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 #इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक कथित पुलिस मुठभेड़ के मामले में पुलिस की कहानी पर प्रथम दृष्टया गंभीर सवाल उठाते हुए जांच CBI ...
27/08/2026

#इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक कथित पुलिस मुठभेड़ के मामले में पुलिस की कहानी पर प्रथम दृष्टया गंभीर सवाल उठाते हुए जांच CBI को सौंपने का निर्देश दिया है। मामले की सुनवाई जस्टिस सुभाष विद्यार्थी ने आरोपी की ओर से दायर आपराधिक पुनर्विचार याचिका पर की। आरोपी ने निचली अदालत द्वारा आरोपमुक्त किए जाने से इनकार करने के आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।

#अभियोजन के अनुसार, दुष्कर्म के एक मामले में आरोपी की तलाश के लिए 13 पुलिसकर्मी सरकारी वाहन से निकले थे। बाद में 10 सदस्यीय SWAT टीम भी अभियान में शामिल हुई। पुलिस का दावा था कि आरोपी ई-रिक्शा से मौके पर पहुंचा और भागने की कोशिश करते हुए पुलिस टीम पर गोली चला दी। इसके बाद थाना प्रभारी ने आत्मरक्षा में दो गोलियां चलाईं, जो आरोपी के दोनों पैरों में लगीं।

#हालांकि, हाईकोर्ट ने इस घटनाक्रम को प्रथम दृष्टया स्वीकार करना कठिन बताया। कोर्ट ने सवाल उठाया कि यदि 13 पुलिसकर्मी एक ही सरकारी वाहन में सवार थे तो वे उसमें कैसे बैठे? साथ ही, 10 सदस्यीय SWAT टीम और 13 अन्य पुलिसकर्मियों की मौजूदगी के बावजूद ई-रिक्शा से जा रहे एक व्यक्ति को पुलिस रोक क्यों नहीं सकी? FIR में किसी अन्य वाहन का उल्लेख नहीं होने और अलग-अलग टीमों के मौके पर दोबारा एकत्र होने के दावे को भी कोर्ट ने पुलिस की कहानी पर गंभीर संदेह पैदा करने वाला माना।

#जस्टिस सुभाष विद्यार्थी ने पुलिस मुठभेड़ों में सामने आने वाले कथित पैटर्न पर भी कड़ी टिप्पणी की। कोर्ट ने कहा कि अक्सर गिरफ्तारी के समय आरोपी द्वारा पुलिस पर अंधाधुंध गोलीबारी करने की एक और FIR दर्ज हो जाती है, पुलिसकर्मी सुरक्षित बच जाते हैं और पुलिस की गोली आरोपी के घुटने या उससे नीचे लगती है।

#थाना प्रभारी ने कोर्ट को बताया कि उसने करीब 15 मीटर की दूरी से चांदनी रात में गोली चलाई थी। मेडिकल रिपोर्ट में घाव अपेक्षाकृत छोटे बताए गए। 9 एमएम की गोली के अगले हिस्से के पतले होने को घाव छोटा होने का कारण बताया गया, लेकिन हाईकोर्ट इस स्पष्टीकरण से संतुष्ट नहीं हुआ। कोर्ट ने थाना प्रभारी की निशानेबाजी क्षमता का आकलन कराने का निर्देश दिया, ताकि यह पता लगाया जा सके कि क्या वह रात में करीब 15 मीटर की दूरी से ऐसी परिस्थितियों में 9 एमएम की सर्विस पिस्तौल से सटीक निशाना लगा सकता था।

#हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के People’s Union for Civil Liberties बनाम महाराष्ट्र राज्य मामले में निर्धारित पुलिस मुठभेड़ संबंधी दिशानिर्देशों का भी उल्लेख किया और प्रथम दृष्टया पाया कि अनिवार्य प्रक्रियाओं के पालन पर सवाल उठते हैं। कोर्ट ने मामले की गंभीरता को देखते हुए स्वतंत्र एजेंसी से विस्तृत जांच को जरूरी माना और CBI को FIR में दर्ज घटनाक्रम की सत्यता की जांच कर तीन महीने के भीतर रिपोर्ट दाखिल करने का निर्देश दिया।

Title: Chotkau Alias Allauddin v. State Of U.P. Thru. Prin. Secy. Home Deptt. Lko And 4 Others

#फिलहाल आरोपी को आरोपमुक्त करने से इनकार करने वाले निचली अदालत के आदेश पर रोक लगा दी गई है। राज्य सरकार को जवाबी हलफनामा दाखिल करने के लिए तीन महीने का समय दिया गया है और मामले की अगली सुनवाई 23 नवंबर को होगी।

#क्या हाईकोर्ट की यह पहल पुलिस मुठभेड़ों में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है? आपकी क्या राय है? कमेंट में बताएं।

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24/08/2026

What to do if a police officer harasses you without any reason?

