Vicky Rastogi Advocate

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यूपी के 2021 किरायेदारी कानून के प्रमुख प्रावधान रद्द, 1972 का कानून जरूरत के अनुसार फिर होगा लागूइलाहाबाद हाईकोर्ट ने उ...
24/08/2026

यूपी के 2021 किरायेदारी कानून के प्रमुख प्रावधान रद्द, 1972 का कानून जरूरत के अनुसार फिर होगा लागू

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश के किरायेदारी कानून को लेकर महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए उत्तर प्रदेश नगरीय परिसर किरायेदारी विनियमन अधिनियम, 2021 के कई प्रमुख प्रावधानों को रद्द किया। कोर्ट ने किराए में संशोधन, किराया निर्धारण और मकान खाली कराने से जुड़े प्रावधानों को संसद द्वारा बनाए गए कानूनों से असंगत पाया।

जस्टिस सौमित्र दयाल सिंह और जस्टिस स्वरूपमा चतुर्वेदी की खंडपीठ ने 16 याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए 2021 के कानून की धारा 8, 9 और 10 तथा किराया प्राधिकारी के आदेश से बेदखली से संबंधित प्रावधानों को संपत्ति अंतरण अधिनियम, 1882 के विपरीत माना।

कोर्ट ने धारा 38 और 42 को भी उस सीमा तक अधिकार से बाहर घोषित किया, जहां वे राष्ट्रपति की पूर्व स्वीकृति के बिना प्रांतीय लघु वाद न्यायालय अधिनियम, 1887 और उत्तर प्रदेश सिविल विधि संशोधन अधिनियम, 1972 में निर्धारित प्रक्रिया को बदलने या उस पर प्रभाव डालने का प्रयास करती हैं।

हालांकि हाईकोर्ट ने पूरे 2021 के कानून को रद्द नहीं किया। कोर्ट ने अलग किए जा सकने वाले प्रावधानों के सिद्धांत को लागू करते हुए केवल उन्हीं प्रावधानों को हटाया, जो संविधान की व्यवस्था और संसद के मौजूदा कानूनों से सीधे टकराते पाए गए।

याचिकाओं में 2021 के कानून की वैधता के साथ-साथ किराया प्राधिकारियों द्वारा किराया तय करने, वसूली और मकान खाली कराने की कार्यवाही को भी चुनौती दी गई। याचिकाकर्ताओं की मुख्य दलील थी कि राष्ट्रपति की स्वीकृति के बिना राज्य विधानसभा इस तरह का कानून नहीं बना सकती।

इस पर हाईकोर्ट ने कहा कि मकान और भवनों से जुड़े मकान मालिक-किरायेदार संबंध समवर्ती सूची की प्रविष्टि 6 के अंतर्गत आते हैं। पीठ ने सुप्रीम कोर्ट के इंदु भूषण बोस बनाम राम सुंदरी देवी मामले का हवाला देते हुए कहा कि विधायी अधिकार का आधार राज्य सूची की प्रविष्टि 18 के बजाय समवर्ती सूची की प्रविष्टि 6 है।

कोर्ट ने इसके बाद यह जांच की कि 2021 का कानून संपत्ति अंतरण अधिनियम और प्रांतीय लघु वाद न्यायालय अधिनियम के साथ किस सीमा तक टकराता है। पीठ ने कहा कि केवल अलग किरायेदारी कानून बना देने से अपने आप विरोधाभास पैदा नहीं होता। यह देखना जरूरी है कि क्या दोनों कानून बिना टकराव के एक साथ लागू हो सकते हैं।

हाईकोर्ट ने पाया कि 2021 के कानून के अध्याय तीन में किराए को लेकर ऐसे अधिकार और दायित्व बनाए गए, जो संपत्ति अंतरण अधिनियम में मौजूद व्यवस्था से अलग हैं। संपत्ति अंतरण अधिनियम में किराया मुख्य रूप से पक्षकारों के बीच हुए समझौते से तय होता है और उसमें मकान मालिक को अनुबंध से अलग जाकर किराया बढ़ाने या विवाद की स्थिति में किसी प्राधिकारी से किराया तय कराने की वैसी व्यवस्था नहीं है जैसी 2021 के कानून में की गई।

वहीं 2021 के कानून की धारा 8, 9 और 10 में किराए में संशोधन और विवाद की स्थिति में किराया प्राधिकारी द्वारा संशोधित किराया तय करने की व्यवस्था की गई। हाईकोर्ट ने इसे संपत्ति अंतरण अधिनियम से असंगत पाया। कोर्ट ने 2021 के कानून में मकान खाली कराने के विभिन्न आधारों पर भी विचार किया।

इनमें किराया नहीं देना, मरम्मत या पुनर्निर्माण, भूमि के उपयोग में बदलाव के बाद पुनर्निर्माण, नोटिस के बाद भी परिसर खाली नहीं करना, अनधिकृत बदलाव और मकान मालिक की स्वयं रहने की जरूरत जैसे आधार शामिल थे। मकान मालिक की मृत्यु के बाद उसके कानूनी उत्तराधिकारियों को व्यक्तिगत आवश्यकता के आधार पर बेदखली मांगने का अधिकार और कुछ परिस्थितियों में दंडात्मक किराए का प्रावधान भी कानून में था।

कोर्ट ने इन प्रावधानों की तुलना संपत्ति अंतरण अधिनियम की धारा 111 से की, जिसमें पट्टे की समाप्ति के तरीके निर्धारित हैं। पीठ ने कहा कि जब पट्टे की समाप्ति के तरीके संपत्ति अंतरण अधिनियम में निर्धारित हैं, तब 2021 के कानून में उसके अतिरिक्त अलग-अलग तरीके से पट्टा समाप्त करने और बेदखली की व्यवस्था करना दोनों कानूनों के बीच असंगति पैदा करता है।

हाईकोर्ट ने मकान मालिक-किरायेदार विवादों के निपटारे के लिए 2021 के कानून में बनाए गए अलग तंत्र पर भी विचार किया। कोर्ट ने कहा कि कानून ने किराया प्राधिकारी और किराया न्यायाधिकरण के रूप में एक विशेष व्यवस्था बनाई, जबकि प्रांतीय लघु वाद न्यायालय अधिनियम और 1972 के सिविल विधि संशोधन अधिनियम के तहत अलग प्रक्रिया निर्धारित है।

कोर्ट ने माना कि 2021 का कानून संसद के कानूनों पर प्रभाव डालने की कोशिश करता है। चूंकि संबंधित कानून समवर्ती सूची के विषयों से जुड़े हैं और संसद द्वारा बनाए गए कानूनों को राष्ट्रपति की स्वीकृति प्राप्त है, इसलिए राज्य कानून को उनसे टकराव की स्थिति में लागू रखने के लिए संविधान के अनुच्छेद 254(2) के तहत राष्ट्रपति की स्वीकृति आवश्यक थी।

पीठ ने कहा कि आवश्यक संवैधानिक स्वीकृति के अभाव में 2021 का कानून उन सीमाओं तक लागू नहीं रह सकता, जहां वह संसद के कानूनों से असंगत है।

हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि 2021 के कानून के संबंधित प्रावधान रद्द होने से कोई कानूनी शून्य पैदा नहीं होगा। 2021 के कानून की धारा 46 के जरिए निरस्त किया गया उत्तर प्रदेश नगरीय भवन किराया, किराया निर्धारण और बेदखली विनियमन अधिनियम, 1972 आवश्यक सीमा तक फिर प्रभावी होगा।

हालांकि, कोर्ट ने स्पष्ट किया कि 1972 का कानून हर मामले में पूरी तरह स्वतः लागू नहीं होगा। वह केवल उतनी सीमा तक प्रभावी होगा, जितनी इन प्रावधानों के हटने के बाद आवश्यक होगी।

हाईकोर्ट ने 2021 के कानून की धारा 8, 9, 10, 38 और 42 को आज से अधिकार से बाहर घोषित किया।

साथ ही कोर्ट ने उन मामलों में पहले से पूरी हो चुकी कार्यवाहियों को सुरक्षित रखा है, जिनमें संबंधित प्रावधानों की वैधता को चुनौती नहीं दी गई थी। इनमें 2021 के कानून के तहत किए गए किराया समझौते और तय या संशोधित किए गए किराए भी शामिल हैं। ऐसे मामलों में तय शर्तें पक्षकारों के अधिकारों को नियंत्रित करती रहेंगी और लागू कानूनों के तहत प्रभावी रहेंगी।

हालांकि, 16 याचिकाओं में चुनौती दिए गए व्यक्तिगत आदेशों को हाईकोर्ट ने रद्द किया और सभी याचिकाओं को स्वीकार कर लिया।

अदालत परिसर से बेटी का अपहरण: कर्नाटक हाईकोर्ट ने पिता पर लगाया 5 लाख रुपये का जुर्माना, 25 अगस्त तक बच्ची को पेश करने क...
22/08/2026

अदालत परिसर से बेटी का अपहरण: कर्नाटक हाईकोर्ट ने पिता पर लगाया 5 लाख रुपये का जुर्माना, 25 अगस्त तक बच्ची को पेश करने का निर्देश

बेंगलुरु की पारिवारिक अदालत परिसर से अपनी नाबालिग बेटी को जबरन ले जाने वाले एक व्यक्ति पर कर्नाटक हाईकोर्ट ने सख्त रुख अपनाते हुए 5 लाख रुपये का भारी जुर्माना लगाया है। हाईकोर्ट ने पिता को निर्देश दिया है कि वह 25 अगस्त तक बच्ची को हर हाल में बेंगलुरु की फैमिली कोर्ट के समक्ष पेश करे।

जस्टिस डॉ. चिल्लाकुर सुमलता की पीठ ने स्पष्ट किया कि जब तक पिता जुर्माना जमा करने का सबूत पेश नहीं करता, तब तक उसे अपनी बेटी की कस्टडी से जुड़े मुकदमे की कानूनी कार्यवाही में भाग लेने की अनुमति नहीं दी जाएगी। अदालत के निर्देश के अनुसार, जुर्माने की 5 लाख रुपये की राशि में से 1 लाख रुपये आर्मी वेलफेयर फंड में जमा कराए जाएंगे, जबकि शेष 4 लाख रुपये नाबालिग बेटी के नाम से बैंक में फिक्स्ड डिपॉजिट (FD) के रूप में जमा किए जाएंगे।

पारिवारिक अदालत के बाहर से गाड़ी में ले गया था पिता ,

यह घटना 18 जुलाई की है, जब पुणे में कार्यरत महिला अपनी बेटी के साथ वर्ष 2015 से लंबित तलाक के मुकदमे की सुनवाई में शामिल होने बेंगलुरु फैमिली कोर्ट आई थी। अदालती प्रक्रिया पूरी होने के बाद, पति ने परिसर के बाहर से बच्ची को जबरन अपनी कार में बैठाया और अपनी बहन के घर ले गया। पुलिस के हस्तक्षेप और निर्देशों के बाद भी उसने बच्ची को मां को सौंपने से इनकार कर दिया।

इसके बाद महिला ने अपनी बेटी को वापस पाने और कस्टडी बहाल कराने के लिए फैमिली कोर्ट में अर्जी दी, जिसे कोर्ट ने खारिज कर दिया। फैमिली कोर्ट के इस फैसले को चुनौती देते हुए महिला ने हाईकोर्ट में याचिका दायर की।

तलाक और अलगाव सहायता प्राप्त करना

अनुच्छेद 21 के तहत बच्चों को भी सम्मान से जीने का अधिकार

पिता के आचरण पर कड़ी आपत्ति व्यक्त करते हुए जस्टिस सुमलता ने कहा कि वयस्कों की भांति बच्चों के भी समान मानवाधिकार होते हैं। अदालत ने टिप्पणी की कि पिता ने बच्ची को इस प्रकार अचानक छीन लिया मानो वह कोई बेजान वस्तु या सामान हो।

हाईकोर्ट ने अपने आदेश में रेखांकित किया कि गरिमा के साथ जीवन व्यतीत करना, सुरक्षित वातावरण में रहना, अपनी इच्छा अनुसार शिक्षा पाना तथा सभी प्रकार के शोषण से संरक्षित रहना बच्चे का मौलिक अधिकार है। यह संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत दिए गए जीवन के अधिकार का ही एक अभिन्न अंग है। पीठ ने कहा कि बच्चे समाज के सबसे संवेदनशील वर्ग हैं, इसलिए उनके साथ सहानुभूति, संवेदनशीलता और करुणा का व्यवहार किया जाना चाहिए। कस्टडी से जुड़ा कोई भी कदम कानून के नियमों के तहत और उचित परामर्श के साथ ही उठाया जाना चाहिए।

पुणे शिफ्ट होने के बाद बदला गया था मुलाकात का नियम

यह कानूनी विवाद 2015 में महिला द्वारा तलाक की याचिका दाखिल करने के बाद शुरू हुआ था, जिसके जवाब में पति ने बेटी की स्थायी कस्टडी की मांग की थी। 17 अप्रैल को फैमिली कोर्ट ने एक अंतरिम आदेश में पिता को एक दिन छोड़कर फोन पर बातचीत करने, हर महीने के चौथे रविवार को दिन में मिलने और दूसरे शुक्रवार की शाम से रविवार शाम तक बच्ची को अपने पास रखने की अनुमति दी थी।उस समय दोनों पक्ष बेंगलुरु में रह रहे थे।

कानूनी सलाह और सेवाएँ प्राप्त करना अपनी मां के साथ रह रही थी और बाद में महिला रोजगार के सिलसिले में पुणे स्थानांतरित हो गई, जहां उसने बच्ची का दाखिला स्थानीय स्कूल में कराया। मां ने इस अंतरिम व्यवस्था को हाईकोर्ट में चुनौती दी। हाईकोर्ट की एक समन्वय पीठ ने दोनों शहरों के बीच 838 किलोमीटर की दूरी और लगभग डेढ़ घंटे की हवाई यात्रा को ध्यान में रखते हुए मुलाकात के नियमों में बदलाव किया था। हाईकोर्ट ने पिता को महीने में एक बार सप्ताहांत (वीकेंड) पर दो दिनों के लिए बच्ची की कस्टडी दी थी, जिसके तहत वह महीने के दूसरे शुक्रवार को स्कूल खत्म होने के बाद बच्ची को ले जा सकता था और रविवार रात 8 से 9 बजे के बीच उसे पुणे में मां के पास वापस छोड़ना होता था।

