20/08/2026
24 जुलाई 1991 के दोपहर 3:00 बजे जब भारत का विदेशी मुद्रा भंडार गिरकर महज 1.2 अरब डॉलर (120 करोड़ USD) रह गया था और देश के पास केवल 14 दिनों के आयात का पैसा बचा था, तब ऑक्सफोर्ड और कैम्ब्रिज से पढ़े अर्थशास्त्री डॉ. मनमोहन सिंह ने संसद में ऐतिहासिक बजट भाषण देकर देश को दिवालिया होने से बचाया था।
उस वक्त देश का सोना बैंक ऑफ इंग्लैंड में गिरवी रखना पड़ा था, लेकिन डॉ. सिंह की उदारीकरण नीतियों ने भारत की जीडीपी को अगले 2 दशकों में 270 अरब डॉलर से बढ़ाकर 2,000 अरब डॉलर (2 ट्रिलियन डॉलर) के पार पहुंचा दिया।
15 नवंबर 2008 को जब वाशिंगटन में G20 सम्मेलन हुआ और अमेरिका की 500 से अधिक बैंकें धराशायी हो चुकी थीं, तब अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने डॉ. मनमोहन सिंह को आमंत्रित कर वित्तीय मंदी से उबरने की सलाह मांगी थी।
डॉ. सिंह ने तब 1.1 ट्रिलियन डॉलर के स्पेशल ड्रॉइंग राइट्स (SDR) और वैश्विक बैंकिंग सुधारों का जो ब्लूप्रिंट दिया, उसी पर अमल करके अमेरिका और यूरोपीय देशों ने अपनी अर्थव्यवस्थाओं को पूरी तरह कंगाल होने से बचाया था।
जून 2010 के टोरंटो G20 सम्मेलन में बराक ओबामा का ऐतिहासिक बयान दर्ज है— "जब डॉ. मनमोहन सिंह बोलते हैं, तो पूरी दुनिया उन्हें सुनती है।"
2014 के बाद राजनीतिक मर्यादाओं को 100% ताक पर रखकर उसी विश्वप्रसिद्ध अर्थशास्त्री का उपहास उड़ाने का एक कुत्सित अभियान चलाया गया।
सोशल मीडिया पर 10,000 से अधिक संगठित हैंडल्स के जरिए उन्हें 'मौनमोहन' और 'गूंगी गुड़िया' कहकर प्रचारित किया गया, जबकि असलियत यह थी कि डॉ. सिंह ने अपने 10 साल (3,650 दिन) के कार्यकाल में 100 से अधिक बिना लिखी पर्चियों वाली प्रेस कॉन्फ्रेंस करके पत्रकारों के सीधे तीखे सवालों के जवाब दिए थे।
वहीं दूसरी तरफ, 2014 से 2026 तक के 12 वर्षों (4,380 से अधिक दिनों) में वर्तमान नेतृत्व ने 0 (शून्य) स्वतंत्र प्रेस कॉन्फ्रेंस करने का अनूठा रिकॉर्ड बनाया है।
8 फरवरी 2017 को राज्यसभा में 245 सांसदों की मौजूदगी में संसद के इतिहास की सबसे शर्मनाक घटना घटी, जब देश के प्रधानमंत्री ने डॉ. सिंह पर कटाक्ष करते हुए कहा कि "बाथरुम में रेनकोट पहनकर नहाने की कला सिर्फ डॉक्टर साहब जानते हैं"।
जिस व्यक्ति को ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय ने मानद उपाधि दी, जिसने 1972 से 1976 तक मुख्य आर्थिक सलाहकार और 1982 से 1985 तक आरबीआई (RBI) गवर्नर के रूप में देश की वित्तीय नींव रखी, उस महान अर्थशास्त्री का देश की सबसे बड़ी पंचायत में इस तरह मजाक उड़ाया गया।
2008 की वैश्विक वित्तीय महामंदी के दौरान, जब दुनिया की बड़ी-बड़ी अर्थव्यवस्थाओं की वृद्धि दर -2.0% तक नकारात्मक हो गई थी, तब डॉ. मनमोहन सिंह की दूरदर्शी नीतियों के कारण भारत की जीडीपी वृद्धि दर 6.7% से नीचे नहीं गिरी।
इसके ठीक विपरीत, बिना किसी वैश्विक संकट के 8 नवंबर 2016 की रात 8:00 बजे लागू की गई नोटबंदी की बिना सोचे-समझे ली गई सनक ने देश की 1.5 मिलियन (15 लाख) नौकरियां रातों-रात खत्म कर दीं, 1,500,000 से अधिक एमएसएमई (MSME) उद्योग बंद कर दिए और जीडीपी को 1.5% का सीधा झटका दिया।
