Advocate Pawan Verma

Advocate Pawan Verma Lawyer of Delhi High Court and All Distt. Courts

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दिल्ली उच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण मामले की सुनवाई करते हुए यह स्पष्ट किया है कि विवाह के पश्चात घर में रहने वाली पत्...
24/10/2025

दिल्ली उच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण मामले की सुनवाई करते हुए यह स्पष्ट किया है कि विवाह के पश्चात घर में रहने वाली पत्नी उस परिवार की सदस्य मानी जाती है, और यदि उसके पति को उसके माता-पिता ने संपत्ति से बेदखल भी कर दिया हो, तब भी पत्नी को उस घर में रहने का अधिकार प्राप्त है। न्यायमूर्ति संजीव नरूला ने यह टिप्पणी बहू को घर से निकालने की मांग करने वाली उसकी सास और दिवंगत ससुर की याचिका को खारिज करते हुए की। 16 अक्टूबर को दिए गए आदेश में अदालत ने कहा कि बिना वैध कानूनी प्रक्रिया के बहू को घर से जबरन नहीं निकाला जा सकता। इस मामले में बहू की ओर से अधिवक्ता संवेदना वर्मा ने पक्ष रखा, जबकि सास-ससुर की ओर से अधिवक्ता काजल चंद्रा ने पैरवी की। दस्तावेजों के अनुसार, यह विवाद वर्ष 2010 में महिला की शादी के बाद शुरू हुआ, जब वह अपने पति के साथ उसके माता-पिता के घर में रहने लगी। साल 2011 में पति-पत्नी के संबंधों में खटास आ गई, जिसके बाद दोनों पक्षों के बीच कई दीवानी और आपराधिक मुकदमे दायर किए गए। याचिका में सास-ससुर ने तर्क दिया कि जिस मकान में महिला रह रही है, वह स्वर्गीय दलजीत सिंह द्वारा अर्जित निजी संपत्ति है, इसलिए इसे घरेलू हिंसा से महिलाओं के संरक्षण अधिनियम के तहत

26/08/2025

क्या पति को भी कोर्ट से मेंटेनेंस मिल सकता है? जानिए विशेष दिल्ली HC के ‘Rani Sethi vs Sunil Sethi’ केस में न्याय की नई परिभाषा!

रानी सेठी बनाम सुनील सेठी – एक ऐसा अनोखा तलाक़ मामला, जिसने अदालतों की लैंगिक-तटस्थता को सबके सामने रखा। दिल्ली उच्च न्यायालय (CM(M) 169/2009; 179 (2011) DLT 414) ने 31 मार्च 2011 को एक बेहद संवेदनशील मुद्दे पर फैसला सुनाया: पत्नी को अपने आर्थिक रूप से असक्षम पति को ₹20,000 प्रतिमाह मेंटेनेंस, ₹10,000 मुकदमा खर्च और एक ज़ेन कार देने का आदेश। इस फैसले ने दिखाया कि केवल पुरुष ही नहीं, अगर आर्थिक स्थिति कमजोर हो तो पति भी न्यायालय से इसे मांग सकते हैं।

जो और भी खास बात रही – अदालत ने स्पष्ट तौर पर कहा कि Section 24 (Hindu Marriage Act) का उद्देश्य सिर्फ़ बुनियादी गुज़ारा नहीं, बल्कि वैवाहिक जीवन के स्तर को बनाए रखना है। इसे "जीवित रहे" का कानून नहीं, बल्कि "सम्मान से जिए" का कानून कहा गया। यही नहीं, जज ने यह भी रेखांकित किया कि यह प्रावधान लैंगिक-तटस्थ है — यानी यह कानून केवल महिलाओं के लिए नहीं, बल्कि न्याय की दृष्टि से किसी भी आर्थिक रूप से कमजोर साथी को राहत देने के लिए है।

यह मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह पारंपरिक सोच को चुनौती देता है और सवाल खड़े करता है: क्या अब समय नहीं आ गया कि तलाक़ के बाद केवल ख़त्म हुआ रिश्ता ही नहीं बल्कि कमजोर साथी की आत्म-सम्मान की रक्षा का रास्ता भी अदालतों द्वारा सुनिश्चित किया जाए? आपके विचार कितने समान रूप से और न्यायपूर्ण तरीके से बदल रहे हैं—नीचे कमेंट में बताइए!

