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03/08/2026

⚖️ जन्म एवं मृत्यु का दो वर्ष से अधिक विलंब से पंजीकरण अब केवल प्रथम श्रेणी न्यायिक मजिस्ट्रेट (Judicial Magistrate First Class) के आदेश से ही होगा; एक वर्ष से अधिक लेकिन दो वर्ष के भीतर विलंबित पंजीकरण के लिए जिला मजिस्ट्रेट, उपखण्ड मजिस्ट्रेट अथवा अधिकृत कार्यपालक मजिस्ट्रेट का आदेश अनिवार्य होगा: जन्म एवं मृत्यु पंजीकरण (संशोधन) विधेयक, 2026

🏛️ विधेयक: The Registration of Births and Deaths (Amendment) Bill, 2026
📜 Bill No.: 140 of 2026 (As Introduced in Lok Sabha)
📅 प्रस्तुति दिनांक: 24 जुलाई 2026
📄 उद्देश्य: Registration of Births and Deaths Act, 1969 की धारा 13 में संशोधन कर विलंबित पंजीकरण (Delayed Registration) की प्रक्रिया को अधिक कठोर एवं पारदर्शी बनाना।

📝 संक्षिप्त पृष्ठभूमि

Registration of Births and Deaths Act, 1969 के अंतर्गत जन्म एवं मृत्यु का पंजीकरण अनिवार्य है तथा इसके अंतर्गत जारी प्रमाणपत्र किसी व्यक्ति की वैधानिक पहचान (Legal Identity) तथा जन्म अथवा मृत्यु के साक्ष्य के रूप में स्वीकार्य होता है। वर्ष 2023 में अधिनियम में संशोधन किए जाने के बाद, राज्यों एवं अन्य हितधारकों के साथ विचार-विमर्श के आधार पर केंद्र सरकार ने विलंबित पंजीकरण की प्रक्रिया को और अधिक कठोर बनाने के उद्देश्य से Registration of Births and Deaths (Amendment) Bill, 2026 प्रस्तुत किया है।

🏛️ विधेयक की प्रमुख विशेषताएँ

1. यदि जन्म अथवा मृत्यु की सूचना घटना के एक वर्ष बाद लेकिन दो वर्ष के भीतर दी जाती है, तो उसका पंजीकरण केवल जिला मजिस्ट्रेट (DM), उपखण्ड मजिस्ट्रेट (SDM) अथवा जिला मजिस्ट्रेट द्वारा अधिकृत कार्यपालक मजिस्ट्रेट (Executive Magistrate) के आदेश के पश्चात ही किया जा सकेगा। संबंधित अधिकारी को पहले जन्म अथवा मृत्यु की सत्यता का सत्यापन करना होगा तथा निर्धारित शुल्क का भुगतान भी आवश्यक होगा।

2. यदि जन्म अथवा मृत्यु की सूचना घटना के दो वर्ष बाद दी जाती है, तो उसका पंजीकरण केवल प्रथम श्रेणी न्यायिक मजिस्ट्रेट (Judicial Magistrate First Class) के आदेश के आधार पर ही किया जा सकेगा। न्यायिक मजिस्ट्रेट द्वारा तथ्यों की सत्यता का परीक्षण किए जाने के बाद ही पंजीकरण की अनुमति दी जाएगी।

3. विधेयक में "Executive Magistrate" की परिभाषा को भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) की धारा 14(1) के अनुरूप अद्यतन किया गया है।

4. विधेयक का उद्देश्य विलंबित पंजीकरण को अधिक जवाबदेह एवं कठोर बनाकर जन्म एवं मृत्यु की समयबद्ध रिपोर्टिंग को प्रोत्साहित करना है।

⚖️ विधिक प्रभाव

यदि यह विधेयक अधिनियम का रूप लेता है, तो दो वर्ष से अधिक विलंब से जन्म अथवा मृत्यु का पंजीकरण अब प्रशासनिक अधिकारी के बजाय प्रथम श्रेणी न्यायिक मजिस्ट्रेट के आदेश से ही संभव होगा, जबकि एक वर्ष से अधिक लेकिन दो वर्ष के भीतर के मामलों में DM/SDM/अधिकृत Executive Magistrate की अनुमति आवश्यक होगी।

📌 प्रमुख संशोधन

✅ 1 वर्ष से 2 वर्ष तक विलंबित पंजीकरण – DM/SDM/अधिकृत Executive Magistrate के आदेश से।

✅ 2 वर्ष से अधिक विलंबित पंजीकरण – Judicial Magistrate First Class के आदेश से।

✅ पंजीकरण से पूर्व जन्म अथवा मृत्यु की सत्यता का सत्यापन अनिवार्य।

✅ BNSS, 2023 के अनुरूप "Executive Magistrate" की परिभाषा में संशोधन।

✅ उद्देश्य – विलंबित पंजीकरण को अधिक कठोर बनाकर समय पर पंजीकरण को प्रोत्साहित करना।

👨‍⚖️ व्यावहारिक महत्व

यह विधेयक जन्म एवं मृत्यु पंजीकरण प्रणाली को अधिक विश्वसनीय, पारदर्शी एवं दुरुपयोग-रोधी बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। इसके लागू होने पर विलंबित पंजीकरण के मामलों में न्यायिक एवं प्रशासनिक स्तर पर अधिक कठोर जांच सुनिश्चित होगी, जिससे फर्जी जन्म अथवा मृत्यु प्रमाणपत्रों की संभावना कम होगी तथा समय पर पंजीकरण को बढ़ावा मिलेगा।

⚠️ Disclaimer

यह सारांश The Registration of Births and Deaths (Amendment) Bill, 2026 पर आधारित है। यह वर्तमान में एक विधेयक (Bill) है, अधिनियम (Act) नहीं। इसके प्रावधान तभी लागू होंगे जब संसद द्वारा पारित होकर राष्ट्रपति की स्वीकृति प्राप्त करने के बाद अधिसूचना द्वारा लागू किए जाएंगे।

19/07/2026
19/07/2026
दुकान का किरायेदारी एग्रीमेंट (जिसे कानूनी भाषा में Commercial Rent Agreement या Commercial Lease Agreement कहा जाता है)...
21/06/2026

दुकान का किरायेदारी एग्रीमेंट (जिसे कानूनी भाषा में Commercial Rent Agreement या Commercial Lease Agreement कहा जाता है), एक बहुत ही महत्वपूर्ण कानूनी दस्तावेज है, और इसमें किसी भी तरह की लापरवाही भविष्य में बड़े विवाद का कारण बन सकती है।

आइये विस्तार से समझते हैं:

1. यह क्या है? (What is it?)
दुकान किरायेदारी एग्रीमेंट एक कानूनी दस्तावेज (Legal Document) है जो दुकान के मालिक (Landlord/Lessor) और दुकान किराये पर लेने वाले व्यक्ति (Tenant/Lessee) के बीच होता है। इसमें दुकान को किराये पर देने की सभी नियम और शर्तें (Terms & Conditions) लिखित रूप में दर्ज होती हैं, जिन पर दोनों पक्षों की सहमति होती है।

