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26/09/2026

सुप्रीम कोर्ट का महत्वपूर्ण NDPS Act Judgment
Case Name: State by (NCB) Bengaluru v. Pallulabid Ahmad Arimutta & Anr.
Judgment Date: 10 जनवरी 2022
Citation: 2022 INSC 26
Bench: Hon’ble CJI N.V. Ramana, Justice Surya Kant एवं Justice Hima Kohli
Provision: Section 67, NDPS Act
इस मामले में NCB ने कई आरोपियों को NDPS Act के विभिन्न प्रावधानों के तहत गिरफ्तार किया था। अभियोजन द्वारा आरोपियों एवं co-accused के Section 67 NDPS Act के तहत recorded statements पर reliance किया गया था।

Supreme Court ने Tofan Singh v. State of Tamil Nadu के निर्णय को ध्यान में रखते हुए कहा कि Section 67 NDPS Act के तहत recorded confessional statement, NDPS offence के trial में admissible नहीं रहेगा।
Court ने यह भी कहा कि जिन respondents के मामलों में arrest का आधार मुख्य रूप से Section 67 के statements थे और arrest के समय कोई substantial material उपलब्ध नहीं था, उन मामलों में ऐसे statements के आधार पर उनके bail orders को overturn नहीं किया जा सकता

हालांकि, Mohammed Afzal के मामले में Court ने अलग निष्कर्ष दिया। उसके rented accommodation से commercial quantity में drugs की recovery और conscious possession से संबंधित material था। इसलिए Section 37 NDPS Act को ध्यान में रखते हुए Supreme Court ने उसकी bail cancel कर दी और उसे surrender करने का निर्देश दिया।

Section 67 NDPS Act के तहत recorded confession को NDPS trial में admissible confession नहीं माना जा सकता। लेकिन जहाँ commercial quantity की conscious possession से संबंधित स्वतंत्र material मौजूद हो, वहाँ Section 37 NDPS Act के requirements अलग से लागू होंगे।
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26/09/2026

दिल्ली हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि किसी मुकदमे, प्रति-दावे (Counter-Claim) या अपील का आपसी समझौते या सहमति के आधार पर निपटारा होने पर पक्षकारों को जमा की गई पूरी कोर्ट फीस वापस पाने का वैधानिक अधिकार है। इसके लिए अलग से आवेदन या याचिका दाखिल करने की आवश्यकता नहीं होनी चाहिए।

जस्टिस अनिल खेतरपाल और जस्टिस भरत पाराशर की खंडपीठ ने कहा कि Court Fees Act, 1870 की संशोधित धारा 16 के तहत जैसे ही मामला समझौते या सहमति के आधार पर समाप्त होता है, कोर्ट फीस वापस पाने का अधिकार उत्पन्न हो जाता है। अदालत ने स्पष्ट किया कि समझौता अदालत की सहायता से हुआ हो या पक्षकारों ने स्वयं किया हो, इससे कोर्ट फीस वापसी के अधिकार पर कोई असर नहीं पड़ेगा। यह भी आवश्यक नहीं है कि समझौता CPC की धारा 89 में बताए गए तरीकों के तहत ही हुआ हो।

कोर्ट ने निर्देश दिया कि जब भी किसी मामले का निपटारा समझौते के आधार पर किया जाए, अदालत को निपटारे के समय ही कोर्ट फीस वापस करने का निर्देश देना चाहिए और संबंधित पक्ष को पूरी कोर्ट फीस वापस पाने के लिए प्रमाणपत्र जारी करना चाहिए। इससे पक्षकारों को फीस वापसी के लिए अलग से कार्यवाही शुरू करने की जरूरत नहीं पड़ेगी।

हाईकोर्ट ने दिल्ली सरकार को भी निर्देश दिया कि अदालत द्वारा जारी प्रमाणपत्र पेश किए जाने के बाद कोर्ट फीस की वापसी सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक प्रशासनिक कदम उठाए जाएं, ताकि पक्षकारों को अपनी ही कोर्ट फीस वापस पाने के लिए अनावश्यक मुकदमेबाजी का सामना न करना पड़े।

