एडवोकेट मोहम्मद शहूद

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31/05/2026
खालिद खान एडवोकेट/हापुड़ प्रत्याशी सदस्य बारकौंसिल ऑफ़ उत्तर प्रदेश 9359622821 8755572821                               ...
22/05/2026

खालिद खान एडवोकेट/हापुड़ प्रत्याशी सदस्य बारकौंसिल ऑफ़ उत्तर प्रदेश 9359622821
8755572821



11/05/2026

ये नकली सुनार है
असली सुनार तो मोदी जी के साथ है😁

निजी ज़मीन पर नियमित सामूहिक धार्मिक गतिविधियां सरकारी नियमों से मुक्त नहीं: इलाहाबाद हाईकोर्ट  --------इलाहाबाद हाईकोर्...
02/05/2026

निजी ज़मीन पर नियमित सामूहिक धार्मिक गतिविधियां सरकारी नियमों से मुक्त नहीं: इलाहाबाद हाईकोर्ट --------
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हाल ही में कहा कि निजी संपत्ति पर धार्मिक प्रार्थनाएं आयोजित की जा सकती हैं, बशर्ते वे कभी-कभार और बिना किसी बाधा के हों; लेकिन जब संपत्ति का इस्तेमाल नियमित या संगठित सामूहिक गतिविधियों के लिए किया जाता है तो उस पर सरकारी नियम लागू हो सकते हैं। जस्टिस सरल श्रीवास्तव और जस्टिस गरिमा प्रसाद की बेंच ने आगे कहा कि अगर निजी संपत्ति पर ऐसी गतिविधि नियमित, संगठित या बड़े पैमाने पर होने लगती है तो इसे परिसर के इस्तेमाल के तरीके में बदलाव माना जा सकता है। यह योजना और स्थानीय नियमों सहित लागू कानूनों के अधीन होगा।

बेंच ने यह भी साफ़ किया कि कोई भी व्यक्ति या समूह सार्वजनिक ज़मीन का इस्तेमाल किसी विशेष या बार-बार होने वाली धार्मिक जगह के तौर पर करने का अधिकार नहीं जता सकता। सरकार की यह ज़िम्मेदारी है कि वह सभी को समान पहुँच सुनिश्चित करे और ऐसी ज़मीन के किसी विशेष या एकाधिकार वाले इस्तेमाल की अनुमति न दे। खास बात यह है कि अपने आदेश में बेंच ने हाईकोर्ट के पिछले फ़ैसलों (जो जस्टिस अतुल श्रीधरन की अगुवाई वाली बेंच ने दिए थे) के बारे में भी स्पष्टीकरण दिया।

इनमें 'मुनाज़िर खान बनाम उत्तर प्रदेश सरकार और अन्य' और 'मरानाथा फुल गॉस्पेल मिनिस्ट्रीज़ बनाम उत्तर प्रदेश सरकार' जैसे मामले शामिल हैं। इन मामलों में यह माना गया कि किसी नागरिक को धार्मिक प्रार्थना करने के लिए कानून के तहत किसी भी तरह की अनुमति की ज़रूरत नहीं होती।
हालांकि, हाईकोर्ट ने अपने ताज़ा फ़ैसले में यह साफ़ किया कि उन फ़ैसलों का यह मतलब नहीं निकाला जाना चाहिए कि निजी परिसर में होने वाली संगठित या नियमित सामूहिक गतिविधियां पूरी तरह से सरकारी नियमों से मुक्त हैं। बेंच ने कहा, "वे (फ़ैसले) एक सीमित सुरक्षा प्रदान करते हैं,

यानी ऐसी स्थिति में जब प्रार्थना निजी दायरे तक सीमित हो और उससे कोई बाधा उत्पन्न न हो। जब कोई गतिविधि इस दायरे से बाहर निकलकर सार्वजनिक क्षेत्र को प्रभावित करने लगती है तो उस पर कानूनी नियम लागू हो जाते हैं। ये फ़ैसले किसी को भी निजी परिसर को बिना किसी नियम-कानून वाली सामूहिक धार्मिक जगह में बदलने का अधिकार नहीं देते।"