2. यह क्यों किया जाता है? (Why is it needed?)
• विवादों से बचने के लिए: कल को किराये, दुकान खाली करने या बिजली बिल को लेकर कोई विवाद न हो, इसके लिए सब कुछ पहले से तय किया जाता है।
• कानूनी सुरक्षा: यह दोनों पक्षों (मालिक और किरायेदार) को कानूनी सुरक्षा प्रदान करता है।
• सरकारी कामों के लिए (Address Proof): किरायेदार को GST नंबर लेने, ट्रेड लाइसेंस बनवाने, या बैंक में करंट अकाउंट खोलने के लिए इस एग्रीमेंट की आवश्यकता होती है।

3. यह कब किया जाता है? (When is it made?)
दुकान का कब्ज़ा (Possession) किरायेदार को सौंपने और किरायेदारी शुरू होने से ठीक पहले यह एग्रीमेंट बनवाया और साइन किया जाता है।

4. किसके द्वारा बनाया जाता है? (By whom?)
• सहमति: यह मकान मालिक और किरायेदार, दोनों की आपसी सहमति से बनता है।
• ड्राफ्टिंग: इसे आमतौर पर किसी वकील (Lawyer) या डीड राइटर (Deed Writer) द्वारा कानूनी भाषा में ड्राफ्ट करवाया जाता है ताकि कोई भी महत्वपूर्ण क्लॉज़ छूट न जाए।

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5. कितने के स्टाम्प पेपर पर बनता है? (Stamp Paper Value)
स्टाम्प पेपर की कीमत इस बात पर निर्भर करती है कि एग्रीमेंट कितने समय के लिए बन रहा है और आपके राज्य के नियम क्या हैं (हर राज्य का Stamp Act अलग होता है):
• 11 महीने के एग्रीमेंट के लिए: आमतौर पर इसे ₹100 या ₹500 के नॉन-ज्यूडिशियल स्टाम्प पेपर पर बनाया जाता है और नोटरी (Notary) करवा लिया जाता है।
• 1 साल (12 महीने) या उससे अधिक के लिए: यदि एग्रीमेंट 1 साल या उससे ज्यादा का है, तो कुल किराये और सिक्यूरिटी डिपॉजिट के आधार पर स्टाम्प ड्यूटी की गणना प्रतिशत (Percentage) में होती है (आमतौर पर 1% से 5% के बीच, राज्य के अनुसार)। इसके लिए ई-स्टाम्प (e-Stamp) निकाला जाता है।

6. इसमें कितना खर्च आता है? (Total Cost)
खर्च तीन हिस्सों में बंटा होता है:
1. स्टाम्प ड्यूटी (Stamp Duty): 11 महीने के लिए ₹100/₹500। उससे अधिक के लिए सरकारी रेट के हिसाब से।
2. रजिस्ट्रेशन फीस (Registration Fee): यदि एग्रीमेंट सब-रजिस्ट्रार ऑफिस में रजिस्टर हो रहा है, तो सरकारी फीस लगती है (आमतौर पर ₹1000 से ₹5000 के बीच)।
3. वकील की फीस (Lawyer Fee): एग्रीमेंट ड्राफ्ट करने और रजिस्टर करवाने के लिए वकील ₹1000 से लेकर ₹5000+ तक चार्ज कर सकते हैं।
ध्यान दें: व्यावसायिक (Commercial) एग्रीमेंट का खर्च आमतौर पर मकान मालिक और किरायेदार 50-50 (आधा-आधा) बांटते हैं, लेकिन यह आपसी सहमति पर निर्भर करता है।

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7. कब तक के लिए वैध (Valid) होता है?
• शॉर्ट-टर्म (Short-Term): 11 महीने। (भारत में 11 महीने का चलन सबसे ज्यादा है क्योंकि इसमें कोर्ट/सब-रजिस्ट्रार के पास रजिस्ट्रेशन करवाना अनिवार्य नहीं होता, सिर्फ नोटरी से काम चल जाता है)।
• लॉन्ग-टर्म (Long-Term): व्यावसायिक एग्रीमेंट अक्सर 3 साल, 5 साल या 9 साल के लिए बनाए जाते हैं।
कानूनी नियम:Registration Act, 1908 की धारा 17 के अनुसार, यदि कोई भी रेंट एग्रीमेंट 11 महीने से ज्यादा का है, तो उसका सब-रजिस्ट्रार ऑफिस में रजिस्ट्रेशन होना अनिवार्य (Mandatory) है। बिना रजिस्ट्रेशन के 11 महीने से ऊपर का एग्रीमेंट कोर्ट में मान्य नहीं होता।

8. कानूनी पहलू (Legal Aspects & Important Clauses)
एक सही एग्रीमेंट में निम्नलिखित कानूनी शर्तें (Clauses) जरूर होनी चाहिए:
• Rent & Deposit (किराया और जमा राशि): प्रतिमाह किराया कितना होगा और एडवांस/सिक्यूरिटी डिपॉजिट कितना दिया गया है। सिक्यूरिटी डिपॉजिट वापसी की शर्तें भी लिखें।
• Escalation Clause (किराया वृद्धि): हर साल किराया कितने प्रतिशत बढ़ेगा (आमतौर पर कमर्शियल में यह 5% से 10% के बीच होता है)।
• Lock-in Period (लॉक-इन पीरियड): यह वह समय है जिससे पहले न तो मालिक दुकान खाली करवा सकता है और न ही किरायेदार दुकान छोड़ सकता है (जैसे 1 साल या 3 साल)। यदि कोई बीच में तोड़ता है, तो उसे जुर्माना देना होगा।
• Notice Period (नोटिस पीरियड): दुकान खाली करने या करवाने से पहले कितने महीने का नोटिस देना होगा (आमतौर पर 1 से 3 महीने)।
• Sub-letting (सब-लेटिंग): क्या किरायेदार उस दुकान का कोई हिस्सा किसी तीसरे व्यक्ति को किराये पर दे सकता है या नहीं (आमतौर पर इसे मना किया जाता है)।
• Maintenance & Bills: बिजली, पानी और मेंटेनेंस का बिल कौन भरेगा। प्रॉपर्टी टैक्स कौन भरेगा (आमतौर पर प्रॉपर्टी टैक्स मालिक भरता है)।

9. उपयोग (Uses and Benefits)
• किरायेदार के लिए फायदे: उसे गारंटी मिलती है कि लॉक-इन पीरियड तक मालिक उसे बेदखल नहीं करेगा। बिज़नेस सेट करने के लिए स्थिरता मिलती है। GST और सरकारी लाइसेंस आसानी से मिल जाते हैं।
• मालिक के लिए फायदे: किराया समय पर मिलने की कानूनी गारंटी। अगर किरायेदार दुकान खाली नहीं करता है, तो रजिस्टर्ड एग्रीमेंट के आधार पर कोर्ट से तुरंत बेदखली (Eviction) का आदेश मिल सकता है।