24/08/2026

What to do if you don't know how to file an FIR?

23/08/2026

138 NI ACT

2015 में डेंगू से 7 वर्षीय बच्चे की मौत और उसके बाद माता-पिता द्वारा आत्महत्या के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने स्वतः संज्ञ...
23/08/2026

2015 में डेंगू से 7 वर्षीय बच्चे की मौत और उसके बाद माता-पिता द्वारा आत्महत्या के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने स्वतः संज्ञान कार्यवाही बंद कर दी है।

📌Case: IN RE: OUTRAGE AS PARENTS END LIFE AFTER CHILD'S DENGUE DEATH | SMW(C) No. 1/2015

CJI सूर्य कांत की अध्यक्षता वाली पीठ, जिसमें जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना शामिल थे, ने दिल्ली छावनी बोर्ड की ओर से दिए गए बयान को रिकॉर्ड करते हुए कार्यवाही समाप्त की। कोर्ट ने यह भी दर्ज किया कि अधिकारियों को अपनी जिम्मेदारियों का एहसास है और भविष्य में आवश्यक एहतियाती कदम उठाए जाएंगे।

मामले में आरोप था कि बच्चे को मूलचंद, मैक्स, आकाश और आइरीन अस्पताल ले जाया गया था, लेकिन कथित तौर पर उसे भर्ती नहीं किया गया। इस घटना के बाद देशभर में आक्रोश हुआ और केंद्र व दिल्ली सरकार ने जांच शुरू की।

बाद में सुप्रीम कोर्ट ने मामले का फोकस वेक्टर-जनित बीमारियों और ठोस कचरा प्रबंधन की समस्या पर सीमित किया। फरवरी 2019 में कोर्ट ने NDMC, MCD और दिल्ली छावनी बोर्ड को कार्य योजना दाखिल करने का निर्देश दिया था।

यह मामला एक महत्वपूर्ण सवाल भी सामने लाता है—क्या किसी मेडिकल इमरजेंसी में मरीज को समय पर इलाज मिलना उसका अधिकार नहीं होना चाहिए?

हाल ही में गाजियाबाद में 4 वर्षीय बच्ची के मामले में भी सुप्रीम कोर्ट ने कथित रूप से इलाज से इनकार करने वाले अस्पतालों के रवैये पर कड़ी टिप्पणी की और SIT जांच के निर्देश दिए। कोर्ट ने मेडिकल इमरजेंसी में तत्काल उपचार सुनिश्चित करने के लिए गाइडलाइंस बनाने के संकेत भी दिए हैं।

👉 आपकी राय क्या है?
क्या गंभीर मेडिकल इमरजेंसी में अस्पतालों की जवाबदेही तय करने के लिए और सख्त नियम होने चाहिए? अपनी राय कमेंट में जरूर बताएं।

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कानून और न्याय मंत्रालय के Department of Legal Affairs ने सुप्रीम कोर्ट, हाईकोर्ट, निचली अदालतों, ट्रिब्यूनल और अन्य मंच...
23/08/2026

कानून और न्याय मंत्रालय के Department of Legal Affairs ने सुप्रीम कोर्ट, हाईकोर्ट, निचली अदालतों, ट्रिब्यूनल और अन्य मंचों पर भारत सरकार का प्रतिनिधित्व करने वाले पैनल काउंसिल की नियुक्ति के लिए नई गाइडलाइंस जारी की हैं।

📌 क्या हैं प्रमुख प्रावधान?

🔹 मान्यता प्राप्त संस्थान से कानून की डिग्री और संबंधित राज्य बार काउंसिल में एनरोलमेंट जरूरी।
🔹 AIBE पास करना और Certificate of Practice हासिल करना आवश्यक।
🔹 वकीलों के अनुभव के साथ-साथ उनके मामलों की प्रकृति, जटिलता, जिम्मेदारी और महत्वपूर्ण मामलों को संभालने की क्षमता भी देखी जाएगी।
🔹 Income Tax, Customs, GST और PMLA जैसे विशेष क्षेत्रों के अनुभवी वकीलों को विशेष पैनल के लिए प्राथमिकता दी जा सकती है।
🔹 सरकारी सेवा के दौरान कानूनी कार्य का कम से कम 10 साल का अनुभव रखने वाले वकीलों पर भी विचार किया जा सकता है।
🔹 सुप्रीम कोर्ट में Group A के लिए 5 वर्ष, Group B के लिए 4 वर्ष और Group C के लिए 3 वर्ष की प्रैक्टिस का प्रावधान है।
🔹 कई हाईकोर्ट में Deputy Solicitor General के लिए 10 वर्ष, Senior Panel Counsel के लिए 5 वर्ष और Central Government Counsel के लिए 4 वर्ष का अनुभव निर्धारित किया गया है।
🔹 अनुशासनहीनता, पेशेवर कदाचार, कोर्ट की अवमानना या सरकारी निर्देशों का उल्लंघन जैसे मामलों में पैनल से हटाया जा सकता है।
🔹 पैनल छोड़ने वाले वकील को सामान्यतः एक महीने का लिखित नोटिस देना होगा और संबंधित केस रिकॉर्ड/दस्तावेज वापस करने होंगे।

