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मेरे परिवार के 40+ वोट है। मैं किसी को भी इस बिल के खिलाफ में आगामी आम चुनावों में BJP को वोट देने दूंगा।यदि किसी व्यक्त...
22/01/2026

मेरे परिवार के 40+ वोट है। मैं किसी को भी इस बिल के खिलाफ में आगामी आम चुनावों में BJP को वोट देने दूंगा।

यदि किसी व्यक्ति का जन्म सवर्ण समाज में हुआ है, तो उसके लिए UGC Bill / UGC Guidelines का विरोध करना केवल एक राजनीतिक मत नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के भविष्य से जुड़ा प्रश्न बन जाता है।
आलोचकों का मानना है कि यह प्रस्तावित व्यवस्था यदि वर्तमान रूप में लागू होती है, तो यह सवर्ण युवाओं और विद्यार्थियों के शैक्षणिक, सामाजिक तथा मानसिक भविष्य को गहरे संकट में डाल सकती है।

UGC Guidelines को लेकर प्रमुख आपत्तियाँ

आरोप है कि प्रस्तावित दिशानिर्देशों में—
• यदि OBC या SC/ST वर्ग का कोई विद्यार्थी किसी सामान्य वर्ग के विद्यार्थी पर शिकायत करता है, तो प्राथमिक स्तर पर सामान्य वर्ग के विद्यार्थी को ही दोषी मान लिया जाएगा, भले ही आरोप असत्य हो।
• झूठी या दुर्भावनापूर्ण शिकायतों के विरुद्ध दंड का स्पष्ट प्रावधान नहीं है।
• कॉलेजों और विश्वविद्यालयों पर UGC तथा फंडिंग एजेंसियों का दबाव बढ़ेगा, जिससे संस्थान निष्पक्ष जाँच के बजाय औपचारिक कार्रवाई करने को बाध्य हो सकते हैं।
• “दोषी, जब तक निर्दोष सिद्ध न हो” जैसी मानसिकता सामान्य वर्ग के विद्यार्थियों पर थोपे जाने की आशंका व्यक्त की जा रही है।
• कुछ परिस्थितियों में पुलिस हस्तक्षेप और त्वरित गिरफ्तारी तक का प्रावधान सामान्य वर्ग के विद्यार्थियों के लिए भय का वातावरण बना सकता है।

OBC वर्ग को लेकर उठाए गए प्रश्न

यह भी तर्क दिया जा रहा है कि—
• सामाजिक यथार्थ में SC/ST वर्ग के विरुद्ध सर्वाधिक शिकायतें OBC वर्ग से संबंधित मामलों में दर्ज होती रही हैं, जिनके आँकड़े सार्वजनिक रूप से उपलब्ध हैं।
• इसके बावजूद UGC Guidelines में OBC को भी उसी श्रेणी में सम्मिलित कर दिया गया है, जिससे शोषणकर्ता और शोषित के बीच का भेद धुंधला होता प्रतीत होता है।
• अहीर, जाट, गुर्जर, कुर्मी, कोयरी, मराठा, पाटीदार, कुछ मुस्लिम जातीय समूह आदि जैसे प्रभावशाली OBC वर्गों के साथ किस स्तर का संस्थागत भेदभाव हो रहा है—यह प्रश्न भी उठाया जा रहा है।

आलोचकों का कहना है कि यदि यह व्यवस्था वास्तव में वंचित और ऐतिहासिक रूप से उत्पीड़ित वर्गों (जैसे धोबी, नाई, बढ़ई, कुम्हार, निषाद आदि) तक सीमित होती, तो भी विमर्श संभव था; किंतु प्रभावशाली OBC वर्गों को उसी श्रेणी में रखकर सवर्ण विद्यार्थियों के भविष्य को जोखिम में डालना अन्यायपूर्ण प्रतीत होता है।

राजनीतिक संदर्भ

यह भी स्मरण कराया जा रहा है कि सवर्ण समाज का एक बड़ा वर्ग अब तक भाजपा का समर्थक रहा है। ऐसे में प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में लाई जा रही इन UGC Guidelines को सवर्ण समाज के हितों के प्रतिकूल बताया जा रहा है।