2004 से 2014 के बीच डॉ. सिंह के शासनकाल में 270 मिलियन (27 करोड़) भारतीय नागरिकों को गरीबी रेखा से बाहर निकाला गया, जो संयुक्त राष्ट्र (UN) के इतिहास का एक रिकॉर्ड आंकड़ा है।
वहीं 2020 में बिना किसी योजना के लागू किए गए आपातकालीन लॉकडाउन के कारण 110 मिलियन (11 करोड़) प्रवासी मजदूरों को पैदल सड़कों पर नापने के लिए मजबूर होना पड़ा, और देश में बेरोजगारी दर 45 वर्षों के रिकॉर्ड स्तर 6.1% पर पहुंच गई।
2005 में डॉ. मनमोहन सिंह ने 1,400,000,000 (140 करोड़) देशवासियों को सूचना का अधिकार (RTI) कानून थमाया, ताकि देश का आम नागरिक भी सरकार से सवाल पूछ सके।
लेकिन आज स्थिति यह है कि आरटीआई के 70% से अधिक आवेदनों को खारिज कर दिया जाता है, और आंकड़े मांगने पर 'डेटा उपलब्ध नहीं है' (No Data Available) का बहाना बनाकर संसद को गुमराह किया जाता है।
डॉ. मनमोहन सिंह ने 2006 में जब मनरेगा (MGNREGA) योजना की शुरुआत की, तो संसद में खड़े होकर सत्ता के समर्थकों ने इसे 'कांग्रेस की विफलता का जीवित स्मारक' कहा था। वही मनरेगा योजना महामारी के दौर में 110 मिलियन (11 करोड़) भूखे मजदूरों के लिए एकमात्र सहारा बनी और वर्तमान सरकार को मजबूरन इसका बजट बढ़ाकर 1,11,500 करोड़ रुपये (1.11 लाख करोड़) करना पड़ा।
2008 में डॉ. मनमोहन सिंह ने अमेरिका के साथ ऐतिहासिक भारत-अमेरिका असैन्य परमाणु समझौते (123 Agreement) पर अपनी सरकार दांव पर लगा दी थी, ताकि भारत को 30,000 मेगावाट स्वच्छ ऊर्जा मिल सके और भारत पर लगे 34 साल पुराने परमाणु प्रतिबंध खत्म हों।
उस समय वर्तमान सत्ता पक्ष ने संसद में विश्वास मत के दौरान सरकार गिराने के लिए अपनी पूरी ताकत झोंक दी थी, लेकिन डॉ. सिंह ने देश के भविष्य के लिए राजनीति की परवाह न करते हुए समझौते को पारित करवाया।
2014 में जब डॉ. मनमोहन सिंह ने प्रधानमंत्री पद छोड़ा, तब भारत का विदेशी मुद्रा भंडार 312 अरब डॉलर था, जो उन्होंने 2004 में केवल 120 अरब डॉलर से शुरू करके 160% से अधिक बढ़ाया था।
उन्होंने कभी टीवी कैमरों के सामने 56 इंच का ढिंढोरा नहीं पीटा, न ही विदेशी राष्ट्राध्यक्षों के साथ फोटो-शूट कराने के लिए किताबें पकड़ने का नाटक किया, बल्कि बिना पर्ची और बिना टेलीप्रॉम्पटर के अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत का आर्थिक रुख दुनिया के सामने रखा।
यह इस देश की सबसे बड़ी त्रासदी है कि जिस अर्थशास्त्री की लिखी किताबें दुनिया के 50 से अधिक विश्वविद्यालयों में पढ़ाई जाती हैं, उस महान व्यक्तित्व को वे लोग नीचा दिखाने की कोशिश करते हैं जिनकी अपनी डिग्रियां सार्वजनिक करने के नाम पर अदालतों में मुकदमे लड़े जाते हैं।
इतिहास हमेशा नारों, भाषणों और विज्ञापनों से नहीं, बल्कि ठोस आर्थिक आंकड़ों और नियत से लिखा जाता है
और आंकड़े चीख-चीखकर गवाही देते हैं कि देश को निर्माण की राह पर कौन ले गया और कौन केवल प्रचार के दम पर देश चला रहा है।
Pankaj Kumar Jat..
Rahul Gandhi Jitu Patwari Sukhendra Singh Maheshwari Mishra