Advocate D. P. Srivastava - Nanpara/Bahraich, UP

Advocate D. P. Srivastava - Nanpara/Bahraich, UP Contact information, map and directions, contact form, opening hours, services, ratings, photos, videos and announcements from Advocate D. P. Srivastava - Nanpara/Bahraich, UP, Legal, Kaamini Kunj Nanpara Suburb District Bahraich, Bahraich.

 #अधिवक्ताओं_के_15_विशेष_अधिकार — जो हर अधिवक्ता को जानने चाहिए. हमारे समाज में अक्सर यह धारणा बना दी जाती है कि वकील के...
07/03/2026

#अधिवक्ताओं_के_15_विशेष_अधिकार — जो हर अधिवक्ता को जानने चाहिए. हमारे समाज में अक्सर यह धारणा बना दी जाती है कि वकील केवल तारीख़ लेने आते हैं।
लेकिन सच्चाई यह है कि अधिवक्ता केवल “ #तारीख़_प्रबंधक” नहीं, बल्कि कानून और संविधान के #प्रोफेशनल_नेविगेटर होते हैं।

भारत में #अधिवक्ताओं को कई ऐसे #विधिक_अधिकार प्राप्त हैं जिनके बारे में आम लोगों को बहुत कम जानकारी है।

1. पूरे भारत में वकालत करने का अधिकार
Advocates Act, 1961 की धारा 30 के अनुसार अधिवक्ता पूरे भारत के किसी भी न्यायालय में प्रैक्टिस कर सकता है।

2. न्यायालय में मुवक्किल का प्रतिनिधित्व करने का अधिकार
अधिवक्ता अपने मुवक्किल की ओर से बहस करता है, याचिका दाखिल करता है और अदालत के सामने उसका पक्ष रखता है।Advocates Act, 1961 धारा: Section 29 (Only advocates entitled to practice law)

3. पेशे की स्वतंत्रता का अधिकार
Constitution of India के अनुच्छेद 19(1)(g) के तहत अधिवक्ता को अपना पेशा करने की स्वतंत्रता प्राप्त है।

4.मुवक्किल की गोपनीयता की रक्षा
Indian Evidence Act, 1872 की Indian Evidence Act, 1872 धारा: Section 126, 127, 129 के तहत वकील अपने क्लाइंट की गोपनीय जानकारी उजागर नहीं कर सकता। इसी अधिकार के तहत कोई भी पुलिस कर्मी किसी भी अधिवक्ता से उसके क्लाइंट के विषय में जानकारी नहीं मांग सकता है.

5.न्यायालय में सुने जाने का अधिकार
कोर्ट किसी भी पक्ष को सुने बिना निर्णय नहीं दे सकती — और उस पक्ष की आवाज़ अक्सर उसका अधिवक्ता ही होता है।अनुच्छेद: Article 14, Article 21
सिद्धांत: Audi Alteram Partem (दोनों पक्षों को सुनना)

6.केस की फाइल और दस्तावेज़ तैयार करने का अधिकार
याचिका, अपील, लिखित बयान, हलफ़नामा वकालतनामा — यह सब अधिवक्ता के माध्यम से ही विधिक रूप से मान्य होते हैं। कानून: Code of Civil Procedure, 1908
Order: Order III Rule 1 & 2

7.ट्रिब्यूनल और अन्य प्राधिकरणों के सामने पेश होने का अधिकार.अधिवक्ता केवल कोर्ट में ही नहीं बल्कि कई अर्ध-न्यायिक संस्थाओं के सामने भी बहस कर सकता है।कानून: Advocates Act, 1961
धारा: Section 33

8. मुवक्किल को कानूनी सलाह देने का अधिकार
कानूनी सलाह देना एक पेशेवर अधिकार है — हर कोई यह काम नहीं कर सकता। कानून: Advocates Act, 1961
धारा: Section 29

9. बार काउंसिल में प्रतिनिधित्व का अधिकार
हर अधिवक्ता को Bar Council of India और राज्य बार काउंसिल के चुनाव में भाग लेने का अधिकार है।कानून: Advocates Act
धारा: Section 3, Section 4

