Advocate V K Upadhyay

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पति-पत्नी की तरह साथ रहने पर  #वैध_विवाह का कड़ा सबूत मांगकर  ोषण से इनकार नहीं किया जा सकता: इलाहाबाद हाईकोर्ट पति-पत्न...
11/07/2026

पति-पत्नी की तरह साथ रहने पर #वैध_विवाह का कड़ा सबूत मांगकर ोषण से इनकार नहीं किया जा सकता: इलाहाबाद हाईकोर्ट पति-पत्नी की तरह साथ रहने पर वैध विवाह का कड़ा #सबूत मांगकर भरण-पोषण से इनकार नहीं किया जा सकता: इलाहाबाद हाईकोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा है कि यदि कोई पुरुष और महिला लंबे समय तक पति-पत्नी की तरह साथ रहे हों और उनका वैवाहिक संबंध अन्य परिस्थितियों से स्थापित होता हो, तो भरण-पोषण ( ) के दावे को केवल इस आधार पर खारिज नहीं किया जा सकता कि वैध विवाह का सख्त दस्तावेजी प्रमाण प्रस्तुत नहीं किया गया है। जस्टिस अचल सचदेव ने यह टिप्पणी महाराजगंज फैमिली कोर्ट के उस आदेश को आंशिक रूप से रद्द करते हुए की, जिसमें महिला की भरण-पोषण याचिका केवल इसलिए खारिज कर दी गई थी क्योंकि वह स्वयं को विधिक रूप से विवाहित पत्नी साबित करने वाले दस्तावेज पेश नहीं कर सकी थी। महिला ने अपनी याचिका में कहा था कि वर्ष 2017 में दोनों ने कोर्ट मैरिज के लिए आवेदन किया था। इसके बाद वह पति के साथ रहने लगी और उनके संबंध से एक पुत्र का जन्म हुआ। महिला का आरोप था कि विवाह के बाद उससे अतिरिक्त दहेज, विशेषकर चार पहिया वाहन की मांग की गई, उसके साथ मारपीट की गई और अंततः उसे उसके नाबालिग बेटे के साथ घर से निकाल दिया गया। उसने अपने लिए ₹25,000 प्रति माह तथा बेटे के लिए ₹15,000 प्रति माह भरण-पोषण की मांग की थी। दूसरी ओर, पुरुष ने यह स्वीकार किया कि दोनों ने कोर्ट मैरिज के लिए आवेदन किया था, वह महिला के साथ अपने सरकारी आवास में रहा और उनके संबंध से एक पुत्र का जन्म हुआ। हालांकि, उसने दहेज मांगने और प्रताड़ना के आरोपों से इनकार किया। हाईकोर्ट ने पाया कि फैमिली कोर्ट ने पुरुष की इन स्वीकारोक्तियों की अनदेखी करते हुए केवल तकनीकी आधार पर महिला की याचिका खारिज कर दी। अदालत ने कहा कि जब दोनों के पति-पत्नी की तरह साथ रहने और उनके संबंध से संतान होने के तथ्य स्वीकार हैं, तब केवल वैध विवाह के कठोर प्रमाण के अभाव में भरण-पोषण से इनकार करना उचित नहीं है। कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के v. Urmila Badshah Godse (2014) फैसले का हवाला देते हुए कहा कि धारा के तहत भरण-पोषण के मामलों में कानून की सामाजिक उद्देश्यपूर्ण (Purposive) व्याख्या अपनाई जानी चाहिए, न कि केवल तकनीकी दृष्टिकोण। हालांकि, हाईकोर्ट ने नाबालिग बच्चे को ₹5,000 प्रतिमाह भरण-पोषण देने के फैमिली कोर्ट के आदेश को बरकरार रखा और कहा कि धारा 125 CrPC के तहत पिता का दायित्व वैध और अवैध, दोनों प्रकार की संतान का भरण-पोषण करना है। अदालत ने महिला के भरण-पोषण के दावे पर पुनर्विचार के लिए मामला फैमिली कोर्ट को वापस भेजते हुए दोनों पक्षों को राजनेश बनाम नेहा फैसले के अनुसार अपनी आय संबंधी शपथपत्र दाखिल करने और तीन महीने के भीतर मामले का निस्तारण करने का निर्देश दिया।

Election | SC/ST  #आबादी वाले इलाकों में  #सीटों का आरक्षण  #संवैधानिक:  #इलाहाबाद_हाईकोर्टइलाहाबाद हाईकोर्ट ने  #परिसीम...
09/07/2026

