31/07/2026
हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 13(1) (तलाक) या धारा 13A (Alternate Relief) से है, तो यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि:
धारा 13A केवल यह शक्ति देती है कि यदि पति या पत्नी ने धारा 13(1) के किसी आधार पर तलाक की याचिका दायर की है (कुछ अपवादों को छोड़कर), तो न्यायालय परिस्थितियों को देखते हुए तलाक के बजाय Judicial Separation (न्यायिक पृथक्करण) की डिक्री दे सकता है।
यदि पति तलाक की याचिका दाखिल करना चाहता है, तो सबसे मजबूत आधार सामान्यतः ये होते हैं:
1. क्रूरता (Section 13(1)(ia))
झूठे 498A, दहेज या अन्य आपराधिक मुकदमे।
निराधार चरित्र हनन।
मानसिक उत्पीड़न।
वैवाहिक दायित्वों का लगातार उल्लंघन।
2. परित्याग (Section 13(1)(ib))
पत्नी बिना उचित कारण लगातार कम से कम 2 वर्ष से अलग रह रही हो।
प्रमुख सुप्रीम कोर्ट के निर्णय
1. Samar Ghosh v. Jaya Ghosh (2007) 4 SCC 511
मानसिक क्रूरता के सिद्धांतों का विस्तृत प्रतिपादन।
यह निर्णय मानसिक क्रूरता के मामलों में सबसे अधिक उद्धृत किया जाता है।
2. K. Srinivas Rao v. D.A. Deepa (2013) 5 SCC 226
झूठे आपराधिक मुकदमे और निराधार आरोप मानसिक क्रूरता हैं तथा तलाक का आधार बन सकते हैं।
3. Mangayakarasi v. M. Yuvaraj (2020) 3 SCC 786
झूठे एवं अपमानजनक आरोप मानसिक क्रूरता माने गए।
4. Naveen Kohli v. Neelu Kohli (2006) 4 SCC 558
लंबे समय तक वैवाहिक संबंधों का टूट जाना और लगातार मुकदमेबाजी मानसिक क्रूरता का महत्वपूर्ण संकेत माना गया।
5. हाल का सुप्रीम कोर्ट निर्णय (2025–26)
यदि पति-पत्नी लंबे समय तक अलग रह रहे हों और वैवाहिक संबंध पूरी तरह समाप्त हो चुके हों, तो इसे मानसिक क्रूरता के रूप में भी देखा जा सकता है।
महत्वपूर्ण हाईकोर्ट निर्णय
A.K. v. S.S.K. (Delhi High Court, 27.11.2018)
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि धारा 13A का उपयोग तथ्यों और परिस्थितियों के अनुसार ही किया जा सकता है; यह स्वतः लागू नहीं होती।
Kerala High Court (Mat. Appeal Nos. 148 & 245 of 2014)
न्यायालय ने धारा 13A की व्याख्या करते हुए कहा कि यदि परिस्थितियाँ उचित हों, तो तलाक के स्थान पर Judicial Separation का आदेश दिया जा सकता है।
यदि पति की ओर से हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 13(1)(ia) (Cruelty) के आधार पर तलाक की याचिका दाखिल की जा रही है, तो निम्नलिखित सुप्रीम कोर्ट के निर्णय सबसे अधिक प्रभावी माने जाते हैं:
1. Samar Ghosh v. Jaya Ghosh, (2007) 4 SCC 511
मानसिक क्रूरता (Mental Cruelty) पर सबसे महत्वपूर्ण निर्णय।
न्यायालय ने कई उदाहरण दिए कि कौन-कौन से आचरण मानसिक क्रूरता माने जाएंगे, जैसे निराधार आरोप, वैवाहिक संबंधों से लगातार इंकार, अपमानजनक व्यवहार आदि।
2. K. Srinivas Rao v. D.A. Deepa, (2013) 5 SCC 226
पत्नी द्वारा झूठे आपराधिक मुकदमे (498A, दहेज आदि) और लगातार मुकदमेबाजी को मानसिक क्रूरता माना।
सुप्रीम कोर्ट ने पति को तलाक की डिक्री प्रदान की।
3. Naveen Kohli v. Neelu Kohli, (2006) 4 SCC 558
झूठे आरोप, लगातार मुकदमे और वैवाहिक संबंधों का पूरी तरह टूट जाना मानसिक क्रूरता माना गया।
न्यायालय ने "Irretrievable Breakdown of Marriage" को भी महत्वपूर्ण परिस्थिति माना।
4. Mangayakarasi v. M. Yuvaraj, (2020) 3 SCC 786
पति पर लगाए गए झूठे और अपमानजनक आरोप मानसिक क्रूरता माने गए और तलाक का आधार स्वीकार किया गया।
5. Joydeep Majumdar v. Bharti Jaiswal Majumdar, (2021)
जीवनसाथी के चरित्र पर निराधार आरोप और सार्वजनिक अपमान को मानसिक क्रूरता माना गया।
परित्याग (Desertion) के लिए महत्वपूर्ण निर्णय
Bipinchandra Jaisinghbhai Shah v. Prabhavati (1957) – परित्याग सिद्ध करने के दो आवश्यक तत्व बताए गए:
1. वास्तविक रूप से अलग रहना (Factum of Separation)
2. वैवाहिक संबंध समाप्त करने का इरादा (Animus Deserendi)
यदि पत्नी ने झूठे मुकदमे दर्ज किए हों
निम्न निर्णय विशेष रूप से उपयोगी हैं:
K. Srinivas Rao v. D.A. Deepa (2013)
Mangayakarasi v. M. Yuvaraj (2020)
Joydeep Majumdar v. Bharti Jaiswal Majumdar (2021)
इन निर्णयों में सुप्रीम कोर्ट ने माना है कि झूठी एफआईआर, निराधार दहेज/498A के आरोप, चरित्रहनन और लगातार मुकदमेबाजी मानसिक क्रूरता हो सकते हैं और तलाक का आधार बन सकते हैं।