10. दुरुपयोग और जोखिम (Misuse and Risks)
• किरायेदार द्वारा दुरुपयोग:
◦ दुकान में कोई गैर-कानूनी काम करना।
◦ एग्रीमेंट खत्म होने के बाद भी दुकान पर कब्ज़ा कर लेना और खाली न करना।
◦ दुकान के स्ट्रक्चर में मालिक की अनुमति के बिना तोड़-फोड़ करना।
• मालिक द्वारा दुरुपयोग:
◦ लॉक-इन पीरियड के बीच में ही ज्यादा किराये के लालच में दुकान खाली करने का दबाव बनाना।
◦ किरायेदार के जाने के बाद बिना किसी वाजिब कारण के सिक्यूरिटी डिपॉजिट (Security Deposit) के पैसे काट लेना या न लौटाना।
◦ बिजली या पानी की सप्लाई मनमाने तरीके से काट देना।

11. नोटरी या रजिस्ट्रेशन ?
• कब नोटरी काफी है? यदि आप एक छोटा और कम अवधि का व्यवसाय कर रहे हैं और मकान मालिक के साथ आपके संबंध अच्छे हैं, तो 11 महीने के लिए नोटरी एग्रीमेंट पर्याप्त हो सकता है।
• कब रजिस्ट्रेशन जरूरी है? यदि आप दुकान में भारी निवेश (इंटीरियर, फर्नीचर, डिपॉजिट) कर रहे हैं, या एग्रीमेंट की अवधि 1 साल से अधिक है, तो हमेशा रजिस्टर्ड एग्रीमेंट ही करवाएं। इससे आपको भविष्य में किसी भी कानूनी फसाद से सुरक्षा मिलेगी।

बचाव कैसे करें?
इन सब दुरुपयोगों से बचने का एकमात्र तरीका है कि एग्रीमेंट को बहुत ही बारीकी से पढ़ा जाए और हर छोटी बात (जैसे टूट-फूट की मरम्मत कौन कराएगा, रंग-रोगन कौन कराएगा) को एग्रीमेंट में स्पष्ट रूप से लिखा जाए। यदि आप कमर्शियल काम के लिए भारी निवेश (Investment) कर रहे हैं, तो हमेशा रजिस्टर्ड एग्रीमेंट (Registered Agreement) ही बनवाएं, सिर्फ नोटरी वाले 11 महीने के एग्रीमेंट पर भरोसा न करें।

Disclaimer:
यह पोस्ट केवल सामान्य जानकारी और शिक्षा के उद्देश्यों के लिए तैयार की गई है। इसे कानूनी सलाह के रूप में नहीं माना जाना चाहिए। चूँकि हर मामला अपने आप में अलग होता है, इसलिए इस पोस्ट आपको अधूरी लग सकती है। इसके साथ दी गई छवि भी पूरी तरह से शिक्षा के उद्देश्यों के लिए तैयार किया एक प्रारूप मात्र है ; यह प्रामाणिक (authentic) नहीं है।इसलिए, कृपया इस छवि को डाउनलोड या प्रिंट न करें, और न ही इसका किसी भी रूप में उपयोग करें; इसे केवल उदाहरण के तौर पर बनाया गया है। इसके बजाय, कोई भी कानूनी कार्रवाई या लेनदेन करने से पहले, आपको अपने मामले की बारीकियों के संबंध में किसी योग्य वकील से सलाह लेना आवश्यक है।


Amit Mehra Advocate
From Bulandshahr
Uttar Pradesh

मैंने हाल ही में इलाहाबाद हाई कोर्ट का एक बहुत ही महत्वपूर्ण फैसला (HABC 214/2026) पढ़ा है, जो मुझे लगा कि हम सबके काम का...
12/06/2026

मैंने हाल ही में इलाहाबाद हाई कोर्ट का एक बहुत ही महत्वपूर्ण फैसला (HABC 214/2026) पढ़ा है, जो मुझे लगा कि हम सबके काम का है। पुलिस और प्रशासन जिस तरह 'शांति भंग' (जैसे Cr.P.C. की धारा 151, 107/116 या नए कानून BNSS की धारा 126/135) के नाम पर आम लोगों को परेशान करती है और अवैध रूप से जेल भेज देती है, उस पर कोर्ट ने करारा तमाचा मारा है।
​मामला कुछ यूं है कि गाजियाबाद की टीलामोड़ पुलिस ने 22 फरवरी 2026 को चंदर पाल सिंह नाम के एक वकील साहब (जो कि शारीरिक रूप से विकलांग भी हैं) को गिरफ्तार कर लिया। कायदे से गिरफ्तारी के 24 घंटे के भीतर उन्हें मजिस्ट्रेट के सामने पेश करना था, लेकिन पुलिस ने मनमानी की। जब उन्हें पेश किया गया, तो उनसे 50,000 रुपये का बांड भरवा लिया गया, लेकिन रिहा करने के बजाय उन्हें फिर भी जेल भेज दिया गया। जब मामला हाई कोर्ट पहुंचा, तब जाकर पुलिस ने उन्हें 25 फरवरी को छोड़ा।
​इस तानाशाही पर हाई कोर्ट ने सख्त रुख अपनाते हुए सीधे 75,000 रुपये (25,000 रुपये प्रतिदिन के हिसाब से) का मुआवजा देने का आदेश दिया है। और सबसे बड़ी बात यह है कि यह पैसा सरकार उन पुलिस अधिकारियों (एसीपी और एसएचओ) की सैलरी से वसूलेगी जिन्होंने यह गैरकानूनी काम किया है, साथ ही उन पर विभागीय कार्रवाई भी होगी।
​इस फैसले से हम सबके लिए जो सबसे काम के नियम निकल कर आए हैं, वो ये हैं:
​अब शांति व्यवस्था के नाम पर कोई भी मजिस्ट्रेट 20,000 रुपये से ज्यादा का बांड नहीं मांग सकता।
​इसके लिए किसी गारंटर (Surety) या नकद पैसे की जरूरत नहीं है, बस हमारे दस्तखत वाला पर्सनल बांड (Signature bond) ही काफी होगा।
​जिस दिन हम बांड साइन कर देंगे, उसी दिन हमें तुरंत रिहा करना होगा।
​अगर कोई व्यक्ति बांड भरने से मना करता है, तो उसे जेल भेजने से पहले मजिस्ट्रेट को उस इनकार की 'ऑडियो-विजुअल' (वीडियो) रिकॉर्डिंग करनी होगी।
​और अगर इसके बाद भी बिना किसी वाजिब कारण के 24 घंटे से ज्यादा किसी को हिरासत में रखा गया, तो सरकार को उस व्यक्ति को 25,000 रुपये रोज के हिसाब से हर्जाना देना पड़ेगा। यह पैसा सीधे गलती करने वाले अधिकारी की जेब (सैलरी) से कटेगा।
​यह फैसला एक बड़ा हथियार है। अब कोई भी पुलिसवाला या मजिस्ट्रेट अपनी मर्जी से किसी को भी बिना वजह 'शांति भंग' का बहाना बनाकर जेल में नहीं डाल सकता।

🚨 क्या “Marriage Agreement” कानूनी रूप से पूरी तरह वैध होता है? ⚖️📄सोशल मीडिया पर इन दिनों विवाह अनुबंध पत्र (Marriage A...
13/05/2026