Election | SC/ST #आबादी वाले इलाकों में #सीटों का आरक्षण #संवैधानिक: #इलाहाबाद_हाईकोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने #परिसीमन_अधिनियम, 2002 की धारा 9(1)(c) की संवैधानिक वैधता बरकरार रखी। यह धारा अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए उन इलाकों में निर्वाचन क्षेत्रों को आरक्षित करने का प्रावधान करती है, जहाँ कुल आबादी में उनकी आबादी का अनुपात अपेक्षाकृत अधिक है। कोर्ट ने कहा कि कोई मतदाता यह दावा नहीं कर सकता कि उसके वोट देने के अधिकार का उल्लंघन हुआ है, सिर्फ़ इसलिए कि उसका निर्वाचन क्षेत्र दशकों से अनुसूचित जातियों के लिए आरक्षित रहा है।

अदालत ने कहा कि #अनुच्छेद_329 का अर्थ यह नहीं निकाला जा सकता कि नागरिकों को अपनी शिकायत रखने से पूरी तरह रोक दिया जाए, खासकर तब जब चुनाव कराने के लिए संवैधानिक प्रावधानों की व्याख्या की आवश्यकता हो या जब सत्ता के दुर्भावनापूर्ण या मनमाने इस्तेमाल का मामला बनता हो। अदालत ने माना कि चूंकि भारत के संविधान के अनुच्छेद 330 और 332 में आरक्षित सीटों की पहचान करने के लिए कोई तरीका नहीं बताया गया, इसलिए संसद अनुच्छेद 327 के तहत अपनी शक्ति का इस्तेमाल करते हुए अधिनियम की धारा 9(1)(c) में यह तरीका तय कर सकती है। आगे कहा गया, “भारत के संविधान के अनुच्छेद 330 और 332 में 2002 के अधिनियम की धारा 9(1)(c) के प्रावधानों के खिलाफ कोई रोक नहीं है। यह धारा उन इलाकों में SC/ST उम्मीदवारों के लिए सीटें आरक्षित करने की व्यवस्था करती है, जहां SC/ST आबादी तुलनात्मक रूप से ज़्यादा है। इसलिए, यह नहीं कहा जा सकता कि ऐसा प्रावधान किसी संवैधानिक प्रावधान का उल्लंघन करता है।” इस तर्क को खारिज करते हुए कि सीटों का आरक्षण सामान्य श्रेणी के उम्मीदवार के चुनाव लड़ने के अधिकार को कम करता है, कोर्ट ने कहा कि ऐसा अधिकार अनुच्छेद 330 और 332 के तहत परिकल्पित संवैधानिक व्यवस्था से ऊपर नहीं हो सकता। कोर्ट ने याचिकाकर्ता के इस दावे को गलत माना कि उसके निर्वाचन क्षेत्र में आरक्षण जारी रहने से उसके वोट देने के अधिकार पर बुरा असर पड़ा है, क्योंकि वोट देने का अधिकार एक संवैधानिक अधिकार है जो अनुच्छेद 327 के तहत संसद द्वारा बनाए गए कानूनों के अधीन है। राजबाला और अन्य बनाम हरियाणा राज्य और अन्य मामले का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा कि किसी कानून को केवल इस आधार पर असंवैधानिक घोषित नहीं किया जा सकता कि वह "मनमाना" है। किसी अधिनियम की वैधता को केवल विधायी क्षमता की कमी या मौलिक अधिकारों या किसी अन्य संवैधानिक प्रावधान के उल्लंघन के आधार पर ही चुनौती दी जा सकती है, सिवाय उस स्थिति के जब कानून स्पष्ट रूप से मनमाना और अनुचित हो। कोर्ट ने कहा कि धारा 9(1)(c) को संसद ने सातवीं अनुसूची की सूची I की प्रविष्टि 72 के तहत अपनी क्षमता के भीतर अधिनियमित किया और जिन इलाकों में SC/ST आबादी तुलनात्मक रूप से ज़्यादा है, वहाँ सीटें आरक्षित करने से किसी मौलिक अधिकार का उल्लंघन नहीं होता है। इसके अलावा, कोर्ट ने कहा कि कानून बनाने की शक्ति अदालतों को नहीं दी गई और विधायिका को किसी खास तरीके से कानून बनाने का निर्देश नहीं दिया जा सकता। कोर्ट ने कहा कि वह अधिनियम में आरक्षित सीटों के रोटेशन (बारी-बारी से आरक्षण) का प्रावधान जोड़ने के लिए कोई आदेश (मैंडमस) जारी नहीं कर सकता, जैसा कि भारत के संविधान के अनुच्छेद 243D और 243T में पंचायतों और नगर पालिकाओं के लिए प्रावधान है। यह देखते हुए कि आरक्षित सीटों को रोटेट (बारी-बारी से बदलना) करने का मामला संसद के विचार करने का विषय है, कोर्ट ने कहा: “जिन निर्वाचन क्षेत्रों में SC/ST आबादी तुलनात्मक रूप से अधिक है, वहां SC/ST उम्मीदवार अपनी बड़ी आबादी के कारण बिना आरक्षण की मदद के भी चुने जा सकते हैं। हमारे संविधान में दिए गए सामाजिक न्याय, राजनीतिक न्याय और समानता के लक्ष्यों को केवल सीटों के रोटेशन से ही हासिल किया जा सकता है, जिससे SC/ST उम्मीदवार उन सीटों से भी चुने जा सकें, जहां उनकी आबादी निर्वाचन क्षेत्र की कुल आबादी की तुलना में काफी कम है। इस मुद्दे पर विचार करना और अपनी समझ के अनुसार कानून बनाना संसद का काम है और यह कोर्ट राज्य को विधानसभा/संसदीय निर्वाचन क्षेत्रों में SC/ST के लिए आरक्षण में रोस्टर लागू करने के लिए मजबूर करने वाला कोई निर्देश जारी नहीं कर सकता।” इसके अनुसार, रिट याचिका #खारिज कर दी गई।