बंद जगह पर जातिसूचक गाली देना SC/ST Act के तहत अपराध नहीं: सुप्रीम कोर्टसुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार (20.08.2026) को अनुसूचि...
21/08/2026

बंद जगह पर जातिसूचक गाली देना SC/ST Act के तहत अपराध नहीं: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार (20.08.2026) को अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 (SC/ST Act) की धारा 3(2)(r) और 3(1)(s) के तहत चल रही कार्यवाही रद्द की। यह मामला स्कूल मैनेजर के खिलाफ दर्ज किया गया, जिस पर दो छात्रों के पिता के साथ मारपीट करने और जातिसूचक गालियां देने का आरोप था। सुप्रीम कोर्ट ने यह कहते हुए मामला रद्द किया कि कथित बातें एक बंद कमरे में कही गईं, जहां आम जनता की पहुंच नहीं थी, इसलिए कानून की ज़रूरी शर्तों को पूरा नहीं किया गया।

जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ अपील पर सुनवाई करते हुए यह आदेश दिया। हाईकोर्ट ने SC/ST Act की धारा 14A(1) के तहत अपीलकर्ता की अपील खारिज की थी।

अपीलकर्ता उस स्कूल का मैनेजर था जहां प्रतिवादी (R2) के बेटे पढ़ते थे। दो छात्रों के बीच झगड़े के बाद R2 अपीलकर्ता के पास गया। आरोप है कि अपीलकर्ता ने स्कूल स्टाफ के साथ मिलकर उसके साथ मारपीट की और जातिसूचक गालियां दीं। अपीलकर्ता के खिलाफ भारतीय दंड संहिता, 1860 (IPC, अब भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 191, 115 और 352) की धारा 147, 323, 342 और 504 और SC/ST Act की धारा 3(1)(r) और 3(1)(s) के तहत FIR दर्ज की गई। उसके खिलाफ चार्जशीट दाखिल की गई और स्पेशल जज ने मामले का संज्ञान लिया।

गौरतलब है कि उसी दिन अपीलकर्ता की पत्नी ने भी R2 के खिलाफ एक क्रॉस-FIR दर्ज कराई। आरोप था कि R2 ने स्कूल ऑफिस में उसके साथ गाली-गलौज और मारपीट की थी, जिसके बाद अपीलकर्ता ने बीच-बचाव किया और खुद भी मारपीट का शिकार हुआ। R2 के खिलाफ भी चार्जशीट दाखिल की गई और मामले का संज्ञान लिया गया। अपीलकर्ता ने इलाहाबाद हाई कोर्ट में स्पेशल जज के समन जारी करने के आदेश को चुनौती दी। हाईकोर्ट ने उनकी याचिका खारिज करते हुए कहा कि सिर्फ़ इसलिए कि यह मामला जवाबी कार्रवाई (counterblast) के तौर पर दर्ज किया गया, इसे रद्द करने का आधार नहीं बनाया जा सकता; और उपलब्ध सबूतों के आधार पर प्रथम दृष्टया (prima facie) मामला बनता है। हाई कोर्ट के इस फ़ैसले से असंतुष्ट होकर अपीलकर्ता सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।

सुप्रीम कोर्ट के सामने अपीलकर्ता ने तर्क दिया कि हाईकोर्ट ने यह मानने में गलती की थी कि घटना सार्वजनिक दृश्यता (public view) वाले स्थान पर हुई थी। यह दलील दी गई कि गवाहों के बयानों से यह साबित नहीं होता कि घटना के समय कमरे के अंदर कोई मौजूद था, और कमरा बंद था, जिसमें न तो कोई खिड़की थी और न ही वहां आम लोगों की पहुंच थी। यह भी कहा गया कि FIR में अपीलकर्ता पर जाति-आधारित अपशब्द कहने का कोई विशिष्ट आरोप नहीं था, और उसे पीड़ित की जाति के बारे में पहले से कोई जानकारी नहीं थी।

इसके विपरीत, प्रतिवादी ने हाईकोर्ट के फ़ैसले का हवाला देते हुए तर्क दिया कि घटना सार्वजनिक दृश्यता वाले स्थान पर हुई थी और रिकॉर्ड पर ऐसा मामला साबित करने के लिए पर्याप्त सबूत मौजूद थे।

SC/ST Act की धारा 3(1)(r) और 3(1)(s) पर विचार करते हुए, सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मुख्य सवाल यह था कि क्या रिकॉर्ड पर मौजूद सबूतों से यह पता चलता है कि कथित जाति-आधारित अपशब्द सार्वजनिक दृश्यता वाले स्थान पर कहे गए।

'करुप्पुदयार बनाम राज्य (प्रतिनिधित्व: डिप्टी सुपरिटेंडेंट ऑफ़ पुलिस, लालगुडी, त्रिची) व अन्य' और 'हितेश वर्मा बनाम उत्तराखंड राज्य' मामलों में अपने फ़ैसलों का हवाला देते हुए बेंच ने दोहराया,

"इस प्रकार यह देखा जा सकता है कि 'सार्वजनिक दृश्यता वाले स्थान' के लिए, वह स्थान खुला होना चाहिए जहां आम लोग आरोपी द्वारा पीड़ित के प्रति कहे गए शब्दों को देख या सुन सकें। यदि कथित अपराध चार दीवारों के भीतर होता है जहां आम लोग मौजूद नहीं हैं, तो यह नहीं कहा जा सकता कि यह सार्वजनिक दृश्यता वाले स्थान पर हुआ है।"

इसे लागू करते हुए कोर्ट ने पाया कि FIR में यह नहीं कहा गया था कि कथित अपशब्द आम लोगों की उपस्थिति या उनकी जानकारी में कहे गए। कोर्ट ने यह भी गौर किया कि न तो FIR में और न ही R2 (दूसरे प्रतिवादी) के बयानों में जाति-आधारित अपशब्द कहने का कोई विशिष्ट आरोप लगाया गया।

बेंच ने कहा,

"अभियोजन पक्ष ने जिन सबूतों का सहारा लिया, उनसे ज़्यादा-से-ज़्यादा यही पता चलता है कि दोनों पक्षों के बीच झगड़ा और हाथापाई हुई। उनसे अपील करने वाले व्यक्ति द्वारा जाति-आधारित कोई खास बात कहे जाने का पता नहीं चलता।"

गवाहों (स्कूल शिक्षकों) के बयानों की जांच करते हुए कोर्ट ने पाया कि हालांकि उन्होंने "बहस और हाथापाई" का ज़िक्र किया, लेकिन उनमें से किसी ने भी यह नहीं कहा कि वे उस समय वहां मौजूद थे जब कथित तौर पर जाति-आधारित अपशब्द कहे गए या उन्होंने उन्हें सुना।

कोर्ट ने कहा,

"इसलिए स्कूल परिसर में उनकी मौजूदगी मात्र से यह साबित नहीं होता कि कथित बात सार्वजनिक रूप से कही गई।"

