपनी बेटियों को हिस्सेदारी दे या नहीं। अगर वह हिस्सेदारी देना नहीं चाहता है तो बेटी कुछ नहीं कर सकती है। उसके पास कानूनी रूप से उस प्रॉपर्टी में हिस्सा लेने का अधिकार नहीं है।

वसीयत नहीं तो यह है नियम
अगर पिता की मौता बिना वसीयत बनाये हो जाती है तो भी बेटी को उनके पैतृक संपत्ति में समान अधिकार मिलता है। हिंदू उत्तराधिकार कानून में पुरुष उत्तराधिकारियों को चार श्रेणियों में बंटा गया है। इसके तहत पिता की मौत होने पर बेटा, बेटी , विधवा और अन्य लोग आते हैं। यानी बेटी को भी पिता के मौत होने पर बेटै जैसा समान अधिकार मिलता है।

बेटी की शादी हो गई तो क्या
साल 2005 से पहले हिंदू उत्तराधिकार कानून में बेटियों को शादी से पहले तक ही हिंदू अविभाजित परिवार (एचयूएफ) का हिस्सा माना जाता था। लेकिन 2005 में संशोधन के बाद बेटी की शादी होने के बाद भी संपत्ति में समान उत्तराधिकारी माना गया है। यानी बेटी की शादी होने के बाद भी वह पिता की संपत्ति में अपना दावा कर सकती है और हिस्सा ले सकती है।

पैतृक संपत्ति का मतलब
किसी भी पुरुष को अपने पिता, दादा या परदादा से उत्तराधिकार में प्राप्त संपत्ति, पैतृक संपत्ति कहलाती है।

20/04/2017

कच्ची बस्ती में बने सरकारी पट्टे वाले मकान को खरीदने के पहले क्या सावधानी जरूरी है?
कच्ची बस्तियों में जो मकान स्थित हैं उन के भूखंडों की लीज सरकार नगर निगम अथवा विकास न्यास/ प्राधिकरण के माध्यम से 99 वर्षीय पट्टों के आधार पर जारी करती है। इस तरह जारी किए गए पट्टों में अक्सर यह शर्त होती है कि पट्टाकर्ता इस लीज को हस्तान्तरित नहीं कर सकता। कभी कभी यह शर्त भी होती है कि 10 या 12 वर्ष तक लीज को हस्तान्तरित नहीं किया जा सकता। ऐसी शर्त होने पर अहस्तांतरणीय अवधि में विक्रय पत्र का पंजीकरण कराया जाना संभव नहीं होता है।
कोई भी मकान जिस का भूखंड लीज/ पट्टे पर हस्तान्तरित किया गया है उस का विक्रय करने के पूर्व नगर निगम/ विकास न्यास/ प्राधिकरण से भूखंड के हस्तान्तरण की अनुमति प्राप्त करना आवश्यक है। इस कारण आप को मकान के वर्तमान मालिक और विक्रेता से कहें कि वह नगर निगम/ विकास न्यास/ प्राधिकरण से भूखंड को विक्रय करने की अनुमति प्राप्त कर ले। आम तौर पर किसी भी मकान को खरीदने का एग्रीमेंट/ इकरारनामा कुछ अग्रिम राशि (साई) दे कर किया जा सकता है। उस में एक निश्चित समय जो तीन माह के आसपास का होता है विक्रेता को इस बात के लिए दिया जाता है कि वह भूखंड को विक्रय करने की अनुमति प्राप्त कर सके। यह शर्त भी होनी चाहिए कि यदि तीन माह या जो भी अवधि निर्धारित हो उस में विक्रेता भूखंड के विक्रय की अनुमति प्राप्त नहीं कर सका तो जो धनराशि उस ने अग्रिम या साई बतौर प्राप्त की है उस की डेढ़ी या दुगनी राशि वह क्रेता को लौटाएगा। यदि विक्रेता विक्रय की अनुमति प्राप्त करने में असफल रहता है तो आप इकरारनामे के अनुसार अग्रिम की डेढ़ी या दुगनी राशि विक्रेता से प्राप्त कर सकते हैं।
कभी कभी ऐसा भी होता है कि सरकार (नगर निगम/ विकास न्यास/ प्राधिकरण) पट्टा जारी करते हैं जिसे उपपंजीयक के कार्यालय में पंजीकृत कराना होता है लेकिन जो पट्टा प्राप्त करता है वह उस की उप पंजीयक के कार्यालय में पंजीकरण (रजिस्ट्री) नहीं करवाता है। इस से वह पट्टा बेकार हो जाता है। यदि आप ने जो पट्टा देखा है वह पंजीकृत है तो ठीक है अन्यथा विक्रेता (मकान के वर्तमान स्वामी) को कहें कि वह पट्टे का पंजीकरण (रजिस्ट्री) कराए और भूखंड को विक्रय करने की अनुमति प्राप्त कर ले। ये दोनों बातें होने पर ही आप उस मकान को खरीदने का इकरारनामा (एग्रीमेंट) करें अन्यथा नहीं।