🚨 क्या “Marriage Agreement” कानूनी रूप से पूरी तरह वैध होता है? ⚖️📄

सोशल मीडिया पर इन दिनों विवाह अनुबंध पत्र (Marriage Agreement) तेजी से वायरल हो रहे हैं,
जिनमें पति-पत्नी के अधिकार, जिम्मेदारियाँ और शर्तें लिखी जा रही हैं। 😳

📌 लेकिन क्या सिर्फ ₹100 के स्टाम्प पर बना ऐसा Agreement अदालत में पूरी तरह मान्य होता है? 🤔

⚖️ कानूनी स्थिति समझिए 👇

✅ पति-पत्नी आपसी समझ, जिम्मेदारियों और व्यवहार से जुड़ी बातें लिख सकते हैं।
❌ लेकिन ऐसा कोई भी Agreement भारतीय कानून, सार्वजनिक नीति या वैवाहिक अधिकारों के खिलाफ नहीं होना चाहिए।
❌ शादी को “Contract” की तरह पूरी तरह नियंत्रित नहीं किया जा सकता।

📌 उदाहरण के लिए —
पति-पत्नी के मूल वैवाहिक अधिकार, भरण-पोषण, घरेलू हिंसा, बच्चों के अधिकार आदि कानून से तय होते हैं, केवल Agreement से खत्म नहीं किए जा सकते।

⚠️ इसलिए सोशल मीडिया पर वायरल किसी भी “Marriage Contract” को बिना कानूनी सलाह के अंतिम सत्य मान लेना सही नहीं है।

📚 हर दस्तावेज की वैधता उसके शब्दों, परिस्थितियों और लागू कानून पर निर्भर करती है।

👨‍⚖️ किसी भी कानूनी दस्तावेज पर हस्ताक्षर करने से पहले योग्य अधिवक्ता से सलाह अवश्य लें।

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⚖️ Amit mehra Adv. | Bulandshahr
🏛️ District Court Bulandshahr | Uttar Pradesh

📞 7906497126

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'गोदनामा' (Adoption Deed) क्या होती है ? इसे कैसे बनाया जाता है ?👇'गोदनामा' (Adoption Deed), जिसे कानूनी भाषा में दत्तक ...
17/04/2026

'गोदनामा' (Adoption Deed) क्या होती है ? इसे कैसे बनाया जाता है ?👇

'गोदनामा' (Adoption Deed), जिसे कानूनी भाषा में दत्तक पत्र भी कहा जाता है, एक ऐसा महत्वपूर्ण कानूनी दस्तावेज है जो किसी बच्चे को गोद लेने (Adoption) की प्रक्रिया को वैधानिकता प्रदान करता है। यह दस्तावेज इस बात का प्रमाण होता है कि जैविक माता-पिता (Biological Parents) ने स्वेच्छा से अपने बच्चे को दत्तक माता-पिता (Adoptive Parents) को सौंप दिया है, और दत्तक माता-पिता ने सभी कानूनी और सामाजिक जिम्मेदारियों के साथ उसे स्वीकार कर लिया है।

भारत में गोद लेने की प्रक्रिया और गोदनामे के लिए मुख्य रूप से अलग-अलग धर्मों और परिस्थितियों के आधार पर कानून लागू होते हैं:

1. लागू होने वाले प्रमुख कानून (Applicable Laws)

》हिंदू दत्तक ग्रहण और भरण-पोषण अधिनियम, 1956 (Hindu Adoptions and Maintenance Act - HAMA): यह कानून हिंदू, बौद्ध, जैन और सिख धर्म को मानने वालों पर लागू होता है। भारत में सीधे रिश्तेदारों या परिचितों के बीच होने वाले अधिकांश पारिवारिक 'गोदनामे' इसी अधिनियम के तहत निष्पादित किए जाते हैं।

》किशोर न्याय (बालकों की देखरेख और संरक्षण) अधिनियम, 2015 (Juvenile Justice Act, 2015): यह एक धर्मनिरपेक्ष (Secular) कानून है। यदि कोई व्यक्ति अनाथ, छोड़े गए (abandoned) या सरेंडर किए गए बच्चे को गोद लेना चाहता है, तो उसे धर्म की परवाह किए बिना इसी कानून और CARA (Central Adoption Resource Authority) के दिशा-निर्देशों का पालन करना होता है। इसमें गोदनामा सीधे नहीं बनता, बल्कि कोर्ट से Adoption Order पारित होता है।

》अभिभावक और प्रतिपाल्य अधिनियम, 1890 (Guardians and Wards Act, 1890): मुस्लिम, ईसाई और पारसी पर्सनल लॉ में पूर्ण रूप से गोद लेने की मान्यता नहीं है, इसलिए ऐतिहासिक रूप से वे इस कानून के तहत बच्चे की 'गार्जियनशिप' (संरक्षण) लेते थे। हालांकि, अब JJ Act 2015 के तहत कोई भी नागरिक पूर्ण रूप से बच्चे को गोद ले सकता है।

2. गोदनामे के प्रमुख कानूनी पहलू (Key Legal Aspects)

विशेष रूप से HAMA, 1956 के तहत एक वैध गोदनामे के लिए निम्नलिखित कानूनी पहलुओं का पालन होना अनिवार्य है:

》वैधता और योग्यता (Capacity to Adopt): गोद लेने वाला व्यक्ति मानसिक रूप से स्वस्थ (Sound mind) और वयस्क (Major) होना चाहिए। यदि गोद लेने वाला व्यक्ति विवाहित है, तो पति/पत्नी की सहमति (Consent) अनिवार्य है।

》आयु का अंतर (Age Difference): यदि कोई पुरुष किसी बालिका को गोद लेता है, या कोई महिला किसी बालक को गोद लेती है, तो दत्तक माता-पिता और बच्चे की उम्र में कम से कम 21 वर्ष का अंतर होना कानूनी रूप से अनिवार्य है।

》पंजीकरण (Registration): Registration Act, 1908 के तहत गोदनामे को सब-रजिस्ट्रार (Sub-Registrar) के कार्यालय में पंजीकृत (Registered) कराना अत्यंत महत्वपूर्ण है। HAMA की धारा 16 के अनुसार, यदि गोदनामा पंजीकृत है और दोनों पक्षों के हस्ताक्षर हैं, तो कोर्ट यह मानकर चलता है (Presumption of law) कि गोद लेने की प्रक्रिया कानूनी रूप से वैध है।

》अखंडनीय प्रक्रिया (Irrevocability): HAMA की धारा 15 के तहत यह स्पष्ट नियम है कि एक बार यदि कोई वैध गोदनामा हो जाता है, तो उसे बाद में रद्द (Cancel) नहीं किया जा सकता। दत्तक माता-पिता बच्चे को त्याग नहीं सकते और न ही बच्चा वापस अपने जैविक माता-पिता के परिवार में लौट सकता है।