बेंच ने साफ़ किया कि हालांकि कोर्ट को मामले का संज्ञान लेने के चरण में सबूतों की बारीकी से जांच करने की ज़रूरत नहीं है, लेकिन "अपराध के मुख्य तत्व कोर्ट के सामने पेश किए गए सबूतों से सामने आने चाहिए।"

यह मानते हुए कि SC/ST Act के तहत अपराध प्रथम दृष्टया नहीं बनते हैं, सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट का फ़ैसला रद्द किया और एक्ट के तहत चल रही कार्यवाही को भी ख़त्म किया। हालांकि, कोर्ट ने साफ़ किया कि IPC के तहत अपराधों से जुड़ी कार्यवाही जारी रहेगी।

Case : Ramkrishna Chauhan v State of Uttar Pradesh & Anr

वेश्यालय में ग्राहक के तौर पर जाने वाले व्यक्ति पर अनैतिक व्यापार रोकथाम कानून के तहत मुकदमा नहीं चल सकता: इलाहाबाद हाईक...
20/08/2026

वेश्यालय में ग्राहक के तौर पर जाने वाले व्यक्ति पर अनैतिक व्यापार रोकथाम कानून के तहत मुकदमा नहीं चल सकता: इलाहाबाद हाईकोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि वेश्यालय में ग्राहक के तौर पर जाने वाले व्यक्ति पर केवल पैसे देकर यौन संतुष्टि प्राप्त करने के आधार पर अनैतिक व्यापार (निवारण) अधिनियम 1956 की धारा 3, 5 और 7 के तहत मुकदमा नहीं चलाया जा सकता।

अदालत ने स्पष्ट किया कि व्यक्तिगत संतुष्टि के लिए किसी यौनकर्मी को पैसे देना अधिनियम के तहत वेश्यावृत्ति के उद्देश्य से किसी व्यक्ति को उपलब्ध कराने या वेश्यावृत्ति के व्यावसायिक शोषण के समान नहीं है।

जस्टिस डॉ. गौतम चौधरी ने एक आरोपी की याचिका स्वीकार करते हुए उसके खिलाफ लंबित आपराधिक कार्यवाही, आरोपपत्र और समन आदेश रद्द किया।

मामला गाजियाबाद का है। पुलिस को सूचना मिली थी कि भोजपुरा चौराहे के पास DLF पुलिस चौकी के नजदीक एक मकान में महिलाएं देह व्यापार में शामिल हैं। सूचना के आधार पर पुलिस ने मकान पर छापा मारा। मौके से 16 लोगों को पकड़ा गया जिनमें महिलाएं और सात पुरुष थे।

पुलिस के अनुसार वहां मौजूद महिलाओं ने बताया कि वे देह व्यापार में शामिल थीं और अपनी कमाई का एक हिस्सा उस व्यक्ति को देती थीं, जिसके मकान में वे मौजूद थीं। इसके बाद उसी दिन FIR दर्ज की गई और अनैतिक व्यापार (निवारण) अधिनियम की धारा 3, 4, 5 और 7 के तहत आरोपपत्र दाखिल किया गया।

मामले में आरोपित एक व्यक्ति ने आपराधिक प्रक्रिया संहिता की धारा 482 के तहत हाईकोर्ट का रुख किया। उसने आरोपपत्र, समन आदेश और उसके खिलाफ चल रही पूरी कार्यवाही रद्द करने की मांग की।

उसकी ओर से दलील दी गई कि अधिनियम की धारा 15(2) में छापेमारी के दौरान दो स्वतंत्र स्थानीय गवाहों की मौजूदगी से जुड़ी शर्त पूरी नहीं की गई। इसके अलावा, FIR में लगाए गए आरोपों को सही मान भी लिया जाए तो उसके खिलाफ कोई अपराध नहीं बनता, क्योंकि वह केवल ग्राहक के रूप में वहां गया था।

याचिकाकर्ता की ओर से हाईकोर्ट के एक पुराने फैसले दिनेश तिवारी उर्फ धीरेंद्र कुमार तिवारी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य का भी हवाला दिया गया। उस मामले में कहा गया कि केवल ग्राहक के तौर पर वेश्यालय जाने वाला व्यक्ति वेश्यालय चलाने, उसका प्रबंधन करने या उसके संचालन में सहायता करने वाला व्यक्ति नहीं माना जा सकता।

राज्य सरकार की ओर से याचिका का विरोध करते हुए कहा गया कि आरोपी वेश्यालय के रूप में संचालित किए जा रहे मकान में छापेमारी के दौरान मौके पर पकड़ा गया और उसने पैसे देकर वेश्यावृत्ति कराई।

हालांकि, रिकॉर्ड की जांच के बाद हाईकोर्ट ने पाया कि याचिकाकर्ता की भूमिका एक ग्राहक की ही थी। अदालत ने कहा कि वह व्यक्तिगत संतुष्टि के लिए पैसे देकर वहां गया और उपलब्ध सामग्री से यह नहीं दिखता कि वह वेश्यालय चलाने या वेश्यावृत्ति के व्यावसायिक शोषण में शामिल था।

अदालत ने कहा,

“यदि कोई व्यक्ति ग्राहक के रूप में वेश्यालय जाता है तो अधिक से अधिक यह कहा जा सकता है कि उसने अपनी व्यक्तिगत इच्छा की पूर्ति के लिए यौनकर्मी की सेवा ली, लेकिन वह कानून में परिभाषित 'वेश्यावृत्ति के उद्देश्य' के लिए ऐसा नहीं करता, जिसमें व्यावसायिक शोषण आवश्यक तत्व है।”

हाईकोर्ट ने आगे कहा कि व्यक्तिगत संतुष्टि के लिए पैसे देने वाले ग्राहक के खिलाफ अनैतिक व्यापार (निवारण) अधिनियम की धारा 3, 5 या 7 के तहत मुकदमा नहीं चलाया जा सकता।

अदालत ने माना कि याचिकाकर्ता के खिलाफ इन धाराओं के तहत कार्यवाही जारी रखना अदालत की प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा। इसके बाद हाईकोर्ट ने गाजियाबाद में सिविल जज (जूनियर डिवीजन)/त्वरित न्यायालय न्यायिक मजिस्ट्रेट के समक्ष लंबित पूरी कार्यवाही के साथ आरोपपत्र और समन आदेश को रद्द कर दिया!