10.न्यायालय का अधिकारी (Officer of the Court) होने का दर्जा अधिवक्ता केवल पक्षकार का प्रतिनिधि नहीं बल्कि न्यायालय की सहायता करने वाला अधिकारी भी होता है।

11. सम्मानजनक व्यवहार पाने का अधिकार
न्यायालय और प्रशासन से अधिवक्ता के साथ गरिमापूर्ण व्यवहार अपेक्षित है।

12. केस की रणनीति तय करने की पेशेवर स्वतंत्रता
मुवक्किल तथ्य देता है, लेकिन कानूनी रणनीति अधिवक्ता तय करता है।

13. न्यायालय में बहस और तर्क रखने का अधिकार
कानून की व्याख्या करना अधिवक्ता का मुख्य कार्य और अधिकार दोनों है।

14.अपने मुवक्किल के हित की रक्षा करने का अधिकार
कभी-कभी इसका मतलब सत्ता से भी सवाल पूछना होता है।

15. न्याय की प्रक्रिया को चुनौती देने का अधिकार
अगर कानून या आदेश गलत लगे तो अधिवक्ता उसके खिलाफ अपील, रिवीजन या रिट दायर कर सकता है।संविधान:
Article 32 (Supreme Court में रिट)
Article 226 (High Court में रिट)
Article 136 (Special Leave Petition)

अगली बार जब कोई कहे —
“वकील क्या करते हैं, बस तारीख़ लेते हैं!”

तो मुस्कुरा कर कहिए —
“भाई साहब, तारीख़ तो कैलेंडर भी देता है…
लेकिन संविधान की भाषा में न्याय दिलाने का काम अधिवक्ता करता है।”



( सभी अधिवक्ता भाई इसे शेयर जरूर करें ताकि दूसरों को पता चले कि अधिवक्ताओं को कौन-कौन कानूनी अधिकार मिले हैं)

25/02/2026

अग्रिम जमानत पर न्यायालय का महत्वपूर्ण निर्णय

सुमित @ मोनू बनाम राज्य उत्तर प्रदेश(2026) मामले में सुप्रीम कोर्ट ने 9 फरवरी, 2026 को एक महत्वपूर्ण आदेश पारित किया।

इस मामले में न्यायालय ने कहा कि केवल प्राथमिकी दर्ज हो जाने या आरोप लगाए जाने मात्र से किसी व्यक्ति को जेल में रखना न्यायसंगत नहीं है।
हर मामले में आरोपी को जेल भेजना कानून का उद्देश्य नहीं है।
🔹 न्यायालय के अनुसार, यदि—
✔️ पुलिस जांच पूर्ण हो चुकी हो
✔️ चार्जशीट दाख़िल कर दी गई हो
✔️ आरोपी लम्बे समय से न्यायिक हिरासत में हो
✔️ आरोपी जांच में सहयोग कर रहा हो
तो ऐसे मामलों में जमानत देने पर गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए।
न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि
सिर्फ़ गंभीर धाराएँ (Serious Sections) होने के आधार पर जमानत से इनकार नहीं किया जा सकता।
प्रत्येक मामले में तथ्यों, परिस्थितियों और आरोपी के आचरण का मूल्यांकन आवश्यक है।

माननीय उच्च न्यायालय में  #जमानत याचिका फाइल करना कोई “इंस्टेंट नूडल्स” प्रक्रिया नहीं है, इसलिए पहले ही अपने क्लाइंट को...
17/02/2026

माननीय उच्च न्यायालय में #जमानत याचिका फाइल करना कोई “इंस्टेंट नूडल्स” प्रक्रिया नहीं है, इसलिए पहले ही अपने क्लाइंट को विधिवत ज्ञान दे दें—वरना चौथी डेट के बाद वही क्लाइंट आपको ऐसे देखेगा जैसे आपने ही उसे अंदर भिजवाया हो, और फिर बोलेगा: “सर, अब हम दूसरे काउंसिल से बात कर रहे हैं।”