》अधिकारों का हस्तांतरण (Transfer of Rights): गोदनामे के निष्पादन की तारीख से, बच्चे के अपने जैविक परिवार से सभी कानूनी संबंध (विवाह के नियमों को छोड़कर) समाप्त हो जाते हैं। बच्चे को दत्तक परिवार में एक जैविक बच्चे (Biological child) के समान ही संपत्ति में उत्तराधिकार और अन्य सभी कानूनी अधिकार प्राप्त हो जाते हैं।

》प्रतिफल का निषेध (Prohibition of Consideration): गोद लेने की एवज में किसी भी प्रकार के पैसे, संपत्ति या इनाम का लेन-देन HAMA की धारा 17 के तहत एक दंडनीय अपराध है।

3. आवश्यक दस्तावेज
एक मजबूत और कानूनी रूप से बाध्यकारी गोदनामा तैयार करने के लिए निम्नलिखित दस्तावेजों की आवश्यकता होती है:
* जैविक और दत्तक माता-पिता दोनों के पहचान और पते के प्रमाण (Aadhar, PAN)।
* बच्चे का जन्म प्रमाण पत्र।
* दोनों पक्षों की तस्वीरें और कम से कम दो गवाहों (Witnesses) के पहचान प्रमाण।
* दत्तक माता-पिता का विवाह प्रमाण पत्र (यदि लागू हो)।

'Law Ki Pathshala' द्वारा यहाँ हिंदू दत्तक ग्रहण और भरण-पोषण अधिनियम, 1956 (HAMA, 1956) के तहत तैयार किए जाने वाले एक मानक 'गोदनामा' (Adoption Deed) का ड्राफ्टिंग फॉर्मेट (मुख्य क्लॉज़) दिया जा रहा है। आप अपनी खास ज़रूरतों के हिसाब से इसे कस्टमाइज़ करवा सकते हैं. कृपया ध्यान दें कि यह पोस्ट/इमेज सिर्फ़ आम जानकारी और शिक्षा के मकसद से बनाई गई है; इसे कानूनी सलाह के तौर पर नहीं माना जाये। चूंकि हर मामला अलग होता है, इसलिए कृपया इस दस्तावेज़ को सीधे इस्तेमाल के लिए सिर्फ़ डाउनलोड और प्रिंट न करें। इसके बजाय, कोई भी कानूनी कार्रवाई या लेन-देन करने से पहले, किसी योग्य अधिवक्ता से मिलकर इसे तैयार करवाएं, ताकि आपको अपने मामले की खास बातों के हिसाब से सही सलाह मिल सके।
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:दत्तक पत्र (Deed of Adoption):

यह दत्तक पत्र आज दिनांक [दिन] [महीना] [वर्ष] को [शहर/स्थान का नाम] में निम्नलिखित पक्षों के बीच निष्पादित किया गया:
प्रथम पक्ष (जैविक माता-पिता / Natural Parents):
1. श्री [जैविक पिता का नाम], आयु [उम्र] वर्ष, पुत्र श्री [दादा का नाम]
2. श्रीमती [जैविक माता का नाम], आयु [उम्र] वर्ष, पत्नी श्री [जैविक पिता का नाम]
निवासी: [पूरा पता]
(जिन्हें आगे इस विलेख में "देने वाले माता-पिता" कहा गया है)

द्वितीय पक्ष (दत्तक माता-पिता / Adoptive Parents):
1. श्री [दत्तक पिता का नाम], आयु [उम्र] वर्ष, पुत्र श्री [पिता का नाम]
2. श्रीमती [दत्तक माता का नाम], आयु [उम्र] वर्ष, पत्नी श्री [दत्तक पिता का नाम]
निवासी: [पूरा पता]
(जिन्हें आगे इस विलेख में "गोद लेने वाले माता-पिता" कहा गया है)

चूँकि (Recitals):
1. प्रथम पक्ष एक बालक/बालिका के जैविक माता-पिता हैं, जिसका नाम [बच्चे का नाम] है, और जिसका जन्म दिनांक [जन्म तिथि] को [जन्म स्थान] पर हुआ था।
2. द्वितीय पक्ष निःसंतान हैं (या उनके पास कोई पुत्र/पुत्री नहीं है) और वे हिंदू दत्तक ग्रहण और भरण-पोषण अधिनियम, 1956 के प्रावधानों के तहत एक बालक/बालिका को गोद लेने के इच्छुक हैं।
3. द्वितीय पक्ष ने प्रथम पक्ष से उनके उक्त बच्चे को गोद लेने का अनुरोध किया, जिसे प्रथम पक्ष ने अपनी पूर्ण और स्वतंत्र सहमति से, बिना किसी दबाव, भय या लालच के स्वीकार कर लिया है।

अत: यह विलेख निम्नलिखित शर्तों को प्रमाणित करता है (Terms and Conditions):
1. बच्चे को सौंपना और स्वीकार करना (Giving and Taking):
प्रथम पक्ष ने दिनांक [गोद देने की तिथि] को अपने निवास/मंदिर [स्थान का नाम] पर आयोजित एक पारिवारिक समारोह में, अपने बच्चे [बच्चे का नाम] को शारीरिक रूप से द्वितीय पक्ष को सौंप दिया है। द्वितीय पक्ष ने बच्चे को अपने दत्तक पुत्र/पुत्री के रूप में सभी अधिकारों के साथ स्वीकार कर लिया है।
2. अधिकारों का हस्तांतरण (Transfer of Legal Ties):
इस विलेख के निष्पादन और बच्चे के हस्तांतरण की तिथि से, बच्चे के अपने जैविक परिवार (प्रथम पक्ष) से सभी कानूनी और पारिवारिक संबंध समाप्त माने जाएंगे (हिंदू विवाह अधिनियम के तहत निषिद्ध संबंधों को छोड़कर)।
3. दत्तक परिवार में अधिकार (Rights in Adoptive Family):
आज से यह बच्चा द्वितीय पक्ष का कानूनी और वैध पुत्र/पुत्री माना जाएगा। उसे द्वितीय पक्ष की संपत्ति, उत्तराधिकार, और भरण-पोषण में वे सभी अधिकार प्राप्त होंगे जो एक जैविक संतान को प्राप्त होते हैं।
4. नाम में परिवर्तन (Change of Name):
आज से बच्चे का नाम बदलकर [बच्चे का नया नाम, यदि कोई हो] रखा जाता है और भविष्य में उसे इसी नाम से और द्वितीय पक्ष के पुत्र/पुत्री के रूप में जाना जाएगा।
5. अखंडनीय प्रक्रिया (Irrevocability):
हिंदू दत्तक ग्रहण और भरण-पोषण अधिनियम, 1956 की धारा 15 के अनुसार, यह गोदनामा पूर्ण रूप से अखंडनीय (Irrevocable) है। भविष्य में न तो प्रथम पक्ष बच्चे को वापस मांग सकता है, न ही द्वितीय पक्ष बच्चे को त्याग सकता है, और न ही बच्चा स्वयं इस गोदनामे को रद्द कर सकता है।
6. प्रतिफल का अभाव (No Consideration):
दोनों पक्ष यह घोषणा करते हैं कि इस गोद लेने की प्रक्रिया में किसी भी पक्ष द्वारा दूसरे पक्ष को न तो कोई नकद राशि दी गई है, न ही कोई संपत्ति या अन्य कोई लाभ (Consideration) दिया या लिया गया है, जो कि अधिनियम की धारा 17 के तहत वर्जित है।
7. कानूनी क्षमता (Legal Capacity):
दोनों पक्ष यह घोषित करते हैं कि वे मानसिक रूप से पूर्णतः स्वस्थ हैं, वयस्क हैं, और हिंदू दत्तक ग्रहण और भरण-पोषण अधिनियम, 1956 के तहत गोद लेने और देने के लिए कानूनी रूप से सक्षम हैं।