सिर्फ संपत्ति पर मालिकाना हक का दावा करने से तीसरा पक्ष लघु वाद अदालत में जरूरी पक्षकार नहीं बन जाता: इलाहाबाद हाईकोर्टइ...
18/08/2026

सिर्फ संपत्ति पर मालिकाना हक का दावा करने से तीसरा पक्ष लघु वाद अदालत में जरूरी पक्षकार नहीं बन जाता: इलाहाबाद हाईकोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि किसी संपत्ति पर स्वतंत्र मालिकाना हक का दावा कर देने मात्र से कोई तीसरा व्यक्ति लघु वाद अदालत में जरूरी या उचित पक्षकार नहीं बन जाता।

अदालत ने स्पष्ट किया कि ऐसे व्यक्ति को तभी पक्षकार बनाया जा सकता है, जब उसके मालिकाना हक का फैसला किए बिना वादी को मांगी गई राहत देने का निर्णय संभव न हो।

जस्टिस डॉ. योगेंद्र कुमार श्रीवास्तव ने कहा कि पक्षकार जोड़ने की शक्ति का उद्देश्य सामने आए विवाद का प्रभावी और पूर्ण निपटारा करना है न कि किसी ऐसे स्वतंत्र विवाद को मुकदमे में शामिल करना जिसका वादी की मांगी गई राहत से सीधा संबंध न हो।

अदालत ने कहा,

“संपत्ति में हित का केवल दावा कर देना किसी व्यक्ति को जरूरी या उचित पक्षकार नहीं बनाता। महत्वपूर्ण यह है कि उसके बिना अदालत के सामने मौजूद विवाद का प्रभावी और पूर्ण निपटारा किया जा सकता है या नहीं।”

मामला दो मंजिला इमारत के भूतल पर स्थित एक दुकान से जुड़ा था। पक्षकारों के अनुसार यह संपत्ति स्वर्गीय जगदीश प्रसाद मित्तल की थी। बुलंदशहर के अपर जिला जज, न्यायालय संख्या एक के समक्ष लघु वाद लंबित था। इसी दौरान याचिकाकर्ता ने खुद को मुकदमे में पक्षकार बनाए जाने की मांग की।

याचिकाकर्ता का दावा था कि जगदीश प्रसाद मित्तल ने 22 नवंबर 2019 को दो गवाहों की मौजूदगी में उसके पक्ष में एक अपंजीकृत वसीयत की थी। उसका कहना था कि वादी किसी दूसरी वसीयत के आधार पर संपत्ति पर अपना एकमात्र अधिकार जता रहा है जबकि वास्तविक अधिकार उसके पास है।

वादी ने इसका विरोध करते हुए याचिकाकर्ता को परिवार से असंबंधित व्यक्ति बताया और उसकी वसीयत को मुकदमे में देरी कराने के लिए तैयार किया गया कथित दस्तावेज बताया। वादी ने 23 सितंबर 2019 की पंजीकृत वसीयत पर भरोसा किया।

निचली अदालत ने याचिकाकर्ता को पक्षकार बनाने की अर्जी खारिज कर दी थी। अदालत ने यह भी ध्यान में रखा कि याचिकाकर्ता के पास किसी सक्षम अदालत का ऐसा कोई आदेश नहीं था जिसमें उसके द्वारा दावा की गई वसीयत के आधार पर उसके अधिकारों को मान्यता दी गई हो।

हाईकोर्ट में याचिकाकर्ता ने दलील दी कि निचली अदालत बिना उसे साक्ष्य पेश करने का अवसर दिए उसकी वसीयत को जाली नहीं मान सकती थी।

उसने कहा कि केवल अपंजीकृत होने के कारण वसीयत अवैध नहीं हो जाती और वसीयतकर्ता अपने स्वाभाविक उत्तराधिकारियों को संपत्ति से वंचित कर सकता है। इसलिए उसे दीवानी प्रक्रिया संहिता के आदेश एक नियम 10 के तहत पक्षकार बनाया जाना चाहिए था।

याचिकाकर्ता की ओर से यह भी तर्क दिया गया कि चूंकि संपत्ति के मालिकाना हक का सवाल मौजूद है, इसलिए लघु वाद अदालत को प्रांतीय लघु वाद न्यायालय अधिनियम, 1887 की धारा 23 के तहत वादपत्र वापस कर देना चाहिए।

हाईकोर्ट ने इन दलीलों को स्वीकार नहीं किया। अदालत ने कहा कि यह तय करने के लिए कि कोई व्यक्ति जरूरी या उचित पक्षकार है या नहीं, सबसे पहले यह देखना होगा कि वादी ने क्या राहत मांगी और उस राहत को देने के लिए अदालत को किन सवालों का जवाब देना आवश्यक है।

अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ता का दावा मकान मालिक और किरायेदार के उस संबंध से जुड़ा नहीं था, जिसके आधार पर मूल मुकदमा चल रहा था। उसका पूरा दावा 22 नवंबर 2019 की वसीयत पर आधारित था। उस वसीयत की वास्तविकता, उसके निष्पादन और उसके प्रभाव का फैसला करना अलग विवाद था।

अदालत ने कहा कि मूल मुकदमे में वादी की राहत पर फैसला करने के लिए इस विवाद का निपटारा जरूरी नहीं था।

पीठ ने अपने पूर्व के फैसले मूर्ति मार्कंडेश्वर जी महाराज गोपाल की बगिया सिटी झांसी बनाम ज्योति गंगवानी मामले का भी उल्लेख किया। उस मामले में भी संपत्ति पर स्वतंत्र अधिकार का दावा करने वाले तीसरे व्यक्ति को पक्षकार बनाने से इनकार किया गया था।

अदालत ने माना था कि मकान मालिक-किरायेदार संबंध से जुड़े मुकदमे को स्वतंत्र मालिकाना हक के विवाद तक नहीं बढ़ाया जा सकता और ऐसे दावे का फैसला सक्षम अदालत के समक्ष होना चाहिए।

धारा 23 के संबंध में हाईकोर्ट ने कहा कि लघु वाद अदालत के समक्ष किसी मामले में मालिकाना हक का सवाल सामने आ जाने मात्र से वाद सुनवाई योग्य नहीं हो जाता। महत्वपूर्ण यह है कि क्या वादी के अधिकार और मांगी गई राहत का आधार ऐसे मालिकाना हक के निर्धारण पर निर्भर करता है जिसका अंतिम फैसला लघु वाद अदालत नहीं कर सकती।

अदालत ने कहा,

“तीसरे व्यक्ति की ओर से स्वतंत्र मालिकाना हक का दावा अपने आप धारा 23 को लागू नहीं करता। यह प्रावधान तब लागू होता है जब वादी का अधिकार और उसके द्वारा मांगी गई राहत ऐसे मालिकाना हक के साबित या असिद्ध होने पर निर्भर करती हो, जिसका लघु वाद अदालत अंतिम रूप से निर्धारण नहीं कर सकती।”

हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि उसने 22 नवंबर 2019 की वसीयत की वास्तविकता, उसके निष्पादन या उसके कानूनी प्रभाव पर कोई अंतिम राय नहीं दी। निचली अदालत की ओर से वसीयत की प्रकृति के संबंध में की गई टिप्पणियों को भी वसीयत की वैधता पर अंतिम फैसला नहीं माना जाएगा।

अदालत ने यह भी ध्यान में रखा कि याचिकाकर्ता ने पहले ही एक अलग मूल वाद दाखिल कर अपनी वसीयत के आधार पर अधिकार घोषित करने की मांग की है। उस मुकदमे में उसे कोई अंतरिम रोक नहीं मिली थी।

हाईकोर्ट ने कहा कि वह मुकदमा याचिकाकर्ता को अपने दावे के लिए उचित मंच उपलब्ध कराता है, लेकिन इससे उसे मौजूदा लघु वाद में पक्षकार बनने का अधिकार नहीं मिल जाता।