सबसे पहले क्लाइंट को प्रेमपूर्वक समझा दें कि जमानत याचिका फाइल होते ही घंटी नहीं बजती और “ऑर्डर-ऑर्डर” नहीं होता। लगभग 3–4 डेट तक तो मामला पास ओवर और लेफ्ट ओवर की आध्यात्मिक साधना में रहेगा। सुनवाई का दर्शन चौथी डेट के बाद ही संभव है।

अब मान लीजिए चौथी डेट पर मामला लगा भी गया—तो यह मानकर न चलें कि उसी दिन जमानत की पुष्पवर्षा हो जाएगी। न्यायालय बड़े स्नेह से सरकारी पक्ष से काउंटर मांगेगा। और फिर आपका केस प्रवेश करेगा रोस्टर रूपी चक्रव्यूह में—जहाँ इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ बेंच में 15 दिन का रोस्टर और इलाहाबाद बेंच में 7 दिन का रोस्टर अनिवार्य तपस्या की तरह लागू है।

लखनऊ बेंच की कुछ अदालतों में तो अगर आपका केस मंगलवार को लिस्ट हो गया, तो समझिए उस दिन सुनवाई नहीं होगी। फिर अगले 15 दिन तक प्रतीक्षा योग कीजिए। साथ ही मन ही मन प्रार्थना कीजिए कि अगली बार आपका मुकदमा मंगलवार की लिस्ट से निकलकर सोमवार, बुधवार, बृहस्पतिवार या शुक्रवार की सूची में अवतरित हो। चाहें तो “सत्यनारायण कथा” भी करा लें—कानूनी प्रक्रिया में आस्था का तत्व बना रहता है।

और अगर ऊपरवाले की असीम कृपा से बहस हो भी गई, तो भी जमानत मिलना न्यायालय का विवेकाधिकार (discretion) है—मिल भी सकती है, नहीं भी मिल सकती। यहाँ कोई “गारंटी कार्ड” नहीं चलता।

इस समूची तपस्या में दो से चार महीने का समय लगना बिल्कुल सामान्य है। इसलिए बेहतर यही है कि वकालतनामा के साथ एक “यथार्थ बोध पत्र” पर भी क्लाइंट के हस्ताक्षर करा लें—जिसमें साफ लिखा हो कि जमानत याचिका कोई जादुई चिराग नहीं है।

वरना चौथी डेट के बाद क्लाइंट का “टाटा-बाय बाय” सुनना पड़ेगा, और फिर आप ही सोचते रह जाएंगे—“काउंटर तो आया ही नहीं, पर क्लाइंट जरूर चला गया।”

23/01/2026
24/11/2025

आवश्यक जानकारी

सीलिंग एक्ट के अनुसार, उत्तर प्रदेश में किसी भी एक व्यक्ति के नाम सिंचित भूमि 18 एकड़ और असिंचित भूमि 27 एकड़ से अधिक नहीं हो सकती है। बाग और ऊसर भूमि के लिए यह सीमा 45 एकड़ है। उससे ज्यादा जमीन होने पर इसे सरकार में निहित किए जाने का प्रावधान है।

सार्वजनिक जलाशयों से अवैध कब्जा हटवाने व हरिशंकरी प्रजाति के पौधरोपण हेतु तहसीलदार नानपारा को रूल ऑफ़ लॉ सोसायटी की ओर से...
21/09/2025

सार्वजनिक जलाशयों से अवैध कब्जा हटवाने व हरिशंकरी प्रजाति के पौधरोपण हेतु तहसीलदार नानपारा को रूल ऑफ़ लॉ सोसायटी की ओर से ज्ञापन https://nnicoverage.blogspot.com/2025/09/blog-post_21.html?m=0

Address

Kaamini Kunj Nanpara Suburb District Bahraich
Bahraich

Telephone

+919648467617

Website

Alerts

Be the first to know and let us send you an email when Advocate D. P. Srivastava - Nanpara/Bahraich, UP posts news and promotions. Your email address will not be used for any other purpose, and you can unsubscribe at any time.

Contact The Business

Send a message to Advocate D. P. Srivastava - Nanpara/Bahraich, UP:

Share

Category