निष्कर्ष

इस दृष्टिकोण के अनुसार—

किसी भी परिस्थिति में यह कानून वर्तमान स्वरूप में स्वीकार्य नहीं है।
यदि इसे वापस नहीं लिया गया, तो सवर्ण समाज को लोकतांत्रिक और संवैधानिक तरीकों से एकजुट होकर अपना विरोध दर्ज कराना चाहिए।

ालाकानून

ापसलो

#सवर्ण_विरोध_नहीं_अन्याय_विरोध





#संविधान_बचाओ











28/09/2025

“पत्नी के गुजर जाने के 15 दिन बाद, जब आखिरी रिश्तेदार भी लौट गया और घर फिर से वैसा ही सूनसान हो गया जैसा वो खुद… तभी उसे एक अलमारी के पुराने कागजों में लिपटा एक पत्र मिला – और वो सिर्फ एक पत्र नहीं था, उसकी पूरी दुनिया थी।”

पत्र का पहला शब्द ही दिल चीर देने वाला था — ‘प्रिय पतिदेव’।
हाथ काँपने लगे, आंखें नम हो गईं… और जब उसने पढ़ना शुरू किया, तो जैसे बीते सालों की हर स्मृति, हर स्पर्श, हर आंसू उसी कमरे में लौट आया।

पत्र में लिखा था:

"मुझे पता है, मैं अब ज़्यादा दिन की मेहमान नहीं। डॉक्टर ने तो कुछ नहीं कहा, पर तुम्हारे चुपचाप गिरे हुए चेहरे ने सब कह दिया। कैंसर ने मेरे शरीर को तोड़ दिया है, पर मेरा मन… अब भी तुम्हारे लिए जीना चाहता है।

मैं जानती हूं, मेरे इलाज में तुमने सब कुछ लुटा दिया। वो छोटी सी जमापूंजी, हमारे सपनों का प्लॉट, मम्मी की आखिरी दी हुई चूड़ियाँ — सब मेरी दवाओं में घुल गया। और तुम... सब चुपचाप करते रहे, बिना कोई शिकायत किए।"

"क्या तुम सोचते थे मैं कुछ नहीं जानती थी? मैं सब जानती थी, मेरे हमसफ़र।
जब तुम मेरी रजाई की आड़ में छुपकर रोते थे, मैं करवट लेकर अपने आंसुओं को तकिये में छुपा लेती थी।
तुम मुझे हिम्मत देते थे, लेकिन खुद अंदर से टूटते जा रहे थे… और फिर भी मेरी हिम्मत बनते रहे।"

"तुमने मुझसे कहा था, ‘तू बड़ी डरपोक है’। देखो, अब वही डरपोक औरत मौत से आंख मिलाकर मुस्कुरा रही है।
क्योंकि अब डर इस बात का नहीं है कि मैं जा रही हूं — डर इस बात का है कि तुम्हें मेरे बिना कैसे रहना होगा?

घर आओगे, और मैं नहीं मिलूंगी। चाय ठंडी होगी, बिस्तर ठंडा होगा, और सबसे ज़्यादा — तुम्हारा मन ठंडा हो जाएगा।

लेकिन मेरी एक बात याद रखना — मैं हमेशा रहूंगी, तुम्हारी आदतों में, तुम्हारे कपड़ों की सिलवटों में, बच्चों की हँसी में और तुम्हारे सपनों में।"

"बच्चों से कहना, मम्मी भगवान के पास गयी है — थोड़ी देर में वापस आएगी।
पर तुम जानो, मैं अब लौटूंगी नहीं।
इसलिए मेरी ज़िम्मेदारी अब तुम्हारी है। बच्चों के साथ-साथ खुद का भी ख़्याल रखना।"

"तुम्हें अब समय पर नहाना होगा, खाना होगा — क्योंकि तुम्हें टोकने के लिए अब कोई नहीं होगा।
अब रूठना छोड़ देना, क्योंकि मनाने वाली भी तो मैं ही थी।
अब बीमार पड़ना भी मत, क्योंकि माथे पर हाथ रखने वाला कोई नहीं होगा।

