Sumit Shukla

Sumit Shukla See the possibility, not the problem...

25/01/2026

अधिवक्ता एकता जिन्दाबाद
बार काउंसिल ऑफ उत्तर प्रदेश के चुनाव में श्रवण सिंह जी को क्रमांक 280 पर प्रथम वरीयता का मत प्रदान करें।

22/01/2026

15/01/2026

देश भर के "टोल कर्मियों" को ट्रेनिंग की जरुरत है, नहीं तो वकील "सारी" बोलने पहुँचेगा।

मकर संक्रांति की हार्दिक शुभकामनाएँ 🤞
14/01/2026

मकर संक्रांति की हार्दिक शुभकामनाएँ 🤞

आप सभी को मकर संक्रांति की हार्दिक शुभकामनायें.....!!

Shout out to my newest followers! Excited to have you onboard!डॉ रामायण प्रसाद प्रजापति, Ananya Soni, Dilip Kumar Rajak,...
13/01/2026

Shout out to my newest followers! Excited to have you onboard!

डॉ रामायण प्रसाद प्रजापति, Ananya Soni, Dilip Kumar Rajak, Samim Hero Panti, Dattu Lakha Mukane, Nahtiya Baberiya Baberiya, Anjani Shukla, Firoj Ansari, राजकुमार सक्सेना, योगीराज विश्व विजेता, Anshu Shukla

12/01/2026

Shyam

वेद, स्मृतियाँ एवं उपनिषद, ग्रन्थ आदि में वर्णित वाच्य ही समस्त सृष्टि का आधार हैं
09/01/2026

वेद, स्मृतियाँ एवं उपनिषद, ग्रन्थ आदि में वर्णित वाच्य ही समस्त सृष्टि का आधार हैं

मनुस्मृति, वैदिक प्रामाण्य और रीतेश्वर महाराज की नौटंकी-साधना : एक शास्त्रसम्मत प्रत्याख्यान-
Raju Tiwari
वैदिक धर्म की सनातन परंपरा किसी एक व्यक्ति, संप्रदाय अथवा युगविशेष की स्वीकृति पर आश्रित नहीं रही है। वेद अपौरुषेय हैं, स्मृतियाँ वेदानुकूल हैं, और इतिहास–पुराण उस परंपरा के व्यावहारिक विस्तार हैं। मनुस्मृति जैसे ग्रंथ, जिन्हें आदि शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, माध्वाचार्य, कुमारील भट्ट, मेधातिथि, विजनेश्वर आदि महापुरुषों ने एककण्ठ से परम प्रमाण स्वीकार किया—उनकी सार्वभौमिकता किसी समकालीन व्यक्ति के प्रणाम या अप्रमाण से न तो सिद्ध होती है, न ही खंडित।

यह कहना कि किसी रीतेश्वर महाराज जैसे व्यक्ति के समर्थन न करने से मनुस्मृति की प्रामाणिकता सशंक हो गई—स्वयं में शास्त्रविमुखता और बौद्धिक दरिद्रता का उद्घोष है। इतिहास साक्षी है कि आसुरी सम्पदा से सम्पन्न, भोगप्रधान, आत्मप्रदर्शन में लिप्त न जाने कितने ही संसारी आए, जिन्होंने वेद, स्मृति, आचार और मर्यादा पर प्रश्नचिह्न लगाए—किन्तु वे स्वयं इतिहास के अंधकार में विलीन हो गए और वैदिक धर्म अपनी अक्षुण्ण, अविच्छिन्न धारा में आज भी प्रवाहित है।

आज समस्या मनुस्मृति नहीं है; समस्या है धर्म का नौटंकीकरण। “
येन केनाप्युपायेन प्रसिद्धः पुरुषो भवेत् ”
—इस सूक्ति को साधना का नहीं, प्रचार का मंत्र बना लिया गया है। रीतेश्वर महाराज इसी मानसिकता के ज्वलंत उदाहरण प्रतीत होते हैं। कहीं मंच पर मॉडल-धर्म का अभिनय, कहीं क्रोधावेश में माइक फेंकना, कहीं हनुमान जी को आदेशात्मक भाषा में “अभी हरो, तुरंत हरो” कहना—यह सब साधुता नहीं, यह आत्ममुग्ध नाट्य है।