इन टिप्पणियों के साथ बेंच ने 'असीन' नाम के एक व्यक्ति द्वारा दायर की गई रिट याचिका खारिज की। असीन ने अधिकारियों से यह निर्देश देने की मांग की कि वे संभल ज़िले के एक गाँव में स्थित ज़मीन के एक टुकड़े पर नमाज़ अदा करने के लिए सुरक्षा और अनुमति प्रदान करें। उसने जून 2023 की एक 'गिफ़्ट डीड' (दान-पत्र) के आधार पर उस निजी संपत्ति पर अपना मालिकाना हक होने का दावा किया। उसने यह भी तर्क दिया कि संबंधित अधिकारी उसे ऐसी प्रार्थनाएं करने से रोक रहे हैं, जिससे संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 के तहत प्राप्त उसके मौलिक अधिकारों का उल्लंघन हो रहा है। दूसरी ओर, राज्य ने दावा किया कि विवादित ज़मीन 'आबादी ज़मीन' के तौर पर दर्ज है, जिसका मतलब है कि यह ज़मीन आम लोगों के इस्तेमाल के लिए है और याचिकाकर्ता का इस पर कोई मालिकाना हक नहीं है।

बेंच को यह भी बताया गया कि इस जगह पर पारंपरिक तौर पर नमाज़ सिर्फ़ ईद के मौके पर ही पढ़ी जाती रही है। इस पुरानी परंपरा पर कोई रोक नहीं लगाई गई है। हालांकि, राज्य ने याचिकाकर्ता की उस कोशिश का विरोध किया, जिसमें वह गाँव के अंदर और बाहर से लोगों को बुलाकर यहां नियमित तौर पर बड़े पैमाने पर सामूहिक नमाज़ शुरू करना चाहता था।
इन दलीलों को ध्यान में रखते हुए बेंच ने कहा कि जहां एक तरफ़ संविधान धर्म का पालन करने के अधिकार की रक्षा करता है, वहीं यह भी साफ़ करता है कि यह अधिकार सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता और स्वास्थ्य के अधीन है। कोर्ट ने आगे कहा कि सार्वजनिक ज़मीन सभी के लिए होती है और उस पर कानून का नियंत्रण होता है। कोई भी व्यक्ति इस पर नियमित धार्मिक सभाएं करने का अधिकार नहीं जता सकता। बेंच ने टिप्पणी की, "इस तरह के इस्तेमाल से लोगों की आवाजाही, पहुंच और सुरक्षा पर असर पड़ता है। कुछ खास स्थितियों में इससे सांप्रदायिक संतुलन भी बिगड़ सकता है। इसलिए इसे नियंत्रित किया जाना ज़रूरी है। सभी को समान पहुंच, नागरिक व्यवस्था और बिना किसी भेदभाव के प्रशासन देना राज्य का फ़र्ज़ है।" निजी ज़मीन पर होने वाली निजी धार्मिक गतिविधियों के बारे में कोर्ट ने कहा कि निजी प्रार्थनाएं, पारिवारिक पूजा और इस तरह की सीमित धार्मिक गतिविधियां आम तौर पर संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 के तहत धार्मिक स्वतंत्रता के दायरे में आती हैं। हालांकि, इसने यह स्पष्ट किया कि यह सुरक्षा केवल उन गतिविधियों तक सीमित है, जो वास्तव में निजी, कभी-कभार होने वाली और बिना किसी बाधा के होती हैं। यह किसी भी निजी परिसर को असल में एक सार्वजनिक धार्मिक स्थल में बदलने तक विस्तारित नहीं होती। बेंच ने टिप्पणी की, "एक बार जब कोई गतिविधि सामूहिक रूप ले लेती है तो वह केवल आंतरिक आस्था का विषय नहीं रह जाती। इसके