और हाँ, अब बच्चा बनने की ज़िद मत करना — क्योंकि अब तुम्हें अकेले पिता और माँ दोनों की भूमिका निभानी है।"

"आज रात मैं तुम्हारे सीने से कान लगाकर सोना चाहती हूं — शायद ये मेरी आखिरी रात हो।
कल सुबह मेरी सांस चले या ना चले, ये ऊपर वाला जाने।
पर इस पल, इस आखिरी स्पर्श में, मैं तुम्हें हमेशा के लिए अपनी धड़कन सौंप देना चाहती हूं।

जब कभी भी बहुत अकेला महसूस करना, आसमान की ओर देख लेना।
मैं वहां चमकती एक तारे में तुम्हें मुस्कुराते हुए दिखूंगी।

अब लिखने की ताकत नहीं रही...
बस तुम्हारी गोद में सिर रखकर, एक बार फिर उस प्यार को महसूस करना चाहती हूं — जो शब्दों से कभी नहीं कहा, मगर हर साँस में जिया।"

पत्र खत्म हुआ… लेकिन उसकी आँखें घंटों उस खाली जगह को देखती रहीं, जहां कभी उसकी पत्नी बैठा करती थी।

अब वो सिर्फ एक याद थी —
पर इतनी जीवित कि हर धड़कन में उसकी आहट थी।

"सच्चा प्यार शरीर के जाने से खत्म नहीं होता —
वो तो हर उस सांस में जिंदा रहता है,
जहां दो आत्माएं बिना कहे सब कह जाती हैं।" 💔

🙏 अगर ये कहानी आपके दिल को छू गई हो, तो उसे औरों से जरूर बाँटिए —
क्योंकि हो सकता है किसी और के आंसू भी इस शब्दों में पनाह पा लें।
🌸🌸🌸

(साभार सोशल मीडिया कॉपीपेस्ट 🖋️ 🖍️ 🖋️)

19/08/2025
कहाँ गया वो प्रशासन जो एक गरीब को एक खेजड़ी काटने पर भी हवालात के दर्शन करवा देता था।आज मौन क्यों है,बीकानेर के क्षेत्र म...
19/08/2025

कहाँ गया वो प्रशासन जो एक गरीब को एक खेजड़ी काटने पर भी हवालात के दर्शन करवा देता था।
आज मौन क्यों है,
बीकानेर के क्षेत्र में अंधाधुंध खेजड़ी की कटाई हो रही है।
किसका दवाब है। कट्टर मशीन से रातों रात खेत साफ किये जा रहे है सोलर प्लांटो में।
स्थानीय जनता आपके साथ है एक्शन लीजिये Rajasthan Police
Rajasthan Patrika

अलगनी पर कपड़े———————अलगनी पर टँगे हुए कपड़े अलग-अलग रंग आकार वय और लिंगको व्यक्त करतेजिसमें -कुछ कपड़े पिता पुरुष के कुछ...
16/08/2025

अलगनी पर कपड़े
———————

अलगनी पर टँगे हुए कपड़े
अलग-अलग रंग आकार वय और लिंग
को व्यक्त करते
जिसमें -
कुछ कपड़े पिता पुरुष के
कुछ बच्चा पुरुष के
कुछ तौलिये सब के लिए हैं छोटे-बड़े

हवा में झंडे की तरह डोल रहा साफे का कपड़ा
पैजामें का नाड़ा अलग ही सूत्र में बाँधे हुए इस पूरे दृश्य को

एक स्त्री इस दृश्य में खोज रही अपनी जगह
छिपाकर टाँगे गये अधोवस्त्रों में छिपी अपनी अस्मिता

हवा के एक तेज झोंके ने
संस्कृति की काढी शर्म को
तार-तार कर दिया है

बच्चा पुरुष अपने पिता पुरुष के साथ
सिल रहा है
संस्कृति की उधड़ी हुई सीवन
जिसके तागे का एक छोर
उस स्त्री के हाथ में है
जो शर्म से अभी पानी हुई।

