14/03/2026
भास्कर की रिपोर्ट के अनुसार बिहार के सारन में राजपूत बच्ची को पाँच पासवान लड़कों ने खींचा, रेप किया और मरने के लिए कुएँ में फेंकने के पश्चात् व्हाट्सएप पर स्टेटस लगाया कि ‘दुल्हन बना कर ले जाएँगे’।
जब रुचि तिवारी को उसके ब्राह्मण होने के कारण पुलिसकर्मियों के सामने से दिल्ली में, भरी दोपहरी में खींचा गया था, मैंने तब भी कहा था कि अगली वारदात खुल्लमखुल्ला रेप और हत्या की होगी। वह आज हो गई है।
प्रदीप भारद्वाज को बाथरूम में बंद कर अग्निशामक चला कर मारने का प्रयास रुचि तिवारी के रेप/हत्या के प्रयास के कुछ ही दिनों के भीतर हुआ। दोनों में ही, मुझे संदेह है कि पुलिस ने अटेम्प्ट टू मर्डर या रेप के चार्ज लगाए होंगे।
जब पुलिस मूक हो जाती है, सत्ता पक्ष सामान्य वर्ग को सताने की नई नीतियों के आविष्कार में व्यस्त रहता है, तब ऐसे ही सवर्ण समाज की बच्चियाँ सत्ताधीश की जातिवादी कुंठा की बलि चढ़ जाती हैं।
जी, 22 से 47 नहीं, 87 कर दो, पर क्या उत्तर दोगे इस बच्ची की माँ को? के नेताओं, तुम्हारी मूक सहमति ऐसी क्रूरता को जनती है।
यही कारण है कि हमारी लड़ाई केवल UGC रोलबैक की नहीं है, हमारी लड़ाई इस तंत्र से है जिसने सामान्य वर्ग की बच्चियों को रेप-हत्या का सामान बना दिया है, जिसमें हमारी सुनवाई है ही नहीं।
राजपूत-ब्राह्मण-भूमिहार-लाला आदि को ले कर घृणा इतनी मेनस्ट्रीम हो गई है कि किसी पासवान समाज के दलित-पीड़ित-शोषित-वंचित को लगता है कि सवर्ण बच्ची का रेप करना, उसके पूर्वजों के साथ हुए कथित अपमान का उचित बदला है।
उसे इसी सरकार ने यह हथियार थमाया है कि दीवारों पर लिखे नारों के मुँह तक पहुँचने, और देश छोड़ने के नारों से कब्र खुदने की बात तक, सवर्णों के प्रति घृणा सामान्यीकृत की जा चुकी है। ये नारे अब केवल नारे नहीं हैं, ये नारे दिल्ली में लगते हैं, बिहार में फोन पर देखे जाते हैं और किसी बच्ची को इस दुष्कृत्य का शिकार बना दिया जाता है।
आप ही बताइए, मैं केवल यूजीसी रोल बैक पर कैसे रुक जाऊँ?