01/08/2026
ये फोटो न्यूयार्क टाइम्स ने छापा है. खबर का शीर्षक है-
Indian Democracy Isn’t Dead After All
गाली नई नहीं है, आपकी याददाश्त नई हो गई है
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जब मैं पहली बार अमेरिका गया था तो सड़क पर मैंने एक कार को हॉर्न दे दिया। सामने वाले अमेरिकी ने बिना कुछ कहे अपनी बीच वाली उंगली दिखा दी।
मैं समझ नहीं पाया कि हुआ क्या?
बेटे ने मुस्कुराकर कहा, “पापा, उसने आपको गाली दी है।”
मैंने पूछा, “लेकिन उसने तो कुछ कहा ही नहीं।”
बेटा बोला, “पापा, गाली में हमेशा शब्द नहीं होते। कई बार एक इशारा ही पूरी गाली होता है।”
तब पहली बार समझ आया कि गाली सिर्फ भाषा नहीं होती, मानसिकता भी होती है।
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27 मई 1988 की बात है। पटना आकाशवाणी के एक लाइव बाल कार्यक्रम में एक छोटी बच्ची से चुटकुला सुनाने को कहा गया। बच्ची ने माइक पर कहा, “गली गली में शोर है, राजीव गांधी चोर हैं।”
पूरा देश यह सुन रहा था।
बताइए, तब किसने कहा था कि यह कैसी पीढ़ी है?
किसने पूछा था कि आखिर इतनी छोटी बच्ची के मुंह से देश के प्रधानमंत्री के लिए ऐसे शब्द कैसे निकल गए?
किसने टीवी स्टूडियो में बैठकर माथा पीटा था कि हमारे बच्चों के संस्कार खत्म हो गए हैं?
किसी ने नहीं।
क्योंकि सब जानते थे कि बच्ची ने अपने मन से कुछ नहीं कहा था। उसने वही दोहराया था जो उसने अपने आसपास सुना था।
बच्चे शब्द पैदा नहीं करते। बच्चे शब्द उधार लेते हैं। वे घर से लेते हैं। गली से लेते हैं। मोहल्ले से लेते हैं। समाज से लेते हैं। फिर मासूमियत से उन्हें लौटा देते हैं।
अगर आपकी उम्र थोड़ी अधिक है तो आपको आपातकाल के बाद का वह दौर भी याद होगा।
इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री थीं। जगह-जगह नारे लगते थे, “इंदिरा हटाओ, इंद्री बचाओ।”
क्या आपको उस नारे का अर्थ नहीं पता था? क्या आपको यह समझ नहीं आता था कि वह किस ओर इशारा कर रहा है? उस समय नसबंदी अभियान का भय पूरे देश में फैला हुआ था।
और यह नारा तो हम ही नहीं, पूरे शहर के बच्चे लगाते थे, “चार चवन्नी थाली में, इंदिरा गांधी नाली में।”
तब किसी ने नहीं रोका। किसी को यह नहीं लगा कि बच्चों के संस्कार खत्म हो गए हैं। इंदिरा गांधी तब देश की प्रधानमंत्री ही थीं।
कई नारे तो ऐसे भी लगाए जाते थे, जिन्हें आज लिखना भी ठीक नहीं लगता। “आम की लकड़ी कादो (कीचड़) में, इंदिरा … भादो में।”
आगे का हिस्सा आप चाहें तो स्वयं याद कर लीजिए।
जाहिर है, वह हमने नहीं बनाया था। हमें भी किसी बड़े ने ही सिखाया था।
तब राजनीति अपने सबसे उग्र रूप में थी। सत्ता पर व्यंग्य था। कटाक्ष था। व्यक्तिगत हमले थे। लेकिन तब किसी ने यह नहीं कहा कि भारत की संस्कृति समाप्त हो गई है।
आपको याद हो न हो, मुझे कवि नागार्जुन की वह प्रसिद्ध कविता याद है—
“इंदु जी, इंदु जी, क्या हुआ आपको?
सत्ता की मस्ती में भूल गईं बाप को।”
सत्ता पर इतना तीखा व्यंग्य भी लोकतंत्र का हिस्सा था।
मैं राजीव गांधी के प्रधानमंत्री रहने के दिनों में भोपाल से दिल्ली आया था और ‘जनसत्ता’ में काम शुरू किया था। उन दिनों अखबारों में नेताओं पर गंभीर आरोप पूरे नाम के साथ छपते थे। विपक्ष खुलकर नारे लगाता था। सत्ता खुलकर जवाब देती थी। अदालतें अपना काम करती थीं। लोकतंत्र अपने ढंग से चलता था।
बोफोर्स कांड की रिपोर्टिंग ने देश की राजनीति बदल दी थी। ‘इंडियन एक्सप्रेस’ और ‘जनसत्ता’ जैसे अखबार सत्ता से कठिन सवाल पूछ रहे थे। अरुण शौरी और प्रभाष जोशी जैसे पत्रकार सत्ता से टकराने की पहचान बन चुके थे। उस दौर में सत्ता से सवाल पूछना पत्रकारिता का धर्म माना जाता था।
और दौर में उस एक बच्ची के मुंह से रेडियो पर निकला वह वाक्य पूरे देश में चर्चा का विषय बन गया था। हमने नाम लिख कर अखबार में छापा था। तब आप हंसे थे, खिलखिलाए थे। किसी ने यह नहीं कहा कि देखिए, हमारी नई पीढ़ी बिगड़ गई है। किसी ने यह नहीं कहा कि बच्चे प्रधानमंत्री का सम्मान करना भूल गए हैं। सब जानते थे कि बच्ची वही बोल रही है जो उसने बड़ों से सुना है।
आज तस्वीर बदल गई है।
आज अगर कोई बच्चा या युवा किसी मंच पर कोई आपत्तिजनक राजनीतिक नारा बोल दे तो अगले ही मिनट पूरी पीढ़ी कठघरे में खड़ी कर दी जाती है। कहा जाता है कि देखिए, आज के बच्चों को संस्कार नहीं मिले। यह कैसी पीढ़ी तैयार हो गई है?
