SKP Legal Adviser

SKP Legal Adviser SKP Legal Adviser is a corporate and commercial law firm based in Agra, Uttar Pradesh, India.

The firm offers a comprehensive range of legal services, including:

Securitisation
Intellectual Property Rights
Family law, Criminal Law (Fraud Investigation)

वकील का खर्च नहीं उठा सकता आरोपी तो कोर्ट दे कानूनी सहायता : सुप्रीम कोर्ट      #सुप्रीमकोर्ट
17/02/2026

वकील का खर्च नहीं उठा सकता आरोपी तो कोर्ट दे कानूनी सहायता : सुप्रीम कोर्ट
#सुप्रीमकोर्ट

08/02/2026

भरण पोषण की बकाया राशि में एक साथ रिकवरी और गिरफ्तारी वारंट जारी करना अवैध है ।।

मोहम्मद शहजाद बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और 2 अन्य
Application no. 39747/2025
"अदालतों द्वारा भरण-पोषण के आदेशों को लागू करने में अत्यधिक उत्साह दिखाते हुए उनकी व्यक्तिगत गरिमा और स्वतंत्रता को कुचला नहीं जा सकता, भले ही वे इस निष्कर्ष पर पहुंचें कि न्यायालय के आदेश के अनुसार भरण-पोषण के बकाया का जानबूझकर भुगतान नहीं किया गया है।"

न्यायमूर्ति:- राजीव लोचन शुक्ला
इलाहाबाद उच्च न्यायालय

इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति राजीव लोचन शुक्ला ने मोहम्मद शहजाद बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और 2 अन्य (2026) के मामले में अलीगढ़ परिवार न्यायालय के अतिरिक्त प्रधान न्यायाधीश के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें भरण-पोषण बकाया की वसूली के लिए याचिकाकर्ता के खिलाफ एक साथ वसूली और गिरफ्तारी वारंट जारी किए गए थे, और इस नियमित प्रथा को अवैध और अमानवीय घोषित किया।

मामले की पृष्ठभूमि क्या थी?
मोहम्मद शहजाद ने परिवार न्यायालय के आदेश को चुनौती देते हुए बीएनएसएस की धारा 528 के तहत याचिका दायर की थी।
अलीगढ़ स्थित परिवार न्यायालय के अतिरिक्त प्रधान न्यायाधीश ने भरण-पोषण की बकाया राशि की वसूली के लिए याचिकाकर्ता के खिलाफ एक साथ वसूली और गिरफ्तारी वारंट जारी किए थे ।
याचिकाकर्ता के वकील ने तर्क दिया कि भरण-पोषण आदेशों को लागू किया जाना चाहिए, लेकिन प्रक्रिया राजनेश बनाम नेहा और अन्य (2021) में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के अनुसार विशिष्ट वैधानिक प्रावधानों का उल्लंघन नहीं कर सकती है।
राज्य की ओर से पेश हुए अतिरिक्त सरकारी अधिवक्ता (एजीए) ने स्वीकार किया कि धारा 125(3) और 128 सीआरपीसी के तहत निर्धारित प्रक्रिया का पालन किए बिना भरण-पोषण के बकाया की वसूली के लिए कोई गिरफ्तारी वारंट जारी नहीं किया जा सकता है।
हालांकि, एजीए ने यह तर्क दिया कि आवेदक ने पहले भी उच्च न्यायालय द्वारा निर्देशित भुगतान किश्तों का भुगतान करने में चूक की थी।

26/01/2026

18 वर्ष की आयु पूरी होने पर बेटा पिता से भरण-पोषण का हकदार नहीं:-हाईकोर्ट
वयस्क पुत्र को भरण-पोषण का अधिकार नहीं, अपवाद केवल विशेष परिस्थितियों में
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने भरण-पोषण से जुड़े एक मामले में स्पष्ट किया है कि पुत्र के 18 वर्ष की आयु पूरी करने के बाद वह सामान्य परिस्थितियों में पिता से भरण-पोषण का अधिकार नहीं रखता कोर्ट ने कहा कि कानून के अनुसार वयस्क पुत्र को भरण-पोषण देने की बाध्यता नहीं है।
अदालत ने यह भी कहा कि भरण-पोषण का अधिकार केवल नाबालिग संतान या ऐसी संतान को दिया जा सकता है, जो शारीरिक या मानसिक रूप से असमर्थ हो और स्वयं अपना भरण-पोषण करने में अक्षम हो सक्षम वयस्क पुत्र इस श्रेणी में नहीं आता।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि भरण-पोषण के मामलों में निर्णय भावनात्मक आधार पर नहीं बल्कि वैधानिक प्रावधानों के अनुसार किया जाना चाहिए। यदि वयस्क पुत्र की असमर्थता सिद्ध नहीं होती, तो भरण-पोषण का आदेश टिकाऊ नहीं माना जा सकता।

10/01/2026

भारत की न्यायिक व्यवस्था (Judicial System) विश्व की सबसे विस्तृत और सुव्यवस्थित प्रणालियों में से एक है। नीचे मैं भारत की अदालतों में जजों के प्रकार, उनके कार्य और पूरी न्यायिक प्रक्रिया को सरल, क्रमबद्ध और परीक्षा-उपयोगी तरीके से समझा रहा हूँ।

1. भारत की न्यायिक संरचना (Judicial Hierarchy)

भारत में न्यायपालिका तीन स्तरों में विभाजित है:

सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court)

उच्च न्यायालय (High Courts)

अधीनस्थ न्यायालय (Subordinate Courts)