बाहरी परिणाम सामने आने लगते हैं: इसमें बार-बार लोग आ सकते हैं—जिनमें घर के सदस्यों के अलावा बाहरी लोग भी शामिल हो सकते हैं—इससे आने-जाने में बाधा पड़ सकती है, ट्रैफिक और पार्किंग की समस्याएं पैदा हो सकती हैं, इलाके का स्वरूप बदल सकता है, शोर हो सकता है, पुलिस की ज़रूरत पड़ सकती है और संवेदनशील इलाकों में समुदायों के बीच तनाव की संभावना पैदा हो सकती है। इस चरण पर वह गतिविधि एक सार्वजनिक या अर्ध-सार्वजनिक आयाम ले लेती है। ऐसा नहीं है कि निजी संपत्ति अपनी सारी सुरक्षा खो देती है, बल्कि उस संपत्ति का उपयोग—उस सीमा तक—संवैधानिक उद्देश्यों के लिए पूरी तरह से निजी नहीं रह जाता और वह उचित नियमों के अधीन हो जाता है।" अदालत ने कहा कि कानून के अनुसार अधिकारियों के लिए यह ज़रूरी नहीं है कि वे किसी वास्तविक अशांति के होने का इंतज़ार करें। जहां किसी गतिविधि से सार्वजनिक व्यवस्था पर असर पड़ने की संभावना हो, वहां अधिकारियों को पहले से ही कार्रवाई करने का अधिकार है। अदालत ने कहा, "इसकी कसौटी गतिविधि का धार्मिक स्वरूप नहीं, बल्कि उसके सार्वजनिक परिणाम हैं। यह दृष्टिकोण धर्मनिरपेक्षता के संवैधानिक सिद्धांत के अनुरूप है, जिसके तहत सभी धर्मों के साथ समान व्यवहार और कानून का समान रूप से पालन होना आवश्यक है। जहाँ एक ओर राज्य को निजी पूजा-पाठ की अनुमति देनी चाहिए, वहीं दूसरी ओर वह उन गतिविधियों को नियंत्रित करने के लिए भी समान रूप से बाध्य है, जिनसे सार्वजनिक व्यवस्था प्रभावित होती है—चाहे वे गतिविधियां सार्वजनिक भूमि पर हों या निजी परिसर में। संवैधानिक व्यवस्था के अंतर्गत अनुच्छेद 25 और 26 के सुचारू संचालन के लिए इस संतुलन को बनाए रखना अत्यंत आवश्यक है।" मामले के गुण-दोषों पर विचार करते हुए बेंच ने पाया कि विचाराधीन भूमि सरकारी (सार्वजनिक) भूमि के रूप में दर्ज है। उस पर मालिकाना हक का दावा केवल अस्पष्ट सीमा-विवरणों पर आधारित है। इसके अलावा भी, अदालत ने कहा कि यदि इस भूमि को निजी संपत्ति मान भी लिया जाए, तब भी याचिकाकर्ता किसी भी प्रकार की राहत पाने का हकदार नहीं है, क्योंकि वह यहां एक नई धार्मिक प्रथा की शुरुआत कर रहा है। रिकॉर्ड से पता चलता है कि वह किसी मौजूदा प्रथा की रक्षा नहीं कर रहे हैं, बल्कि नियमित रूप से सामूहिक सभाएं शुरू करना चाहते हैं, जिनमें गांव के अंदर और बाहर के लोग शामिल होंगे। यह स्वीकार किया गया कि पहले नमाज़ केवल ईद जैसे विशेष अवसरों पर ही अदा की जाती है। एक सीमित निजी दायरे से बाहर का यह विस्तार संरक्षित क्षेत्र के अंतर्गत नहीं आता है और यह विनियमन के अधीन है। इन परिस्थितियों में यह पाते हुए कि कोई भी लागू करने योग्य कानूनी अधिकार नहीं बनता है, पीठ ने रिट याचिका खारिज की। Case title - Aseen vs State of UP and 3 Others 2026 LiveLaw (AB) 256