📌CASE TITLE: Hitech Enterprises v. Modern Construction Company

⚖️ क्या आपको लगता है कि कोर्ट फीस वापसी की ऐसी प्रक्रिया देशभर में सरल और स्वतः होनी चाहिए? अपनी राय कमेंट में बताएं।

ऐसी ही महत्वपूर्ण कानूनी और न्यायिक अपडेट्स के लिए हमारे पेज को ज़रूर फॉलो करें और इस पोस्ट को शेयर करें।
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⚖️कानून से डरिए नहीं-कानून को समझिए !अपने अधिकारों को जानिए, अपने कर्तव्यों को समझिए और कानून का जिम्मेदारी से इस्तेमाल ...
24/09/2026

⚖️कानून से डरिए नहीं-कानून को समझिए !

अपने अधिकारों को जानिए, अपने कर्तव्यों को समझिए और कानून का जिम्मेदारी से इस्तेमाल कीजिए।

एक जागरूक नागरिक न केवल अपने अधिकारों के प्रति सजग रहता है, बल्कि दूसरों के अधिकारों का भी सम्मान करता है।

* अपने अधिकार जानिए

समय पर कानूनी सलाह लीजिए

* जरूरी दस्तावेज सुरक्षित रखिए

★ अपने कानूनी कर्तव्यों का पालन कीजिए

* कानून का दुरुपयोग नहीं, सदुपयोग कीजिए

All Know the Law • Know Your Rights • Justice for
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Disclaimer: This content is for educational and awareness purposes only and does not constitute legal advice.

रजिस्ट्रार जनरल उच्च न्यायालय इलाहाबाद द्वारा 21 सितंबर 2026 को उत्तर प्रदेश के सभी जिला एवं सत्र न्यायालय को जारी किया ...
22/09/2026

रजिस्ट्रार जनरल उच्च न्यायालय इलाहाबाद द्वारा 21 सितंबर 2026 को उत्तर प्रदेश के सभी जिला एवं सत्र न्यायालय को जारी किया पत्र
7 साल या उससे कम सजा के मुकदमों में अब मुल्जिम को फिजिकल रूप से जमानत के समय उपस्थित होना अनिवार्य नहीं
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NDPS मामलों में जमानत – महत्वपूर्ण बातेंNDPS Act के मामलों में जमानत का निर्णय मामले की मात्रा, आरोपों, बरामदगी, गिरफ्ता...
22/09/2026

NDPS मामलों में जमानत – महत्वपूर्ण बातें

NDPS Act के मामलों में जमानत का निर्णय मामले की मात्रा, आरोपों, बरामदगी, गिरफ्तारी / तलाशी की प्रक्रिया और लागू कानूनी प्रावधानों पर निर्भर करता है। खासकर Commercial Quantity वाले मामलों में Section 37 NDPS Act की कठोर शर्तें महत्वपूर्ण होती हैं।

* मुख्य बातें:

Quantity और applicable provisions की जाँच करें

Search, seizure और arrest की legality देखें

Section 37 की requirements पर ध्यान दें

मजबूत legal grounds प्रस्तुत करें

Personal circumstances और trial delay जैसे relevant factors रखें

Bail conditions का पालन करें

कानून को समझें, अपने अधिकार जानें और उनका जिम्मेदारी से इस्तेमाल करें।

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Disclaimer: This post is for educational and general awareness purposes only and does not constitute legal advice. प्रत्येक मामला अपने तथ्यों और परिस्थितियों पर निर्भर करता है।

Cyber Crime में Bail कैसे लें?Cyber crime case में bail FIR में लगी धाराओं, offence की nature, arrest की स्थिति और avail...
20/09/2026

Cyber Crime में Bail कैसे लें?