2. जजों के प्रकार और उनके कार्य
(क) सर्वोच्च न्यायालय के जज

पद

भारत के मुख्य न्यायाधीश (Chief Justice of India – CJI)

अन्य न्यायाधीश

नियुक्ति

राष्ट्रपति द्वारा (कॉलेजियम प्रणाली के तहत)

कार्य

संविधान की अंतिम व्याख्या करना

मौलिक अधिकारों की रक्षा

केंद्र और राज्यों के बीच विवाद सुलझाना

हाई कोर्ट के फैसलों के विरुद्ध अपील सुनना

जनहित याचिका (PIL) सुनना

(ख) उच्च न्यायालय के जज

पद

मुख्य न्यायाधीश (Chief Justice)

अन्य न्यायाधीश

नियुक्ति

राष्ट्रपति द्वारा

कार्य

राज्य/केंद्रशासित प्रदेश में कानून की व्याख्या

अधीनस्थ अदालतों की निगरानी

निचली अदालतों के फैसलों पर अपील सुनना

रिट जारी करना (Article 226)

(ग) जिला एवं अधीनस्थ न्यायालयों के जज
1. जिला न्यायाधीश (District Judge)

कार्य

जिले की सर्वोच्च अदालत का संचालन

गंभीर आपराधिक और बड़े दीवानी मामलों की सुनवाई

अधीनस्थ अदालतों के फैसलों पर अपील

2. अतिरिक्त जिला न्यायाधीश

जिला न्यायाधीश की सहायता करना

3. सिविल जज

संपत्ति, विवाह, अनुबंध जैसे दीवानी मामलों की सुनवाई

4. न्यायिक मजिस्ट्रेट

आपराधिक मामलों की सुनवाई

जमानत, रिमांड, ट्रायल

(घ) विशेष अदालतों के जज

उदाहरण

पारिवारिक न्यायालय

किशोर न्यायालय

भ्रष्टाचार निरोधक अदालत

NIA / CBI अदालत

कार्य

विशेष कानूनों से जुड़े मामलों की सुनवाई

10/01/2026

भारत में ट्रायल कोर्ट में केस चलने की चरणबद्ध प्रक्रिया
(सिविल और आपराधिक—दोनों का संक्षेप में विवरण)

1) सिविल केस की प्रक्रिया

वाद दायर (Plaint/Petition) – वादी द्वारा केस फाइल।

नोटिस जारी – प्रतिवादी को समन।

लिखित बयान (Written Statement) – प्रतिवादी का जवाब।

मुद्दे तय (Framing of Issues) – कोर्ट विवाद के बिंदु तय करती है।

साक्ष्य (Evidence) –

वादी का साक्ष्य व जिरह

प्रतिवादी का साक्ष्य व जिरह

अंतिम बहस – दोनों पक्षों की दलीलें।

निर्णय (Judgment) – कोर्ट का फैसला।

डिक्री/कार्यान्वयन – फैसले का अमल।

2) आपराधिक केस की प्रक्रिया

FIR/शिकायत – पुलिस/कोर्ट में।

जांच – पुलिस जांच।

चार्जशीट/क्लोजर – पुलिस रिपोर्ट।

संज्ञान व समन – कोर्ट द्वारा आरोपी को बुलावा।

आरोप तय (Charge Framing) – आरोप स्पष्ट।

अभियोजन साक्ष्य – गवाह व जिरह।

आरोपी का बयान (313 CrPC) – स्पष्टीकरण।

बचाव साक्ष्य (यदि कोई)

अंतिम बहस

फैसला – दोषसिद्धि/बरी।

सजा/रिहाई – आवश्यकतानुसार।

नोट: प्रक्रिया केस के प्रकार, कानून (CPC/CrPC), और राज्य/कोर्ट के अनुसार थोड़ी बदल सकती है।

ससुराल में यौन उत्पीड़न भी दहेज उत्पीड़ना के दायरे में:-दिल्ली हाईकोर्टदिल्ली हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में स्पष्ट किया ह...
31/12/2025

ससुराल में यौन उत्पीड़न भी दहेज उत्पीड़ना के दायरे में:-दिल्ली हाईकोर्ट

दिल्ली हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में स्पष्ट किया है कि यदि ससुराल पक्ष द्वारा महिला के साथ यौन उत्पीड़न किया जाता है, तो उसे केवल अलग अपराध मानकर नहीं देखा जाएगा, बल्कि वह दहेज उत्पीड़न की श्रेणी में भी आएगा। अदालत ने कहा कि ऐसे मामलों में अलग से सुनवाई की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि यह आचरण महिला के प्रति की गई शारीरिक और मानसिक क्रूरता का ही हिस्सा है।
कोर्ट के अनुसार, दहेज के लिए प्रताड़ना केवल पैसों या सामान की मांग तक सीमित नहीं है, बल्कि महिला की गरिमा और शारीरिक स्वतंत्रता को ठेस पहुंचाने वाले कृत्य भी उसी श्रेणी में आते हैं। इस फैसले का उद्देश्य कानून की व्यापक और वास्तविक व्याख्या करना है, ताकि पीड़िता को न्याय मिल सके और अपराध की गंभीरता को कम करके न आंका जाए।
हालांकि, कि ऐसे मामलों में निष्पक्ष जांच और ठोस साक्ष्य बेहद जरूरी हैं, ताकि कानून का दुरुपयोग न हो और निर्दोष व्यक्तियों को झूठे आरोपों का सामना न करना पड़े। न्याय तभी संतुलित होगा, जब पीड़ित को संरक्षण और आरोपी को निष्पक्ष सुनवाई—दोनों समान रूप से मिलें।

27/10/2025
12/10/2025

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12/10/2025

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