21/08/2025
दिल्ली हाईकोर्ट ने 5 अगस्त 2025 को एक अहम निर्णय सुनाया। जस्टिस संजीव नारुला की बेंच ने स्पष्ट किया कि अगर दो वयस्क अपनी...
20/08/2025

दिल्ली हाईकोर्ट ने 5 अगस्त 2025 को एक अहम निर्णय सुनाया। जस्टिस संजीव नारुला की बेंच ने स्पष्ट किया कि अगर दो वयस्क अपनी मर्जी और सहमति से शादी करना या साथ रहना चाहते हैं, तो इसमें परिवार या समाज का कोई दखल स्वीकार्य नहीं है।
मामला एक ऐसे जोड़े से जुड़ा था, जिसने 23 जुलाई को आर्य समाज मंदिर, तिस हज़ारी कोर्ट (दिल्ली) में विवाह किया। महिला ने कोर्ट को बताया कि उसका परिवार इस रिश्ते से नाराज़ है और उसे शारीरिक नुकसान पहुँचाने की धमकियाँ मिल रही थीं। इसी डर की वजह से वह 18 जुलाई को घर छोड़कर अपने साथी के पास चली गई और बाद में शादी कर ली।
महिला की गुमशुदगी की शिकायत पर पुलिस ने पहले "मिसिंग पर्सन इन्क्वायरी" दर्ज की थी, लेकिन कोर्ट के सामने उसने साफ कहा कि वह स्वेच्छा से शादी करने गई थी। इसके बाद जोड़े ने सुरक्षा की गुहार लगाई।
कोर्ट ने कहा कि भारतीय संविधान का अनुच्छेद 21 हर नागरिक को जीवन, स्वतंत्रता और गरिमा के साथ जीने का अधिकार देता है। इसी के तहत वयस्कों को अपनी पसंद का जीवनसाथी चुनने और उसके साथ रहने का हक़ है। परिवार की असहमति या नाराज़गी इस संवैधानिक अधिकार को प्रभावित नहीं कर सकती।
इसके साथ ही हाईकोर्ट ने पुलिस को आदेश दिया कि जोड़े को सुरक्षा मुहैया कराई जाए। स्थानीय थाना प्रभारी को निर्देश दिए गए कि एक बीट ऑफिसर नियुक्त किया जाए, उन्हें आपातकालीन संपर्क नंबर दिए जाएं और किसी भी खतरे की स्थिति में तुरंत कार्रवाई की जाए।
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि यह आदेश केवल सुरक्षा तक सीमित है। परिवार के लगाए आरोपों या विवाद की सच्चाई पर उसने कोई टिप्पणी नहीं की, और कहा कि इसकी जाँच भविष्य में कानून के अनुसार होगी।
यह फैसला भारतीय समाज में व्यक्तिगत स्वतंत्रता और वैवाहिक अधिकारों को लेकर एक महत्वपूर्ण संदेश देता है - कि वयस्कों की पसंद और सहमति को सर्वोपरि माना जाएगा और किसी भी तरह का पारिवारिक दबाव या सामाजिक हस्तक्षेप संविधान की कसौटी पर खरा नहीं उतरता।

सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फैसले में स्पष्ट किया है कि अग्रिम जमानत (Anticipatory Bail) के लिए पहले सेशन कोर्ट में अर्जी दे...
11/08/2025

सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फैसले में स्पष्ट किया है कि अग्रिम जमानत (Anticipatory Bail) के लिए पहले सेशन कोर्ट में अर्जी देना अनिवार्य नहीं है। आवेदक चाहें तो सीधे हाईकोर्ट में भी अग्रिम जमानत के लिए याचिका दाखिल कर सकते हैं।
#सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फैसले में स्पष्ट किया है कि अग्रिम जमानत (Anticipatory Bail) के लिए पहले सेशन कोर्ट में अर्जी देना अनिवार्य नहीं है। आवेदक चाहें तो सीधे हाईकोर्ट में भी अग्रिम जमानत के लिए याचिका दाखिल कर सकते हैं।