Cyber crime case में bail FIR में लगी धाराओं, offence की nature, arrest की स्थिति और available evidence पर निर्भर करती है।

मुख्य बातेंः

FIR की धाराएँ और offence की nature check करें

Non-bailable offence में regular bail के लिए आवेदन करें

Arrest की आशंका हो तो applicable law के अनुसार anticipatory bail पर विचार करें

Electronic evidence, seizure और investigation की legality देखें

False implication, weak evidence, mistaken identity आदि applicable grounds रखें

Evidence से छेड़छाड़ न करने और investigation में cooperate करने की readiness दिखाएँ

हर cyber offence के bail provisions समान नहीं होते

कानून की जानकारी डर नहीं, ताकत देती है।

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Disclaimer: यह पोस्ट केवल educational & legal awareness purposes के लिए है। Bail प्रत्येक मामले के facts, applicable sections और court orders पर निर्भर करती है।

19/09/2026

इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने भारतीय स्टेट बैंक (SBI) को एक विधवा की फिक्स्ड डिपॉजिट से उसके दिवंगत पति के व्यक्तिगत कर्ज की वसूली के लिए काटी गई ₹19,90,693 की पूरी रकम ब्याज समेत वापस करने का आदेश दिया है। कोर्ट ने बैंक की कार्रवाई के लिए विधवा को ₹1 लाख मुआवजा देने का भी निर्देश दिया।

मामले के अनुसार, याचिकाकर्ता के पति ने 3 नवंबर 2020 को SBI से ₹15 लाख का व्यक्तिगत ऋण लिया था। पत्नी इस ऋण में न तो सह-आवेदक थीं, न सह-ऋणी, गारंटर, जमानतदार, क्षतिपूर्तिकर्ता या नामिनी। पति की 6 मई 2021 को कोविड-19 के कारण मृत्यु हो गई। इसके बाद बैंक ने पति के बकाया ऋण की वसूली के लिए पत्नी से भुगतान की मांग शुरू की।

वर्ष 2025 में पत्नी ने SBI की आशियाना शाखा में अपनी FD खोली थी। आरोप के अनुसार, बैंक ने इस FD को उस शाखा में ट्रांसफर किया जहां से उनके दिवंगत पति ने ऋण लिया था। इसके बाद FD से ₹19,90,693 काटकर पति के ऋण खाते में समायोजित कर दिए गए और बाद में खाता फिर आशियाना शाखा में ट्रांसफर कर दिया गया।

जस्टिस शेखर बी. सराफ और जस्टिस अब्देश कुमार चौधरी की खंडपीठ ने इस कार्रवाई पर गंभीर आपत्ति जताई। कोर्ट ने कहा कि SBI के वकील ऐसी कोई कानूनी व्यवस्था नहीं बता सके जिसके तहत पत्नी की FD से उसके पति का व्यक्तिगत ऋण सीधे वसूला जा सके। कोर्ट ने बैंक द्वारा FD को शाखाओं के बीच ट्रांसफर करके रकम काटने की प्रक्रिया को भी गंभीरता से लिया और इसे बैंकिंग प्रथा के लिए अनुचित बताया।

हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि बैंक को मृतक के कानूनी उत्तराधिकारियों के खिलाफ कानून के अनुसार ऋण वसूलने का अधिकार हो सकता है, लेकिन इसके लिए स्थापित कानूनी प्रक्रिया का पालन करना आवश्यक है। बैंक किसी व्यक्ति के खाते में रखी उसकी अपनी रकम को बिना वैध कानूनी आधार के मनमाने तरीके से दूसरे व्यक्ति के कर्ज में समायोजित नहीं कर सकता।

कोर्ट ने SBI को ₹19,90,693 की रकम FD पर लागू ब्याज सहित चार सप्ताह के भीतर वापस करने का आदेश दिया। इसके अलावा बैंक को विधवा को ₹1 लाख का मुआवजा भी चार सप्ताह के भीतर देने का निर्देश दिया गया।