अपना पराया
07/08/2025

अपना पराया

ये जगह कौनसी है??सही बताने वाले को collab किया जाएगा 😋😋
06/08/2025

ये जगह कौनसी है??
सही बताने वाले को collab किया जाएगा 😋😋

मनोरोग विशेषज्ञ होने का मतलब ये कतई नहीं कि वो मनोरोग से ग्रसित मरीज नहीं हो सकते। ये गृह क्लेश बहुत बड़ा वायरस है जो लग...
06/08/2025

मनोरोग विशेषज्ञ होने का मतलब ये कतई नहीं कि वो मनोरोग से ग्रसित मरीज नहीं हो सकते। ये गृह क्लेश बहुत बड़ा वायरस है जो लगभग हर पेशे के लोगों को अपने चपेट में ले रहा है। पहले संयुक्त परिवारों में ऐसा “न” के बराबर होता था।

पहल पति-पत्नी केवल रात्रि में ही साथ रह पाते थे क्योंकि हर व्यक्ति का अपना निजी कमरा नहीं होता था और बुजुर्गों के सामने पति-पत्नी आपस में नहीं बोलते थे, नतीजन झगड़ा कम होता था और होता था तो भी ज़्यादा लंबा नहीं चलता था क्योंकि 5-7 घंटे बाद पुनः 10-12 घंटे के लिए अलग होना होता था।

गृह क्लेश केवल और केवल एकांतवाद के कारण बढ़ा है। वर्तमान में ऐसा शायद ही कोई परिवार होगा जिसमें कोई न कोई पारिवारिक मामला नहीं चल रहा हो। तंग आकर मौत को गले लगाने से अच्छा तो समय रहते अलग होना है ताकि जिंदगी दुबारा शुरू करने की संभावना रहती है।

मेरी निजी राय में TV सीरियल, मोबाइल, एकांतवाद ही मुख्य रूप से गृह क्लेश के कारण बनते हैं। वैसे देखा जाये तो पत्नी-पति को बराबर का हक और अधिकार है लेकिन पत्नी अपने पति के पीछे ससुराल जाती है लेकिन पति नहीं जाता, पत्नी अपने ससुराल में रहती है पति नहीं रहता। ये बात सही है कि क़ानून के अनुसार पति-पत्नी बराबर नहीं है, क़ानून पत्नी का पक्ष लेता है जबकि नहीं लेना चाहिए।

भारत में पति-पत्नी के रिश्ते को सर्वाधिक गहरा रिश्ता माना गया है, जिसके अनुसार पत्नी अपने पति को भगवान मानती आई है। वर्तमान में वो पौराणिकता, वो संस्कृति कहाँ गई? प्रतिदिन गृह क्लेश से पति-पत्नी आत्महत्याएं कर रहे हैं, ऐसा कोई दिन नहीं जिस दिन समाचार पत्र में इस तरह के 1-2 मामले नहीं आए।

इस समाचार पत्र को पूरा पढ़ो, दस वर्ष साथ रहे फिर ऐसा क्या भूचाल आया कि अलग होना पड़ा। अलग हो गए, तलाक हो गया फिर कौनसा गृह क्लेश था जिसने एक मनोरोग विशेषज्ञ डॉक्टर की जान ले ली ये सोचनीय है। एक बात है गरीबों में ये समस्या कम है ये कारण मेरे समझ नहीं आया! क्या पैसे आने के साथ साथ समस्याएं और क्लेश भी साथ साथ आते हैं?

जितनी ज़्यादा सूख सुविधाएं होती अपेक्षाएं उतनी ही बढ़ती जाएगी और ज़्यादा अपेक्षाएं दुख का कारण बनती है, दुख हमेशा क्लेश पैदा करता है। कोई भी व्यक्ति किसी विशेष क्षेत्र का ज्ञाता होता है उसको वही विशेषता नुकसान देती है अगर ख़ुद ने उस विशेषता को बिना किसी अन्य विशेषज्ञ की राय के उपयोग में लिया है तो। आप कितने ही बड़े विशेषज्ञ होंगे लेकिन वही समस्या स्वयं को हो तो अन्य विशेषज्ञ से ही राय लें, स्वयं पंचायती नहीं करें।

✍️......

 #दो_कुत्ते?एक गांव में एक किसान रहता था।उसके पास  दो बैल और दो कुत्ते थे।एक बार उसे किसी काम से गांव से बाहर जाना था कि...
30/08/2024

#दो_कुत्ते?