बच्चे आज भी वही कर रहे हैं जो चालीस साल पहले करते थे। वे सुनते हैं और दोहराते हैं।
असल सवाल यह नहीं है कि बच्चों ने क्या कहा।असल सवाल यह है कि उन्होंने वह सुना कहां से?
सच तो यह है कि पिछले दिनों जंतर मंतर पर जो गालियां सुनाई दीं, उनमें एक भी गाली नई नहीं थी। वे वर्षों से हमारे समाज में मौजूद हैं। हम सब उन्हें जानते हैं। सुनते रहे हैं। और यह पहली बार भी नहीं है।
टीवी बहसों में नेताओं के लिए अपमानजनक शब्दों का इस्तेमाल होता रहा है। एक वरिष्ठ पत्रकार ने अपने लाइव कार्यक्रम में राहुल गांधी के लिए “बास्टर्ड” शब्द का इस्तेमाल किया था। क्या तब आपको उस शब्द का अर्थ नहीं पता था? क्या तब आपको यह चिंता नहीं हुई कि प्राइम टाइम में घर-घर तक कैसी भाषा पहुंच रही है? आप तब चुप रहे थे।
एक पूर्व सैन्य अधिकारी ने लाइव टेलीविजन पर, चाहे दुश्मन के लिए ही सही, मां-बहन की गाली दी। तब बहुत लोगों ने उसे राष्ट्रभक्ति समझकर ताली बजाई। उसके बाद उन्हें जगह-जगह बुला कर वक्ता बनाया गया।
देश के पूर्व प्रधानमंत्री की पत्नी के लिए वर्षों तक अपमानजनक शब्द बोले गए। बार बाला, जर्सी गाय याद है कि भूल गए?
डॉ. मनमोहन सिंह (पीएम) के लिए “रेनकोट पहनकर बाथरूम में नहाने” जैसी टिप्पणी की गई। राहुल गांधी के लिए ‘पप्पू’ जैसे शब्द सामान्य राजनीतिक भाषा बना दिए गए।
यह सब सुन कर आपकी नैतिकता क्यों नहीं जागती?
आज इतना शोर क्यों?
असल में आपका विरोध गाली से है ही नहीं।
गाली तो आप रोज सुनते हैं। देते हैं। घर में, दफ्तर में, सड़क पर, ट्रैफिक सिग्नल पर, टीवी की बहसों में और सोशल मीडिया पर।
आपकी शिकायत सिर्फ इतनी है कि इस बार गाली किसके लिए बोली गई।
अगर सचमुच आपको गाली से नफरत है तो फिर सिद्धांत साफ रखिए।
अभी कहिए कि “गली गली में शोर है, राजीव गांधी चोर हैं” कहना भी गलत था। वो बच्ची असंस्कारी थी।
अभी कहिए कि इंदिरा गांधी के लिए अश्लील नारे लगाना भी गलत था।
अभी कहिए कि किसी भी नेता या उसके परिवार के लिए अपमानजनक (बार बाला, जर्सी गाय) भाषा गलत थी।
अभी कहिए कि टीवी स्टूडियो में पूर्व फौजी का लाइव दुश्मन को भी मां बहन की गाली देना गलत थी।
सिद्धांत व्यक्ति देखकर नहीं बदलने चाहिए। मैं स्पष्ट कहता हूं कि वो कभी गाली के पक्ष में नहीं रहे। न तब, जब इंदिरा गांधी के लिए अश्लील नारे लगाए गए। न तब, जब वह राजीव गांधी के लिए बोली गई। न आज, जब किसी और के लिए बोली जा रही है।
लोकतंत्र की ताकत तर्क से बढ़ती है, गाली से नहीं।
लोकतंत्र की सबसे बड़ी कमजोरी तब पैदा होती है, जब गाली का भी राजनीतिक धर्म तय कर दिया जाता है।
जब एक ही शब्द, एक ही अशालीनता और एक ही अपराध, व्यक्ति बदलते ही सही और गलत हो जाए, तब समझ लीजिए कि समस्या भाषा में नहीं है। समस्या हमारी ईमानदारी में है।
बच्चे वही नहीं बनते जो हम उन्हें पढ़ाते हैं। बच्चे वह भी बनते हैं जो हम उनके सामने बोलते हैं। वे हमारी किताबों से कम और हमारे व्यवहार से ज्यादा सीखते हैं।
इसलिए अगली बार जब किसी बच्चे के मुंह से कोई कड़वा राजनीतिक वाक्य सुनें तो उससे पहले अपने घर की बातचीत याद कीजिए। अपने नेताओं की भाषा याद कीजिए। अपने टीवी स्टूडियो की भाषा याद कीजिए। अपने सोशल मीडिया की भाषा याद कीजिए।
संभव है वह बच्चा सिर्फ आपकी ही आवाज लौटा रहा हो।
पीढ़ियां अचानक असंस्कारी नहीं होतीं। हर पीढ़ी अपने समय के बड़ों का आईना होती है।
नोट:
1. आईने पर गुस्सा करने से चेहरा नहीं बदलता।
2. आप गजनी के संजय सिंघानिया हो गए हैं। आपको सिर्फ वही गालियां याद हैं, जो आपके पसंदीदा के लिए बोली जाती हैं। बाकी आप भूल चुके हैं।
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