08/09/2025
बीते दिन देहरादून शहर में एक अजीब होड़ देखने को मिली। ऊँची आवाज़ में डीजे गूंज रहे थे, अलग-अलग पिकअप और कमर्शियल टेम्पो में गणेश जी की प्रतिमाओं के साथ लोग भरे पड़े थे। चारों ओर बस जाम ही जाम था।
भीषण शोर, उस पर नृत्य करती भीड़, लगभग हर गाड़ी में डीजे और स्पीकर लगे हुए। यह देख मन खिन्न हो उठा जब छोटे-छोटे बच्चे भी इन स्पीकर्स से चिपके हुए थे। इतनी तीव्र ध्वनि में उनके नाज़ुक कानों पर क्या बीत रही होगी? शायद वे भीड़ के बहाव में यही मान बैठे कि यह सब कोई पवित्र धार्मिक कार्य है।
सड़कों पर मोटरसाइकिलों को बेलगाम चलाते युवक, रंगों में लथपथ भीड़, और हर तरफ बिखरा कूड़ा-करकट—खाने-पीने के बाद की थैलियाँ और गंदगी ही गंदगी।
जब टॉन्स नदी के किनारे पहुँचा, तो मन और भी विचलित हो गया। वहां बेशुमार ढोल बज रहे थे, लोग नाचते-गाते नदी किनारे खड़े थे और पन्नियों में भरी सामग्री नदी में डाल रहे थे। हर ओर प्लास्टिक और गंदगी का अंबार था। केमिकल से बनी मूर्तियों का बार-बार नदी में विसर्जन किया जा रहा था। नदी मानो सहनशील होकर सब कुछ झेल रही थी, जैसे चुपचाप पूछ रही हो—“मैं अपनी शिकायत किससे करूँ?”
घर की ओर के सफर में ट्रैफिक और शोर ने व्याकुलता और बढ़ा दी। मन खुद से प्रश्न कर बैठा—क्या मैं ही नास्तिक हूँ जो इस सबको देखकर विचलित हूँ? लेकिन नहीं, मैं तो प्रतिदिन पूजा करता हूँ। तो फिर इसे आस्था का कौन-सा रूप कहा जाए?
यह देवभूमि है, जहाँ हर कोने में देवी-देवताओं का वास है। फिर हम भगवान को नदियों में क्यों विसर्जित कर रहे हैं? अपनी अब तक की धार्मिक यात्रा से मैंने यही समझा है कि परमात्मा का निवास हमारी आत्मा में है। अगर वास्तव में विसर्जन करना है, तो अपने अंतरमन में डूबकर अपनी बुराइयों का करना होगा। वहीं हमें परमात्मा मिलेंगे।
जब तक हम नदियों को भी परमात्मा का स्वरूप मानकर उनका सम्मान नहीं करेंगे, तब तक अपनी फूहड़ता पर लगाम नहीं लगा पाएंगे। आज हर प्रदेश किसी न किसी प्राकृतिक त्रासदी से गुजर रहा है, पर हम हैं कि मानने को तैयार नहीं। धर्म के नाम पर दिखावा अब बंद होना चाहिए; अब तो समय प्रकृति से क्षमा मांगने का है।
बात कड़वी लग सकती है, लेकिन अगर माँ प्रकृति की व्याकुलता को भी हम अनसुना करते रहे, तो हमें इंसान कहलाने का कोई हक नहीं। हमसे बेहतर तो वे पशु हैं जिन्होंने न सीमेंट के जंगल बनाए, न ही धर्म के नाम पर कोई पाखंड रचा।
मान लो, स्वयं श्री गणेश और सभी इष्ट भी यही चाहते होंगे कि हम विसर्जन करें अपनी बुराइयों का, और धारण करें ईश्वर का सच्चा स्मरण। क्योंकि जब स्मरण होगा, तभी दया, करुणा और संवेदना स्वतः प्रकट होंगी—और यही तो धर्म का असली उद्देश्य है।
*बड़े ही व्याकुल मन से आपका जसविंदर सिंह*