साक्ष्य स्वरूप (In Witness Whereof):
उपरोक्त पक्षों ने अपने पूरे होशो-हवास में, बिना किसी अनुचित दबाव के, नीचे दिए गए गवाहों की उपस्थिति में इस दत्तक पत्र पर अपने हस्ताक्षर/अंगूठे के निशान अंकित किए हैं।

हस्ताक्षर प्रथम पक्ष (जैविक माता-पिता):
1. ____________ (पिता)
2. ____________ (माता)

हस्ताक्षर द्वितीय पक्ष (दत्तक माता-पिता):
1. ____________ (पिता)
2. ____________ (माता)

गवाह (Witnesses):
(गवाहों के नाम, पिता का नाम, पता और हस्ताक्षर अनिवार्य हैं)

1. गवाह 1: __________________ (हस्ताक्षर)
नाम एवं पता: ______________________

2. गवाह 2: __________________ (हस्ताक्षर)
नाम एवं पता: ______________________

Note :
ड्राफ्टिंग से जुड़े कुछ अहम सुझाव:
* यदि किसी धार्मिक अनुष्ठान (जैसे दत्ता होमम) का आयोजन किया गया है, तो उसका उल्लेख 'चूँकि' (Recitals) वाले हिस्से में किया जा सकता है।
* कोर्ट में इस दस्तावेज़ की वैधता पुख्ता करने के लिए Registration Act के तहत सब-रजिस्ट्रार ऑफिस में इसका रजिस्ट्रेशन करवाना अत्यंत आवश्यक है।
* यदि बच्चा किशोर न्याय अधिनियम (JJ Act) के तहत अनाथालय या किसी एजेंसी से गोद लिया जा रहा है, तो यह साधारण डीड काम नहीं आती, उसके लिए कोर्ट से 'Adoption Order' प्राप्त करना होता है।

Disclaimer:
यह पोस्ट केवल सामान्य जानकारी और शिक्षा के उद्देश्य से तैयार की गई है। इसे कानूनी सलाह न माना जाए। चूंकि हर मामले अलग अलग हो सकते हैं. कृपया इसको download करके इसका प्रिंट नहीं निकले. ब्लकि किसी भी कानूनी कार्रवाई से पहले अपने मामले के अनुसार किसी योग्य वकील से सलाह अवश्य लें।

अमित मेहरा Advocate 7906497126

स्टाम्प पेपर क्या होता है और इसमें Non-Judicial क्यूं लिखा होता हैं ? स्टाम्प पेपर किस काम में आता है इसके लीगल पहलू क्य...
06/04/2026

स्टाम्प पेपर क्या होता है और इसमें Non-Judicial क्यूं लिखा होता हैं ?
स्टाम्प पेपर किस काम में आता है इसके लीगल पहलू क्या हैं ?
स्टाम्प पेपर की Expiry कब होती हैं ?
और स्टाम्प पेपर के गलत उपयोग से क्या हो सकता हैं ?

अभी पिछले दिनों से ये Qustions बहुत बार पूछे गये है इसलिए हमने इस पोस्ट के माध्यम से पूरी जानकारी देने की कोशिश की है, अगर कोई प्रश्न फिर भी रह गया हो या कुछ जरूरी Information रह गई हो तो आप विद्वान लोग भी कमेन्ट के माध्यम से इसे Update कर सकते है 🙏

स्टाम्प पेपर एक Legal Document Paper होता हैं जो Government इशू करतीं हैं, जिसके ऊपर स्टाम्प ड्यूटी (tax) पहले ही Paid होती हैं. इसका उपयोग किसी भी Agreement, Affidavit, Power of Attorney, Sale Deed, Rent Agreement आदि को legally valid बनाने के लिए किया जाता है।

आइए इसे और भी अच्छे से और असान भाषा में समझते हैं 👇

Stamp Paper क्या होता है?
Stamp paper वो कागज़ होता है जिस पर पहले से stamp duty (सरकारी शुल्क) जमा होती है।
इसका main purpose है:
• Legal transaction को valid बनाना
• Government को revenue देना
• Document को evidentiary value देना (court में proof के रूप में)

Non-Judicial Stamp Paper क्यों लिखा होता है?
Stamp paper दो प्रकार के होते हैं:

1. Judicial Stamp Paper
👉 Court related work के लिए उपयोग आता है . यह इस स्टाम्प से बिल्कुल अलग होता है.
जैसे:
• Court fee
• Case filing

2. Non-Judicial Stamp Paper
👉 Court के बाहर legal कामों के लिए (सबसे ज्यादा इस्तेमाल यही होता है)
इसलिए “Non-Judicial” लिखा होता है ताकि clear हो कि:
➡️ यह court fees के लिए नहीं है
➡️ यह agreements, affidavits आदि के लिए है

Non-Judicial Stamp Paper का उपयोग कहाँ होता है?
इसका use बहुत सारे legal documents में होता है:
• Affidavit (हलफनामा)
• Rent Agreement
• Sale Deed / Property Agreement
• Gift Deed
• General Power of Attorney (GPA)
• Partnership Deed
• Indemnity Bond
• Declaration

Legal महत्व (Legal Aspects)
Stamp paper का use करना Indian law के तहत mandatory होता है:
👉 Relevant law: Indian Stamp Act, 1899

Important legal points:
• Proper stamp duty के बिना document:
• Court में admissible नहीं होता (inadmissible evidence)
• Under-stamped document:
• Penalty के साथ valid कराया जा सकता है
• Over-stamped:
• Refund possible (certain conditions में)

👉 Registration law: Registration Act, 1908

Important 👇
कुछ documents (जैसे sale deed) में: Stamp + Registration दोनों जरूरी होते हैं

Stamp Paper की Expiry होती है क्या?
👉 Generally stamp paper expire नहीं होता
लेकिन practical/legal points:
• Thiruvengada Pillai vs Navaneethammal
मैं Supreme Court ने कहा कि Stamp paper की कोई expiry नहीं होती.

लेकिन:
• कुछ states (जैसे Maharashtra, Gujarat) में local rules:
👉 6 months में use करने की requirement हो सकती है
• बहुत पुराना stamp (जैसे 5–10 साल पुराना):
👉 suspicion create कर सकता है
👉 misuse माना जा सकता है.