पीठ ने कहा,

“संपत्ति पर स्वतंत्र मालिकाना हक का दावा करने वाला तीसरा व्यक्ति केवल इसलिए लघु वाद का जरूरी या उचित पक्षकार नहीं बन जाता कि उसका दावा वादी के दावे से अलग या विरोधाभासी है। जब तक उसके दावे का फैसला वादी की मांगी गई राहत निर्धारित करने के लिए आवश्यक न हो स्वतंत्र मालिकाना हक के विवाद को आदेश एक नियम 10 के तहत मुकदमे में शामिल नहीं किया जा सकता।”

हाईकोर्ट ने माना कि निचली अदालत के आदेश में ऐसा कोई अधिकार क्षेत्र संबंधी दोष, गंभीर अनियमितता या विकृति नहीं थी, जिसके आधार पर हस्तक्षेप किया जाए। अदालत ने पुनर्विचार याचिका खारिज की।

विधवा द्वारा गोद लिए गए बच्चे को उसके मृत पति की संपत्ति का अधिकार मिल सकता है: इलाहाबाद हाईकोर्टइलाहाबाद हाईकोर्ट ने फि...
17/08/2026

विधवा द्वारा गोद लिए गए बच्चे को उसके मृत पति की संपत्ति का अधिकार मिल सकता है: इलाहाबाद हाईकोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने फिर से कहा कि पति की मौत के बाद विधवा द्वारा गोद लिए गए बेटे को मृत पति का भी गोद लिया हुआ बेटा माना जाएगा और उसे पति का हिस्सा मिलेगा।

'सुभाष मिसिर (श्री जनार्दन तिवारी के संरक्षण में) बनाम ठगाई मिसिर' मामले में हाई कोर्ट के पहले के फैसले का पालन करते हुए, जस्टिस चंद्र कुमार राय ने कहा,

"इस कोर्ट ने 1966 RD 255 'सुभाष मिसिर (श्री जनार्दन तिवारी के संरक्षण में) बनाम ठगाई मिसिर' मामले में यह माना है कि पति की मौत के बाद विधवा द्वारा गोद लिए गए बेटे को पति का भी गोद लिया हुआ बेटा माना जाएगा।"

मुरलीधर की बिना किसी संतान के मौत हो गई और उनका हिस्सा उनकी विधवा श्रीमती मोती रानी को मिला। रामजी ने दावा किया कि श्रीमती मोती रानी ने 2 अगस्त 1960 के गोद लेने के एक दस्तावेज़ (एडॉप्शन डीड) के ज़रिए उन्हें गोद लिया था। इस तरह उन्हें मुरलीधर का हिस्सा मिला।

चकबंदी (कंसोलिडेशन) के शुरुआती साल में रामजी का नाम गाँव रसौली के खाता नंबर 96 पर मुरलीधर के गोद लिए हुए बेटे के तौर पर दर्ज था। राम कृपाल ने यूपी चकबंदी अधिनियम, 1953 की धारा 9A(2) के तहत आपत्ति जताई और कहा कि यह एंट्री गलत है और इसे हटा दिया जाना चाहिए।

चकबंदी अधिकारी ने आपत्ति खारिज की और अपील भी खारिज हो गई। 1974 में अधिनियम की धारा 48 के तहत राम कृपाल की रिवीजन याचिका मंज़ूर की गई, लेकिन 1981 में रामजी द्वारा दायर रिट याचिका पर हाईकोर्ट ने उस आदेश को रद्द किया और मामले पर फिर से सुनवाई का निर्देश दिया। मामले की दोबारा सुनवाई (रिमांड) के बाद 1983 में रिवीजन याचिका खारिज कर दी गई।

इससे जुड़े एक अन्य मामले में रामजी ने धारा 9A(2) के तहत आपत्ति जताते हुए गाँव जवनिया के खाता नंबर 123 और गाँव अटावरिया के खाता नंबर 108 पर पैतृक संपत्ति में हिस्सेदार के तौर पर अपना नाम दर्ज करने का दावा किया। चकबंदी अधिकारी ने 1983 में यह एंट्री मंज़ूर कर ली, और धारा 11(1) के तहत अपील और रिवीजन याचिका खारिज की गई। राम कृपाल ने हाई कोर्ट में दोनों आदेशों को चुनौती दी। दोनों याचिकाओं पर एक साथ सुनवाई हुई।

राम कृपाल की ओर से दलील दी गई कि गोद लेने के दस्तावेज़ (एडॉप्शन डीड) पर भरोसा नहीं किया जा सकता, क्योंकि 'हिंदू एडॉप्शन एंड मेंटेनेंस एक्ट 1956' की धारा 16 की ज़रूरतों को पूरा नहीं किया गया। यह भी कहा गया कि दस्तावेज़ में मौजूद कमी को स्वतंत्र गवाहों से पूछताछ करके ठीक नहीं किया जा सकता। आगे यह भी तर्क दिया गया कि मुरलीधर की मौत के बाद जब उनकी जगह विधवा का नाम दर्ज कर दिया गया था, तो गोद लेने के दस्तावेज़ पर विचार नहीं किया जा सकता।

रामजी की ओर से कहा गया कि ज़मीन के एकीकरण (कंसोलिडेशन) से जुड़ी तीनों अथॉरिटीज़ ने एकमत से यह माना था कि गोद लेने का दस्तावेज़ सही तरीके से तैयार किया गया, इसलिए भारत के संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत इसमें दखल देने की कोई गुंजाइश नहीं थी।

कोर्ट ने पाया कि पहले के रिमांड फ़ैसले और रिविज़न ऑर्डर से गोद लेने का दस्तावेज़ साबित होता था और ज़मीन के एकीकरण की प्रक्रिया शुरू होने से पहले ही म्यूटेशन की कार्यवाही में रामजी को मुरलीधर का गोद लिया हुआ बेटा माना जा चुका था।

कोर्ट ने 'सावन राम बनाम श्रीमती कलावंती व अन्य' मामले में सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले का ज़िक्र किया, जिसमें एक्ट की धारा 12 के दायरे पर विचार किया गया।

कोर्ट ने कहा,

"सुप्रीम कोर्ट और इस कोर्ट द्वारा तय किए गए कानूनी सिद्धांतों को ध्यान में रखते हुए ज़मीन के एकीकरण से जुड़ी अथॉरिटीज़ द्वारा अधिकार क्षेत्र का इस्तेमाल करते हुए यह मानना कि रामजी, श्रीमती मोती रानी और मुरलीधर के गोद लिए हुए बेटे के तौर पर उत्तराधिकार पाएंगे, किसी भी तरह से गैर-कानूनी नहीं है।"

यह मानते हुए कि ज़मीन के एकीकरण से जुड़ी अथॉरिटीज़ द्वारा तथ्यों के बारे में एक जैसी राय बनाने के बाद अनुच्छेद 226 के तहत दखल देने की कोई गुंजाइश नहीं बची थी, कोर्ट ने दोनों रिट याचिकाएं खारिज कीं।

Case Title: Ram Kripal v. J.D.C. and others

ट्रायल से पहले बचाव पक्ष के सबूतों के आधार पर आपराधिक केस रद्द किया जा सकता है या नहीं, इसे परखने के 4 तरीके: सुप्रीम को...
15/08/2026

ट्रायल से पहले बचाव पक्ष के सबूतों के आधार पर आपराधिक केस रद्द किया जा सकता है या नहीं, इसे परखने के 4 तरीके: सुप्रीम कोर्ट ने समझाया