एक गांव में एक किसान रहता था।
उसके पास दो बैल और दो कुत्ते थे।
एक बार उसे किसी काम से गांव से बाहर जाना था किंतु उसकी समस्या यह थी कि खेत जोतने का भी समय हो गया था,
और काम पूरा करने के लिए गांव से बाहर भी जाना जरूरी था।

तब किसान ने उस समस्या का समाधान निकाला, उसने अपने बैलों और कुत्तों को बुलाकर कहा कि .
मैं कुछ दिनों के लिए गांव से बाहर जा रहा हूं,
मेरे लौटने तक तुम लोग सारे खेत जोतकर रखना ताकि लौटने पर खेतों में बीज बो सकूं। बैलों और कुत्तों ने स्वीकृति में सिर हिलाया।

किसान चला गया और बैलों ने किसान के कहे अनुसार खेत जोतना शुरू कर दिया, परंतु कुत्ते आवारागर्दी करते हुए सारा-सारा दिन आवारागर्दी करते रहते।

बैलों ने किसान के लौटने से पहले पूरा खेत जोत दिया।

जब कुत्तों ने देखा कि खेतों की जुताई हो गई है और मालिक के लौटने का समय हो गया है
तब कुत्तों ने बैलों से कहा कि तुम दोनों इतने दिनों से खेत जोत रहे हो और काफी थक गए हो इसलिए घर जाकर आराम करो और हम लोग खेतों की रखवाली करेंगे।

कुत्तों की बात मानकर दोनों बैल घर चले गए और खा पीकर आराम करने लगे।
इधर कुत्तों ने सारे खेतों में दौड़-भाग करके अपने पैरों के निशान बना दिए, और खेत की मेंड़ पर बैठकर किसान का इंतजार करने लगे।
थोड़ी देर में किसान वापस गांव आया और सीधा खेतों पर पहुंचा तो देखा दोनों कुत्ते मेंड़ पर बैठे हैं और खेतों की जुताई हो गई है, परंतु बैल कहीं नजर नहीं आ रहे थे।

किसान ने कुत्तों से पूछा कि बैल कहां हैं ?

कुत्तों ने कहा- मालिक आप जबसे गए थे तभी से हम लोग खेत जोत रहे हैं और अभी काम पूरा करके मेंड़ पर बैठकर आपका इंतजार कर रहे हैं,* *जबकि बैल घर से बाहर निकलकर खेतों की ओर झांकने भी नहीं आए, वह घर पर ही आराम से सो रहे हैं।

मालिक ने खेतों में जाकर देखा तो उसे हर तरफ कुत्तों के पैरों के निशान मिले, वह कुत्तों के उपर बहुत प्रसन्न हुआ और कुत्तों के साथ घर लौटा तो देखा कि बैल घर के बाहर बैठे हुए आराम कर रहे थे।

किसान बैलों के उपर बहुत क्रोधित हुआ और बैलों को रस्सी से बांध कर उनकी पिटाई कर दिया और कुत्तों को खाने के लिए दूध रोटी और मांस के टुकड़े दिए और बैलों को खाने के लिए सुखा हुआ भूसा दिया।

गुरुजी कहते थे कि
यह जो
महात्मा गांधी रोड,
नेहरू युनिवर्सिटी
इंदिरा एयरपोर्ट और ऐसे अनेकों जगह नेहरू और गांधी का नाम देखते हो ये कुछ वैसे ही कुत्तों के पैरों के निशान हैं और वे आजादी के बाद
से ही दूध मलाई खा रहे हैं।

जबकि रानी लक्ष्मी बाई, तात्या टोपे,लाला लाजपत राय , वीर सावरकर, महारानी अवंतीबाई लोधी सुभाष चन्द्र बोस, रामप्रसाद बिस्मिल, भगतसिंह, चंद्रशेखर आजाद, खुदीराम बोस.....!
जैसे सात लाख बहत्तर हजार असली सेनानियों
के परिवार को रुखी-सूखी घास ही मिली है ।

बंधुओं, यही है स्वाधीनता संग्राम में गांधी-नेहरू का योगदान।
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