ये गाइडलाइंस 20 अगस्त 2026 के ऑफिस मेमोरैंडम के जरिए जारी की गईं और जारी होने की तारीख से प्रभावी हैं। हालांकि, पहले से पैनल में शामिल वकीलों का कार्यकाल उनके मौजूदा कार्यकाल की समाप्ति तक जारी रहेगा।

💬 आपके अनुसार नई गाइडलाइंस से सरकारी मुकदमों में वकीलों की नियुक्ति और जवाबदेही में कितना सुधार आएगा? अपनी राय कमेंट में बताएं।

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सुप्रीम कोर्ट ने आरक्षण और सेवा आवंटन से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में कहा है कि आरक्षित वर्ग का ऐसा उम्मीदवार, जो अपनी ...
23/08/2026

सुप्रीम कोर्ट ने आरक्षण और सेवा आवंटन से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में कहा है कि आरक्षित वर्ग का ऐसा उम्मीदवार, जो अपनी मेरिट के आधार पर ओपन कैटेगरी में चयनित हुआ है, वह आरक्षित वर्ग में उससे कम अंक पाने वाले उम्मीदवार की तुलना में बेहतर पद या सेवा पाने का हकदार है।

जस्टिस एम.एम. सुंदरेश और जस्टिस प्रसन्ना बी. वराले की पीठ ने कहा कि इस संबंध में कानून पूरी तरह स्थापित है। पीठ ने Union of India v. Ramesh Ram, (2010) 7 SCC 234 सहित संविधान पीठ के कई फैसलों का उल्लेख करते हुए इस सिद्धांत को दोहराया।

मामला झारखंड लोक सेवा आयोग (JPSC) की 6वीं संयुक्त सिविल सेवा परीक्षा में सेवा आवंटन से जुड़ा है। याचिकाकर्ताओं चंदन (SC), संजय कुमार महतो (EBC-I), गौतम कुमार (EBC) और कुमार अविनाश (SC) का कहना था कि उन्होंने अधिक अंक प्राप्त कर ओपन मेरिट में चयन हासिल किया, लेकिन इसके बावजूद उन्हें झारखंड एडमिनिस्ट्रेटिव सर्विस नहीं दी गई, जबकि आरक्षित वर्ग में उनसे कम अंक पाने वाले उम्मीदवारों को यह सेवा आवंटित कर दी गई।

याचिकाकर्ताओं के अंक क्रमशः 611, 621, 619 और 606 थे। उन्हें सूचना, वित्त और योजना जैसी सेवाएं मिलीं। वहीं, झारखंड एडमिनिस्ट्रेटिव सर्विस में ओपन कैटेगरी का अंतिम चयनित उम्मीदवार 631 अंक वाला था। दूसरी ओर पुलिस, वित्त, शिक्षा, सहकारिता, सामाजिक सुरक्षा, सूचना और योजना सेवाओं की कट-ऑफ क्रमशः 679, 614, 614, 613, 613, 611 और 600 अंक बताई गई।

सुनवाई के दौरान प्रतिवादियों की ओर से यह दावा किया गया कि याचिकाकर्ताओं ने कुछ relaxation (छूट) का लाभ लिया था। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस दावे के समर्थन में रिकॉर्ड पर कोई सामग्री नहीं है। अब राज्य सरकार और JPSC को छह सप्ताह के भीतर हलफनामा दाखिल कर स्पष्ट करना होगा कि क्या याचिकाकर्ताओं ने किसी प्रकार की छूट का लाभ लिया था।

पीठ ने इससे जुड़ा एक महत्वपूर्ण सवाल भी उठाया है कि यदि आरक्षित वर्ग का कोई उम्मीदवार ओपन कैटेगरी में मेरिट के आधार पर चयनित होने के बाद भी आरक्षित पद पर भेज दिया जाता है, तो ऐसी स्थिति में अनारक्षित उम्मीदवारों की स्थिति और उनके अधिकारों पर क्या प्रभाव पड़ेगा?