📌CASE: Neha Mishra vs. Reserve Bank of India & Ors. | Writ-C No. 6722 of 2026

यह फैसला बैंक खाताधारकों के अधिकारों और ऋण वसूली में अपनाई जाने वाली कानूनी प्रक्रिया से जुड़ा महत्वपूर्ण न्यायिक घटनाक्रम है।

💬 आप इस फैसले के बारे में क्या सोचते हैं? अपनी राय कमेंट में जरूर बताएं।

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Adv Anupam Pandey

18/09/2026

🏠 Transfer of Property Act, Section 41 — गलत मालिक से खरीदी संपत्ति भी बच सकती है! ⚖️

क्या होगा अगर किसी व्यक्ति ने संपत्ति बेच दी, जबकि वह असली मालिक नहीं था—लेकिन वह व्यक्ति मालिक की तरह उस संपत्ति पर दिखाई देता था?

ऐसी स्थिति में Transfer of Property Act, 1882 की Section 41 महत्वपूर्ण हो सकती है।

📌 Section 41 — Transfer by Ostensible Owner

अगर असली मालिक की स्पष्ट या निहित सहमति से कोई दूसरा व्यक्ति संपत्ति का “मालिक” दिखाई देता है और वह व्यक्ति संपत्ति किसी खरीदार को बेच देता है, तो कुछ परिस्थितियों में खरीदार का अधिकार कानून द्वारा सुरक्षित हो सकता है।

लेकिन खरीदार को यह साबित करना होगा कि—

🔹 उसने संपत्ति खरीदते समय उचित सावधानी (reasonable care) बरती थी।
🔹 उसने सद्भावना (good faith) में संपत्ति खरीदी।
🔹 उसे यह जानकारी नहीं थी कि बेचने वाला वास्तविक मालिक नहीं है।

⚠️ सिर्फ रजिस्ट्री हो जाना पर्याप्त नहीं है। खरीदार को यह भी दिखाना पड़ सकता है कि उसने मालिकाना हक, रिकॉर्ड और परिस्थितियों की उचित जाँच की थी।

⚖️ Supreme Court के महत्वपूर्ण फैसले:
• Jumma Masjid, Mercara v. Kodimaniandra Deviah — ostensible ownership और Section 41 के सिद्धांत पर महत्वपूर्ण निर्णय।
• Hardev Singh v. Gurmail Singh — Section 41 की सुरक्षा के लिए statutory conditions और good faith पर महत्वपूर्ण चर्चा।
• Ramcoomar Koondoo v. Macqueen — ostensible ownership के सिद्धांत की शुरुआती महत्वपूर्ण judicial authority।

📌 सरल उदाहरण:
मान लीजिए A असली मालिक है, लेकिन उसकी सहमति से B लंबे समय से संपत्ति का मालिक जैसा दिखाई देता है। B ने वह संपत्ति C को बेच दी। यदि C ने पूरी सावधानी से रिकॉर्ड की जाँच की और सद्भावना में खरीद की, तो Section 41 C के अधिकारों के लिए महत्वपूर्ण हो सकती है।

👉 इसलिए संपत्ति खरीदने से पहले केवल रजिस्ट्री नहीं, बल्कि title documents और ownership records की उचित जाँच करना बेहद जरूरी है।

कानून जानिए — संपत्ति खरीदते समय सावधानी बरतिए। ⚖️

Your legal help ⚖️
Adv Anupam Pandey

18/09/2026

भारतीय न्यायपालिका में मुकदमों के लंबे इंतजार और भारी-भरकम लंबित मामलों को लेकर एक बार फिर चिंताजनक तस्वीर सामने आई है। जहां बताया गया है कि देश के विभिन्न उच्च न्यायालयों में 65 लाख से अधिक मामले पेंडिंग पड़े हैं, जिसके कारण आम लोगों को न्याय मिलने में दशकों का समय लग रहा है।

