Vikas Agrahari

Vikas Agrahari Advocate

सारी चीजे तय कर दी गयी है, फीस बढ़ा दिया गया है पर ये तय नहीं किया गया है की तय समय सीमा 30 दिन के भीतर काम न होने की दशा...
06/08/2026

सारी चीजे तय कर दी गयी है, फीस बढ़ा दिया गया है पर ये तय नहीं किया गया है की तय समय सीमा 30 दिन के भीतर काम न होने की दशा में सम्बंधित अधिकारी और कामचोर सरकारी कर्मचारियो पर क्या कार्यवाही की जायेगी और क्या उन पर भी अर्थ दण्ड लगाया जायेगा I विलम्ब शुल्क हमेशा जनता ही क्यों भरे, यदि सरकारी कर्मचारी समय पर कार्य नहीं करते तो उनसे भी विलम्ब शुल्क वसूलना चाहिए अतः सरकार से निवेदन है की नयी जन्म एवं मृत्यु रजिस्ट्रीकरण नियमावली-2026 को संसोधित कर पुनः लागू करे I 🙏🙏🙏

⚖️  इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हत्या के एक दोषी को दी गई जमानत और सजा पर रोक के आदेश को वापस लेने की मांग वाली जनहित याचिका को...
04/07/2026

⚖️ इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हत्या के एक दोषी को दी गई जमानत और सजा पर रोक के आदेश को वापस लेने की मांग वाली जनहित याचिका को खारिज करते हुए याचिकाकर्ता पर ₹50,000 का जुर्माना लगाया है। यह फैसला जस्टिस जे. जे. मुनीर और जस्टिस अरुण कुमार की खंडपीठ ने सुनाया। अदालत ने याचिका में की गई मांगों को "चौंकाने वाली" और "बेहद अनुचित" बताते हुए कहा कि इस तरह की प्रार्थनाएं कभी भी किसी याचिका का हिस्सा नहीं बननी चाहिए।

यह जनहित याचिका लालचंद यादव द्वारा दायर की गई थी, जिसमें उत्तर प्रदेश सरकार, वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक और संबंधित थाना प्रभारी को निर्देश देने की मांग की गई थी कि वे हाईकोर्ट की खंडपीठ द्वारा हत्या के दोषी को दी गई जमानत और सजा पर रोक के आदेश को वापस लें। इसके अलावा, हाईकोर्ट में लंबित आपराधिक अपील को सांसद-विधायक मामलों की विशेष अदालत में स्थानांतरित करने की भी मांग की गई थी।

सुनवाई के दौरान अदालत ने स्पष्ट किया कि जिस अधिकार क्षेत्र का उपयोग किया गया और जिस प्रकार की राहत मांगी गई, वह पूरी तरह कानून के विपरीत थी। कोर्ट ने याचिकाकर्ता के वकील की भी कड़ी आलोचना करते हुए कहा कि एक अधिवक्ता का दायित्व है कि वह तथ्यों को कानून के अनुरूप अदालत के समक्ष प्रस्तुत करे, न कि ऐसी मांगों को याचिका का हिस्सा बनाए जो पहली नजर में ही अस्वीकार्य हों। अदालत ने टिप्पणी की कि इतना समझने के लिए कानून का गहन प्रशिक्षण भी आवश्यक नहीं है कि इस प्रकार का निर्देश मांगना पूरी तरह बेतुका है और ऐसी प्रार्थना कभी लिखी ही नहीं जानी चाहिए।

अपने फैसले में हाईकोर्ट ने समाज में कानून के प्रति घटती जागरूकता पर भी गंभीर चिंता व्यक्त की। पीठ ने कहा कि आज नागरिकों में कानून की सामान्य समझ लगातार कम होती जा रही है और "कानून की समझ आज अपने सबसे निचले स्तर पर पहुंच गई है।" अदालत ने कहा कि विज्ञान और अन्य विषयों के बढ़ते प्रभाव के बीच कानूनी जागरूकता का स्तर चिंताजनक रूप से घटा है।

इन टिप्पणियों के साथ हाईकोर्ट ने जनहित याचिका को खारिज करते हुए याचिकाकर्ता पर ₹50,000 का जुर्माना लगाया और निर्देश दिया कि यह राशि 15 दिनों के भीतर हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल के पास जमा कराई जाए। यदि तय समय के भीतर जुर्माना जमा नहीं किया जाता है, तो इसकी वसूली भू-राजस्व बकाया की तरह की जाएगी।

आप इस फैसले पर क्या सोचते हैं? क्या निराधार और अनुचित जनहित याचिकाओं पर अदालत की ऐसी सख्ती न्याय व्यवस्था को मजबूत करेगी? अपनी राय कमेंट में जरूर बताएं।

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03/07/2026

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