सुप्रीम कोर्ट ने फिर से कहा कि खास मामलों में, बचाव पक्ष के सबूतों या सरकारी रिकॉर्ड के आधार पर ट्रायल शुरू होने से पहले ही आपराधिक कार्यवाही रद्द की जा सकती है। ऐसा तब किया जा सकता है जब वे सबूत पूरी तरह भरोसेमंद हों और उनसे यह साबित हो कि केस को आगे बढ़ाना कोर्ट की प्रक्रिया का गलत इस्तेमाल होगा।

राहुल बनाम उत्तर प्रदेश राज्य मामले में 11 अगस्त, 2026 को दिए गए फैसले में जस्टिस संजय करोल और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की बेंच ने राजीव थापर बनाम मदन लाल कपूर (2013) मामले में तय किए गए चार-चरणीय टेस्ट को लागू किया। बेंच ने माना कि बिना किसी विवाद वाले सरकारी सर्विस रिकॉर्ड के आधार पर आपराधिक कार्यवाही रद्द की जा सकती है।

कोर्ट ने साफ किया कि CrPC की धारा 482 के तहत याचिका पर सुनवाई के दौरान बचाव पक्ष के सबूतों की जांच न करने का आम नियम यह नहीं कहता कि कोर्ट को ऐसे दस्तावेजी सबूतों को बिना सोचे-समझे नजरअंदाज कर देना चाहिए जो भरोसेमंद हों, घटना के समय के हों और जिनसे अभियोजन पक्ष के मामले को पूरी तरह गलत साबित किया जा सके।

राजीव थापर मामले में चार-चरणों वाला टेस्ट

“पहला चरण: क्या आरोपी द्वारा पेश किया गया सबूत ठोस, वाजिब और शक से परे है, यानी क्या सबूत बेहतरीन और बेदाग़ क्वालिटी का है?

दूसरा चरण: क्या आरोपी द्वारा पेश किया गया सबूत, आरोपी पर लगाए गए आरोपों को गलत साबित करता है? यानी, क्या यह सबूत शिकायत में बताए गए तथ्यों को खारिज करने के लिए काफी है? क्या यह सबूत किसी समझदार व्यक्ति को यह मानने के लिए तैयार कर सकता है कि आरोपों का तथ्यात्मक आधार गलत है?

तीसरा चरण: क्या अभियोजन पक्ष/शिकायतकर्ता ने आरोपी द्वारा पेश किए गए सबूत को गलत नहीं ठहराया; और/या क्या सबूत ऐसा है जिसे अभियोजन पक्ष/शिकायतकर्ता सही तरीके से गलत नहीं ठहरा सकता?

चौथा चरण: क्या मुकदमे की कार्यवाही को आगे बढ़ाने से कोर्ट की प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा और इससे न्याय नहीं होगा?

अगर सभी चरणों का जवाब 'हाँ' में है, तो हाई कोर्ट को अपनी अंतरात्मा की आवाज़ सुनकर CrPC की धारा 482 के तहत मिली शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए ऐसी आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर देना चाहिए। शक्तियों का ऐसा इस्तेमाल न केवल आरोपी के साथ न्याय करेगा, बल्कि कोर्ट का कीमती समय भी बचाएगा, जो अन्यथा ऐसे मुकदमे (और उससे जुड़ी कार्यवाही) को चलाने में बर्बाद हो जाता, खासकर तब जब यह साफ हो कि इसका नतीजा आरोपी को दोषी ठहराने के तौर पर नहीं निकलेगा।”

बेहतरीन डिफेंस सबूत मुकदमे से पहले कार्यवाही रद्द करने का आधार बन सकता है

सुप्रीम कोर्ट ने प्रशांत भारती बनाम स्टेट (NCT ऑफ़ दिल्ली) (2013) मामले में राजीव थापर सिद्धांत को लागू किया और कहा कि जहां डिफेंस का बेहतरीन और बेदाग़ सबूत अभियोजन पक्ष के मामले को पूरी तरह से खत्म कर देता है, वहां हाईकोर्ट मुकदमे से पहले ही कार्यवाही रद्द कर सकता है।

राहुल मामले में कोर्ट ने इस सिद्धांत पर ज़ोर देते हुए कहा कि "मिनी-ट्रायल" न करने के सामान्य नियम का मतलब यह नहीं है कि ऐसे अभियोजन को चलने दिया जाए, जो साफ तौर पर टिकने लायक नहीं है।

हर्षेंद्र कुमार डी. बनाम रेबतिलता कोले (2011) मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि CrPC की धारा 482 के तहत अधिकार क्षेत्र का इस्तेमाल करते समय हाईकोर्ट ऐसे सबूतों पर विचार कर सकता है जो यह तय करने में मदद करते हैं कि क्या आपराधिक कार्यवाही को जारी रखना प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा। जब ऐसे दस्तावेज़, जिन पर कोई शक या संदेह न हो, साफ़ तौर पर यह दिखाते हैं कि आरोपी के ख़िलाफ़ कोई मामला नहीं बनता है, तो हाई कोर्ट कार्यवाही को रद्द करने के लिए अपनी इनहेरेंट ज्यूरिस्डिक्शन (अंतर्निहित अधिकार क्षेत्र) का इस्तेमाल कर सकता है।

इसलिए यह फ़ैसला उस आम नियम का एक महत्वपूर्ण अपवाद मानता है, जिसके तहत आरोपी के बचाव पक्ष की जांच आम तौर पर सिर्फ़ ट्रायल के दौरान ही की जानी चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट ने 'राजेंद्र सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2007)' मामले में इससे अलग दिखने वाले सिद्धांत पर भी विचार किया था।

राजेंद्र सिंह मामले में कोर्ट ने कहा था कि 'एलिबाई' (घटना के समय कहीं और होने) का दावा आम तौर पर सबूत का मामला होता है। इसकी ज़िम्मेदारी आरोपी पर होती है, और आम तौर पर CrPC की धारा 482 के तहत कार्यवाही में पहली बार 'Alibi' पर कोई निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता, वह भी ऐसे लोगों के हलफ़नामों के आधार पर जिनका मामले से हित जुड़ा हो और जिनकी क्रॉस-एग्जामिनेशन (जिरह) करने का मौका अभियोजन पक्ष को न मिला हो।

हालांकि, 'राहुल' मामले में सुप्रीम कोर्ट ने साफ़ किया कि यह सिद्धांत कोई ऐसा सख़्त नियम नहीं है, जो आरोपी की मौजूदगी या गैर-मौजूदगी से जुड़े किसी भी दस्तावेज़ पर विचार करने से रोकता हो।

Cause Title: RAHUL VERSUS STATE OF UTTAR PRADESH AND ANOTHER

'बेटे' में सौतेला बेटा भी शामिल, मकान मालिक सौतेले बेटे की असली ज़रूरत के आधार पर किरायेदार को बेदखल कर सकता है: मध्य प्...
14/08/2026

'बेटे' में सौतेला बेटा भी शामिल, मकान मालिक सौतेले बेटे की असली ज़रूरत के आधार पर किरायेदार को बेदखल कर सकता है: मध्य प्रदेश हाईकोर्ट

