15/08/2026
एडीएम जबलपुर केस (1976): जब सुप्रीम कोर्ट ने सरेंडर कर दिया था और कहा था—'इमरजेंसी में सरकार को आपकी जान लेने का भी हक है!'
भारतीय लोकतंत्र और हमारी न्यायपालिका का इतिहास हमेशा जीत की कहानियों से भरा नहीं रहा है। एक दौर ऐसा भी आया था जब देश की सबसे बड़ी अदालत ने सत्ता की तानाशाही के सामने पूरी तरह घुटने टेक दिए थे और नागरिकों को उनके भाग्य के भरोसे छोड़ दिया था। यह दौर था जून 1975 में इंदिरा गांधी द्वारा लगाया गया 'आपातकाल' (Emergency)।
🔹 एडीएम जबलपुर केस (1976) – न्यायपालिका का सबसे काला अध्याय:आपातकाल के दौरान सरकार ने मीसा (MISA - Maintenance of Internal Security Act) जैसे सख्त कानूनों के तहत विपक्ष के हजारों नेताओं, पत्रकारों और सामाजिक कार्यकर्ताओं को बिना किसी कारण और बिना ट्रायल के जेलों में ठूंस दिया था। इसके खिलाफ देश के विभिन्न हाईकोर्ट्स ने नागरिकों को राहत दी, तो मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। इस केस को एडीएम जबलपुर बनाम शिवकांत शुक्ला (1976) या 'हेबियस कॉर्पस केस' (Habeas Corpus Case) कहा जाता है।सुप्रीम कोर्ट के सामने सबसे बड़ा और सीधा सवाल यह था: क्या आपातकाल के दौरान सरकार किसी भी नागरिक को बिना कारण बताए अनिश्चितकाल के लिए जेल में रख सकती है? क्या आपातकाल में नागरिकों से उनका 'जीने और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार' (Article 21) भी छीन लिया जाता है?सुप्रीम कोर्ट के 5 सबसे वरिष्ठ जजों की बेंच ने 4-1 के बहुमत से सरकार के पक्ष में एक बेहद चौंकाने वाला और शर्मनाक फैसला सुनाया। तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश ए.एन. रे सहित चार जजों ने कहा कि जब आपातकाल लागू हो, तो सरकार के पास किसी भी व्यक्ति की जान लेने या उसे कैद करने की असीमित शक्ति होती है और नागरिक राहत के लिए अदालत का दरवाजा नहीं खटखटा सकता।लेकिन इस घने अंधेरे में केवल एक जज ने न्याय का दीया जलाए रखा। वो थे जस्टिस एच.आर. खन्ना (H.R. Khanna)। उन्होंने अकेले बहुमत के खिलाफ जाते हुए अपनी ऐतिहासिक असहमति (Dissent Note) दर्ज की। जस्टिस खन्ना ने लिखा: “जीने और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार कानून की देन नहीं है, यह प्रकृति की देन है। कोई भी सरकार आपातकाल की आड़ में अपने ही नागरिकों को इस अधिकार से वंचित नहीं कर सकती।”जस्टिस खन्ना जानते थे कि इस सच को बोलने की उन्हें भारी कीमत चुकानी पड़ेगी। जनवरी 1977 में जब नए CJI की नियुक्ति का समय आया, तो सबसे वरिष्ठ होने के बावजूद सरकार ने उनकी वरिष्ठता को लांघकर जस्टिस एम.एच. बेग को मुख्य न्यायाधीश बना दिया। जस्टिस खन्ना ने बिना एक क्षण गंवाए उसी दिन अपने पद से इस्तीफा दे दिया। (दशकों बाद, साल 2017 में सुप्रीम कोर्ट ने प्राइवेसी के फैसले के दौरान आधिकारिक तौर पर माना कि एडीएम जबलपुर का वह पुराना फैसला बेहद गलत था और कोर्ट ने उसे इतिहास के कूड़ेदान में फेंकते हुए पलट दिया)।
