15/08/2026
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि जुडिशियल मजिस्ट्रेट द्वारा फाइनल रिपोर्ट स्वीकार कर लेने के बाद भी जांच एजेंसी को CrPC की धारा 173(8) के तहत Further Investigation करने से नहीं रोका जा सकता।
यह टिप्पणी जस्टिस विवेक कुमार सिंह की बेंच ने करीब दो दशक पुराने हत्या के मामले में की। मामला वर्ष 2005 की उस FIR से जुड़ा था, जिसमें याचिकाकर्ता समेत कई लोगों पर शिकायतकर्ता के माता-पिता की हत्या का आरोप लगाया गया था। जांच के दौरान शिकायतकर्ता और उसकी बहन ने अपने बयानों में आरोपियों को हत्या से अलग बताया था। इसके बाद पर्याप्त साक्ष्य न मिलने पर पुलिस ने फरवरी 2006 में फाइनल रिपोर्ट दाखिल की, जिसे अप्रैल 2006 में सक्षम कोर्ट ने स्वीकार कर लिया।
करीब 20 साल बाद शिकायतकर्ता ने आगे की जांच की मांग की। पुलिस ने जांच आगे बढ़ाने की कार्रवाई शुरू की, जिसे याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट में चुनौती दी। उसका तर्क था कि फाइनल रिपोर्ट स्वीकार होने के बाद मामला अंतिम रूप ले चुका था और बिना नई जानकारी या साक्ष्य के इतने वर्षों बाद जांच दोबारा शुरू करना Re-investigation या De-novo Investigation के समान होगा।
हाईकोर्ट ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया। कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के Vinay Tyagi, Vinu Bhai Haribhai Malviya, State of Rajasthan v. Aruna Devi और K. Chandrasekhar जैसे फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि फाइनल रिपोर्ट स्वीकार होने के बावजूद CrPC की धारा 173(8) के तहत Further Investigation पर कोई कानूनी रोक नहीं है।
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि आगे की जांच शुरू करने के लिए फाइनल रिपोर्ट स्वीकार करने वाले पुराने आदेश को वापस लेना या उसकी समीक्षा करना आवश्यक नहीं है। हालांकि, कोर्ट ने यह जरूर कहा कि पुलिस के लिए आगे की जांच से पहले संबंधित अदालत को सूचित करना और औपचारिक अनुमति लेना बेहतर प्रक्रिया है।
इस मामले में कोर्ट ने पाया कि शिकायतकर्ता की ओर से ऐसी नई परिस्थितियां और जानकारी सामने लाई गई थीं, जिन पर पहले पर्याप्त जांच नहीं हुई थी। इसलिए इसे पुराने मामले की Re-investigation नहीं, बल्कि कानून के तहत Further Investigation माना गया।
एक और महत्वपूर्ण बात पर हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि जांच के चरण में आरोपी को अपनी बात रखने का कोई सामान्य अधिकार नहीं है और वह पुलिस की जांच किस दिशा या तरीके से की जा रही है, इस पर आपत्ति नहीं कर सकता।
📌Case Title: Anurag Dubey @ Dabban vs State of U.P. and Another
हाईकोर्ट ने अंततः याचिका खारिज करते हुए जांच अधिकारी से अपेक्षा की कि आगे की जांच निष्पक्ष, विवेकपूर्ण और पारदर्शी तरीके से की जाए।