 #सुप्रीम_कोर्ट ने फिर स्पष्ट की न्यायिक  #अनुशासन की सीमा, कब किसी निर्णय को माना जाएगा  ?
09/07/2026

#सुप्रीम_कोर्ट ने फिर स्पष्ट की न्यायिक #अनुशासन की सीमा, कब किसी निर्णय को माना जाएगा ?

 #अवमानना मामले में केवल पेश होकर जवाब देने के आदेश के खिलाफ   की धारा 19 के तहत अपील नहीं होगी:  #इलाहाबाद_हाईकोर्टइलाह...
01/07/2026

#अवमानना मामले में केवल पेश होकर जवाब देने के आदेश के खिलाफ की धारा 19 के तहत अपील नहीं होगी: #इलाहाबाद_हाईकोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि अवमानना न्यायालय द्वारा किसी कथित अवमाननाकर्ता को केवल उपस्थित होकर यह बताने का निर्देश देना कि उसके खिलाफ अवमानना के आरोप क्यों न तय किए जाएं, ऐसा आदेश नहीं है जिसके खिलाफ Contempt of Courts Act, 1971 की धारा 19(1)(a) के तहत अपील की जा सके।

हालांकि, न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि ऐसे मामलों में प्रभावित पक्ष के पास कोई उपाय नहीं होने की स्थिति नहीं है और वह लेटर्स पेटेंट अपील ( - LPA) दाखिल कर सकता है।

मामला एक अवमानना याचिका से जुड़ा था, जिसमें एकल न्यायाधीश ने अपीलकर्ता सहित तीन लोगों को अदालत में उपस्थित होकर यह स्पष्ट करने का निर्देश दिया था कि उनके खिलाफ अवमानना के आरोप क्यों न तय किए जाएं। इस अंतरिम आदेश को अपीलकर्ता ने Contempt of Courts Act की धारा 19(1) के तहत चुनौती दी।

अपीलकर्ता की ओर से दलील दी गई कि धारा 19(1) के तहत अवमानना संबंधी अधिकार क्षेत्र का प्रयोग करते हुए हाईकोर्ट द्वारा पारित "किसी भी आदेश" के खिलाफ अपील का प्रावधान है।

वहीं, प्रतिवादियों ने तर्क दिया कि विवादित आदेश से किसी पक्ष के अधिकारों का अंतिम निर्धारण नहीं हुआ है और जब तक अवमानना के लिए दंड नहीं दिया जाता, तब तक धारा 19 के तहत अपील सुनवाई योग्य नहीं होती। इस संबंध में उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के Midnapore Peoples' Co-op. Bank Ltd. v. Chunilal Nanda फैसले का हवाला दिया।

जस्टिस सिद्धार्थ वर्मा और जस्टिस जय कृष्ण उपाध्याय की खंडपीठ ने सुप्रीम कोर्ट के उक्त निर्णय पर भरोसा करते हुए कहा कि वर्तमान मामले में अब तक कथित अवमाननाकर्ताओं को कोई दंड नहीं दिया गया है। एकल न्यायाधीश ने केवल उन्हें उपस्थित होकर यह बताने का निर्देश दिया था कि उनके खिलाफ आरोप क्यों न तय किए जाएं।