15/10/2015
24/08/2015

भूमि का भू उपयोग किस प्रकार परिवर्तित कराया जा सकता है?
धरा १४३ भू राजस्व अधिनियम के अंतर्गत उप जिलाधिकारी को प्रार्थना पत्र जिस के साथ भूमि की खतौनी, खसरा,
प्रार्थी का शपथ पत्र, तथा जिस उद्देश्य (आबादी या औधोगिक ) के लिए भू उपयोग परिवर्तित करना है उस का दस्तावेज़ी सबूत साथ लगा कर ५ रुपये की कोर्ट फीस के साथ प्रस्तुत किया जाता है जिस पर उप जिलधिकारी सम्बंधित तहसीलदार से आख्या माँगा कर आदेश पारित करेंगे।
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03/08/2015

टैक्स रिटर्न फाइलिंग के नए रूल्स
इकनॉमिक टाइम्स| Aug 3, 2015,

इस साल फाइनैंस मिनिस्ट्री ने टैक्स रिटर्न फाइल करने के नियमों में कई बदलाव किए हैं। नए फॉर्म लाए गए हैं। टैक्सपेयर्स से अतिरिक्त सूचनाएं मांगी जा रही हैं और रिटर्न फाइलिंग के प्रोसेस को पूरी तरह पेपरलेस कर दिया गया है। टैक्सपेयर्स होने के नाते आपको इनके बारे में जानना चाहिए, नहीं तो आप गलत रिटर्न फाइल कर सकते हैं, जिसे रिजेक्ट किया जा सकता है। हम नए टैक्स फाइलिंग प्रोसेस और डॉक्युमेंटेशन के बारे में जानकारी दे रहे हैं।

कई टैक्सपेयर्स मानते हैं कि अगर उन पर कोई टैक्स लायबिलिटी नहीं है या उन्होंने सारे टैक्स चुका दिए हैं तो उन्हें रिटर्न फाइल करने की जरूरत नहीं है। यह गलत सोच है। ClearTax.in के फाउंडर और सीईओ अर्चित गुप्ता ने बताया, 'इससे फर्क नहीं पड़ता कि आपने टैक्स दिया है या नहीं। अगर आपका सारा टैक्स आपकी कंपनी और बैंक ने टीडीएस के जरिये चुका दिया है या आपने अडवांस टैक्स दिया है तो भी सालाना इनकम 2.5 लाख रुपये से अधिक होने पर आपको रिटर्न फाइल करना पड़ेगा।' हालांकि, उससे पहले हम यह बता रहे हैं कि इस साल के टैक्स फाइलिंग रूल्स में क्या बदलाव किए गए हैं।

डेडलाइन बढ़ गई है...

इस साल टैक्स रिटर्न फाइल करने की डेडलाइन 31 अगस्त तक बढ़ा दी गई है। हालांकि, इसमें बिना वजह की देरी ठीक नहीं है। अगर आपके पास सारे डॉक्युमेंट्स (फॉर्म 16, बैंक स्टेटमेंट, टीडीएस डिटेल्स, कैपिटल गेंस स्टेटमेंट) हैं, तो जल्द से जल्द रिटर्न फाइल कीजिए।

नए टैक्स फॉर्म्स

फॉरन ट्रिप्स और बिना इस्तेमाल वाले बैंक खातों के बारे में जानकारी अनिवार्य किए जाने पर खूब हो-हल्ला मचा। इस वजह से सरकार को नए आईटीआर फॉर्म्स को रिवाइज करने पर मजबूर होना पड़ा। रिवाइज्ड फॉर्म्स सिंपल हैं और इन्हें भरने में भी कोई दिक्कत नहीं होनी चाहिए। आईटीआर फॉर्म्स में बदलाव के बाद भले ही आपको 14 पन्ने का रिटर्न फाइल नहीं करना पड़ेगा, लेकिन कुछ प्रस्तावित बदलावों को फाइनैंस मिनिस्ट्री ने बनाए रखा है।