📌CASE: Chandan v. State of Jharkhand & Ors. | Special Leave to Appeal (C) No. 967/2024

💬 आप सुप्रीम कोर्ट के इस रुख को मेरिट और आरक्षण के बीच संतुलन के लिहाज से कैसे देखते हैं? अपनी राय कमेंट में जरूर बताएं।

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सुप्रीम कोर्ट ने SPO/Constable IRB Satpal Singh v. State of Punjab & Ors. मामले में सरकारी कर्मचारियों के सेवा अधिकारों ...
23/08/2026

सुप्रीम कोर्ट ने SPO/Constable IRB Satpal Singh v. State of Punjab & Ors. मामले में सरकारी कर्मचारियों के सेवा अधिकारों से जुड़ा एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है।

जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस शील नागू की पीठ ने कहा कि यदि किसी सरकारी कर्मचारी के खिलाफ केवल आपराधिक मामला लंबित है और उस समय उसे दोषी (Convicted) नहीं ठहराया गया है, तो सिर्फ़ इसी आधार पर उसे नौकरी से हटाना उचित नहीं ठहराया जा सकता—विशेषकर जब कर्मचारी को अपना पक्ष रखने का अवसर भी न दिया गया हो।

📌 मामले की मुख्य बातें:
• अपीलकर्ता को 1991 में पंजाब पुलिस में Special Police Officer नियुक्त किया गया था।
• बाद में उसे कॉन्स्टेबल के पद के लिए चुना गया, लेकिन उसके खिलाफ लंबित FIR का हवाला देकर उसे जॉइन नहीं कराया गया।
• 14 जनवरी 2003 को उसे सेवा से हटा दिया गया, जबकि उस समय उसके खिलाफ आपराधिक मामला लंबित था और कोई दोषसिद्धि नहीं हुई थी।
• सुप्रीम कोर्ट ने इस आधार पर की गई बर्खास्तगी/हटाने की कार्रवाई को ग़ैर-क़ानूनी माना।
• हालांकि, करीब दो दशक से अधिक समय बीत जाने के कारण कोर्ट ने नौकरी में बहाली का आदेश नहीं दिया।
• संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत राज्य को अपीलकर्ता को ₹5 लाख मुआवज़ा देने का निर्देश दिया गया।

⚖️ एक महत्वपूर्ण कानूनी अंतर भी कोर्ट ने स्पष्ट किया:
बाद में यदि कर्मचारी को आपराधिक मामले में दोषी ठहराया जाता है, तो केवल यह तथ्य कि उसे Probation of Offenders Act, 1958 के तहत प्रोबेशन पर रिहा किया गया है, दोषसिद्धि को समाप्त नहीं करता। ऐसी दोषसिद्धि के आधार पर सेवा संबंधी कार्रवाई की जा सकती है।

यानी “आपराधिक मामला लंबित होना” और “दोषसिद्धि हो जाना” कानूनी रूप से एक जैसी स्थितियां नहीं हैं।

आप इस फैसले को सरकारी कर्मचारियों के सेवा अधिकारों के संदर्भ में कितना महत्वपूर्ण मानते हैं? अपनी राय कमेंट में बताएं

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2003 में मध्य प्रदेश में डकैती-रोधी अभियान के दौरान दो डकैतों को मार गिराने वाले पूर्व पुलिस अधिकारी एसआई विवेक कुमार चौ...
23/08/2026

2003 में मध्य प्रदेश में डकैती-रोधी अभियान के दौरान दो डकैतों को मार गिराने वाले पूर्व पुलिस अधिकारी एसआई विवेक कुमार चौहान को अब 'राष्ट्रपति वीरता पदक' (President's Medal for Gallantry) देने की मंज़ूरी मिल गई है।

📌CASE TITLE – Govind Mohan v. Vivek Singh Chouhan

इस मामले की सुनवाई जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ कर रही थी। मामला हाई कोर्ट के उस आदेश के अनुपालन में हुई देरी से जुड़ा था, जिसमें चौहान को वीरता पुरस्कार देने का निर्देश दिया गया था। सुप्रीम कोर्ट की नाराज़गी के बाद सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत को बताया कि राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने चौहान को वीरता पदक देने की मंज़ूरी दे दी है।