Stamp Paper कैसे valid माना जाता है?
Valid होने के लिए:
• Authorized vendor से खरीदा गया हो
• सही value (stamp duty) हो
• Document proper ex*****on (sign, date, witnesses) के साथ हो
• Fraud या alteration न हो

Galat use (Misuse) और Consequences
❌ Common misuse:
• Fake / forged stamp paper
• Old stamp misuse (backdated documents)
• Low value stamp (duty evasion)
• Same stamp paper का multiple use
• Alteration / cutting

⚖️ Legal consequences:
• Penalty (Fine)
• Stamp duty का कई गुना penalty
• Document invalid हो सकता है
• Court में reject हो सकता है
• Criminal offence बन सकता है
• Fraud / forgery के तहत case

Relevant laws:
• भारतीय न्याय संहिता
👉 Sections:
• 318 (Cheating)
• 338 (Forgery of valuable security)
• 336(3) (Forgery for cheating)
• Jail भी हो सकती है.

Practical Legal Advice (Important)
• हमेशा fresh stamp paper लेना better है
• Correct stamp duty calculate करें (state-wise अलग होती है)
• Important documents को register कराएं
• Backdating से बचें
• E-stamp (e-Stamping) prefer करें (safe और traceable)

Overall 👇
• Stamp paper = Govt tax-paid legal paper
• Non-judicial = Court के बाहर legal use
• Mostly agreements/affidavits में use होता है
• Expiry technically नहीं होती (SC judgment)
• Misuse = penalty + criminal case

Disclaimer:
Law Ki Pathshala ने यह जानकारी केवल सामान्य जानकारी और शिक्षा के उद्देश्य से तैयार की है। स्टाम्प के Misuse से बचे. एवं इस पोस्ट के किसी भी हिस्से को कानूनी सलाह न माना जाए। चूंकि हर मामले अलग अलग हो सकते हैं. तो किसी भी कानूनी कार्रवाई से पहले अपने मामले के अनुसार किसी योग्य वकील से सलाह अवश्य लें।

Mo. 7906497126

जुर्म इकबाल (Confession) 7906497126
02/04/2026

जुर्म इकबाल (Confession)

7906497126

Marriage Certificate बनवाने के लिए Affidavit 👇भारत में मैरिज रजिस्ट्रेशन के लिए इस तरह के एफिडेविट का उपयोग किया जाता है...
01/04/2026

Marriage Certificate बनवाने के लिए Affidavit 👇

भारत में मैरिज रजिस्ट्रेशन के लिए इस तरह के एफिडेविट का उपयोग किया जाता है। इसे आपको नॉन-ज्यूडिशियल स्टाम्प पेपर (Non-Judicial Stamp Paper) पर बनवाकर नोटरी (Notary) से अटेस्ट करवाना होता हैं।

Law Ki Pathshala ने यहां एक सामान्य नमूना दिया है जिसे आप अपनी जरूरत के अनुसार बदल सकते हैं:

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​ शपथ पत्र (Affidavit)

​हम,
• ​[पति का नाम], पुत्र श्री [पति के पिता का नाम], आयु [उम्र] वर्ष, निवासी: [पति का वर्तमान पूरा पता]
• ​[पत्नी का नाम - शादी से पहले का], पुत्री श्री [पत्नी के पिता का नाम], आयु [उम्र] वर्ष, निवासी: [पत्नी का शादी से पहले का पूरा पता]

​ईश्वर की शपथ लेकर संयुक्त रूप से निम्नलिखित सत्य बयान करते हैं कि:
• ​यह कि हम दोनों ने दिनांक [शादी की तारीख, जैसे: 15-02-2024] को [शादी का स्थान / मंदिर / मैरिज गार्डन का नाम और पता] में हिंदू रीति-रिवाज (Hindu rites and ceremonies) के अनुसार स्वेच्छा से विवाह कर लिया है और तब से हम पति-पत्नी के रूप में एक साथ रह रहे हैं। (नोट: यदि आपका विवाह किसी अन्य धर्म या एक्ट के तहत हुआ है, तो यहाँ उसका उल्लेख करें)
• ​यह कि विवाह के समय मेरी (पति) जन्म तिथि [पति की जन्म तिथि] थी और मेरी आयु 21 वर्ष से अधिक थी, तथा मेरी (पत्नी) जन्म तिथि [पत्नी की जन्म तिथि] थी और मेरी आयु 18 वर्ष से अधिक थी।
• ​यह कि हम दोनों विवाह के समय अविवाहित (Unmarried) थे। (नोट: यदि कोई तलाकशुदा या विधुर/विधवा था, तो यहाँ उसका स्पष्ट उल्लेख करें कि "विवाह के समय पति/पत्नी तलाकशुदा थे" आदि)।
• ​यह कि हम दोनों एक-दूसरे के साथ निषिद्ध संबंधों (Prohibited degrees of relationship) की श्रेणी में नहीं आते हैं, जैसा कि हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 के तहत परिभाषित है।
• ​यह कि विवाह के बाद पत्नी का नाम [पत्नी का नया नाम, यदि बदला गया हो] रखा गया है। (यदि नाम नहीं बदला है तो लिखें: "विवाह के बाद पत्नी के नाम में कोई बदलाव नहीं किया गया है")
• ​यह कि इस शपथ पत्र में दी गई सभी जानकारी हमारी व्यक्तिगत जानकारी और विश्वास के अनुसार सत्य और सही है।

​शपथकर्ता
• ​___________________ (पति के हस्ताक्षर)
• ​___________________ (पत्नी के हस्ताक्षर)

सत्यापन (Verification)

​हम, उपरोक्त शपथकर्ता, आज दिनांक [आज की तारीख] को [शहर का नाम, जैसे: इंदौर] में यह सत्यापित करते हैं कि इस शपथ पत्र के पैरा 1 से 6 तक की विषयवस्तु हमारी व्यक्तिगत जानकारी के अनुसार पूर्णतः सत्य और सही है। इसमें कुछ भी छिपाया नहीं गया है और कोई भी हिस्सा झूठा नहीं है। ईश्वर हमारी मदद करें।
​शपथकर्ता
• ​___________________ (पति के हस्ताक्षर)
• ​___________________ (पत्नी के हस्ताक्षर)

__________________________________________

​इस एफिडेविट को लीगल (Legal) बनाने के लिए जरूरी कदम:
• ​स्टाम्प पेपर: इस फॉर्मेट को 50 रुपये या 100 रुपये के ई-स्टाम्प पेपर (e-Stamp Paper) पर टाइप करवाएं। स्टाम्प पेपर पति या पत्नी किसी के भी नाम से खरीदा जा सकता है।
• ​नोटरी: इसे टाइप करवाने के बाद, पति और पत्नी दोनों को एक पब्लिक नोटरी (Public Notary) या ओथ कमिश्नर के सामने हस्ताक्षर करने होंगे। नोटरी अपनी सील (Seal) और साइन करके इसे कानूनी रूप से प्रमाणित (Attest) कर देगा।
• ​तस्वीरें (Photographs): स्टाम्प पेपर के ऊपर या किनारे पर पति और पत्नी की एक जॉइंट पासपोर्ट साइज फोटो (Joint Photograph) भी लगानी होती है, जिसे नोटरी अटेस्ट करता है।
• ​स्थानीय नियम: हर राज्य या नगर निगम के नियमों में थोड़ा बदलाव हो सकता है, इसलिए अपने स्थानीय नगर निगम (Municipal Corporation) या रजिस्ट्रार ऑफिस के बाहर बैठने वाले वकील से इसे एक बार क्रॉस-चेक जरूर करवा लें।