जो इंडिविजुअल्स और एचयूएफ एक से ज्यादा प्रॉपर्टी रखते हैं, लेकिन उन्हें टैक्सेबल कैपिटल गेंस, बिजनस या प्रफेशन या फॉरन ऐसेट्स से इनकम नहीं हो रही है, उनके लिए नया तीन पन्ने का आईटीआर 2ए फॉर्म लाया गया है। एग्जेम्ट इनकम होने पर भी इंडिविजुअल्स आईटीआर-1 (सरल) फॉर्म भर सकते हैं। पहले 5,000 रुपये से ज्यादा एग्जेम्ट इनकम होने पर इंडिविजुअल्स को इस फॉर्म को भरने की इजाजत नहीं थी। हालांकि, जिन इंडिविजुअल्स की ऐग्रिकल्चरल इनकम 5,000 रुपये से अधिक है, वे अभी भी इस फॉर्म का इस्तेमाल नहीं कर सकते।

ई-फाइलिंग का दायरा बढ़ा

जो टैक्सपेयर्स रिफंड की मांग करने वाले हैं, उनके लिए टैक्स की ई-फाइलिंग जरूरी कर दी गई है। अगर उनकी इनकम 5 लाख रुपये से कम है, तो भी उन्हें ऑनलाइन रिटर्न फाइल करना होगा। हालांकि, यह रूल 80 साल से अधिक उम्र वाले सीनियर सिटिजंस पर लागू नहीं होगा। वे फिजिकल मोड में अब भी रिटर्न भर सकते हैं। हालांकि, ई-फाइलिंग के अपने फायदे हैं। Taxspanner.com के को-फाउंडर और डायरेक्टर सुधीर कौशिक ने बताया, 'अगर आपने ऑनलाइन रिटर्न फाइल किया है तो इसे तेजी से प्रोसेस किया जाता है और रिफंड भी जल्द मिलता है। इनकम टैक्स डिपार्टमेंट रिफंड को सीधे आपके बैंक अकाउंट में भेजता है। टैक्सपेयर्स ऑनलाइन टैक्स रिटर्न की प्रोसेसिंग का स्टेटस भी ट्रैक कर सकते हैं।'

अगर आपको टैक्स फॉर्म्स और रूल्स की जानकारी है तो आप इनकम टैक्स डिपार्टमेंट की वेबसाइट पर जाकर खुद ही रिटर्न फाइल कर सकते हैं। कुछ पोर्टल्स भी फ्री में रिटर्न फाइल करने की सुविधा देते हैं। वहीं, दूसरे इसमें मदद के बदले मामूली फीस लेते हैं। अगर आपको लग रहा है कि खुद रिटर्न फाइल करना संभव नहीं है तो प्रफेशनल्स की मदद लेने में कोई बुराई नहीं है। इसके लिए कुछ पैसा तो खर्च करना पड़ता है, लेकिन टैक्स रिटर्न में कोई गलती नहीं होती।

प्रॉपर्टी और कैपिटल गेंस पर नजर

नए फॉर्म में प्रॉपर्टी के स्टेटस के लिए 'डीम्ड टु बी लेटआउट' और 'लेटआउट' के लिए अलग कॉलम दिए गए हैं। इसका मतलब यह है कि भले ही आपका दूसरा घर खाली पड़ा हो, आपको उस पर टैक्स देना पड़ेगा। आपकी प्रॉपर्टी जिस एरिया में है, वहां के रेंट के हिसाब से नोशनल इनकम पर टैक्स चुकाना पड़ेगा। प्रॉपर्टी बेचने के मामले में आपको सावधानी से कैपिटल गेंस चुकाना चाहिए क्योंकि नए फॉर्म में बची हुई रकम के बारे में जानकारी मांगी गई है ताकि इस पर लॉन्ग और शॉर्ट टर्म कैपिटल गेंस का पता लगाया जा सके। डेलॉयट हास्किंस ऐंड सेल्स की पार्टनर ताप्ती घोष ने बताया, 'अगर प्रॉपर्टी देश से बाहर है तो नए फॉर्म में टैक्सपेयर को कैपिटल गेन इनकम की जानकारी देनी होगी और टैक्स रिलीफ का भी ब्योरा देना पड़ेगा।'