Latest judgement of SC
29/06/2025

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विवाह समारोह के बिना विवाह रजिस्ट्रेशन मान्य नहीं, फर्जी माना जाएगा मैरिज सर्टिफिकेट- हाईकोर्टउच्च न्यायलय ने कहा कि शाद...
01/11/2022

विवाह समारोह के बिना विवाह रजिस्ट्रेशन मान्य नहीं, फर्जी माना जाएगा मैरिज सर्टिफिकेट- हाईकोर्ट

उच्च न्यायलय ने कहा कि शादी का पंजीकरण करने वाले अधिकारी का यह कर्तव्य है कि वह रजिस्ट्रेशन करने से पहले इस बात की जांच करे कि वास्तव में शादी हुई है या नहीं. कोर्ट ने कहा विवाह समारोह जरूरी है.

Madras High Court on Marriage Certificate – मद्रास उच्च न्यायलय ने मैरिज सर्टिफिकेट Marriage Certificate को लेकर एक विशेष टिप्पणी की. हाईकोर्ट ने कहा कि बगैर विवाह समारोह Marriage Ceremony के शादी का रजिस्ट्रेशन Marriage Registration अमान्य होगा और मैरिज सर्टिफिकेट फेक Marriage Certificate Fake माना जाएगा. हाईकोर्ट ने कहा कि शादी का पंजीकरण करने वाले अधिकारी का यह कर्तव्य है कि वह रजिस्ट्रेशन Registration करने से पहले इस बात की जांच करे कि वास्तव में शादी हुई है या नहीं.

‘जोड़ों के लिए विवाह समारोहों से गुजरना अनिवार्य’

मद्रास हाईकोर्ट Madras High Court के न्यायमूर्ति आर. विजयकुमार ने कहा, “जोड़ों के लिए विवाह के उन समारोहों से गुजरना अनिवार्य है जो उनके संबंधित धर्म पर लागू होते हैं. संबंधित व्यक्तिगत कानूनों के अनुसार विवाह के बाद ही उक्त विवाह अधिनियम (तमिलनाडु विवाह पंजीकरण अधिनियम, 2009) के तहत पंजीकृत किया जा सकता है. विवाह समारोह से गुजरे बिना, अधिनियम के तहत विवाह को पंजीकृत नहीं किया जा सकता है.”

इस मामले में की ये टिप्पणी?

उन्होंने 2015 की एक मुस्लिम महिला की दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए यह टिप्पणी की, जिसमें उसके चचेरे भाई के साथ उसकी शादी को इस आधार पर रद्द करने की मांग की गई थी कि उसने उसके माता-पिता को जान से मारने की धमकी देकर जबरन शादी की थी. महिला ने दावा किया कि उसके और उसके चचेरे भाई के बीच इस्लामी परंपरा के अनुसार कोई विवाह समारोह आयोजित नहीं किया गया था.

‘…तो मन जायेगा विवाह पत्र फर्जी’

न्यायाधीश ने कहा कि पंजीकरण प्राधिकारी का यह कर्तव्य है कि वह यह सत्यापित करे कि विवाह को पंजीकृत करने से पहले जोड़ों ने अपने संबंधित व्यक्तिगत कानूनों के अनुसार विवाह समारोह किया है या नहीं. उन्होंने कहा, “विवाह के तथ्य को सत्यापित किए बिना पंजीकरण प्राधिकारी जोड़ों के प्रस्तुत आवेदन के आधार पर विवाह का रजिस्ट्रेशन नहीं कर सकता है. यदि कोई विवाह प्रमाण पत्र बिना किसी विवाह समारोह से पहले जारी किया जाता है तो इसे केवल फर्जी विवाह प्रमाण पत्र माना जा सकता है.”

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