गृह मंत्रालय की 20 अगस्त 2026 की सूचना के अनुसार, 24 जून 2003 की कार्रवाई के लिए एसआई विवेक कुमार चौहान को वीरता पदक प्रदान करने की स्वीकृति दी गई है। पुरस्कार की औपचारिक अधिसूचना उचित समय पर भारत के राजपत्र (Gazette of India) में जारी की जाएगी।

सुप्रीम कोर्ट ने घटनाक्रम को देखते हुए कहा कि अब इस याचिका पर आगे विचार करने की आवश्यकता नहीं है। चौहान की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मृगेंद्र सिंह ने भी हाई कोर्ट में लंबित अवमानना कार्यवाही वापस लेने की बात कही।

आपकी राय में, क्या इतने वर्षों बाद मिला यह सम्मान कर्तव्य और साहस के प्रति न्याय की मिसाल है? अपनी राय कमेंट में जरूर बताएं।

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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने करीब चार दशक पुराने हत्या मामले में नागेंद्र और जुगेंद्र को बरी करते हुए महत्वपूर्ण टिप्पणी की कि क...
23/08/2026

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने करीब चार दशक पुराने हत्या मामले में नागेंद्र और जुगेंद्र को बरी करते हुए महत्वपूर्ण टिप्पणी की कि केवल FIR में नाम दर्ज होना, बिना किसी विशिष्ट भूमिका या विश्वसनीय साक्ष्य के, दोषसिद्धि का आधार नहीं बन सकता।

जस्टिस सलिल कुमार राय और जस्टिस पदम नारायण मिश्रा की पीठ ने दोनों की अपील स्वीकार करते हुए ट्रायल कोर्ट द्वारा सुनाई गई दोषसिद्धि और सजा को रद्द कर दिया। दोनों आरोपी IPC की धाराओं 147, 148, 302/149, 325/149 और 323/149 के तहत दोषी ठहराए गए थे। अपील लंबित रहने के दौरान अन्य छह आरोपियों की मृत्यु हो गई।

अभियोजन के अनुसार, पुरानी मुकदमेबाजी की रंजिश के चलते आरोपियों ने ओमपाल सिंह पर लाठी, भाला, फावड़ा और गंडासा जैसे हथियारों से हमला किया था, जिसकी बाद में मृत्यु हो गई। हालांकि, हाईकोर्ट ने पाया कि नागेंद्र और जुगेंद्र के खिलाफ FIR में उनका नाम तो था, लेकिन उनकी कोई विशिष्ट भूमिका या किसी विशेष हथियार का उल्लेख नहीं किया गया था। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि “सिर्फ FIR में नाम होना अपने आप में उनकी दोषसिद्धि स्थापित नहीं कर सकता।”

पीठ ने यह भी पाया कि अभियोजन के पांच तथ्यात्मक गवाहों में से केवल सूचनाकर्ता ने अभियोजन की कहानी का समर्थन किया, जबकि अन्य गवाह पक्षद्रोही हो गए। घायल गवाह भी यह स्पष्ट नहीं कर सका कि किस आरोपी के पास कौन-सा हथियार था या किसने उस पर हमला किया। मृतक की पत्नी और कथित घायल गवाह द्वारा भी हमलावरों की स्पष्ट पहचान नहीं की गई।

धारा 149 IPC के संबंध में कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के Kuldip Yadav v. State of Bihar और Ramachandran v. State of Kerala के फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि केवल घटनास्थल पर मौजूदगी या किसी समूह का सदस्य होना पर्याप्त नहीं है। अभियोजन को यह साबित करना होता है कि धारा 141 IPC के अर्थ में गैरकानूनी सभा मौजूद थी, आरोपी उसका सदस्य था और उसका आवश्यक साझा उद्देश्य (Common Object) था या उसे इसकी जानकारी थी।

कोर्ट ने पाया कि ट्रायल कोर्ट ने यह स्पष्ट रूप से स्थापित नहीं किया था कि कथित समूह किस प्रकार गैरकानूनी सभा बना, उसका साझा उद्देश्य क्या था और नागेंद्र तथा जुगेंद्र ने उस उद्देश्य को किस प्रकार साझा किया। उपलब्ध साक्ष्यों से दोनों की कथित गैरकानूनी सभा में उपस्थिति, भागीदारी और साझा उद्देश्य संतोषजनक रूप से साबित नहीं हुआ। ऐसे में हाईकोर्ट ने दोनों की दोषसिद्धि और सजा रद्द करते हुए उन्हें बरी कर दिया।

📌Case Title: Suresh and 7 Others vs. State of U.P.

💬 आपके अनुसार, क्या केवल FIR में नाम होना किसी आरोपी को दोषी ठहराने के लिए पर्याप्त होना चाहिए? अपनी राय कमेंट में जरूर बताएं।

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