कुछ राज्यों और नगर निगमों (जैसे दिल्ली, महाराष्ट्र या कुछ अन्य जगहों पर) मैरिज रजिस्ट्रेशन के लिए पति और पत्नी दोनों को अपने-अपने अलग शपथ पत्र (Separate Affidavits) देने होते हैं।
​यहाँ पति और पत्नी दोनों के लिए अलग-अलग एफिडेविट का मानक कानूनी फॉर्मेट दिया गया है। इन दोनों को अलग-अलग नॉन-ज्यूडिशियल स्टाम्प पेपर (Non-Judicial Stamp Paper) पर बनवाकर नोटरी करवाना होता है।

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​ शपथ पत्र (पति की ओर से)

​मैं, [पति का नाम], पुत्र श्री [पिता का नाम], आयु [उम्र] वर्ष, निवासी: [पति का वर्तमान पूरा पता], ईश्वर की शपथ लेकर निम्नलिखित सत्य बयान करता हूँ कि:
• ​यह कि मेरा विवाह दिनांक [शादी की तारीख, जैसे: 15-02-2024] को [पत्नी का नाम - शादी से पहले का], पुत्री श्री [पत्नी के पिता का नाम], निवासी: [पत्नी का शादी से पहले का पता] के साथ [शादी का स्थान / मंदिर / मैरिज गार्डन का नाम और पता] में हिंदू रीति-रिवाजों (या जिस भी धर्म/एक्ट के तहत शादी हुई हो) के अनुसार संपन्न हुआ है।
• ​यह कि विवाह के समय मेरी जन्म तिथि [पति की जन्म तिथि] थी और मेरी आयु 21 वर्ष से अधिक थी।
• ​यह कि विवाह के समय मैं अविवाहित (Unmarried) था। (नोट: यदि तलाकशुदा या विधुर थे, तो यहाँ स्पष्ट लिखें)
• ​यह कि मैं और मेरी पत्नी एक-दूसरे के साथ निषिद्ध संबंधों (Prohibited degrees of relationship) की श्रेणी में नहीं आते हैं, जैसा कि हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 के तहत परिभाषित है।
• ​यह कि मेरी पत्नी और मैं विवाह के दिन से पति-पत्नी के रूप में एक साथ रह रहे हैं।
• ​यह कि इस शपथ पत्र में दी गई सभी जानकारी मेरी व्यक्तिगत जानकारी और विश्वास के अनुसार सत्य और सही है।

​शपथकर्ता
(पति के हस्ताक्षर)

सत्यापन (Verification):

मैं, उपरोक्त शपथकर्ता, आज दिनांक [आज की तारीख] को [शहर का नाम] में यह सत्यापित करता हूँ कि इस शपथ पत्र के पैरा 1 से 6 तक की विषयवस्तु मेरी व्यक्तिगत जानकारी के अनुसार पूर्णतः सत्य और सही है। इसमें कुछ भी छिपाया नहीं गया है।

​शपथकर्ता
(पति के हस्ताक्षर)
__________________________________________

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​ शपथ पत्र (पत्नी की ओर से)

​मैं, [पत्नी का नाम - शादी से पहले का] (विवाह के बाद का नाम: [नया नाम, यदि बदला गया हो]), पुत्री श्री [पिता का नाम], आयु [उम्र] वर्ष, निवासी: [शादी से पहले का पूरा पता या वर्तमान पता], ईश्वर की शपथ लेकर निम्नलिखित सत्य बयान करती हूँ कि:
• ​यह कि मेरा विवाह दिनांक [शादी की तारीख] को [पति का नाम], पुत्र श्री [पति के पिता का नाम], निवासी: [पति का पता] के साथ [शादी का स्थान / मंदिर / मैरिज गार्डन का नाम और पता] में हिंदू रीति-रिवाजों (या अन्य धर्म/एक्ट) के अनुसार संपन्न हुआ है।
• ​यह कि विवाह के समय मेरी जन्म तिथि [पत्नी की जन्म तिथि] थी और मेरी आयु 18 वर्ष से अधिक थी।
• ​यह कि विवाह के समय मैं अविवाहित (Unmarried) थी। (नोट: यदि तलाकशुदा या विधवा थीं, तो यहाँ स्पष्ट लिखें)
• ​यह कि मैं और मेरे पति एक-दूसरे के साथ निषिद्ध संबंधों (Prohibited degrees of relationship) की श्रेणी में नहीं आते हैं, जैसा कि हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 के तहत परिभाषित है।
• ​यह कि मेरे पति और मैं विवाह के दिन से पति-पत्नी के रूप में एक साथ रह रहे हैं।
• ​यह कि इस शपथ पत्र में दी गई सभी जानकारी मेरी व्यक्तिगत जानकारी और विश्वास के अनुसार सत्य और सही है।

शपथकर्ता
(पत्नी के हस्ताक्षर)

सत्यापन (Verification):

मैं, उपरोक्त शपथकर्ता, आज दिनांक [आज की तारीख] को [शहर का नाम] में यह सत्यापित करती हूँ कि इस शपथ पत्र के पैरा 1 से 6 तक की विषयवस्तु मेरी व्यक्तिगत जानकारी के अनुसार पूर्णतः सत्य और सही है। इसमें कुछ भी छिपाया नहीं गया है।

शपथकर्ता
(पत्नी के हस्ताक्षर)

___________________________________

​Important Suggestions:
• ​स्टाम्प पेपर: दोनों शपथ पत्रों को अलग-अलग 10 रुपये, 50 रुपये या 100 रुपये (आपके राज्य के नियमानुसार) के नॉन-ज्यूडिशियल स्टाम्प पेपर पर बनवाएं।
• ​नोटरी: दोनों एफिडेविट को किसी पब्लिक नोटरी (Public Notary) से अटेस्ट (Attest) करवाना अनिवार्य है।
• ​दस्तावेज़: मैरिज रजिस्ट्रेशन के समय इन दोनों शपथ पत्रों के साथ उम्र का प्रमाण (10वीं की मार्कशीट या जन्म प्रमाण पत्र), पते का प्रमाण (आधार कार्ड/वोटर आईडी), शादी का कार्ड और शादी की तस्वीरें (वरमाला या फेरे लेते हुए) या और भी अन्य दस्तावेज भी संलग्न करना पड सकता हैं।

Disclaimer:

यह दस्तावेज़ केवल सामान्य जानकारी एवं शैक्षणिक उद्देश्य के लिए तैयार किया गया है। इसे कानूनी सलाह (Legal Advice) के रूप में न माना जाए। किसी भी कानूनी कार्यवाही, दस्तावेज़ के प्रयोग, या निर्णय लेने से पूर्व संबंधित मामले के तथ्यों के अनुसार योग्य अधिवक्ता / विधिक विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।

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