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने कहा कि एक्ट की धारा 2 के तहत परिवार के सदस्य की परिभाषा में सौतेला बेटा भी शामिल है। इसलिए एमपी अकोमोडेशन कंट्रोल एक्ट, 1961 की धारा 12(1) के तहत बेदखली के मकसद से उसे 'बेटा' ही माना जाएगा।

किरायेदार के खिलाफ बेदखली के मामले में ट्रायल कोर्ट के आदेश को बहाल करते हुए जस्टिस आशीष श्रोती की बेंच ने कहा कि मकान मालिक खुद के लिए या परिवार के किसी अन्य सदस्य (जिसमें सौतेला बेटा भी शामिल है) की असली ज़रूरत के आधार पर किरायेदार को बेदखल करने की मांग कर सकता है।

कोर्ट ने कहा,

"जब बेदखली के मामले में 'पालक बेटे' को 'बेटे' के अर्थ में शामिल किया जाता है, तो एक्ट की धारा 12(1)(e) और (f) के तहत ज़रूरत के मकसद से 'सौतेले बेटे' को शामिल न करने का कोई कारण नहीं है। इसलिए यह माना जाता है कि एक्ट की धारा 12(1)(e) और (f) के अर्थ में सौतेला बेटा भी 'बेटा' ही होगा।"

मामले के तथ्यों के अनुसार, वादी आनंद राव मटकाकरी की बेटी है, जो उस दुकान के असली मालिक थे। उनकी शादी आनंद कुमार से हुई और उन्होंने आशुतोष को गोद लिया, जो आनंद कुमार की पहली पत्नी आरती (जिनका निधन हो चुका है) से पैदा हुआ।

प्रतिवादी को 1972 में आनंद राव मटकाकरी ने गैर-आवासीय मकसद के लिए उस दुकान में किरायेदार के तौर पर रखा था। मटकाकरी की मौत के बाद प्रतिवादी वादी को किराया देने लगा, जिससे उनके बीच किरायेदार-मकान मालिक का रिश्ता बन गया।

वादी ने दुकान से प्रतिवादी को बेदखल करने के लिए मुकदमा दायर किया। उनका तर्क था कि एमपी अकोमोडेशन कंट्रोल एक्ट, 1961 की धारा 12(1)(f) के तहत आशुतोष को उस दुकान की ज़रूरत है।

ट्रायल कोर्ट ने मुकदमे में वादी के पक्ष में फैसला सुनाया, लेकिन अपीलीय अदालत ने उस फैसले को पलट दिया। अपीलीय अदालत ने माना कि वादी प्रतिवादी को घर खाली करने के लिए नहीं कह सकती, क्योंकि आशुतोष सौतेला बेटा होने के कारण धारा 2 के तहत परिवार के सदस्य की परिभाषा में नहीं आता है।

वादी के वकील ने तर्क दिया कि धारा 12 बेटे और सौतेले बेटे के बीच कोई भेदभाव नहीं करती।

वादी का विरोध करते हुए प्रतिवादियों के वकील ने गोपीनाथ नैनसुख बनाम गिरधरदास विशेष्वरदास [1977 MPLJ 358] मामले का हवाला देते हुए तर्क दिया कि 'बेटा' शब्द में सौतेला बेटा शामिल नहीं है। वकील ने तर्क दिया कि संपत्ति पूरी तरह से वादी की थी, क्योंकि उसे यह संपत्ति बंटवारे में पिता से मिली थी, इसलिए उसके पति की पहली शादी से हुआ बेटा उन फायदों का हकदार नहीं होगा जो वादी के अपने बेटे को मिलते।

अदालत ने गौर किया कि मुख्य मुद्दा यह था कि "क्या एमपी एकोमोडेशन कंट्रोल एक्ट, 1961 की धारा 12(1)(f) के अर्थ में 'बेटा' शब्द में सौतेला बेटा भी शामिल होगा?"

अदालत ने देखा कि घर खाली कराने का मुकदमा 1961 के अधिनियम के तहत आता है और धारा 2(e) परिवार के सदस्य को परिभाषित करती है। इसमें जीवनसाथी, बेटा, अविवाहित बेटी, पिता, दादा, माँ, दादी, भाई, अविवाहित बहन, चाचा, चाचा की पत्नी या विधवा, या भाई का बेटा या अविवाहित बेटी जो साथ रह रहे हों, या उन पर निर्भर कोई अन्य रिश्तेदार शामिल हैं।

अदालत ने आगे देखा कि धारा 12(1) मकान मालिक की आवासीय और गैर-आवासीय उद्देश्यों के लिए वास्तविक ज़रूरत के आधार पर किरायेदार को घर खाली कराने का प्रावधान करती है। अदालत ने देखा कि इस धारा के तहत मकान मालिक खुद के लिए या अपने किसी बालिग बेटे या अविवाहित बेटी की वास्तविक ज़रूरत के आधार पर घर खाली कराने की मांग कर सकता है।

कोर्ट ने आगे कहा कि 'लक्ष्मण सिंह' मामले में सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले में हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 की धारा 15 के तहत बिना वसीयत के मरने वाली हिंदू महिला की संपत्ति के बंटवारे पर विचार करते समय सौतेले बेटे को सगे बच्चे से नीचे का दर्जा दिया गया। हालांकि, कोर्ट ने कहा कि विचार करने वाला मुद्दा यह था कि क्या उस मामले को 1961 के अधिनियम की धारा 12 पर लागू किया जा सकता है, जिसमें कोई महिला अपने जीवनकाल में अपने सौतेले बेटे के लिए विवादित जगह की मांग करती है।

इस प्रकार, बेंच ने कहा,

"आशुतोष, आनंद कुमार की पहली पत्नी से हुआ बेटा है। आनंद कुमार के साथ वादी की शादी को लेकर कोई विवाद नहीं है। वादी और आशुतोष के बीच कोई झगड़ा नहीं है। इसलिए सिर्फ़ इसलिए कि आशुतोष वादी की कोख से पैदा नहीं हुआ, यह नहीं कहा जा सकता कि वादी आशुतोष की ज़रूरत के लिए प्रतिवादियों को बेदखल करने की मांग नहीं कर सकती।"

इसलिए कोर्ट ने माना कि अपीलीय कोर्ट ने यह कहने में गलती की कि चूंकि विवादित दुकान की पहली मंज़िल खाली है, इसलिए ज़मीनी मंज़िल की जगह की मांग नहीं की जा सकती।

कोर्ट ने कहा,

"अपीलीय कोर्ट का उक्त निष्कर्ष भी स्वीकार्य नहीं है क्योंकि केवल जगह की उपलब्धता ही काफ़ी नहीं है, ऐसी वैकल्पिक जगह वादी की ज़रूरत के हिसाब से उपयुक्त भी होनी चाहिए।"

इसलिए कोर्ट ने माना कि अपीलीय कोर्ट ने वादी के बेदखली के आदेश को अस्वीकार करने में भारी गलती की। तदनुसार, बेंच ने ट्रायल कोर्ट का फ़ैसला बहाल कर दिया।

Case Title: Vijaya Rizbud v Deepak Kumar Mishra, SECOND APPEAL No.1544 of 2005

Address

Chamber No:-05 High Court
Allahabad

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