उदाहरण के तौर पर ऐसे समझिए कि राजस्थान के जालोर जिले के एक स्वास्थ्यकर्मी को 1999 में दैनिक वेतन भोगी के रूप में काम से हटा दिया गया था। इसके खिलाफ उन्होंने जोधपुर लेबर कोर्ट के फैसले से नाखुश होकर साल 2004 में राजस्थान हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था।

इस पूरे मामले में चौंकाने और हैरान करने वाली बात यह है कि आज इस घटना के 22 साल बीत जाने के बाद भी उनकी इस याचिका पर सुनवाई तक पूरी नहीं हो पाई है। मजबूरन उन्हें अपनी याचिका पर जल्द सुनवाई के लिए सुप्रीम कोर्ट जाना पड़ा।

मामले में मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत की अगुवाई वाली बेंच ने इस मामले पर सुनवाई करते हुए वही पुराना और व्यावहारिक आदेश दिया। कोर्ट ने कहा कि हम याचिका पर विचार करने का कोई आधार नहीं देखते हैं, लेकिन याचिकाकर्ता को यह छूट देते हैं कि वह हाईकोर्ट में जल्द सुनवाई के लिए आवेदन दे सकता है।

बता दें कि देश के बड़े उच्च न्यायालयों में मामलों का अंबार लग चुका है। शीर्ष अदालतों के आंकड़ों के अनुसार स्थिति कुछ इस प्रकार है:-

इलाहाबाद हाईकोर्ट- करीब 12.5 लाख मामले लंबित (यहां प्रत्येक जज/बेंच रोज औसतन 150 से 200 मामलों की सुनवाई करती है, फिर भी भारी बैकलॉग के आगे यह नाकाफी साबित हो रहा है)।

राजस्थान हाईकोर्ट- करीब 7 लाख मामले लंबित।

बॉम्बे हाईकोर्ट- करीब 6.4 लाख मामले लंबित।

मद्रास हाईकोर्ट- करीब 5.6 लाख मामले लंबित।

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट- करीब 4.9 लाख मामले लंबित।

कर्नाटक हाईकोर्ट- करीब 3.3 लाख मामले लंबित।

आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट- करीब 2.5 लाख मामले लंबित।

कलकत्ता हाईकोर्ट- करीब 1.9 लाख मामले लंबित।

दिल्ली हाईकोर्ट- करीब 1.2 लाख मामले लंबित।

गौरतलब है कि देश भर के विभिन्न उच्च न्यायालयों में लगभग 15 लाख मामले ऐसे हैं जो 10 साल से भी ज्यादा समय से लंबित पड़े हैं। इन अदालतों में मुकदमों का बोझ इतना ज्यादा हो गया है कि न्यायिक निर्णय लेने की क्षमता पर इसका भारी असर पड़ रहा है।

स्थिति यह है कि लोग अपने मामलों के जल्दी फैसले के लिए नहीं, बल्कि महज सुनवाई की तारीख जल्दी पाने के लिए सुप्रीम कोर्ट का रुख कर रहे हैं, जिससे सुप्रीम कोर्ट पर भी मुकदमों का दबाव लगातार बढ़ रहा है।

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⚖️FIR QUASH - अपने अधिकारों कोक्या आपके खिलाफ दर्ज FIR में अपराध के आवश्यक तत्व ही नहीं हैं? क्या FIR झूठी, दुर्भावनापूर...
18/09/2026

⚖️FIR QUASH - अपने अधिकारों को

क्या आपके खिलाफ दर्ज FIR में अपराध के आवश्यक तत्व ही नहीं हैं? क्या FIR झूठी, दुर्भावनापूर्ण या कानूनी प्रक्रिया के दुरुपयोग पर आधारित है?

ऐसी परिस्थितियों में उचित मामलों में High Court अपनी inherent powers का प्रयोग कर FIR / कार्यवाही को Quash कर सकता है।

इस पोस्ट में जानिए:

FIR Quash के प्रमुख Grounds

Quashing की Procedure

Section 528Bnss की भूमिका

High Court की Inherent Powers

Justice Integrity Commitment



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