आप जिस टैक्स स्लैब में आते हैं, उस हिसाब से रिटर्न फाइल करते वक्त कैपिटल गेंस की जानकारी अलग से देनी पड़ेगी। अगर आपने कैपिटल गेंस अकाउंट स्कीम में कोई पैसा डिपॉजिट किया है तो आपको उस साल के बारे में बताना होगा, जब एसेट ट्रांसफर किया गया था। वहीं, जिस सेक्शन के तहत उस पर एग्जेम्पशन की मांग की गई थी, उसकी भी जानकारी देनी होगी। आपको बताना होगा कि किस साल में नया ऐसेट खरीदा गया है और उसके लिए कितना पैसा खर्च किया गया। कैपिटल गेंस अकाउंट में बची हुई रकम की जानकारी भी देनी पड़ेगी।

फॉरन इनकम और ऐसेट्स

रिवाइज्ड फॉर्म्स में प्रस्तावित फॉर्म के मुकाबले बहुत सवाल नहीं पूछे जा रहे हैं। हालांकि, फॉरन इनकम और ऐसेट्स के बारे में आपको कई जानकारियां देनी पड़ेंगी। नए फॉर्म में फॉरन ट्रिप के दौरान खर्च की गई रकम की जानकारी नहीं मांगी गई है, लेकिन फॉरन इनकम का ब्योरा देना पड़ेगा। इसमें रकम, नेचर ऑफ इनकम, टैक्सेबिलिटी, देश इन सबकी जानकारी देनी पड़ेगी। अगर आपने डबल टैक्सेशन अवॉयडेंस अग्रीमेंट (डीटीएए) के तहत टैक्स छूट क्लेम की है तो रिटर्न में उसका ब्योरा होना चाहिए।

इसी तरह से अगर आपके पास विदेश में कोई प्रॉपर्टी है तो मालिकाना हक (सीधे या बेनेफिशरी के तौर पर), उसे खरीदने की तारीख, प्रॉपर्टी से हुई इनकम और टैक्स के लिए दिखाई गई रकम के बारे में बताना होगा। अगर किसी फॉरन एंटिटी में आपका फाइनैंशल इंटरेस्ट है तो उसके बारे में भी बताना जरूरी कर दिया गया है। मालिकाना हक रखने वालों के अलावा विदेश में किसी ऐसेट्स के बेनेफिशिज या उससे हुई इनकम की जानकारी आईटीआर फॉर्म में देना जरूरी कर दिया गया है।

पेपरलेस ई फाइलिंग आसान हुई

इस साल से ज्यादातर टैक्सपेयर्स के लिए सही अर्थों में ई-फाइलिंग पेपरलेस हो गई है। अब तक ई-फाइलिंग के बाद साइन किया हुआ आईटीआर-V फॉर्म बेंगलुरु में सेंट्रलाइज्ड प्रोसेसिंग सेंटर में भेजना पड़ता था। इसका मकसद टैक्सपेयर की आइडेंटिटी की पहचान करना था। अब इलेक्ट्रॉनिक वेरिफिकेशन कोड (ईवीसी) के जरिये इलेक्ट्रॉनिक तरीके से आइडेंटिटी रिटर्न्स को वेरिफाई किया जा सकता है। 10 डिजिट वाला ईवीसी एक शब्दों और अंकों वाला कोड है, जो हर पैन के लिए यूनीक होगा। यह ई-फाइलिंग करने वाले का इलेक्ट्रॉनिक वेरिफिकेशन होगा। एचयूएफ के मामले में कर्ता का ईवीसी वेरिफिकेशन होगा। इस बारे में Makemyreturns.com के को-फाउंडर विक्रम रामचंद ने कहा, 'बड़ी बाधा खत्म हो गई है। इससे ई-फाइलिंग का काम वाकई पेपरलेस हो गया है।' इस साल से आईटीआर में आधार कार्ड होल्डर्स के लिए भी जगह दी गई है, जहां वे यूनीक आइडेंटिफिकेशन नंबर का जिक्र कर सकते हैं। आधार उन चार तरीकों में से एक है, जिसके जरिये टैक्सपेयर की पहचान तय होगी। हालांकि, अगर आप इस मोड का इस्तेमाल नहीं करना चाहते तो आईटीआर V को मेल के जरिये सेंट्रलाइज्ड प्रोसेसिंग सेंटर भेज सकते हैं।