सार्वजनिक स्थान पर कॉफी पीना भी डर का कारण बन गया': अंतरधार्मिक जोड़ों की उत्पीड़न पर NHRC की चुप्पी पर हाईकोर्ट में तीख...
01/05/2026

सार्वजनिक स्थान पर कॉफी पीना भी डर का कारण बन गया': अंतरधार्मिक जोड़ों की उत्पीड़न पर NHRC की चुप्पी पर हाईकोर्ट में तीखी टिप्पणी, बेंच में मतभेद
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इलाहाबाद हाईकोर्ट में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) की भूमिका को लेकर सुनवाई के दौरान खंडपीठ के दो जजों के बीच असामान्य मतभेद देखने को मिले। जस्टिस अतुल श्रीधरन ने NHRC की कार्यप्रणाली पर कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि अंतरधार्मिक संबंधों में रहने वाले लोगों के लिए सार्वजनिक स्थान पर साथ कॉफी पीना तक भय का कारण बन गया है, जबकि आयोग ऐसे मामलों में स्वतः संज्ञान नहीं लेता। हालांकि जस्टिस विवेक सारन ने इन व्यापक टिप्पणियों से असहमति जताई और कहा कि बिना सभी पक्षों को सुने इस प्रकार की प्रतिकूल टिप्पणियां उचित नहीं हैं।
मामला टीचर्स एसोसिएशन मदरिस अरबीया' की याचिका से संबंधित है, जिसमें उत्तर प्रदेश के 558 सहायता प्राप्त मदरसों के विरुद्ध जांच के लिए एनएचआरसी द्वारा आर्थिक अपराध शाखा को दिए गए निर्देश को चुनौती दी गई। सुनवाई के दौरान जस्टिस अतुल श्रीधरन ने कहा कि प्रथम दृष्टया NHRC अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर ऐसे मामलों में हस्तक्षेप कर रहा है, जबकि वह उन मामलों में सक्रिय नहीं दिखता जहां मुस्लिम समुदाय के लोगों पर हमले, भीड़ हिंसा या अंतरधार्मिक जोड़ों के उत्पीड़न के आरोप सामने आते हैं।
अदालत ने टिप्पणी की, “विभिन्न समुदायों के व्यक्तियों के बीच संबंधों के कारण उत्पीड़न की स्थिति ऐसी हो गई है कि अलग धर्म के व्यक्ति के साथ सार्वजनिक स्थान पर कॉफी पीना भी भय का विषय बन गया है।” जस्टिस श्रीधरन ने कहा कि उनके समक्ष ऐसा कोई उदाहरण नहीं रखा गया,
जिसमें NHRC या राज्य मानवाधिकार आयोग ने ऐसे मामलों में स्वतः संज्ञान लिया हो। दूसरी ओर, जस्टिस विवेक सारन ने कहा कि NHRC उस समय अदालत में प्रतिनिधित्व नहीं कर रहा था और जब ऐसे गंभीर अवलोकन किए जा रहे हों तो संबंधित पक्षों को सुनना आवश्यक है।
उन्होंने कहा, “यदि मामले के गुण-दोष या एनएचआरसी की भूमिका पर कोई टिप्पणी करनी थी तो सभी संबंधित पक्षों को सुनना चाहिए था।” हालांकि, जस्टिस सारन ने NHRC को नोटिस जारी करने और उसके आदेश पर पहले से लगी अंतरिम रोक जारी रखने के निर्णय से सहमति व्यक्त की। मामले की आगे सुनवाई NHRC के जवाब के बाद होगी।

RTE Act | स्कूल, राज्य द्वारा आवंटित स्टूडेंट का एडमिशन योग्यता पर विवाद का बहाना बनाकर नहीं रोक सकते: सुप्रीम कोर्ट ---...
30/04/2026

