02/03/2026
अगर आपको लगता है कि झूठी FIR दर्ज कराकर किसी को भी फंसा देना आसान है…
तो अब सावधान हो जाइए।
क्योंकि अगर FIR झूठी निकली —
तो जेल भी हो सकती है और मुआवज़ा भी देना पड़ सकता है।
नमस्कार मैं advocate आदित्य शर्मा तीस हजारी कोर्ट दिल्ली से
⚖️ Supreme Court of India ने साफ कहा है कि
किसी निर्दोष व्यक्ति को झूठे मुकदमे में फंसाना
उसके अनुच्छेद 21 के तहत मिले
“सम्मानपूर्वक जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता” के अधिकार का उल्लंघन है।
1992 के ऐतिहासिक फैसले
State of Haryana v. Bhajan Lal में
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि
अगर FIR दुर्भावना से दर्ज की गई हो,
तो उसे रद्द किया जा सकता है।
अब बात करते हैं कार्रवाई की —
अगर FIR झूठी साबित होती है, तो:
🔹 IPC की धारा 182 – पुलिस को झूठी सूचना देने पर
6 महीने तक की सजा या जुर्माना।
🔹 धारा 211 – झूठा आपराधिक आरोप लगाने पर
2 साल तक की सजा,
और अगर आरोप गंभीर अपराध का हो
तो 7 साल तक की सजा।
🔹 धारा 193 – झूठे सबूत देने पर
7 साल तक की सजा।
🔹 धारा 500 – मानहानि के लिए
2 साल तक की सजा या जुर्माना।
साथ ही, कोर्ट, पीड़ित व्यक्ति को मुआवज़ा भी दिला सकती है।
याद रखिए —
कानून बदले का हथियार नहीं है।
निर्दोष को फंसाना खुद एक अपराध है।
हर व्यक्ति को
सम्मान के साथ जीने का अधिकार है।
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