इन परिस्थितियों में हाईकोर्ट ने माना कि धारा 19(1)(a) के तहत दायर अपील सुनवाई योग्य नहीं है और इसे खारिज कर दिया। हालांकि, अदालत ने स्पष्ट किया कि अपीलकर्ता चाहे तो लेटर्स पेटेंट अपील का वैकल्पिक कानूनी उपाय अपना सकता है।

27/06/2026
 #मामूली_गवाही विरोधाभास से  #पंजीकृत  #बिक्री  #विलेख की वैधता पर संदेह नहीं किया जा सकता:  #सुप्रीम कोर्टसुप्रीम कोर्ट...
27/06/2026

#मामूली_गवाही विरोधाभास से #पंजीकृत #बिक्री #विलेख की वैधता पर संदेह नहीं किया जा सकता: #सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि #पंजीकृत_बिक्री_विलेख (Sale Deed) को कानूनन वैधता और प्रामाणिकता का मजबूत अनुमान प्राप्त होता है। ऐसे में सत्यापनकर्ता (Attesting Witness) के बयान में मामूली विरोधाभास मात्र से विलेख के निष्पादन पर संदेह नहीं किया जा सकता। जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस एन.वी. अंजारिया की खंडपीठ ने हरिद्वार की कृषि भूमि से जुड़े एक विवाद में यह टिप्पणी की। समेकन अधिकारियों और हाईकोर्ट ने अपीलकर्ताओं के स्वामित्व दावे को यह कहते हुए खारिज कर दिया था कि बिक्री विलेख के एक गवाह के विवरण में विसंगति है।
हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि बिक्री विलेख की वैधता सत्यापन पर निर्भर नहीं करती। वसीयत या उपहार विलेख के विपरीत, बिक्री विलेख के लिए सत्यापन वैधानिक आवश्यकता नहीं है। इसलिए गवाह के विवरण में मामूली अंतर के आधार पर पंजीकृत दस्तावेज को संदिग्ध नहीं माना जा सकता। पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि 1957 में निष्पादित बिक्री विलेख पर बाद के संशोधनों को लागू नहीं किया जा सकता। साथ ही, जब तक किसी सक्षम सिविल अदालत द्वारा दस्तावेज निरस्त न किया जाए, समेकन अधिकारी केवल इस आधार पर उसे नजरअंदाज नहीं कर सकते कि वह कथित रूप से अवैध है। मामले में जालसाजी, धोखाधड़ी या दबाव का कोई आरोप नहीं था। इसलिए सुप्रीम कोर्ट ने निचली अदालतों के आदेश रद्द करते हुए अपील स्वीकार कर ली और अपीलकर्ताओं के नाम राजस्व अभिलेखों में दर्ज करने का निर्देश दिया।

इलाहाबाद हाईकोर्ट का महत्वपूर्ण निर्णय"महज  /ST समुदाय से होने के आधार पर FIR दर्ज करने का निर्देश देना अनिवार्य नहीं"हा...
12/03/2026

इलाहाबाद हाईकोर्ट का महत्वपूर्ण निर्णय
"महज /ST समुदाय से होने के आधार पर FIR दर्ज करने का निर्देश देना अनिवार्य नहीं"
हाल ही में #इलाहाबाद_हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण आदेश देते हुए स्पष्ट किया है कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 173(4) के तहत, अदालतें सिर्फ इस आधार पर दर्ज करने का आदेश देने के लिए बाध्य नहीं हैं कि शिकायतकर्ता SC/ST समुदाय से है।
मुख्य बिंदु जो आपको जानने चाहिए:
न्यायिक विवेक ( ): अदालत ने स्पष्ट किया कि मजिस्ट्रेट को केवल 'डाकघर' की तरह काम नहीं करना चाहिए। FIR का आदेश देने से पहले प्रथम दृष्टया ( ) संज्ञेय अपराध का होना आवश्यक है।
#तथ्यों_की_महत्ता: केवल जातिगत पहचान किसी मामले में स्वतः FIR का आधार नहीं बन सकती; आरोपों की प्रकृति और तथ्यों की प्रारंभिक जांच अनिवार्य है।
BNSS का प्रभाव: यह निर्णय नई संहिता (BNSS) के तहत प्रक्रियात्मक स्पष्टता लाता है, जिससे झूठी शिकायतों या कानूनी प्रक्रिया के दुरुपयोग को रोकने में मदद मिलेगी।
#कानूनी_राय: यह फैसला कानून के उस सिद्धांत को मजबूत करता है जहाँ न्याय प्रक्रिया "तथ्यों और साक्ष्यों" पर आधारित होती है, न कि केवल पहचान पर। यह अदालतों को अधिक सतर्क रहने और केवल वास्तविक मामलों को ही आगे बढ़ाने की शक्ति प्रदान करता है।
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