1973 में केशवानंद भारती केस से निकला 'मूल ढांचे' का सिद्धांत आज भी उतना ही प्रासंगिक है और वर्तमान समय में भी कार्यपालिका (정부) और न्यायपालिका (Judiciary) के बीच सबसे बड़े वैचारिक टकराव की वजह बना हुआ है। हाल के वर्षों में संसद और न्यायपालिका के बीच इसे लेकर कई तीखे बयान सामने आए हैं:सरकार का तर्क (संसद की संप्रभुता सर्वोच्च है): सरकार और संसद के कई प्रतिनिधियों (जिनमें उपराष्ट्रपति और कानून मंत्री शामिल रहे हैं) का तर्क है कि 'मूल ढांचे' का सिद्धांत अस्पष्ट है और इसकी आड़ में न्यायपालिका संसद की कानून बनाने की संप्रभु शक्ति को कमजोर करती है। उनका सीधा तर्क है कि भारतीय लोकतंत्र में जनता सांसदों और सरकार को चुनकर भेजती है, जजों को कोई नहीं चुनता। इसलिए जनता की इच्छा (संसद) सर्वोच्च होनी चाहिए, जजों की राय नहीं।इसका सबसे बड़ा उदाहरण 2015 का एनजेएसी (NJAC - राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग) कानून था। इसे जजों की नियुक्ति की पुरानी कॉलेजियम प्रणाली को बदलने और उसमें पारदर्शिता लाने के लिए संसद के दोनों सदनों ने लगभग सर्वसम्मति से पास किया था। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने 'न्यायपालिका की स्वतंत्रता' को संविधान के मूल ढांचे का हिस्सा बताते हुए इस पूरे कानून को ही असंवैधानिक घोषित कर रद्द कर दिया। सरकार आज भी इसे संसद के अधिकार क्षेत्र में न्यायपालिका का एक बड़ा दखल मानती है।न्यायपालिका का तर्क (संविधान की सर्वोच्चता अनिवार्य है): दूसरी तरफ, सुप्रीम कोर्ट का रुख बेहद कड़ा और स्पष्ट है। विभिन्न मुख्य न्यायाधीशों ने सार्वजनिक मंचों से स्पष्ट किया है कि 'मूल ढांचा' कोई अड़चन या रुकावट नहीं है, बल्कि यह हमारे संविधान का 'उत्तरध्रुव तारा' (North Star) है। यह वह ध्रुवतारा है जो भारतीय लोकतंत्र के जहाज को भटकने नहीं देता। न्यायपालिका का मानना है कि यदि 'मूल ढांचे' की यह लक्ष्मण रेखा हटा दी गई, तो भविष्य में पूर्ण बहुमत वाली कोई भी सरकार संविधान को बदलकर देश के धर्मनिरपेक्ष ताने-बाने, संघीय ढांचे या स्वतंत्र चुनाव प्रणाली को अपनी राजनीतिक सहूलियत के हिसाब से खत्म कर सकती है।
हाल ही में मई 2026 के अपने ताजा फैसलों में भी सुप्रीम कोर्ट ने प्रिवी पर्स से जुड़े एक लंबित मामले की समीक्षा के दौरान एक बार फिर स्पष्ट किया है कि 'मूल ढांचा' का सिद्धांत केवल सरकार की निरंकुश या तानाशाही प्रवृत्तियों पर लगाम लगाने के लिए है। कोर्ट ने दोहराया कि जो संशोधन लोकतांत्रिक मूल्यों और समानता को मजबूत करते हैं (जैसे प्रिवी पर्स का अंत), उन्हें कोर्ट कभी नहीं रोकता, लेकिन संविधान की बुनियादी आत्मा से खिलवाड़ की इजाजत किसी को नहीं दी जा सकती।संसद और अदालत के बीच का यह वैचारिक शीतयुद्ध ही दरअसल भारतीय लोकतंत्र का संतुलन चक्र (Balance of Power) है। कानून बनाने की शक्ति भले ही जनता के प्रतिनिधियों के पास हो, लेकिन उस कानून की मर्यादा की रक्षा करने की जिम्मेदारी हमेशा संविधान की अदालत के पास रहेगी।