09/07/2015

कोलाहल निवारण अधिनियम-1985 की धारा 13, असंवैधानिक।
हाईकोर्ट मध्यप्रदेश
सरकार इस धारा दुरुपयोग करके लाउडस्पीकर, डीजे बजाने की अनुमति देती रही है ।
यद्यपि शौर करने व रोकने के खिलाफ संविधान में अनेक कानूनो के वाबजूद सरकारों द्वारा धर्म की राजनीति करने वाले के हित में इस पर रोक लगाने में कभी भी दिलचस्पी नही दिखाई बल्कि इन ताकतों का ही साथ देती है ।
मालूम होना चाहिए कि 80 डेसीबल से ज्यादा शौर नियम के विरुद्ध है, यह न केवल मानव जीवन पर वरन पशु पक्षियों के जीवन पर भी बुरा असर डालता है ।
लेकिन इससे लापरवाह लोग धर्म , उत्सवों , शादी विवाह व अन्य आयोजनों इसका दुरुपयोग करते रहे है , जो अब जागरूकता व इसके विरुद्ध जनसमर्थन बढने से असहनीय हो गया है ।
लेकिन यह शौर उक्त कानून को गैर संवैधानिक कर देने मात्र से खत्म नही होगा । ना ही कोई इन्हे रोज रोज बोलने जाएगा की वे आवाज धीमी रखें ।जरूरी है धार्मिक स्वार्थो का टकरावों को खत्म करने की दिशा में पहल हो?

28/06/2015

मेरे देशवासी कहते हैं कि घोटाले की राशि लौटा दी जाए और किस्सा ख़त्म लेकिन ....
सुप्रीम कोर्ट ने आर.वेंकटाकृषणन बनाम केन्द्रीय अन्वेषण ब्यूरो के निर्णय दिनांक 07.08.09 में कहा है कि सुप्रीम कोर्ट ने बृजलाल प्रसाद सिन्हा बनाम बिहार राज्य (एआईआर 1998 सुको 2443) में कहा है कि इसे सावधानी के नियम के तौर पर कहा जाये कि परिस्थितिजन्य साक्ष्य के आधार पर दोष सिद्धि करने से पहले न्यायालय को सन्तुष्ट कर लेना चाहिए कि वे परिस्थितियां जिनसे दोषी होने का अभिप्राय लगाया गया है वे अखण्डनीय साक्ष्य होने चाहिए। चूँकि किसी को अन्ततः नुकसान नहीं हुआ। इसलिए भा.द.सं. की धारा 409 का अपराध नहीं बनता। इसे स्वीकार नहीं किया जा सकता। एक बैंक या वितीय संस्था संभव है अन्ततः हानि नहीं उठाये। किन्तु यदि दूसरे व्यक्ति द्वारा अवैध उद्देश्य के लिए अवैध रूप से धन काम में लेने दिया जाये तो धारा 405 के घटक आकर्षित होते हैं। एक मामला जिसमें अस्थायी गबन किया गया हो भा.द.सं. की धारा 405 के घटक आकर्षित होते हैं। अभियोजन केन्द्रीय अन्वेषण ब्यूरो के द्वारा प्राप्त सूचना के आधार पर प्रारम्भ हुआ था। कानून यह नहीं है कि दोषसिद्धि का निर्णय देने के लिए हानि उठाना आवश्यक हो। अब यह सुस्थापित है कि आपराधिक कानून को कोई भी गतिमान कर सकता है। कार्य कुछ भी हो। लोकहित के लिए आशयित होना चाहिए। दूसरी ओर उसके द्वारा हुई सार्वजनिक हानि और पीड़ा अमापनीय है। हमें यह नहीं भूलना चाहिये कि सफेद कालर वाले अपराध समूचे समाज पर प्रभाव डालते हैं। यद्यपि उनसे तुरन्त कोई आहत नहीं होता। केन्द्रीय अन्वेषण ब्यूरो मात्र दिल्ली विशेष पुलिस अधिनियम में समाहित सांविधित शक्तियों के प्रयोग में ऐसा नहीं कर सकता। अपितु यह जानकीरमण समिति द्वारा प्रस्तुत रिपोर्ट के संदर्भ में भी प्रसंज्ञान लेने का अधिकारी है। अन्तरण में संलिप्त सार्वजनिक धन सरकारी क्षेत्र के बैंको का है।
Mani Sharma.

02/06/2015

० किरायानामा पंजीकरण के लिए निम्न दस्तावेजो की आवश्यकता है ==
० सम्पत्ति का पूरा विवरण।
० सम्पत्ति मालिक का नाम का नाम / पिता का नाम /पता/दो फोटो ( आई डी सहित ) .
० किरायेदार का नाम / पिता का नाम /पता/दो फोटो ( आई डी सहित )
० दो गवाह/ पिता का नाम /पता/दो फोटो (आई डी सहित )
० किरायेदारी के कुल वर्ष।
० हर महीने का तय किराया तय दिनाक सहित।
० सम्पत्ति किरायेदारी पर लेते समय बिजली मीटर राइडिंग।
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