RTE Act | स्कूल, राज्य द्वारा आवंटित स्टूडेंट का एडमिशन योग्यता पर विवाद का बहाना बनाकर नहीं रोक सकते: सुप्रीम कोर्ट --------------
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सुप्रीम कोर्ट ने फैसला दिया कि प्राइवेट "पड़ोस के स्कूलों" को शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009 (RTE Act) के तहत राज्य द्वारा आवंटित स्टूडेंट्स को तुरंत एडमिशन देना होगा। इस मामले में वे इस आधार पर एडमिशन से मना नहीं कर सकते कि छात्र की योग्यता को लेकर कोई विवाद अभी लंबित है। कोर्ट ने साफ किया कि भले ही स्कूल को किसी स्टूडेंट की योग्यता को लेकर कोई शक हो तो भी वह स्पष्टीकरण के लिए अधिकारियों से संपर्क कर सकता है, लेकिन इस बीच वह एडमिशन नहीं रोक सकता।
जस्टिस पमिदिघंतम श्री नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की बेंच ने यह टिप्पणी की, "...हम पाते हैं कि याचिकाकर्ता जैसे स्कूल, जिन्हें सरकार द्वारा किए गए चयन से कुछ असहमति हो सकती है, वे संबंधित अधिकारी के सामने अपनी बात रख सकते हैं। हालांकि, उन्हें ऐसी अर्जी के नतीजे का इंतज़ार नहीं करना चाहिए। इसके बजाय उन्हें उस स्टूडेंट को एडमिशन देना अनिवार्य है, जिसका नाम इस बीच स्कूल को भेजी गई सूची में शामिल है। यह तत्परता भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21A के वादे को साकार करने के लिए ज़रूरी है।"
यह मामला तब सामने आया, जब उत्तर प्रदेश बेसिक शिक्षा विभाग द्वारा याचिकाकर्ता स्कूल के लिए चुने और आवंटित किए गए एक स्टूडेंट को योग्यता को लेकर "अनिश्चितता" के आधार पर एडमिशन देने से मना कर दिया गया। इलाहाबाद हाईकोर्ट के विचार को सही ठहराते हुए कोर्ट ने साफ किया कि एक बार जब राज्य चयन प्रक्रिया पूरी कर लेता है और सूची भेज देता है तो स्कूल के पास एडमिशन से मना करने या उसमें देरी करने का कोई अधिकार नहीं रह जाता।
कोर्ट ने हाईकोर्ट के फैसले का समर्थन करते हुए कहा, "...स्कूल राज्य सरकार द्वारा लिए गए फैसले के खिलाफ अपील की तरह काम नहीं कर सकते।" कोर्ट ने बताया कि 'पड़ोस के स्कूलों' सहित सभी स्कूल, कमजोर और वंचित समूहों के बच्चों के लिए 25% आरक्षण देने हेतु राज्य द्वारा निर्धारित एडमिशन प्रक्रिया का पालन करने के लिए कानूनी रूप से बाध्य हैं। अदालत ने टिप्पणी की, “RTE Act, 2009 की धारा 12 के तहत 'पड़ोस के स्कूल' का यह दायित्व है कि वह हमारे समाज के कमज़ोर और वंचित वर्गों के बच्चों को क्लास की कुल संख्या के पच्चीस प्रतिशत तक, एडमिशन दे। इस दायित्व में हमारे समाज की सामाजिक संरचना को बदलने की असाधारण क्षमता है। इसका ईमानदारी से पालन सचमुच एक बड़ा बदलाव ला सकता है। यह न केवल 'युवा भारत' को शिक्षित करने की दिशा में एक कदम है, बल्कि 'दर्जे की समानता' के प्रस्तावना वाले उद्देश्य को हासिल करने की दिशा में भी एक ठोस उपाय है… ऐसे स्टूडेंट्स का एडमिशन सुनिश्चित करना 'राष्ट्रीय मिशन' होना चाहिए। साथ ही यह उचित सरकार तथा स्थानीय प्राधिकरण का दायित्व होना चाहिए। इसी तरह अदालतें—चाहे वे संवैधानिक हों या दीवानी—उन्हें उन माता-पिता को आसान पहुंच और प्रभावी राहत देने के लिए अतिरिक्त प्रयास करने चाहिए, जो अपने अधिकार से वंचित किए जाने की शिकायत करते हैं।”
अदालत ने आगे कहा, “एक्ट की धारा 12 के तहत दिए गए आदेश को पूरी निष्ठा और प्रतिबद्धता के साथ लागू किया जाना चाहिए। हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि गैर-सहायता प्राप्त स्कूलों में क्लास की कुल संख्या के कम-से-कम पच्चीस प्रतिशत बच्चों का एडमिशन कमज़ोर और वंचित समूहों से हो। यह निश्चित रूप से एक 'राष्ट्रीय मिशन' है। इस वैधानिक नीति का प्रभावी ढंग से पालन करना एक बड़ा बदलाव लाएगा। इस संबंध में हममें से हर कोई—चाहे वह कोई संस्था हो या कोई व्यक्ति, चाहे वह केंद्र सरकार हो या राज्य सरकार, सलाहकार परिषदें हों या आयोग—सभी अपने-अपने दायित्वों को निभाने के लिए बाध्य हैं। इसमें सबसे महत्वपूर्ण भूमिका 'पड़ोस के स्कूलों' की है। इस मिशन में न्यायपालिका पर भी यह सुनिश्चित करने का दायित्व है कि एडमिशन की प्रक्रिया सभी के लिए आसानी से सुलभ, प्रभावी और कुशल हो। अदालत को यह भी सुनिश्चित करना चाहिए कि किसी भी प्रकार की निष्क्रियता या अकुशलता के विरुद्ध उपलब्ध न्यायिक उपचारों का समाधान प्रभावी ढंग से और शीघ्रता से किया जाए।” तदनुसार, अपील खारिज की गई। Cause Title: LUCKNOW PUBLIC SCHOOL, ELDICO AND ANR. VERSUS THE STATE OF UTTAR PRADESH & ORS.

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