जिस व्यक्ति का अधिकांश समय कैमरों की संख्या तय करने, रील की एंगेजमेंट बढ़ाने और सोशल मीडिया पर छवि चमकाने में व्यतीत हो—वह तप, संयम, स्वाध्याय और आत्मसंयम की साधना कब करेगा? लग्ज़री जीवन, महँगी गाड़ियाँ, मंत्रियों-अधिकारियों की संगति, चार-चार कैमरों की निगरानी में स्वयं को “ब्रह्मप्राप्त संत” घोषित कर देना—यह वैदिक संन्यास परंपरा नहीं, यह आधुनिक ब्रांड-साधुता है।

विडंबना यह है कि रीतेश्वर महाराज की रीलें यदि कोई सामान्य बालक भी देख ले, तो वह समझ जाए कि यहाँ गंभीर आध्यात्मिक साधना नहीं, केवल सुनियोजित अभिनय चल रहा है। शास्त्रार्थ का स्थान शोर ने ले लिया है, विवेक का स्थान उन्माद ने, और वैराग्य का स्थान वैभव-प्रदर्शन ने।

मनुस्मृति जैसे गम्भीर विधिसंहिता-ग्रंथ को, बिना अध्ययन, बिना भाष्य-परंपरा को समझे, केवल प्रसिद्धि-लिप्सा में अप्रमाणित ठहराना—न प्रगतिशीलता है, न साहस; यह केवल अहंकार और अज्ञान का सम्मिलित विस्फोट है। जिनके मस्तक पर बाह्य भार नहीं, बल्कि अहंकार का “छप्पन किलो” बोझ रखा हो—उनकी बुद्धि का दब जाना स्वाभाविक है। ऐसी अवस्था में शास्त्रचिन्तन नहीं, केवल प्रलाप ही संभव होता है।

वास्तविक संत वह है जो स्वयं को नहीं, शास्त्र को आगे रखता है; जो ग्रंथों के समक्ष नतमस्तक होता है, न कि उन्हें मंच से खारिज करता है। रीतेश्वर महाराज द्वारा मनुस्मृति जैसे परम प्रमाण ग्रंथ को प्रणाम न करना—उनकी बुद्धि की सीमा का परिचायक है, न कि शास्त्र की।

यद्यपि इन विषयों पर बोलना–लिखना आत्मक्लेशकारी प्रतीत होता है, किंतु जब मनुस्मृति जैसे ग्रंथ, जिन्हें समस्त आचार्यपरंपरा ने प्रमाण माना, उनके विरुद्ध इस प्रकार का सार्वजनिक प्रलाप हो—तब मौन भी अपराध बन जाता है।

अंततः यही प्रार्थना शेष रह जाती है—
प्रभु रीतेश्वर महाराज को सद्बुद्धि प्रदान करें।
उन्हें यह बोध हो कि धर्म रीलों से नहीं, संयम से जीवित रहता है; और शास्त्रों की प्रतिष्ठा किसी व्यक्ति की स्वीकृति पर नहीं, बल्कि सहस्राब्दियों की साधना, तप और आचार्यपरंपरा पर आधारित होती है।

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प्रभु मार्ग प्रशस्त करें।
11/12/2025

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11/12/2025

कल मेरे परम मित्र बृजेश भाई से चाय पर एक लंबे अंतराल के बाद भेंट हुई। बृजेश भाई हमसे अत्यधिक स्नेह रखते हैं। आप पर प्रभु श्री राम जी की कृपा बनी रहे। Yadav Brijesh

बनो तो वक़्त जैसे बनो, कदर न करने वालों को दोबारा न मिलो!
10/12/2025

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